मत्स्योपाख्यान : परमेश्वर ने मत्स्य रूप धारण करके सृष्टि की रक्षा क्यों की?
भय से मुक्ति और संरक्षण
महर्षि वेदव्यास कृत महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान पढ़ें।
वनपर्व → मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 187 · पृष्ठ 1271–1281
मार्कण्डेय ने युधिष्ठिर से कहा
वैवस्वत मनु के चरित्र और प्रलय काल की सुरक्षा जानने हेतु
वैशम्पायनजी ने कहा— जनमेजय! इसके बाद पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर ने मार्कण्डेयजी से कहा— 'अब आप हमसे वैवस्वत मनु के चरित्र कहिये।'
मार्कण्डेयजी बोले— 'नरश्रेष्ठ नरेश! विवस्वान् के एक अत्यन्त प्रतापी पुत्र हुए, जो प्रजापतिके समान कान्तिमान् और महान ऋषि थे। वह बालक मनु ओज, तेज, कान्ति और विशेषतः तपस्या द्वारा अपने पिता भगवान् सूर्य तथा पितामह महर्षि कश्यप से भी आगे बढ़ गए। महाराज! उन्होंने बदरिकाश्रम में जाकर दोनों बाँहें ऊपर उठाये, एक पैर से खड़े होकर दस हजार वर्षों तक बड़ी भारी तपस्या की। उस समय उनका सिर नीचे की ओर झुका हुआ था और वह एकटक नेत्रों से निरन्तर देखता रहता था। इस प्रकार बड़ी दृढ़ता के साथ उस बालक ने घोर तप किया।'
ओजसा तेजसा लक्ष्म्या तपसा च विशेषतः ।
अतिचक्राम पितरं मनुः स्वं च पितामहम् ॥
वह बालक मनु ओज, तेज, कान्ति और विशेषतः तपस्याद्वारा अपने पिता भगवान् सूर्य तथा पितामह महर्षि कश्यपसे भी आगे बढ़ गया ।
एक दिन की बात है, मनु भीगे चीर और जटा धारण किये चीरिणी नदी के तट पर तपस्या कर रहे थे। उस समय एक छोटा सा मत्स्य उनके समीप आया और बोला— ‘भगवन्! मैं एक छोटा-सा मत्स्य हूँ। मुझे अपनी जाति के बलवान् मत्स्यों से बराबर भय बना रहता है। अतः उत्तम व्रत का पालन करने वाले सहर्षे! आप उनसे मेरी रक्षा करें। बलवान् मत्स्य विशेषतः दुर्बल मत्स्य को अपना आहार बना लेते हैं, यह सदा से हमारी मत्स्य-जाति की नियत वृत्ति है। इसलिये भय के महान् समुद्र में मैं डूब रहा हूँ। आप विशेष प्रयत्न करके मुझे बचाने का कष्ट करें। आपके इस उपकार के बदले मैं भी प्रत्युपकार करूँगा।'
तस्माद् भयौघान्महतो मज्जन्तं मां विशेषतः ।
त्रातुमर्हसि कर्तास्मि कृते प्रतिकृतं तव ॥
‘ इसलिये भयके महान् समुद्रमें मैं डूब रहा हूँ । आप विशेष प्रयत्न करके मुझे बचानेका कष्ट करें । आपके इस उपकारके बदले मैं भी प्रत्युपकार करूँगा'
मत्स्य की यह बात सुनकर वैवस्वत मनु को बड़ी दया आयी। उन्होंने स्वयं अपने हाथ से चन्द्रमा की किरणों के समान श्वेत रङ्गवाले उस मत्स्य को उठा लिया और पानी के बाहर लाकर मटके में डाल दिया। वहाँ उन्होंने बड़े आदर के साथ उसका पालन-पोषण किया और वह दिन-दिन बढ़ने लगा। मनु ने उसके प्रति पुत्र के समान विशेष वात्सल्य भाव प्रकट किया। तदनन्तर दीर्घकाल बीतने पर वह मत्स्य इतना बड़ा हो गया कि मटके में उसका रहना असम्भव हो गया। तब एक दिन मत्स्य ने मनु को देखकर फिर कहा— 'भगवन्! अब आप मेरे लिये इससे अच्छा कोई दूसरा स्थान दीजिये।'
तब वे भगवान् मनु उस मत्स्य को उस मटके से निकालकर एक बहुत बड़ी बावली के पास ले गये और वहीं डाल दिया। अब वह मत्स्य अनेक वर्षों तक उसी में क्रमशः बढ़ता रहा; परन्तु उस बावली की लम्बाई दो योजन और चौड़ाई एक योजन की थी, उसमें भी उसका रहना कठिन हो गया। वह हिल-डुल भी नहीं पाता था। अतः मनु को देखकर वह पुनः बोला— ‘भगवन्! साधु बाबा! अब आप मुझे समुद्र की प्यारी पटरानी गङ्गाजी में ले चलिये। मैं वहीं निवास करूँगा। अथवा तात! आप जहाँ उचित समझें, ले चलें। अनघ! मुझे दोषदृष्टिका परित्याग करके सदा आपके आज्ञापालन में स्थिर रहना है; क्योंकि आपके कारण ही मैं भलीभाँति पुष्ट होकर इतना बड़ा हुआ हूँ।'
नय मां भगवन् साधो समुद्रमहिषीं प्रियाम् ।
गङ्गां तत्र निवत्स्यामि यथा वा तात मन्यसे ॥
निदेशे हि मया तुभ्यं स्थातव्यमनसूयता ।
वृद्धिर्हि परमा प्राप्ता त्वत्कृते हि मयानघ ॥
‘ भगवन्! साधुबाबा! अब आप मुझे समुद्रकी प्यारी पटरानी गंगाजीमें ले चलिये । मैं वहीं निवास करूँगा । अथवा तात! आप जहाँ उचित समझें, ले चलें। अनघ! मुझे दोषदृष्टिका परित्याग करके सदा आपके आज्ञापालनमें स्थिर रहना है; क्योंकि आपके कारण ही मैं भलीभाँति पुष्ट होकर इतना बड़ा हुआ हूँ'
जितेन्द्रिय मनु ने उसे स्वयं ले जाकर गङ्गा में डाल दिया। फिर वह मत्स्य वहाँ कुछ काल तक बढ़ता रहा, फिर एक दिन उसने कहा— 'प्रभो! मेरा शरीर अब इतना बड़ा हो गया है कि मैं गङ्गाजी में हिल-डुल नहीं सकता। अतः मुझे शीघ्र ही समुद्र में ले चलिये। भगवन्! आप प्रसन्न होकर मुझपर इतनी कृपा अवश्य कीजिये।' तब मनु ने स्वयं उस मत्स्य को गङ्गाजी के जल से निकालकर समुद्र तक पहुँचाया और उसमें छोड़ दिया। यद्यपि वह मत्स्य बहुत विशाल था, तो भी जब मनु उसे ले जाने लगे, तब वह ऐसा बन गया जिससे आसानी से ले जाया जा सके। उसका स्पर्श और गन्ध दोनों मनु के लिये बड़े सुखकर थे।
सुमहानपि मत्स्यस्तु स मनोर्नयतस्तदा ।
आसीद् यथेष्टहार्यश्च स्पर्शगन्धसुखस्य वै ॥
राजन्! यद्यपि वह मत्स्य बहुत विशाल था, तो भी जब मनु उसे ले जाने लगे, तब वह ऐसा बन गया, जिससे आसानीसे ले जाया जा सके । उसका स्पर्श और गन्ध दोनों मनुके लिये बड़े सुखकर थे ।
जब मनु ने उस मत्स्य को समुद्र में डाल दिया, तब इसने उनसे मुसकराते हुए कहा— ‘भगवन्! आपने विशेष मनोयोग के साथ सब प्रकार से मेरी रक्षा की है, अब आपके लिये जिस कार्य का अवसर प्राप्त हुआ है, वह बताता हूँ, सुनिये— यह सारा-का-सारा चराचर पार्थिव जगत् शीघ्र ही नष्ट होने वाला है। सम्पूर्ण जगत् का प्रलय हो जायेगा। सम्पूर्ण जङ्गमों तथा स्थावर पदार्थों में जो हिल-डुल सकते हैं और जो हिलने-डुलने वाले नहीं हैं, उन सबके लिये अत्यन्त भयङ्कर समय आ पहुँचा है। आपको एक मजबूत नाव बनानी चाहिये, जिसमें मजबूत रस्सी जुटी हो। महामुने! फिर आप सप्तर्षियों के साथ उस नाव पर बैठ जाइये। पूर्वकाल में ब्राह्मणों ने जो सब प्रकार के बीज बताये हैं, उनका पृथक्-पृथक् सङ्ग्रह करके उन्हें सुरक्षित रूप से उस नाव पर रख लें। मुनिजनों के प्रेमी तपस्वी नरेश! उस नाव में बैठे रहकर आप मेरी प्रतीक्षा कीजियेगा। मैं आपके पास अपने मस्तक में सींग धारण किये आऊँगा। उसीसे आप मुझे पहचान लेंगे। अब मैं आपसे आज्ञा चाहता हूँ और यहाँ से जाता हूँ।' तब राजा ने कहा— 'बहुत अच्छा! मैं ऐसा ही करूंगा।'
यदा समुद्रे प्रक्षिप्तः स मत्स्यो मनुना तदा ।
तत एनमिदं वाक्यं स्मयमान इवाब्रवीत् ॥
जब मनुने उस मत्स्यको समुद्रमें डाल दिया, तब इसने उनसे मुसकराते हुए -से कहा - ।
तदनन्तर मनु सम्पूर्ण बीज लेकर एक सुन्दर नौका द्वारा उत्ताल तरङ्गों से भरे हुए महासागर में तैरने लगे। उस समय समुद्र अपनी लहरों से नृत्य करता-सा जान पड़ता था; पानी के हिलोरों से भयङ्कर गर्जना कर रहा था। प्रचण्ड वायु के झोंकों से विक्षुब्ध वह नौका चञ्चल-चित्त वाली मतवाली स्त्री के समान झूम रही थी। दिशाओं का भी भान नहीं होता था। तभी मनु ने भगवान् मत्स्य का चिन्तन किया और शृङ्गधारी भगवान् शीघ्र वहाँ पहुँच गये। समुद्र में ऊँचे पर्वत की भाँति शृङ्गधारी मत्स्य को देखकर मनु ने उनके मस्तकवर्ती सींग में बँटी हुई रस्सी बाँध दी।
मनु और सप्तर्षि मिलकर उस विशाल नाव को समुद्र के जलराशि में खींचने लगे। वर्षों तक भगवान् मत्स्य आलस्यरहित होकर उस नौका को खींचते रहे। तदनन्तर हिमालय का जो सर्वोच्च शिखर था, वहाँ मत्स्य भगवान् उस नाव को खींचकर ले गये। वे धीरे-धीरे हँसते हुए ऋषियों से बोले— 'आप लोग हिमालय के इस शिखर में इस नाव को शीघ्र बाँध दें।' महर्षियों ने तुरन्त वहाँ नौका बाँध दी; तभी से वह शिखर 'नौका बन्धन' के नाम से विख्यात हुआ।
ख्यातमद्यापि कौन्तेय तद् विद्धि भरतर्षभ ।
अथाब्रवीदनिमिषस्तानृषीन् सहितस्तदा ॥
भरतश्रेष्ठ कुन्तीनन्दन! तुम्हें मालूम होना चाहिये कि वह शिखर आज भी उसी नामसे प्रसिद्ध है । तदनन्तर एकटक दृष्टिवाले भगवान् मत्स्य एक साथ उन सब ऋषियोंसे बोले ।
तदनन्तर मत्स्य भगवान् ने एक साथ उन सब ऋषियों से कहा— 'मैं प्रजापति ब्रह्मा हूँ। मैंने ही मत्स्य रूप धारण करके इस महान् भय से तुम लोगों की रक्षा की है। अब मनु को चाहिये कि ये देवता, असुर और मनुष्य आदि समस्त प्रजा की सृष्टि करे।' ऐसा कहकर वे क्षणभर में अदृश्य हो गये। तदनन्तर स्वयं वैवस्वत मनु को प्रजा की सृष्टि करने की इच्छा हुई, किन्तु उनकी बुद्धि मोहाच्छन्न थी; तब उन्होंने बड़ी भारी तपस्या की और महान् तपोबल से सम्पन्न होकर सृष्टिका कार्य प्रारम्भ किया।
इत्युक्त्वा वचनं मत्स्यः क्षणेनादर्शनं गतः ।
स्रष्टुकामः प्रजाश्चापि मनुर्वैवस्वतः स्वयम् ॥
प्रमूढोऽभूत् प्रजासर्गे तपस्तेपे महत् ततः ।
तपसा महता युक्तः सोऽथ स्रष्टुं प्रचक्रमे ॥
ऐसा कहकर भगवान् मत्स्य क्षणभरमें अदृश्य हो गये । तदनन्तर स्वयं वैवस्वत मनुको प्रजाओंकी सृष्टि करनेकी इच्छा हुई, किंतु प्रजाकी सृष्टि करनेमें उनकी बुद्धि मोहाच्छन्न हो गयी थी । तब उन्होंने बड़ी भारी तपस्या की और महान् तपोबलसे सम्पन्न होकर उन्होंने सृष्टिका कार्य प्रारम्भ किया ।
In English
The Story of Manu and the Fish
Manu rescues a small fish that grows larger over time until it can no longer fit in a jar, a pond, or the river Ganga. The fish reveals itself to be Brahma and instructs Manu to build a boat to survive a great flood. Manu uses a rope tied to the fish's horn to pull his boat to the peak of the Himalayas.
This page answers
- How did manu save the fish?
- Why did the fish ask manu to build a boat?
- How did manu move the boat to the himalayas?
- Who was the fish in disguise?
Also written: Matsyopakhyana, Matsya, Saptarshi, Pandava, Markandeya, मत्स्योपाख्यान