श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1281–1290

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1281–1290

पृष्ठ 1281

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मत्प्रसादात् प्रजासर्गे न च मोहं गमिष्यति ॥ ५४ ॥

' इन्हें तीव्र तपस्याके द्वारा जगत्की सृष्टि करनेकी प्रतिभा प्राप्त हो जायगी । मेरी कृपासे प्रजाकी सृष्टि करते समय इन्हें मोह नहीं होगा ॥ ५४ ॥

इत्युक्त्वा वचनं मत्स्यः क्षणेनादर्शनं गतः ।

स्रष्टुकामः प्रजाश्चापि मनुर्वैवस्वतः स्वयम् ॥ ५५ ॥

प्रमूढोऽभूत् प्रजासर्गे तपस्तेपे महत् ततः ।

तपसा महता युक्तः सोऽथ स्रष्टुं प्रचक्रमे ॥ ५६ ॥

ऐसा कहकर भगवान् मत्स्य क्षणभरमें अदृश्य हो गये । तदनन्तर स्वयं वैवस्वत मनुको प्रजाओंकी सृष्टि करनेकी इच्छा हुई, किंतु प्रजाकी सृष्टि करनेमें उनकी बुद्धि मोहाच्छन्न हो गयी थी । तब उन्होंने बड़ी भारी तपस्या की और महान् तपोबलसे सम्पन्न होकर उन्होंने सृष्टिका कार्य प्रारम्भ किया ॥ ५५-५६ ॥

सर्वाः प्रजा मनुः साक्षाद् यथावद् भरतर्षभ ।

इत्येतन्मात्स्यकं नाम पुराणं परिकीर्तितम् ॥ ५७ ॥

भरतकुलभूषण! फिर वे पूर्वकल्पके अनुसार सारी प्रजाकी यथावत् सृष्टि करने लगे ।

इस प्रकार यह संक्षेपसे मत्स्य पुराणका वृत्तान्त बताया गया है ॥ ५७ ॥

आख्यानमिदमाख्यातं सर्वपापहरं मया ।

य इदं शृणुयान्नित्यं मनोश्चरितमादितः ।

स सुखी सर्वपूर्णार्थः सर्वलोकमियान्नरः ॥ ५८ ॥

मेरे द्वारा वर्णित यह उपाख्यान सब पापोंको नष्ट करनेवाला है । जो मनुष्य प्रतिदिन प्रारम्भसे ही मनुके इस चरित्रको सुनता है, वह सुखी हो सम्पूर्ण मनोरथोंको पा लेता और सब लोकोंमें जा सकता है ॥ ५८ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि मत्स्योपाख्याने सप्ताशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८७ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें मत्स्योपाख्यानविषयक एक सौ सतासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १८७ ॥

पृष्ठ 1282

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अष्टाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः चारों युगोंकी वर्ष संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान्‌के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना वैशम्पायन उवाच

ततः स पुनरेवाथ मार्कण्डेयं यशस्विनम् ।

पप्रच्छ विनयोपेतो धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तदनन्तर विनयशील धर्मराज युधिष्ठिरने यशस्वी मार्कण्डेय मुनिसे पुनः इस प्रकार प्रश्न किया- ॥ १ ॥

नैके युगसहस्रान्तास्त्वया दृष्टा महामुने ।

न चापीह समः कश्चिदायुष्मान् दृश्यते तव ॥ २ ॥

‘ महामुने! आपने हजार- हजार युगोंके अन्तमें होनेवाले अनेक महाप्रलयके दृश्य देखे हैं । इस संसारमें आपके समान बड़ी आयुवाला दूसरा कोई पुरुष नहीं दिखायी देता ॥ २ ॥

वर्जयित्वा महात्मानं ब्रह्माणं परमेष्ठिनम् ।

न तेऽस्ति सदृशः कश्चिदायुषा ब्रह्मवित्तम ॥ ३ ॥

ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे! परमेष्ठी महात्मा ब्रह्माजीको छोड़कर दूसरा कोई आपके समान दीर्घायु नहीं है ॥ ३ ॥

अनन्तरिक्षे लोकेऽस्मिन् देवदानववर्जिते ।

त्वमेव प्रलये विप्र ब्रह्माणमुपतिष्ठसे ॥ ४ ॥

ब्रह्मन्! जब यह संसार देवता, दानव तथा अन्तरिक्ष आदि लोकोंसे शून्य हो जाता है उस प्रलयकालमें केवल आप ही ब्रह्माजीके पास रहकर उनकी उपासना करते हैं ॥ ४ ॥

प्रलये चापि निर्वृत्ते प्रबुद्धे च पितामहे ।

त्वमेकः सृज्यमानानि भूतानीह प्रपश्यसि ॥ ५ ॥

चतुर्विधानि विप्रर्षे यथावत् परमेष्ठिना ।

वायुभूता दिशः कृत्वा विक्षिप्यापस्ततस्ततः ॥ ६ ॥

ब्रह्मर्षे! फिर प्रलयकाल व्यतीत होनेपर जब पितामह ब्रह्मा जागते हैं, तब सम्पूर्ण दिशाओंमें वायुको फैलाकर उसके द्वारा समस्त जलराशिको इधर- उधर छितराकर ( सूखे

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स्थानोंमें ) ब्रह्माजीके द्वारा जो जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज नामक चार प्रकारके प्राणी रचे जाते हैं, उन्हें एकमात्र आप ही ( सबसे पहले ) अच्छी तरह देख पाते हैं ॥ ५-६ ॥

त्वया लोकगुरुः साक्षात् सर्वलोकपितामहः ।

आराधितो द्विजश्रेष्ठ तत्परेण समाधिना ॥ ७ ॥

स्वप्रमाणमथो विप्र त्वया कृतमनेकशः ।

घोरेणाविश्य तपसा वेधसो निर्जितास्त्वया ॥ ८ ॥

द्विजश्रेष्ठ! आपने तत्परतापूर्वक चित्तवृत्तियोंका निरोध करके सम्पूर्ण लोकोंके पितामह साक्षात् लोकगुरु ब्रह्माजीकी आराधना की है । विप्रवर! आपने अनेक बार इस जगत्की प्रारम्भिक सृष्टिको प्रत्यक्ष किया है और घोर तपस्याद्वारा ( मरीचि आदि ) प्रजापतियोंको भी जीत लिया है ॥ ७-८ ॥

नारायणाङ्कप्रख्यस्त्वं साम्परायेऽतिपठ्यसे ।

भगवाननेकशः कृत्वा त्वया विष्णोश्च विश्वकृत् ॥ ९ ॥

कर्णिकोद्धरणं दिव्यं ब्रह्मणः कामरूपिणः ।

रत्नालंकारयोगाभ्यां दृग्भ्यां दुष्टस्त्वया पुरा ॥ १० ॥

आप भगवान् नारायणके समीप रहनेवाले भक्तोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं । परलोकमें आपकी महिमाका सर्वत्र गान होता है । आपने पहले स्वेच्छासे प्रकट होनेवाले सर्वव्यापक ब्रह्मकी उपलब्धिके स्थानभूत हृदयकमलकी कर्णिकाका ( योगकी कलासे ) अलौकिक उद्घाटन कर वैराग्य और अभ्याससे प्राप्त हुई दिव्य दृष्टिद्वारा विश्वरचयिता भगवान्का अनेक बार साक्षात्कार किया है ॥ ९ -१० ॥

तस्मात् तवान्तको मृत्युर्जरा वा देहनाशिनी ।

न त्वां विशति विप्रर्षे प्रसादात् परमेष्ठिनः ॥ ११ ॥

इसीलिये सबको मारनेवाली मृत्यु तथा शरीरको जर्जर बना देनेवाली जरा आपका स्पर्श नहीं करती है । ब्रह्मर्षे! इसमें भगवान् परमेष्ठीका कृपाप्रसाद ही कारण है ॥ ११ ॥

यदा नैवं रविर्नाग्निर्न वायुर्न च चन्द्रमाः ।

नैवान्तरिक्षं नैवोर्वी शेषं भवति किंचन ॥ १२ ॥

तस्मिन्नेकार्णवे लोके नष्टे स्थावरजङ्गमे ।

नष्टे देवासुरगणे समुत्सन्नमहोरगे ॥ १३ ॥

शयानममितात्मानं पद्मोत्पलनिकेतनम् ।

त्वमेकः सर्वभूतेशं ब्रह्माणमुपतिष्ठसि ॥ १४ ॥

( महाप्रलयके समय) जब सूर्य, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, अन्तरिक्ष और पृथ्वी आदिमेंसे कोई भी शेष नहीं रह जाता, समस्त चराचर जगत् उस एकार्णवके जलमें डूबकर अदृश्य हो जाता है, देवता और असुर नष्ट हो जाते हैं तथा बड़े - बड़े नागोंका संहार हो जाता है, उस

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समय कमल और उत्पलमें निवास तथा शयन करनेवाले सर्वभूतेश्वर अमितात्मा ब्रह्माजीके पास रहकर केवल आप ही उनकी उपासना करते हैं ॥ १२–१४ ॥

एतत् प्रत्यक्षतः सर्वं पूर्वं वृत्तं द्विजोत्तम ।

तस्मादिच्छाम्यहं श्रोतुं सर्वहेत्वात्मिकां कथाम् ॥ १५ ॥

द्विजोत्तम! यह सारा पुरातन इतिहास आपका प्रत्यक्ष देखा हुआ है । इसलिये मैं आपके मुखसे सबके हेतुभूत कालका निरूपण करनेवाली कथा सुनना चाहता हूँ ॥ १५ ॥

अनुभूतं हि बहुशस्त्वयैकेन द्विजोत्तम ।

न तेऽस्त्यविदितं किंचित् सर्वलोकेषु नित्यदा ॥ १६ ॥

विप्रवर! केवल आपने ही अनेक कल्पोंकी श्रेष्ठ रचनाका बहुत बार अनुभव किया है ।

सम्पूर्ण लोकोंमें कभी कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो आपको ज्ञात न हो' ॥ १६ ॥

मार्कण्डेय उवाच

हन्त ते वर्णयिष्यामि नमस्कृत्वा स्वयम्भुवे ।

पुरुषाय पुराणाय शाश्वतायाव्ययाय च ॥ १७ ॥

अव्यक्ताय सुसूक्ष्माय निर्गुणाय गुणात्मने ।

स एष पुरुषव्याघ्र पीतवासा जनार्दनः ॥ १८ ॥

एष कर्ता विकर्ता च भूतात्मा भूतकृत् प्रभुः ।

अचिन्त्यं महदाश्चर्यं पवित्रमिति चोच्यते ॥ १ ९ ॥

मार्कण्डेयजी बोले — राजन्! मैं स्वयं प्रकट होनेवाले सनातन, अविनाशी, अव्यक्त, सूक्ष्म, निर्गुण एवं गुणस्वरूप पुराणपुरुषको नमस्कार करके तुम्हें वह कथा अभी सुनाता हूँ । पुरुषसिंह! ये जो हमलोगोंके पास बैठे हुए पीताम्बरधारी भगवान् जनार्दन हैं, ये ही संसारकी सृष्टि और संहार करनेवाले हैं । ये ही भगवान् समस्त प्राणियोंके अन्तर्यामी आत्मा और उनके रचयिता हैं । ये पवित्र, अचिन्त्य एवं महान् आश्चर्यमय तत्त्व कहे जाते हैं ॥ १७ –१ ९ ॥

अनादिनिधनं भूतं विश्वमव्ययमक्षयम् ।

एष कर्ता न क्रियते कारणं चापि पौरुषे ॥ २० ॥

इनका न आदि है, न अन्त । ये सर्वभूतस्वरूप, अव्यय और अक्षय हैं । ये ही सबके कर्ता हैं, इनका कोई कर्ता नहीं है । पुरुषार्थकी प्राप्तिमें भी ये ही कारण हैं ॥ २० ॥

यद्येष पुरुषो वेद वेदा अपि न तं विदुः ।

सर्वमाश्चर्यमेवैतन्निवृत्तं राजसत्तम ॥ २१ ॥

आदितो मनुजव्याघ्र कृत्स्नस्य जगतः क्षये ।

पृष्ठ 1285

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ये अन्तर्यामी आत्मा होनेसे सबको जानते हैं, परंतु इन्हें वेद भी नहीं जानते । नृपशिरोमणे! नरश्रेष्ठ! सम्पूर्ण जगत्का प्रलय होनेके पश्चात् इन आदिभूत परमेश्वरसे ही यह सम्पूर्ण आश्चर्यमय जगत् पुनः उत्पन्न हो जाता है ॥ २१३ ॥

चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां तत् कृतं युगम् ॥ २२ ॥

तस्य तावच्छती संध्या संध्यांशश्च तथाविधः । चार हजार दिव्य वर्षोंका एक सत्ययुग बताया गया है, उतने ही सौ वर्ष उसकी संध्या और संध्यांशके होते हैं ( इस प्रकार कुल अड़तालीस सौ दिव्य वर्ष सत्ययुगके हैं) ॥ २२३ || त्रीणि वर्षसहस्राणि त्रेतायुगमिहोच्यते ॥ २३ ॥

तस्य तावच्छती संध्या संध्यांशश्च ततः परम् । तीन हजार दिव्य वर्षोंका त्रेतायुग बताया जाता है, उसकी संध्या और संध्यांशके भी उतने ही ( तीन- तीन ) सौ दिव्य वर्ष होते हैं ( इस तरह यह युग छत्तीस सौ दिव्य वर्षोंका होता है ) ॥ २३ ॥

तथा वर्षसहस्रे द्वे द्वापरं परिमाणतः ॥ २४ ॥

तस्यापि द्विशती संध्या संध्यांशश्च तथाविधः । द्वापरका मान दो हजार दिव्य वर्ष है तथा उतने ही सौ दिव्य वर्ष उसकी संध्या और संध्यांशके हैं ( अतः सब मिलकर चौबीस सौ दिव्य वर्ष द्वापरके हैं ) ॥ २४ ॥

सहस्रमेकं वर्षाणां ततः कलियुगं स्मृतम् ॥ २५ ॥

तस्य वर्षशतं संधिः संध्यांशश्च ततः परम् ।

संधिसंध्यांशयोस्तुल्यं प्रमाणमुपधारय ॥ २६ ॥

तदनन्तर एक हजार दिव्य वर्ष कलियुगका मान कहा गया है, सौ वर्ष उसकी संध्याके और सौ वर्ष संध्यांशके बताये गये हैं ( इस प्रकार कलियुग बारह सौ दिव्य वर्षोंका होता है ) । संध्या और संध्यांशका मान बराबर - बराबर ही समझो ॥ २५-२६ ॥

क्षीणे कलियुगे चैव प्रवर्तेत कृतं युगम् ।

एषा द्वादशसाहस्री युगाख्या परिकीर्त्तिता ॥ २७ ॥

कलियुगके क्षीण हो जानेपर पुनः सत्ययुगका आरम्भ होता है । इस तरह बारह हजार दिव्य वर्षोंकी एक चतुर्युगी बतायी गयी है ॥ २७ ॥

एतत् सहस्रपर्यन्तमहो ब्राह्ममुदाहृतम् ।

विश्वं हि ब्रह्मभवने सर्वतः परिवर्त्तते ॥ २८ ॥

लोकानां मनुजव्याघ्र प्रलयं तं विदुर्बुधाः ।

पृष्ठ 1286

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नरश्रेष्ठ! एक हजार चतुर्युग बीतनेपर ब्रह्माजीका एक दिन होता है । यह सारा जगत् ब्रह्माके दिनभर ही रहता है ( और वह दिन समाप्त होते ही नष्ट हो जाता है । ) इसीको विद्वान् पुरुष लोकोंका प्रलय मानते हैं ॥ २८३ ॥

अल्पावशिष्टे तु तदा चुगान्ते भरतर्षभ ॥ २ ९ ॥

सहस्रान्ते नराः सर्वे प्रायशोऽनृतवादिनः ।

यज्ञप्रतिनिधिः पार्थ दानप्रतिनिधिस्तथा ॥ ३० ॥

व्रतप्रतिनिधिश्चैव तस्मिन् काले प्रवर्तते । भरतश्रेष्ठ! सहस्र युगकी समाप्तिमें जब थोड़ा-सा ही समय शेष रह जाता है, उस समय कलियुगके अन्तिम भागमें प्रायः सभी मनुष्य मिथ्यावादी हो जाते हैं । पार्थ! उस समय यज्ञ, दान और व्रतके प्रतिनिधि कर्म चालू हो जाते हैं अर्थात् यज्ञ, दान, तप मुख्य विधिसे न होकर गौण विधिसे नाममात्र होने लगते हैं ॥ २ ९ -३०३ ॥ ब्राह्मणाः शूद्रकर्माणस्तथा शूद्रा धनार्जकाः ॥ ३१ ॥

क्षत्रधर्मेण वाप्यत्र वर्तयन्ति गते युगे । युगकी समाप्तिके समय ब्राह्मण शूद्रोंके कर्म करते हैं और शूद्र वैश्योंकी भाँति धनोपार्जन करने लगते हैं अथवा क्षत्रियोंके कर्मसे जीविका चलाने लगते हैं ॥ ३१३ ॥

निवृत्तयज्ञस्वाध्याया दण्डाजिनविवर्जिताः ॥ ३२ ॥

ब्राह्मणाः सर्वभक्षाश्च भविष्यन्ति कलौ युगे ।

अजपा ब्राह्मणास्तात शूद्रा जपपरायणाः ॥ ३३ ॥

( सहस्र चतुर्युगके अन्तिम) कलियुगके अन्तिम भागमें ब्राह्मण यज्ञ, स्वाध्याय, दण्ड और मृगचर्मका त्याग कर देंगे और (भक्ष्याभक्ष्यका विचार छोड़कर) सब कुछ खाने-पीनेवाले हो जायँगे । तात! ब्राह्मण तो जपसे दूर भागेंगे और शूद्र वैदिक मन्त्रोंके जपमें संलग्न होंगे ॥ ३२-३३ ॥

विपरीते तदा लोके पूर्वरूपं क्षयस्य तत् ।

बहवो म्लेच्छराजानः पृथिव्यां मनुजाधिप ॥ ३४ ॥

नरेश्वर! इस प्रकार जब लोगोंके विचार और व्यवहार विपरीत हो जाते हैं, तब प्रलयका पूर्वरूप आरम्भ हो जाता है । उस समय इस पृथ्वीपर बहुत से म्लेच्छ राजा राज्य करने लगते हैं ॥ ३४ ॥

मृषानुशासिनः पापा मृषावादपरायणाः ।

आन्ध्राः शकाः पुलिन्दाश्च यवनाश्च नराधिपाः ॥ ३५ ॥

काम्बोजा बाह्लिकाः शूरास्तथाऽऽभीरा नरोत्तम ।

न तदा ब्राह्मणः कश्चित् स्वधर्ममुपजीवति ॥ ३६ ॥

छलसे शासन करनेवाले, पापी और असत्यवादी आन्ध्र, शक, पुलिन्द, यवन, काम्बोज, बाह्लीक तथा शौर्यसम्पन्न आभीर इस देशके राजा होंगे । नरश्रेष्ठ! उस समय कोई

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ब्राह्मण अपने धर्मके अनुसार जीविका चलानेवाला न होगा ॥ ३५-३६ ॥

क्षत्रियाश्चापि वैश्याश्च विकर्मस्था नराधिप ।

अल्पायुषः स्वल्पबलाः स्वल्पवीर्यपराक्रमाः ॥ ३७ ॥

नरेश्वर! क्षत्रिय और वैश्य भी अपना- अपना धर्म छोड़कर दूसरे वर्णोंके कर्म करने लगेंगे । सबकी आयु कम होगी, सबके बल, वीर्य और पराक्रम घट जायँगे ॥ ३७ ॥

अल्पसाराल्पदेहाश्च तथा सत्याल्पभाषिणः ।

बहुशून्या जनपदा मृगव्यालावृता दिशः ॥ ३८ ॥

युगान्ते समनुप्राप्ते वृथा च ब्रह्मवादिनः ।

भोवादिनस्तथा शूद्रा ब्राह्मणाश्चार्यवादिनः ॥ ३ ९ ॥

मनुष्य नाटे कदके होंगे । उनकी शरीरिक शक्ति बहुत कम हो जायगी और उनकी बातोंमें सत्यका अंश बहुत कम होगा । बहुधा सारे जनपद जनशून्य होंगे । सम्पूर्ण दिशाएँ पशुओं और सर्पोंसे भरी होंगी । युगान्तकाल उपस्थित होनेपर अधिकांश मनुष्य ( अनुभव न होते हुए भी) वृथा ही ब्रह्मज्ञानकी बातें कहेंगे । शूद्र द्विजातियोंको भो ( ऐ ) कहकर पुकारेंगे और ब्राह्मणलोग शूद्रोंको आर्य अर्थात् आप कहकर सम्बोधन करेंगे ॥ ३८-३९ ॥

युगान्ते मनुजव्याघ्र भवन्ति बहुजन्तवः ।

न तथा घ्राणयुक्ताश्च सर्वगन्धा विशाम्पते ॥ ४० ॥

पुरुषसिंह राजन्! युगान्तकालमें बहुतसे जीव -जन्तु उत्पन्न हो जायँगे । सब प्रकारके सुगन्धित पदार्थ नासिकाको उतने गन्धयुक्त नहीं प्रतीत होंगे ॥ ४० ॥

रसाश्च मनुजव्याघ्र न तथा स्वादुयोगिनः ।

बहुप्रजा ह्रस्वदेहाः शीलाचारविवर्जिताः ।

मुखे भगाः स्त्रियो राजन् भविष्यन्ति युगक्षये ॥ ४१ ॥

अट्टशूला जनपदाः शिवशूलाश्चतुष्पथाः ।

केशशूलाः स्त्रियो राजन् भविष्यन्ति युगक्षये ॥ ४२ ॥

नरव्याघ्र! इसी प्रकार रसीले पदार्थभी जैसे चाहिये वैसे स्वादिष्ट नहीं होंगे । राजन्! उस समयकी स्त्रियाँ नाटे कदकी और बहुत संतान ( बच्चा) पैदा करनेवाली होंगी । उनमें शील और सदाचारका अभाव होगा । युगान्तकालमें स्त्रियाँ मुखसे भगसम्बन्धी यानी व्यभिचारकी ही बातें करनेवाली होंगी । राजन्! युगान्त- कालमें हर देशके लोग अन्न बेचनेवाले होंगे । ब्राह्मण वेद बेचनेवाले तथा ( प्रायः ) स्त्रियाँ वेश्यावृत्तिको अपनानेवाली होंगी * ॥ ४१-४२ ॥

अल्पक्षीरास्तथा गावो भविष्यन्ति जनाधिप ।

अल्पपुष्पफलाश्चापि पादपा बहुवायसाः ॥ ४३ ॥

ब्रह्मवध्यानुलिप्तानां तथा मिथ्याभिशंसिनाम् ।

नृपाणां पृथिवीपाल प्रतिगृह्णन्ति वै द्विजाः ॥ ४४ ॥

पृष्ठ 1288

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जनेश्वर! युगान्तकालमें गायोंके थनोंमें बहुत कम दूध होगा । वृक्षपर फल और फूल बहुत कम होंगे और उनपर ( अच्छे पक्षियोंकी अपेक्षा) कौए ही अधिक बसेरे लेंगे । भूपाल! ब्राह्मणलोग ( लोभवश ) ब्रह्महत्या - जैसे पापोंसे लिप्त और मिथ्यावादी नरेशोंसे ही दान-दक्षिणा लेंगे ॥ ४३-४४ ॥

लोभमोहपरीताश्च मिथ्याधर्मध्वजावृताः ।

भिक्षार्थं पृथिवीपाल चञ्चूर्यन्ते द्विजैर्दिशः ॥ ४५ ॥

राजन्! वे ब्राह्मण लोभ और मोहमें फँसकर झूठे धर्मका ढोंग रचनेवाले होंगे, इतना ही नहीं, वे भिक्षाके लिये सारी दिशाओंके लोगोंको पीड़ित करते रहेंगे ॥ ४५ ॥

करभारभयाद् भीता गृहस्थाः परिमोषकाः ।

मुनिच्छद्माकृतिच्छन्ना वाणिज्यमुपजीविनः ॥ ४६ ॥

मिथ्या च नखरोमाणि धारयन्ति तदा द्विजाः । गृहस्थलोग करके भारसे डरकर लुटेरे बन जायँगे । ब्राह्मण मुनियों -जैसी कपटपूर्ण आकृति धारण किये वैश्यवृत्तिसे जीविका चलायेंगे और झूठे दिखावेके लिये नख तथा दाढ़ी - मूछ धारण करेंगे ॥ ४६३ ॥

अर्थलोभान्नरव्याघ्र तथा च ब्रह्मचारिणः ॥ ४७ ॥

आश्रमेषु वृथाचाराः पानपा गुरुतल्पगाः ।

इह लौकिकमीहन्ते मांसशोणितवर्धनम् ॥ ४८ ॥

नरश्रेष्ठ! धनके लोभसे ब्रह्मचारी भी आश्रमोंमें दम्भपूर्ण आचारको अपनायेंगे और मद्यपान करके गुरुपत्नीगमन करेंगे । लोग अपने शरीरके मांस और रक्त बढ़ानेवाले इहलौकिक कर्मोंमें ही लगे रहेंगे ॥

बहुपाषण्डसंकीर्णाः परान्नगुणवादिनः ।

आश्रमा मनुजव्याघ्र भविष्यन्ति युगक्षये ॥ ४ ९ ॥

नरश्रेष्ठ! युगान्तकालमें सभी आश्रम अनेक प्रकारके पाखण्डोंसे व्याप्त और दूसरोंसे मिले हुए भोजनका ही गुणगान करनेवाले होंगे ॥ ४ ९ ॥

यथर्तुवर्षी भगवान् न तथा पाकशासनः ।

न चापि सर्वबीजानि सम्यग् रोहन्ति भारत ॥ ५० ॥

भगवान् इन्द्र भी ठीक वर्षाऋतुके समय जलकी वर्षा नहीं करेंगे । भारत! भूमिमें बोये हुए सभी बीज ठीकसे नहीं जमेंगे ॥ ५० ॥

हिंसाभिरामश्च जनस्तथा सम्पद्यतेऽशुचिः ।

अधर्मफलमत्यर्थं तदा भवति चानघ ॥ ५१ ॥

कलियुगमें सब लोग हिंसामें ही सुख माननेवाले तथा अपवित्र रहेंगे । निष्पाप! उस समय अधर्मका फल बहुत अधिक मात्रामें मिलेगा ॥ ५१ ॥

तदा च पृथिवीपाल यो भवेद् धर्मसंयुतः ।

पृष्ठ 1289

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अल्पायुः स हि मन्तव्यो न हि धर्मोऽस्ति कश्चन ॥ ५२ ॥

भूपाल! उस समय जो भी धर्ममें तत्पर रहेगा, उसकी आयु बहुत थोड़ी देखनेमें आयेगी; क्योंकि उस समय कोई भी धर्म टिक नहीं सकेगा ॥ ५२ ॥

भूयिष्ठं कूटमानैश्च पण्यं विक्रीणते जनाः ।

वणिजश्च नरव्याघ्र बहुमाया भवन्त्युत ॥ ५३ ॥

लोग बाजारमें झूठे माप-तौल बनाकर बहुत-सा माल बेचते रहेंगे । नरश्रेष्ठ! उस समयके बनिये भी बहुत माया जाननेवाले ( धूर्त ) होंगे ॥ ५३ ॥

धर्मिष्ठाः परिहीयन्ते पापीयान् वर्धते जनः ।

धर्मस्य बलहानिः स्यादधर्मश्च बली तथा ॥ ५४ ॥

धर्मात्मा पुरुष हानि उठाते दीखेंगे और बड़े - बड़े पापी लौकिक दृष्टिसे उन्नतिशील होंगे । धर्मका बल घटेगा और अधर्म बलवान् होगा ॥ ५४ ॥

अल्पायुषो दरिद्राश्च धर्मिष्ठा मानवास्तथा ।

दीर्घायुषः समृद्धाश्च विधर्माणो युगक्षये ॥ ५५ ॥

युगान्तकालमें धर्मिष्ठ मानव अल्पायु तथा दरिद्र देखे जायँगे और अधर्मी मनुष्य दीर्घायु तथा समृद्धिशाली देखे जायँगे ॥ ५५ ॥

नगराणां विहारेषु विधर्माणो युगक्षये ।

अधर्मिष्ठैरुपायैश्च प्रजा व्यवहरन्त्युत ॥ ५६ ॥

युगान्तके समय नगरोंके उद्यानोंमें पापी पुरुष अड्डा जमायेंगे और पापपूर्ण उपायोंद्वारा प्रजाके साथ दुर्व्यवहार करेंगे ॥ ५६ ॥

संचयेन तथाल्पेन भवन्त्याढ्यमदान्विताः ।

धनं विश्वासतो न्यस्तं मिथो भूयिष्ठशो नराः ॥ ५७ ॥

हर्तुं व्यवसिता राजन् पापाचारसमन्विताः ।

नैतदस्तीति'मनुजा वर्तन्ते निरपत्रपाः ॥ ५८ ॥

राजन्! थोड़ेसे धनका संग्रह हो जानेपर लोग धनाढ्यताके मदसे उन्मत्त हो उठेंगे । यदि किसीने विश्वास करके अपने धनको धरोहरके रूपमें रख दिया तो अधिकांश पापाचारी और निर्लज मनुष्य उस धरोहरको हड़प लेनेकी चेष्टा करेंगे और उससे साफ कह देंगे कि हमारे यहाँ तुम्हारा कुछ भी नहीं है ॥ ५७-५८ ॥

पुरुषादानि सत्त्वानि पक्षिणोऽथ मृगास्तथा ।

नगराणां विहारेषु चैत्येष्वपि च शेरते ॥ ५ ९ ॥

मनुष्यका मांस खानेवाले हिंसक जीव तथा पशु-पक्षी नागरिकोंके बगीचों और देवालयों में भी शयन करेंगे ॥ ५ ९ ॥

सप्तवर्षाष्टवर्षाश्च स्त्रियो गर्भधरा नृप ।

दशद्वादशवर्षाणां पुंसां पुत्रः प्रजायते ॥ ६० ॥

पृष्ठ 1290

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राजन्! युगान्तकालमें सात- आठ वर्षकी स्त्रियाँ गर्भ धारण करेंगी और दस - बारह वर्षकी अवस्थावाले पुरुषोंके भी पुत्र होंगे ॥ ६० ॥

भवन्ति षोडशे वर्षे नराः पलितिनस्तथा ।

आयुःक्षयो मनुष्याणां क्षिप्रमेव प्रपद्यते ॥ ६१ ॥

सोलहवें वर्षमें मनुष्योंके बाल पक जायँगे और उनकी आयु शीघ्र ही समाप्त हो जायगी ॥ ६१ ॥

क्षीणायुषो महाराज तरुणा वृद्धशीलिनः ।

तरुणानां च यच्छीलं तद् वृद्धेषु प्रजायते ॥ ६२ ॥

महाराज! उस समयके तरुणोंकी आयु क्षीण होगी और उनका शील स्वभाव बूढ़ोंका-सा हो जायगा और तरुणोंका जो शील-स्वभाव होना चाहिये, वह बूढ़ोंमें प्रकट होगा ॥ ६२ ॥

विपरीतास्तदा नार्यो वञ्चयित्वार्हतः पतीन् ।

व्युच्चरन्त्यपि दुःशीला दासैः पशुभिरेव च ॥ ६३ ॥

उस समयकी विपरीत स्वभाववाली स्त्रियाँ अपने योग्य पतियोंको भी धोखा देकर बुरे शील- स्वभावकी हो जायँगी और सेवकों तथा पशुओंके साथ भी व्यभिचार करेंगी ॥ ६३ ॥

वीरपत्न्यस्तथा नार्यः संश्रयन्ति नरान् नृप ।

भर्तारमपि जीवन्तमन्यान् व्यभिचरन्त्युत ॥ ६४ ॥

राजन्! वीर पुरुषोंकी पत्नियाँ भी परपुरुषोंका आश्रय लेंगी और पतिके जीते हुए भी दूसरोंसे व्यभिचार करेंगी ॥ ६४ ॥

तस्मिन् युगसहस्रान्ते सम्प्राप्ते चायुषः क्षये ।

अनावृष्टिर्महाराज जायते बहुवार्षिकी ॥ ६५ ॥

महाराज! इस प्रकार आयुको क्षीण करनेवाले सहस्र युगोंके अन्तिम भागकी समाप्ति होनेपर बहुत वर्षोंतक वृष्टि बंद हो जाती है ॥ ६५ ॥

ततस्तान्यल्पसाराणि सत्त्वानि क्षुधितानि वै ।

प्रलयं यान्ति भूयिष्ठं पृथिव्यां पृथिवीपते ॥ ६६ ॥

पृथ्वीपते! इससे भूतलके थोड़ी शक्तिवाले अधिकांश प्राणी भूखसे व्याकुल होकर मर जाते हैं ॥ ६६ ॥

ततो दिनकरैर्दीप्तैः सप्तभिर्मनुजाधिप ।

पीयते सलिलं सर्वं समुद्रेषु सरित्सु च ॥ ६७ ॥

नरेश्वर! तदनन्तर प्रचण्ड तेजवाले सात सूर्य उदित होकर सरिताओं और समुद्रोंका सारा जल सोख लेते हैं ॥ ६७ ॥

यच्च काष्ठं तृणं चापि शुष्कं चार्द्रं च भारत ।

सर्वं तद् भस्मसाद् भूतं दृश्यते भरतर्षभ ॥ ६८ ॥