श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1761–1770
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1761–1770
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तथैव संकटादस्मान्मामुद्धर्तुमिहार्हसि ॥ १६ ॥
‘ भगवन्! पहले कौरव सभामें दुःशासनके हाथसे जैसे तुमने मुझे बचाया था, उसी प्रकार इस वर्तमान संकटसे भी मेरा उद्धार करो ' ॥ १६ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं स्तुतस्तदा देवः कृष्णया भक्तवत्सलः ।
द्रौपद्याः संकटं ज्ञात्वा देवदेवो जगत्पतिः ॥ १७ ॥
पार्श्वस्थां शयने त्यक्त्वा रुक्मिणीं केशवः प्रभुः ।
तत्राजगाम त्वरितो ह्यचिन्त्यगतिरीश्वरः ॥ १८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - द्रौपदीके इस प्रकार स्तुति करनेपर अचिन्त्यगति परमेश्वर देवाधिदेव जगन्नाथ भक्तवत्सल भगवान् केशवको यह मालूम हो गया कि द्रौपदीपर कोई संकट आ गया है, फिर तो शय्यापर अपने पास ही सोयी हुई रुक्मिणीको छोड़कर तुरंत वहाँ आ पहुँचे ॥ १७-१८ ॥
ततस्तं द्रौपदी दृष्ट्वा प्रणम्य परया मुदा ।
अब्रवीद् वासुदेवाय मुनेरागमनादिकम् ॥ १९ ॥
भगवान्को आया देख द्रौपदीको बड़ा आनन्द हुआ । उसने उन्हें प्रणाम करके दुर्वासा मुनिके आने आदिका सारा समाचार कह सुनाया ॥ १ ९ ॥
ततस्तामब्रवीत् कृष्णः क्षुधितोऽस्मि भृशातुरः ।
शीघ्रं भोजय मां कृष्णे पश्चात् सर्वं करिष्यसि ॥ २० ॥
निशम्य तद्वचः कृष्णा लज्जिता वाक्यमब्रवीत् ।
स्थाल्यां भास्करदत्तायामन्नं मद्भोजनावधि ॥ २१ ॥
भुक्तवत्यस्म्यहं देव तस्मादन्नं न विद्यते । तब भगवान् श्रीकृष्णने द्रौपदीसे कहा – ' कृष्णे! इस समय मुझे बड़ी भूख लगी है; मैं भूखसे अत्यन्त पीड़ित हो रहा हूँ । पहले मुझे जल्दी भोजन करा; फिर सारा प्रबन्ध करती रहना । ' उनकी यह बात सुनकर द्रौपदीको बड़ी लज्जा हुई । वह बोली – ' भगवन्! सूर्यनारायणकी दी हुई बटलोईसे तभीतक भोजन मिलता है जबतक मैं भोजन न कर लूँ । देव! आज तो मैं भी भोजन कर चुकी हूँ; अतः अब उसमें अन्न नहीं रह गया है' ॥ २०-२१ ३ ॥ ततः प्रोवाच भगवान् कृष्णां कमललोचनः ॥ २२ ॥
कृष्णे न नर्मकालोऽयं क्षुच्छ्रमेणातुरे मयि ।
शीघ्रं गच्छ मम स्थालीमानीय त्वं प्रदर्शय ॥ २३ ॥
इति निर्बन्धतः स्थालीमानाय्य स यदूद्वहः ।
स्थाल्याः कण्ठेऽथ संलग्नं शाकान्नं वीक्ष्य केशवः ॥ २४ ॥
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उपयुज्याब्रवीदेनामनेन हरिरीश्वरः ।
विश्वात्मा प्रीयतां देवस्तुष्टश्चास्त्विति यज्ञभुक् ॥ २५ ॥
यह सुनकर कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने द्रौपदीसे फिर कहा - ' कृष्णे! मैं तो भूख और थकावटसे आतुर हो रहा हूँ और तुझे हँसी सूझती है । यह परिहासका समय नहीं है । जल्दी जा और बटलोई लाकर मुझे दिखा । इस प्रकार हठ करके भगवान्ने द्रौपदीसे बटलोई मँगवायी । उसके गलेमें जरा- सा साग लगा हुआ था। उसे देखकर श्रीकृष्णने लेकर खा लिया और द्रौपदीसे कहा - ' इस सागसे सम्पूर्ण विश्वके आत्मा यज्ञभोक्ता सर्वेश्वर भगवान् श्रीहरि तृप्त और संतुष्ट हों' ॥ २२-२५ ॥
आकारय मुनीन् शीघ्रं भोजनायेति चाब्रवीत् ।
सहदेवं महाबाहुः कृष्णः क्लेशविनाशनः ॥ २६ ॥
इतना कहकर सबका क्लेश दूर करनेवाले महाबाहु भगवान् श्रीकृष्ण सहदेवसे बोले - ' तुम शीघ्र जाकर मुनियोंको भोजनके लिये बुला लाओ ' ॥ २६ ॥
ततो जगाम त्वरितः सहदेवो महायशाः ।
आकारितुं तु तान् सर्वान् भोजनार्थं नृपोत्तम ॥ २७ ॥
स्नातुं गतान् देवनद्यां दुर्वासः प्रभृतीन् मुनीन् ।
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नृपश्रेष्ठ! तब महायशस्वी सहदेव देवनदीमें स्नानके लिये गये हुए उन दुर्वासा आदि सब मुनियोंको भोजनके निमित्त बुलानेके लिये तुरंत गये ॥ २७३ ॥
ते चावतीर्णाः सलिले कृतवन्तोऽघमर्षणम् ॥ २८ ॥
दृष्ट्वोद्गारान् सान्नरसांस्तृप्त्या परमया युताः ।
उत्तीर्य सलिलात् तस्माद् दृष्टवन्तः परस्परम् ॥ २ ९ ॥
दुर्वाससमभिप्रेक्ष्य ते सर्वे मुनयोऽब्रुवन् ।
राज्ञा हि कारयित्वान्नं वयं स्नातुं समागताः ॥ ३० ॥
आकण्ठतृप्ता विप्रर्षे किंस्विद् भुञ्जामहे वयम् ।
वृथा पाकः कृतोऽस्माभिस्तत्र किं करवामहे ॥ ३१ ॥
वे मुनिलोग उस समय जलमें उतरकर अघमर्षण मन्त्रका जप कर रहे थे । सहसा उन्हें पूर्ण तृप्तिका अनुभव हुआ; बार- बार अन्नरससे युक्त डकारें आने लगीं । यह देखकर वे जलसे बाहर निकले और आपसमें एक-दूसरेकी ओर देखने लगे । ( सबकी एक - सी अवस्था हो रही थी । ) वे सभी मुनि दुर्वासाकी ओर देखकर बोले— 'ब्रह्मर्षे! हमलोग राजा युधिष्ठिरको रसोई बनवानेकी आज्ञा देकर स्नान करनेके लिये आये थे, परंतु इस समय इतनी तृप्ति हो रही है कि कण्ठतक अन्न भरा हुआ जान पड़ता है । अब हम कैसे भोजन करेंगे? हमने जो रसोई तैयार करवायी है, वह व्यर्थ होगी । उसके लिये हमें क्या करना चाहिये ' ॥ २८–३१ ॥
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दुर्वासा उवाच
वृथा पाकेन राजर्षेरपराधः कृतो महान् ।
मास्मानधाक्षुर्दृष्ट्वैव पाण्डवाः क्रूरचक्षुषा ॥ ३२ ॥
स्मृत्वानुभावं राजर्षेरम्बरीषस्य धीमतः ।
बिभेमि सुतरां विप्रा हरिपादाश्रयाज्जनात् ॥ ३३ ॥
पाण्डवाश्च महात्मानः सर्वे धर्मपरायणाः ।
शूराश्च कृतविद्याश्च व्रतिनस्तपसि स्थिताः ॥ ३४ ॥
सदाचाररता नित्यं वासुदेवपरायणाः ।
क्रुद्धास्ते निर्दहेयुर्वै तूलराशिमिवानलः ।
तत एतानपृष्ट्वैव शिष्याः शीघ्रं पलायत ॥ ३५ ॥
दुर्वासा बोले- वास्तवमें व्यर्थ ही रसोई बनवाकर हमने राजर्षि युधिष्ठिरका महान् अपराध किया है । कहीं ऐसा न हो कि पाण्डव क्रूर दृष्टिसे देखकर हमें भस्म कर दें । ब्राह्मणो! परम बुद्धिमान् राजा अम्बरीषके प्रभावको याद करके मैं उन भक्तजनोंसे सदा डरता रहता हूँ, जिन्होंने भगवान् श्रीहरिके चरणोंका आश्रय ले रखा है । सब पाण्डव महामना, धर्मपरायण, विद्वान्, शूरवीर, व्रतधारी तथा तपस्वी हैं । वे सदा सदाचारपरायण तथा भगवान् वासुदेवको अपना परम आश्रय माननेवाले हैं। पाण्डव कुपित होनेपर हमको
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उसी प्रकार भस्म कर सकते हैं, जैसे रूईके ढेरको आग । अतः शिष्यो! पाण्डवोंसे बिना पूछे ही तुरंत भाग चलो ॥ ३२–३५ ॥ वैशम्पायन उवाच
इत्युक्तास्ते द्विजाः सर्वे मुनिना गुरुणा तदा ।
पाण्डवेभ्यो भृशं भीता दुद्रुवुस्ते दिशो दश ॥ ३६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! गुरु दुर्वासा मुनिके ऐसा कहनेपर वे सब ब्राह्मण पाण्डवोंसे अत्यन्त भयभीत हो दसों दिशाओंमें भाग गये ॥ ३६ ॥
सहदेवो देवनद्यामपश्यन् मुनिसत्तमान् ।
तीर्थेष्वितस्ततस्तस्या विचचार गवेषयन् ॥ ३७ ॥
सहदेवने जब देवनदीमें उन श्रेष्ठ मुनियोंको नहीं देखा, तब वे वहाँके तीर्थोंमें इधर- उधर खोजते हुए विचरने लगे ॥ ३७ ॥
तत्रस्थेभ्यस्तापसेभ्यः श्रुत्वा तांश्चैव विद्रुतान् ।
युधिष्ठिरमथाभ्येत्य तं वृत्तान्तं न्यवेदयत् ॥ ३८ ॥
वहाँ रहनेवाले तपस्वी मुनियोंके मुखसे उनके भागनेका समाचार सुनकर सहदेव युधिष्ठिरके पास लौट आये और सारा वृत्तान्त उनसे निवेदन कर दिया ॥ ३८ ॥
ततस्ते पाण्डवाः सर्वे प्रत्यागमनकाङ्क्षिणः ।
प्रतीक्षन्तः कियत्कालं जितात्मानोऽवतस्थिरे ॥ ३ ९ ॥
तदनन्तर मनको वशमें करनेवाले सब पाण्डव उनके लौट आनेकी आशासे कुछ देरतक उनकी प्रतीक्षा करते रहे ॥ ३ ९ ॥
निशीथेऽभ्येत्य चाकस्मादस्मान् स छलयिष्यति ।
कथं च निस्तरे मास्मात् कृच्छ्राद् दैवोपसादितात् ॥ ४० ॥
इति चिन्तापरान् दृष्ट्वा निःश्वसन्तो मुहुर्मुहुः ।
उवाच वचनं श्रीमान् कृष्णः प्रत्यक्षतां गतः ॥ ४१ ॥
पाण्डव सोचने लगे — ‘ दुर्वासा मुनि अकस्मात् आधी रातको आकर हमें छलेंगे । दैववश प्राप्त हुए इस महान् संकटसे हमारा उद्धार कैसे होगा? ' इसी चिन्तामें पड़कर वे बारंबार लंबी साँसें खींचने लगे । उनकी यह दशा देखकर भगवान् श्रीकृष्णने युधिष्ठिर आदि अन्य सब पाण्डवोंको प्रत्यक्ष दर्शन देकर कहा ॥ ४०-४१ ॥ श्रीकृष्णउवाच
भवतामापदं ज्ञात्वा ऋषेः परमकोपनात् ।
द्रौपद्या चिन्तितः पार्था अहं सत्वरमागतः ॥ ४२ ॥
न भयं विद्यते तस्मादृषेर्दुर्वाससोऽल्पकम् ।
तेजसा भवतां भीतः पूर्वमेव पलायितः ॥ ४३ ॥
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श्रीकृष्ण बोले – कुन्तीकुमारो! परम क्रोधी महर्षि दुर्वासासे आपलोगोंपर संकट आता जानकर द्रौपदीने मेरा स्मरण किया था, इसीलिये मैं तुरंत यहाँ आ पहुँचा । अब आपलोगोंको दुर्वासा मुनिसे तनिक भी भय नहीं है । वे आपके तेजसे डरकर पहले ही भाग गये हैं ॥
धर्मनित्यास्तु ये केचिन्न ते सीदन्ति कर्हिचित् ।
आपृच्छे वो गमिष्यामि नियतं भद्रमस्तु वः ॥ ४४ ॥
जो लोग सदा धर्ममें तत्पर रहते हैं, वे कभी कष्टमें नहीं पड़ते । अब मैं आपलोगोंसे जानेके लिये आज्ञा चाहता हूँ । यहाँसे द्वारकापुरीको जाऊँगा। आपलोगोंका निरन्तर कल्याण हो ॥ ४४ ॥
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वेरितं केशवस्य बभूवुः स्वस्थमानसाः ।
द्रौपद्या सहिताः पार्थास्तमूचुर्विगतज्वराः ॥ ४५ ॥
त्वया नाथेन गोविन्द दुस्तरामापदं विभो ।
तीर्णाः प्लवमिवासाद्य मज्जमाना महार्णवे ॥ ४६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! भगवान् श्रीकृष्णका यह कथन सुनकर द्रौपदीसहित पाण्डवोंका चित्त स्वस्थ हुआ । उनकी सारी चिन्ता दूर हो गयी और वे भगवान्से इस प्रकार बोले — ' विभो! गोविन्द! तुम्हें अपना सहायक और संरक्षक पाकर हम बड़ी - बड़ी दुस्तर विपत्तियोंसे उसी प्रकार पार हुए हैं, जैसे महासागरमें डूबते हुए मनुष्य जहाजका सहारा पाकर पार हो जाते हैं ॥ ४५-४६ ॥ स्वस्ति साधय भद्रं ते इत्याज्ञातो ययौ पुरीम् । 'तुम्हारा कल्याण हो । इसी प्रकार भक्तोंका हित साधन किया करो । ' पाण्डवोंके इस प्रकार कहनेपर भगवान् श्रीकृष्ण द्वारकापुरीको चले गये ॥ ४६३ ॥
पाण्डवाश्च महाभाग द्रौपद्या सहिताः प्रभो ॥ ४७ ॥
ऊषुः प्रहृष्टमनसो विहरन्तो वनाद् वनम् । महाभाग जनमेजय! तत्पश्चात् द्रौपदीसहित पाण्डव प्रसन्नचित्त हो वहाँ एक वनसे दूसरे वनमें भ्रमण करते हुए सुखसे रहने लगे ॥ ४७३ ॥
इति तेऽभिहितं राजन् यत् पृष्टोऽहमिह त्वया ॥ ४८ ॥
एवंविधान्यलीकानि धार्तराष्ट्रैर्दुरात्मभिः ।
पाण्डवेषु वनस्थेषु प्रयुक्तानि वृथाभवन् ॥ ४९ ॥
राजन्! यहाँ तुमने मुझसे जो कुछ पूछा था, वह सब मैंने तुम्हें बतला दिया । इस प्रकार दुरात्मा धृतराष्ट्रपुत्रोंने वनवासी पाण्डवोंपर अनेक बार छल- कपटका प्रयोग किया, परंतु वह सब व्यर्थ हो गया ॥ ४८-४९ ॥
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि द्रौपदीहरणपर्वणि दुर्वासउपाख्याने त्रिषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २६३ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत द्रौपदीहरणपर्वमें दुर्वासाकी कथाविषयक तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६३ ॥
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चतुःषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः जयद्रथका द्रौपदीको देखकर मोहित होना और उसके पास कोटिकास्यको भेजना वैशम्पायन उवाच
तस्मिन् बहुमृगेऽरण्ये अटमाना महारथाः ।
काम्यके भरतश्रेष्ठा विजहुस्ते यथामराः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! काम्यकवनमें नाना प्रकारके वन्य पशु रहते थे । वहाँ भरतकुलभूषण महारथी पाण्डव सब ओर घूमते हुए देवताओंके समान विहार करते थे ॥ १ ॥
प्रेक्षमाणा बहुविधान् वनोद्देशान् समन्ततः ।
यथर्तुकालरम्याश्च वनराजीः सुपुष्पिताः ॥ २ ॥
वे चारों ओर घूम- घूमकर नाना प्रकारके वन्य प्रदेशों तथा ऋतुकालके अनुसार भलीभाँति खिले हुए फूलोंसे सुशोभित रमणीय वनश्रेणियोंकी शोभा देखते थे ॥ २ ॥
पाण्डवा मृगयाशीलाश्चरन्तस्तन्महद् वनम् ।
विजहुरिन्द्रप्रतिमाः कञ्चित् कालमरिंदम ॥ ३ ॥
शत्रुदमन जनमेजय! पाण्डवलोग बाघ-चीते आदि हिंसक पशुओंका शिकार किया करते थे । देवराज इन्द्रके समान वे उस महान् वनमें विचरते हुए कुछ कालतक विहार करते रहे ॥ ३ ॥
ततस्ते यौगपद्येन ययुः सर्वे चतुर्दिशम् ।
मृगयां पुरुषव्याघ्रा ब्राह्मणार्थे परंतपाः ॥ ४ ॥
द्रौपदीमाश्रमे न्यस्य तृणबिन्दोरनुज्ञया ।
महर्षेर्दीप्ततपसो धौम्यस्य च पुरोधसः ॥ ५ ॥
एक दिनकी बात है, शत्रुओंको संताप देनेवाले पुरुषसिंह पाँचों पाण्डव उद्दीप्त तपस्वी पुरोहित धौम्य तथा महर्षि तृणबिन्दुकी आज्ञासे द्रौपदीको अकेली ही आश्रममें रखकर ब्राह्मणोंकी रक्षाके लिये हिंसक पशुओं को मारने एक साथ चारों दिशाओंमें ( अलग - अलग ) चले गये ॥ ४-५ ॥
ततस्तु राजा सिन्धूनां वार्द्धक्षत्रिर्महायशाः ।
विवाहकामः शाल्वेयान् प्रयातः सोऽभवत् तदा ॥ ६ ॥
महता परिबर्हेण राजयोग्येन संवृतः ।
राजभिर्बहुभिः सार्धमुपायात् काम्यकं च सः ॥ ७ ॥
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उसी समय सिंधुदेशका महायशस्वी राजा जयद्रथ, जो वृद्धक्षत्रका पुत्र था, विवाहकी
इच्छासे शाल्वदेशकी ओर जा रहा था । वह बहुमूल्य राजोचित ठाट- बाटसे सुसज्जित था ।
अनेक राजाओंके साथ यात्रा करता हुआ वह काम्यकवनमें आ पहुँचा ॥ ६-७ ॥
तत्रापश्यत् प्रियां भार्यां पाण्डवानां यशस्विनीम् ।
तिष्ठन्तीमाश्रमद्वारि द्रौपदीं निर्जने वने ॥ ८ ॥
वहाँ उसने पाण्डवोंकी प्यारी पत्नी यशस्विनी द्रौपदीको दूरसे देखा, जो निर्जन वनमें अपने आश्रमके दरवाजेपर खड़ी थी ॥ ८ ॥
विभ्राजमानां वपुषा बिभ्रतीं रूपमुत्तमम् ।
भ्राजयन्तीं वनोद्देशं नीलाभ्रमिव विद्युतम् ॥ ९ ॥
वह परम सुन्दर रूप धारण किये अपनी अनुपम कान्तिसे उद्भासित हो रही थी और जैसे विद्युत् अपनी प्रभासे नीले मेघसमूहको प्रकाशित करती है, उसी प्रकार वह सुन्दरी अपनी अङ्गच्छटासे उस वनप्रान्तको सब ओरसे देदीप्यमान कर रही थी ॥ ९ ॥
अप्सरा देवकन्या वा माया वा देवनिर्मिता ।
इति कृत्वाञ्जलिं सर्वे ददृशुस्तामनिन्दिताम् ॥ १० ॥
जयद्रथ और उसके सभी साथियोंने उस अनिन्द्य सुन्दरीकी ओर देखा और वे हाथ जोड़कर मन -ही-मन यह विचार करने लगे- ' यह कोई अप्सरा है या देवकन्या अथवा देवताओंकी रची हुई माया है? ' ॥ १० ॥
ततः स राजा सिन्धूनां वार्द्धक्षत्रिर्जयद्रथः ।
विस्मितस्त्वनवद्याङ्गीं दृष्ट्वा तां दुष्टमानसः ॥ ११ ॥
निर्दोष अंगोंवाली उस सुन्दरीको देखकर वृद्धक्षत्र - कुमार सिन्धुराज जयद्रथ चकित रह गया । उसके मनमें दूषित भावनाका उदय हुआ ॥ ११ ॥
स कोटिकास्यं राजानमब्रवीत् काममोहितः ।
कस्य त्वेषानवद्याङ्गी यदि वापि न मानुषी ॥ १२ ॥
उसने काममोहित होकर राजा कोटिकास्यसे कहा - ' कोटिक! जरा जाकर पता तो लगाओ, यह सर्वांगसुन्दरी किसकी स्त्री है? अथवा यह मनुष्यजातिकी स्त्री है भी या नहीं? ॥ १२ ॥
विवाहार्थों न मे कश्चिदिमां प्राप्यातिसुन्दरीम् ।
एतामेवाहमादाय गमिष्यामि स्वमालयम् ॥ १३ ॥
‘ इस अत्यन्त सुन्दरी रमणीको पाकर मुझे और किसीसे विवाह करनेकी आवश्यकता ही नहीं रह जायगी । इसीको लेकर मैं अपने घर लौट जाऊँगा ॥ १३ ॥
गच्छ जानीहि सौम्येमां कस्य वात्र कुतोऽपि वा ।
किमर्थमागता सुभ्रुरिदं कण्टकितं वनम् ॥ १४ ॥
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पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
' सौम्य! जाओ, पता लगाओ, यह किसकी स्त्री है और कहाँसे इस वनमें आयी है? यह सुन्दर भौंहोंवाली युवती काँटोंसे भरे हुए इस जंगलमें किसलिये आयी है? ॥ १४ ॥
अपि नाम वरारोहा मामेषा लोकसुन्दरी ।
भजेदद्यायतापाङ्गी सुदती तनुमध्यमा ॥ १५ ॥
‘ क्या यह मनोहर कटिप्रदेशवाली विश्वसुन्दरी मुझे अंगीकार करेगी? इसके नेत्रप्रान्त कितने विशाल हैं, दाँत कैसे सुन्दर हैं और शरीरका मध्यभाग कितना सूक्ष्म है? ॥ १५ ॥
अप्यहं कृतकामः स्यामिमां प्राप्य वरस्त्रियम् ।
गच्छ जानीहि को न्वस्या नाथ इत्येव कोटिक ॥ १६ ॥
स कोटिकास्यस्तच्छ्रुत्वा रथात् प्रस्कन्द्य कुण्डली ।
उपेत्य पप्रच्छ तदा क्रोष्टा व्याघ्रवधूमिव ॥ १७ ॥
‘यदि मैं इस सुन्दरीको पा जाऊँ तो कृतार्थ हो जाऊँगा । कोटिक! जाओ और पता लगाओ कि इसका पति कौन है? ' जयद्रथका यह वचन सुनकर कुण्डलमण्डित कोटिकास्य रथसे उतर पड़ा और जैसे गीदड़ बाघकी स्त्रीसे बात करे, उसी प्रकार उसने द्रौपदीके पास जाकर पूछा ॥ १६-१७ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि द्रौपदीहरणपर्वणि जयद्रथागमने चतुःषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २६४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत द्रौपदीहरणपर्वमें जयद्रथका आगमनविषयक दो सौचौसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६४ ॥