02.Mahabharata Volume 2 — पृष्ठ 1751–1760
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1751–1760
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' ओह! पतनके बाद तो स्वर्गवासी मनुष्योंको अत्यन्त भयंकर महान् दुःख और अनुताप होता है और फिर वे इसी लोकमें विचरते रहते हैं; इसलिये मुझे स्वर्गमें जानेकी इच्छा नहीं है ॥ ४३ ॥
यत्र गत्वा न शोचन्ति न व्यथन्ति चलन्ति वा ।
तदहं स्थानमत्यन्तं मार्गयिष्यामि केवलम् ॥ ४४ ॥
' जहाँ जाकर मनुष्य कभी शोक नहीं करते, व्यथित नहीं होते तथा जहाँसे विचलित नहीं होते हैं । केवल उसी अक्षय धामका मैं अनुसंधान करूँगा' ॥ ४४ ॥
इत्युक्त्वा स मुनिर्वाक्यं देवदूतं विसृज्य तम् ।
शिलोञ्छवृत्तिर्धर्मात्मा शममातिष्ठदुत्तमम् ॥ ४५ ॥
ऐसा कहकर मुद्गल मुनिने उस देवदूतको विदा कर दिया और शिल एवं उञ्छवृत्तिसे जीवन - निर्वाह करनेवाले वे धर्मात्मा महर्षि उत्तम रीति से शम- दम आदि नियमोंका पालन करने लगे ॥ ४५ ॥
तुल्यनिन्दास्तुतिर्भूत्वा समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
ज्ञानयोगेन शुद्धेन ध्याननित्यो बभूव ह ॥ ४६ ॥
उनकी दृष्टिमें निन्दा और स्तुति समान हो गयी । वे मिट्टीके ढेले, पत्थर और सुवर्णको समान समझने लगे और विशुद्ध ज्ञानयोगके द्वारा नित्य ध्यानमें तत्पर रहने लगे ॥
ध्यानयोगाद् बलं लब्ध्वा प्राप्य बुद्धिमनुत्तमाम् ।
जगाम शाश्वतीं सिद्धिं परां निर्वाणलक्षणाम् ॥ ४७ ॥
ध्यानसे ( परम वैराग्यका ) बल पाकर उन्हें उत्तम बोध प्राप्त हुआ और उसके द्वारा उन्होंने सनातन मोक्षरूपा परम सिद्धि प्राप्त कर ली ॥ ४७ ॥
तस्मात् त्वमपि कौन्तेय न शोकं कर्तुमर्हसि ।
राज्यात् स्फीतात् परिभ्रष्टस्तपसा तदवाप्स्यसि ॥ ४८ ॥
कुन्तीनन्दन! इसलिये तुम भी समृद्धिशाली राज्यसे भ्रष्ट होनेके कारण शोक न करो; तपस्याद्वारा तुम उसे प्राप्त कर लोगे ॥ ४८ ॥
सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम् ।
पर्यायेणोपसर्पन्ते नरं नेमिमरा इव ॥ ४ ९ ॥
मनुष्यपर सुखके बाद दुःख और दुःखके बाद सुख बारी- बारीसे आते रहते हैं । जैसे अरे नेमिसे जुड़े हुए ऊँचे - नीचे आते रहते हैं, वैसे ही मनुष्यका दुःख - सुखसे सम्बन्ध होता रहता है ॥ ४ ९ ॥
पितृपैतामहं राज्यं प्राप्स्यस्यमितविक्रम ।
वर्षात् त्रयोदशादूर्ध्वं व्येतु ते मानसो ज्वरः ॥ ५० ॥
अमितपराक्रमी युधिष्ठिर! तुम तेरहवें वर्षके बाद अपने बाप-दादोंका राज्य प्राप्त कर लोगे, अतः अब तुम्हारी मानसिक चिन्ता दूर हो जानी चाहिये ॥ ५० ॥
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वैशम्पायन उवाच
स एवमुक्त्वा भगवान् व्यासः पाण्डवनन्दनम् ।
जगाम तपसे धीमान् पुनरेवाश्रमं प्रति ॥ ५१ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! परम बुद्धिमान् भगवान् व्यास पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर तपस्याके लिये पुनः अपने आश्रमकी ओर चले गये ॥ ५१ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि व्रीहिद्रौणिकपर्वणि मुद्गलदेवदूतसंवादे एकषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २६१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत व्रीहिद्रौणिकपर्वमें मुद्गल- देवदूत- संवादविषयक दो सौ इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६१ ॥
• मुद्गल ऋषिको ही ' मौद्गल्य' भी कहा है ।
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(द्रौपदीहरणपर्व) द्विषष्टयधिकद्विशततमोऽध्यायः दुर्योधनका महर्षि दुर्वासाको आतिथ्यसत्कारसे संतुष्ट करके उन्हें युधिष्ठिरके पास भेजकर प्रसन्न होना जनमेजय उवाच
वसत्स्वेवं वने तेषु पाण्डवेषु महात्मसु ।
रममाणेषु चित्राभिः कथाभिर्मुनिभिः सह ॥ १ ॥
सूर्यदत्ताक्षयान्नेव कृष्णाया भोजनावधि ।
ब्राह्मणांस्तर्पमाणेषु ये चान्नार्थमुपागताः ॥ २ ॥
धार्तराष्ट्रा दुरात्मानः सर्वे दुर्योधनादयः ।
कथं तेष्वन्ववर्तन्त पापाचारा महामुने ॥ ३ ॥
दुःशासनस्य कर्णस्य शकुनेश्च मते स्थिताः ।
एतदाचक्ष्व भगवन् वैशम्पायन पृच्छतः ॥ ४ ॥
जनमेजयने पूछा— महामुनि वैशम्पायनजी! जब महात्मा पाण्डव इस प्रकार वनमें रहकर मुनियोंके साथ विचित्र कथा- वार्ताद्वारा मनोरञ्जन करते थे तथा जबतक द्रौपद्री भोजन न कर ले, तबतक सूर्यके दिये हुए अक्षयपात्रसे प्राप्त होनेवाले अन्नसे वे उन ब्राह्मणोंको तृप्त करते थे, जो भोजनके लिये उनके पास आये होते थे; उन दिनों दुःशासन, कर्ण और शकुनिके मतके अनुसार चलनेवाले पापाचारी दुरात्मा दुर्योधन आदि धृतराष्ट्रपुत्रोंने उन पाण्डवोंके साथ कैसा बर्ताव किया? भगवन्! मेरे प्रश्नके अनुसार ये सब बातें कहिये ॥ १–४ ॥ वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा तेषां तथा वृत्तिं नगरे वसतामिव ।
दुर्योधनो महाराज तेषु पापमरोचयत् ॥ ५ ॥
वैशम्पायनजीने कहा - महाराज! जब दुर्योधनने सुना कि पाण्डवलोग तो वनमें भी उसी प्रकार दान - पुण्य करते हुए आनन्दसे रह रहे हैं, जैसे नगरके निवासी रहा करते हैं, तब उसने उनका अनिष्ट करनेका विचार किया ॥ ५ ॥
तथा तैर्निकृतिप्रज्ञैः कर्णदुःशासनादिभिः ।
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नानोपायैरघं तेषु चिन्तयत्सु दुरात्मसु ॥ ६ ॥
अभ्यागच्छत् स धर्मात्मा तपस्वी सुमहायशाः ।
शिष्यायुतसमोपेतो दुर्वासा नाम कामतः ॥ ७ ॥
इस प्रकार सोचकर छल- कपटकी विद्यामें निपुण कर्ण और दुःशासन आदिके साथ जब वे दुरात्मा धृतराष्ट्र - पुत्र भाँति- भाँतिके उपायोंसे पाण्डवोंको संकटमें डालनेकी युक्तिका विचार कर रहे थे, उसी समय महायशस्वी धर्मात्मा तपस्वी महर्षि दुर्वासा अपने दस हजार शिष्योंको साथ लिये हुए वहाँ स्वेच्छासे ही आ पहुँचे ॥ ६-७ ॥
तमागतमभिप्रेक्ष्य मुनिं परमकोपनम् ।
दुर्योधनो विनीतात्मा प्रश्रयेण दमेन च ॥ ८ ॥
सहितो भ्रातृभिः श्रीमानातिथ्येन न्यमन्त्रयत् । परम क्रोधी दुर्वासा मुनिको आया देख भाइयों सहित श्रीमान् राजा दुर्योधनने अपनी इन्द्रियोंको काबूमें रखकर नम्रतापूर्वक विनीतभावसे उन्हें अतिथिसत्कारके रूपमें निमन्त्रित किया ॥ ८३ ॥
विधिवत् पूजयामास स्वयं किङ्करवत् स्थितः ॥ ९ ॥
अहानि कतिचित् तत्र तस्थौ स मुनिसत्तमः ।
दुर्योधनने स्वयं दासकी भाँति उनकी सेवामें खड़े रहकर विधिपूर्वक उनकी पूजा की ।
मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा कई दिनोंतक वहाँ ठहरे रहे ॥ ९ ३ ॥
तं च पर्यचरद् राजा दिवारात्रमतन्द्रितः ॥ १० ॥
दुर्योधनो महाराज शापात् तस्य विशङ्कितः । महाराज जनमेजय! राजा दुर्योधन (श्रद्धासे नहीं, अपितु उनके शापसे डरता हुआ दिन - रात आलस्य छोड़कर उनकी सेवामें लगा रहा ॥ १०३ ॥
क्षुधितोऽस्मि ददस्वान्नं शीघ्रं मम नराधिप ॥ ११ ॥
इत्युक्त्वा गच्छति स्नातुं प्रत्यागच्छति वै चिरात् ।
न भोक्ष्याम्यद्य मे नास्ति क्षुधेत्युक्त्वैत्यदर्शनम् ॥ १२ ॥
वे मुनि कभी कहते कि ' राजन्! मैं बहुत भूखा हूँ, मुझे शीघ्र भोजन दो' ऐसा कहकर वे स्नान करनेके लिये चले जाते और बहुत देरके बाद लौटते थे । लौटकर वे कह देते — ' मैं नहीं खाऊँगा; आज मुझे भूख नहीं है ' ऐसा कहकर अदृश्य हो जाते थे ॥ ११-१२ ॥
अकस्मादेत्य च ब्रूते भोजयास्मांस्त्वरान्वितः ।
कदाचिच्च निशीथे स उत्थाय निकृतौ स्थितः ॥ १३ ॥
पूर्ववत् कारयित्वान्नं न भुङ्क्ते गर्हयन् स्म सः । फिर कहींसे अकस्मात् आकर कहते- ' हमलोगोंको जल्दी भोजन कराओ । ' कभी आधी रातमें उठकर उसे नीचा दीखानेके लिये उद्यत हो पूर्ववत् भोजन बनवाकर उस भोजनकी निन्दा करते हुए भोजन करनेसे इनकार कर देते थे ॥ १३३ ॥
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वर्तमाने तथा तस्मिन् यदा दुर्योधनो नृपः ॥ १४ ॥
विकृतिं नैति न क्रोधं तदा तुष्टोऽभवन्मुनिः ।
आह चैनं दुराधर्षो वरदोऽस्मीति भारत ॥ १५ ॥
भारत! ऐसा उन्होंने कई बार किया, तो भी जब राजा दुर्योधनके मनमें विकार या क्रोध नहीं उत्पन्न हुआ, तब वे दुर्धर्ष मुनि उसपर बहुत प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले — ' मैं तुम्हें वर देना चाहता हूँ' ॥ १४-१५ ॥ दुर्वासाउवाच
वरं वरय भद्रं ते यत् ते मनसि वर्तते ।
मयि प्रीते तु यद् धर्म्यं नालभ्यं विद्यते तव ॥ १६ ॥
दुर्वासा बोले- राजन्! तुम्हारा कल्याण हो । तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसके लिये वर माँगो । मेरे प्रसन्न होनेपर जो धर्मानुकूल वस्तु होगी, वह तुम्हारे लिये अलभ्य नहीं रहेगी ॥ १६ ॥
वैशम्पायन उवाच
एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य महर्षेर्भावितात्मनः ।
अमन्यत पुनर्जातमात्मानं स सुयोधनः ॥ १७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! शुद्ध अन्तःकरणवाले महर्षि दुर्वासाका यह वचन सुनकर दुर्योधनने मन-ही- मन ऐसा समझा, मानो उसका नया जन्म हुआ हो ॥ १७ ॥
प्रागेव मन्त्रितं चासीत् कर्णदुःशासनादिभिः ।
याचनीयं मुनेस्तुष्टादिति निश्चित्य दुर्मतिः ॥ १८ ॥
अतिहर्षान्वितो राजन् वरमेनमयाचत ।
शिष्यैः सह मम ब्रह्मन् यथा जातोऽतिथिर्भवान् ॥ १ ९ ॥
अस्मत्कुले महाराजो ज्येष्ठः श्रेष्ठो युधिष्ठिरः ।
वने वसति धर्मात्मा भ्रातृभिः परिवारितः ॥ २० ॥
गुणवान् शीलसम्पन्नस्तस्य त्वमतिथिर्भव । तो क्या माँगना चाहिये, इस बातके लिये कर्ण और,साथमुनिउसकीसंतुष्टपहलेसेहों ही सलाह हो चुकी थी । राजन्! उसी निश्चयकेदुःशासनअनुसार आदिकेदुर्बुद्धि दुर्योधनने अत्यन्त प्रसन्न होकर यह वर माँगा- 'ब्रह्मन्! हमारे कुलमें महाराज युधिष्ठिर सबसे ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हैं । इस समय वे धर्मात्मा पाण्डुकुमार अपने भाइयोंके साथ वनमें निवास करते हैं । युधिष्ठिर बड़े गुणवान् और सुशील हैं । जिस प्रकार आप मेरे अतिथि हुए, उसी तरह शिष्योंके सहित आप उनके भी अतिथि होइये ॥ १८–२०३ ॥ यदा च राजपुत्री सा सुकुमारी यशस्विनी ॥ २१ ॥
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भोजयित्वा द्विजान् सर्वान् पतींश्च वरवर्णिनी ।
विश्रान्ता च स्वयं भुक्त्वा सुखासीना भवेद् यदा ॥ २२ ॥
तदा त्वं तत्र गच्छेथा यद्यनुग्राह्यता मयि । ' यदि आपकी मुझपर कृपा हो तो मेरी प्रार्थनासे आप वहाँ ऐसे समयमें जाइयेगा, जब परम सुन्दरी यशस्विनी सुकुमारी राजकुमारी द्रौपदी समस्त ब्राह्मणों तथा पाँचों पतियोंको भोजन कराकर स्वयं भी भोजन करनेके पश्चात् सुखपूर्वक बैठकर विश्राम कर रही हो' ॥ २१-२२ ॥ तथा करिष्ये त्वत्प्रीत्येत्येवमुक्त्वा सुयोधनम् ॥ २३ ॥
दुर्वासा अपि विप्रेन्द्रो यथागतमगात् ततः ।
कृतार्थमपि चात्मानं तदा मेने सुयोधनः ॥ २४ ॥
' तुमपर प्रेम होनेके कारण मैं वैसा ही करूंगा ', दुर्योधनसे ऐसा कहकर विप्रवर दुर्वासा जैसे आये थे, वैसे ही चले गये । उस समय दुर्योधनने अपने- आपको कृतार्थ माना ॥ २३-२४ ॥
करेण च करं गृह्य कर्णस्य मुदितो भृशम् ।
कर्णोऽपि भ्रातृसहितमित्युवाच नृपं मुदा ॥ २५ ॥
वह कर्णका हाथ अपने हाथमें लेकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ । कर्णने भी भाइयोंसहित राजा दुर्योधनसे बड़े हर्षके साथ इस प्रकार कहा ॥ २५ ॥
कर्णउवाच
दिष्टया कामः सुसंवृत्तो दिष्टया कौरव वर्धसे ।
दिष्टया ते शत्रवो मग्ना दुस्तरे व्यसनार्णवे ॥ २६ ॥
कर्ण बोला –— कुरुनन्दन! सौभाग्यसे हमारा काम बन गया । तुम्हारा अभ्युदय हो रहा है, यह भी भाग्यकी ही बात है । तुम्हारे शत्रु विपत्तिके अपार महासागरमें डूब गये, यह कितने सौभाग्यकी बात है? ॥ २६ ॥
दुर्वासःक्रोधजे वह्नौ पतिताः पाण्डुनन्दनाः ।
स्वैरेव ते महापापैर्गता वै दुस्तरं तमः ॥ २७ ॥
पाण्डव दुर्वासाकी क्रोधाग्निमें गिर गये हैं और अपने ही महापापोंके कारण वे दुस्तर नरकमें जा पड़े हैं ॥ वैशम्पायन उवाच
इत्थं ते निकृतिप्रज्ञा राजन् दुर्योधनादयः ।
हसन्तः प्रीतमनसो जग्मुः स्वं स्वं निकेतनम् ॥ २८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! छल- कपटकी विद्यामें प्रवीण दुर्योधन आदि इस प्रकार बातें करते और हँसते हुए प्रसन्न मनसे अपने- अपने भवनोंमें गये ॥ २८ ॥
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि द्रौपदीहरणपर्वणि दुर्वासउपाख्याने द्विषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २६२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत द्रौपदीहरणपर्वमें दुर्वासाका उपाख्यानविषयक दो सौ बासठवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २६२ ॥
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त्रिषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः दुर्वासाका पाण्डवोंके आश्रमपर असमयमें आतिथ्यके लिये जाना, द्रौपदीके द्वारा स्मरण किये जानेपर भगवान्का प्रकट होना तथा पाण्डवोंको दुर्वासाके भयसे मुक्त करना और उनको आश्वासन देकर द्वारका जाना वैशम्पायन उवाच
ततः कदाचिद् दुर्वासाः सुखासीनांस्तु पाण्डवान् ।
भुक्त्वा चावस्थितां कृष्णां ज्ञात्वा तस्मिन् वने मुनिः ॥ १ ॥
अभ्यागच्छत् परिवृतः शिष्यैरयुतसम्मितैः । वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तदनन्तर एक दिन महर्षि दुर्वासा इस बातका पता लगाकर कि पाण्डवलोग भोजन करके सुखपूर्वक बैठे हैं और द्रौपदी भी भोजनसे निवृत्त हो आराम कर रही है, दस हजार शिष्योंसे घिरे हुए उस वनमें आये ॥ १३ ॥
दृष्ट्वाऽऽयान्तं तमतिथिं स च राजा युधिष्ठिरः ॥ २ ॥
जगामाभिमुखः श्रीमान् सह भ्रातृभिरच्युतः ।
तस्मै बद्ध्वाञ्जलिं सम्यगुपवेश्य वरासने ॥ ३ ॥
विधिवत् पूजयित्वा तमातिथ्येन न्यमन्त्रयत् ।
आह्निकं भगवन् कृत्वा शीघ्रमेहीति चाब्रवीत् ॥ ४ ॥
श्रीमान् राजा युधिष्ठिर अतिथिको आते देख भाइयोंसहित उनके सम्मुख गये । वे अपनी मर्यादासे कभी च्युत नहीं होते थे । उन्होंने उन अतिथिदेवताको लाकर श्रेष्ठ आसनपर आदरपूर्वक बैठाया और हाथ जोड़कर प्रणाम किया । फिर विधिपूर्वक पूजा करके उन्हें अतिथिसत्कारके रूपमें निमन्त्रित किया और कहा - ' भगवन्! अपना नित्य नियम पूरा करके ( भोजनके लिये ) शीघ्र पधारिये ' ॥ २–४ ॥
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B
जगाम च मुनिः सोऽपि स्नातुं शिष्यैः सहानघः ।
भोजयेत् सहशिष्यं मां कथमित्यविचिन्तयन् ॥ ५ ॥
न्यमज्जत् सलिले चापि मुनिसङ्घः समाहितः । यह सुनकर वे निष्पाप मुनि अपने शिष्योंके साथ स्नान करनेके लिये चले गये । उन्होंने इस बातका तनिक भी विचार नहीं किया कि ये इस समय शिष्योंसहित मुझे भोजन कैसे दे सकेंगे । सारी मुनिमण्डलीने जलमें गोता लगाया, फिर सब लोग एकाग्रचित्त होकर ध्यान करने लगे ॥ ५३ ॥
एतस्मिन्नन्तरे राजन् द्रौपदी योषितां वरा ॥ ६ ॥
चिन्तामवाप परमामन्नहेतोः पतिव्रता । राजन्! इसी समय युवतियोंमें श्रेष्ठ पतिव्रता द्रौपदीको अन्नके लिये बड़ी चिन्ता हुई ॥ ६३ ॥
सा चिन्तयन्ती च सदा नान्नहेतुमविन्दत ॥ ७ ॥
मनसा चिन्तयामास कृष्णं कंसनिषूदनम् । जब बहुत सोचने - विचारनेपर भी उसे अन्न मिलनेका कोई उपाय नहीं सूझा, तब वह मन- ही - मन कंसनिकन्दन आनन्दकन्द भगवान् श्रीकृष्णचन्द्रका स्मरण करने लगी— ॥ ७ ¾ ॥
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कृष्ण कृष्ण महाबाहो देवकीनन्दनाव्यय ॥ ८ ॥
वासुदेव जगन्नाथ प्रणतार्तिविनाशन ।
विश्वात्मन् विश्वजनक विश्वहर्तः प्रभोऽव्यय ॥ ९ ॥
प्रपन्नपाल गोपाल प्रजापाल परात्पर ।
आकूतीनां च चित्तीनां प्रवर्तक नतास्मि ते ॥ १० ॥
'हे कृष्ण! हे महाबाहु श्रीकृष्ण! हे देवकीनन्दन! हे अविनाशी वासुदेव! चरणोंमें पड़े हुए दुखियोंका दुःख दूर करनेवाले हे जगदीश्वर! तुम्हीं सम्पूर्ण जगत्के आत्मा हो । अविनाशी प्रभो! तुम्हीं इस विश्वकी उत्पत्ति और संहार करनेवाले हो । शरणागतोंकी रक्षा करनेवाले गोपाल! तुम्हीं समस्त प्रजाका पालन करनेवाले परात्पर परमेश्वर हो । आकूति ( मन) और चित्ति ( बुद्धि ) -के प्रेरक परमात्मन्! मैं तुम्हें प्रणाम करती हूँ ॥ ८–१० ॥
वरेण्य वरदानन्त अगतीनां गतिर्भव ।
पुराणपुरुष प्राणमनोवृत्त्याद्यगोचर ॥ ११ ॥
सर्वाध्यक्ष पराध्यक्ष त्वामहं शरणं गता ।
पाहि मां कृपया देव शरणागतवत्सल ॥ १२ ॥
' सबके वरण करने योग्य वरदाता अनन्त! आओ । जिन्हें तुम्हारे सिवा दूसरा कोई सहायता देनेवाला नहीं है, उन असहाय भक्तोंकी सहायता करो । पुराणपुरुष! प्राण और मनकी वृत्ति आदि तुम्हारे पासतक नहीं पहुँच सकती। सबके साक्षी परमात्मन्! मैं तुम्हारी शरणमें आयी हूँ । शरणागतवत्सल देव! कृपा करके मुझे बचाओ ' ॥ ११-१२ ॥
नीलोत्पलदलश्याम पद्मगर्भारुणेक्षण ।
पीताम्बरपरीधान लसत्कौस्तुभभूषण ॥ १३ ॥
त्वमादिरन्तो भूतानां त्वमेव च परायणम् ।
परात्परतरं ज्योतिर्विश्वात्मा सर्वतोमुखः ॥ १४ ॥
‘ नीलकमलदलके समान श्यामसुन्दर! कमलपुष्पके भीतरी भागके समान किंचित् लाल नेत्रोंवाले पीताम्बरधारी श्रीकृष्ण! तुम्हारे वक्षःस्थलपर कौस्तुभमणिमय आभूषण शोभा पाता है । प्रभो! तुम्हीं समस्त प्राणियोंके आदि और अन्त हो । तुम्हीं सबके परम आश्रय हो । तुम्हीं परात्पर, ज्योतिर्मय सर्वात्मा एवं सब ओर मुखवाले परमेश्वर हो ॥ १३-१४ ॥
त्वामेवाहुः परं बीजं निधानं सर्वसम्पदाम् ।
त्वया नाथेन देवेश सर्वापद्भ्यो भयं न हि ॥ १५ ॥
' ज्ञानी पुरुष तुम्हें ही इस जगत्का परम बीज और सम्पूर्ण सम्पदाओंकी निधि बतलाते हैं । देवेश्वर! यदि तुम मेरे रक्षक हो तो मुझपर सारी विपत्तियाँ टूट पड़ें, तो भी मुझे उनसे भय नहीं है ' ॥ १५ ॥
दुःशासनादहं पूर्वं सभायां मोचिता यथा ।