मुद्गलोपाख्यान : अत्यधिक अभाव और भूख के समय धैर्य कैसे बनाए रखें?

धैर्य और निष्काम दान

महर्षि वेदव्यास कृत महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान पढ़ें।

वनपर्व → व्रीहिद्रौणिकपर्व · अध्याय 260 · पृष्ठ 1737–1744

व्यास ने युधिष्ठिर से कहा

मुद्गल ऋषि के त्याग और तप की महिमा समझाने हेतु

युधिष्ठिर ने पूछा— "भगवन्! महात्मा मुद्गल ने एक द्रोण धान का दान कैसे और किस विधि से किया था तथा वह दान किसको दिया गया था? यह सब मुझे बताइये।"

व्यासजी बोले— "राजन्! कुरुक्षेत्र में मुद्गल नामक एक ऋषि रहते थे। वे बड़े धर्मात्मा और जितेन्द्रिय थे। वे शील तथा उञ्छवृत्ति से ही अपनी जीविका चलाते थे और सदा सत्य बोलते थे, किसी की निन्दा नहीं करते थे। उन्होंने अतिथियों की सेवा का व्रत ले रखा था। वे अत्यन्त कर्मनिष्ठ और तपस्वी थे; आवश्यकता के अनुरूप थोड़े-से अन्न का सङ्ग्रह करते थे। वे अपनी स्त्री और पुत्र के साथ रहकर पन्द्रह दिन में जैसे कबूतर दाने चुगता है, उसी प्रकार चुनकर एक द्रोण धान का सङ्ग्रह कर पाते थे और उसके द्वारा इष्टीकृत नामक यज्ञ का अनुष्ठान करते थे। इस प्रकार परिवार सहित उन्हें पन्द्रह दिन पर भोजन प्राप्त होता था। उनके मन में किसी के प्रति ईर्ष्या का भाव नहीं था। वे प्रत्येक पर्व पर दर्श एवं पौर्णमास यज्ञ करते हुए देवताओं और अतिथियों को उनका भाग अर्पित करके शेष अन्न से जीवन-यापन करते थे। महाराज! प्रत्येक पर्व पर तीनों लोकों के स्वामी साक्षात् इन्द्र देवता अन्य देवताओं सहित पधारकर उनके यज्ञ में भाग ग्रहण करते थे।

व्रीहिद्रोणस्य तद्ध्यस्य ददतोऽन्नं महात्मनः ।
शिष्टं मात्सर्यहीनस्य वर्धतेऽतिथिदर्शनात् ॥

ईर्ष्यासे रहित महात्मा मुद्गल एक द्रोण धानसे तैयार किये हुए अन्नमेंसे जब - जब दान करते थे, तब - तब देनेसे बचा हुआ अन्न मुद्गलके द्वारा दूसरे अतिथियोंका दर्शन करनेसे बढ़ जाया करता था ।

महाभारत · वनपर्व · व्रीहिद्रौणिकपर्व · अध्याय 260 · श्लोक 9पृष्ठ 1739

मुद्गल ऋषि मुनिवृत्ति से रहते हुए पर्व कालोचित कर्मदर्श और पौर्णमास यज्ञ करके हर्षोल्लासपूर्ण हृदय से अतिथियों को भोजन देते थे। ईर्ष्या से रहित महात्मा मुद्गल जब-जब दान करते थे, तब-तब देने से बचा हुआ अन्न दूसरे अतिथियों के दर्शन होने से बढ़ जाता था। इस प्रकार उसमें सैकड़ों मनीषी ब्राह्मण एक साथ भोजन कर लेते थे; वह अन्न उनके विशुद्ध त्याग के प्रभाव से निश्चय ही बढ़ जाता था।

राजन्! एक दिन दिगम्बर वेष में भ्रमण करने वाले महर्षि दुर्वासा ने उत्तम व्रत का पालन करने वाले धर्मिष्ठ महात्मा मुद्गल का नाम सुना। उनके व्रत की ख्याति सुनकर वे वहाँ आ पहुँचे। पाण्डुनन्दन! दुर्वासा मुनि पागलों की तरह अटपटे वेष धारण किए, मूँड़ मुराए और नाना प्रकार के कटु वचन बोलते हुए उस आश्रम में पधारे। ब्रह्मर्षि मुद्गल के पास पहुँचकर मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा ने कहा— 'विप्रवर! तुम्हें यह मालूम होना चाहिए कि मैं भोजन की इच्छा से यहाँ आया हूँ।'

अभिगम्याथ तं विप्रमुवाच मुनिसत्तमः ।
अन्नार्थिनमनुप्राप्तं विद्धि मां द्विजसत्तम ॥

ब्रह्मर्षि मुद्गलके पास पहुँचकर मुनिश्रेष्ठ दुर्वासाने कहा - ' विप्रवर! तुम्हें यह मालूम होना चाहिये कि मैं भोजनकी इच्छासे यहाँ आया हूँ'

महाभारत · वनपर्व · व्रीहिद्रौणिकपर्व · अध्याय 260 · श्लोक 13पृष्ठ 1739

मुद्गल ने उनसे कहा— 'महर्षे! आपका स्वागत है।' ऐसा कहकर उन्होंने पाद्य, उत्तम अर्घ्य तथा आचमनीय आदि पूजन की सामग्री भेंट की। तत्पश्चात् उन व्रतधारी अतिथिसेवी महर्षि मुद्गल ने बड़ी श्रद्धा के साथ उन्मत्त-वेशधारी भूखे तपस्वी दुर्वासा को भोजन अर्पित किया। वह अन्न बड़ा स्वादिष्ट था। वे उन्मत्त मुनि भूखे तो थे ही, परोसी हुई सारी रसोई खा गए। तब महर्षि मुद्गल ने उन्हें और भोजन दिया। इस तरह सारा भोजन उदरस्थ करके दुर्वासाजी ने जूठन लेकर अपने सारे अङ्गों में लपेट ली और फिर जैसे आए थे, वैसे ही चल दिए।

भुक्त्वा चान्नं ततः सर्वमुच्छिष्टेनात्मनस्ततः ।
अथाङ्गं लिलिपेऽन्नेन यथागतमगाच्च सः ॥

इस तरह सारा भोजन उदरस्थ करके दुर्वासाजीने जूठन लेकर अपने सारे अंगोंमें लपेट ली और फिर जैसे आये थे, वैसे ही चल दिये ।

महाभारत · वनपर्व · व्रीहिद्रौणिकपर्व · अध्याय 260 · श्लोक 17पृष्ठ 1740

इसी प्रकार दूसरा पर्वकाल आने पर दुर्वासा ऋषि ने पुनः आकर उन उञ्छवृत्ति से जीवन-निर्वाह करने वाले महात्मा मुद्गल के यहाँ का सारा अन्न खा लिया। मुनि निराहार रहकर पुनः अन्न के दाने बीनने लगे। भूख का कष्ट उनके मन में कोई विकार उत्पन्न करने में समर्थ न हो सका। स्त्री-पुत्र सहित अन्न के दाने चुनते हुए विप्रवर मुद्गल के हृदय में क्रोध, द्वेष, घबराहट तथा अपमान प्रवेश नहीं कर सके। इस प्रकार उञ्छधर्म का पालन करने वाले मुनिश्रेष्ठ मुद्गल के घर पर महर्षि दुर्वासा उनका धैर्य छुड़ाने का दृढ़ निश्चय लेकर लगातार छः बार ठीक पर्व के समय उपस्थित हुए। किन्तु उन्होंने उनके मन में कभी कोई विकार नहीं देखा। शुद्ध अन्तःकरण वाले महर्षि मुद्गल के मन को दुर्वासा ने सदा शुद्ध और निर्मल ही पाया।

तथा तमुञ्छधर्माणं दुर्वासा मुनिसत्तमम् ।
उपतस्थे यथाकालं षट्कृत्वः कृतनिश्चयः ॥

इस प्रकार उञ्छधर्मका पालन करनेवाले मुनिश्रेष्ठ मुद्गलके घरपर महर्षि दुर्वासा उनका धैर्य छुड़ानेका दृढ़ निश्चय लेकर लगातार छः बार ठीक पर्वके समय उपस्थित हुए ।

महाभारत · वनपर्व · व्रीहिद्रौणिकपर्व · अध्याय 260 · श्लोक 21पृष्ठ 1741

तब वे प्रसन्न होकर मुद्गल से बोले— 'ब्रह्मन्! इस संसार में ईर्ष्या से रहित होकर दान देने वाला मनुष्य तुम्हारे समान दूसरा कोई नहीं है। भूख बड़े-बड़े लोगों के धर्मज्ञान को विलुप्त कर देती है, धैर्य हर लेती है तथा रस का अनुसरण करने वाली रसना सदा रसीले पदार्थों की ओर मनुष्य को खींचती रहती है। भोजन से ही प्राणों की रक्षा होती है। चञ्चल मन को रोकना अत्यन्त कठिन होता है; मन और इन्द्रियों की एकाग्रता को ही निश्चित रूप से तप कहा गया है। परिश्रम से उपार्जित किए हुए धन का शुद्ध हृदय से दान करना अत्यन्त दुष्कर है, परन्तु श्रेष्ठ पुरुष! तुमने यह सब कुछ यथार्थ रूप से सिद्ध कर लिया है। तुमसे मिलकर हम बहुत प्रसन्न हैं और अपने ऊपर तुम्हारा अनुग्रह मानते हैं। इन्द्रियसंयम, धैर्य, संविभाग (दान), शम, दम, दया, सत्य और धर्म— ये सब गुण तुममें पूर्ण रूप से विद्यमान हैं। तुम्हारे जैसा पवित्र अन्तःकरण वाला दूसरा कोई नहीं है। तुमने अपने शुभ कर्मों से सभी लोकों को जीत लिया; परमपद को प्राप्त कर लिया। अहो! स्वर्गवासी देवताओं ने भी तुम्हारे महान दान की सर्वत्र घोषणा की है। उत्तम व्रत का पालन करने वाले महर्षे! तुम सदेह स्वर्गलोक को जाओगे।'

तमुवाच ततः प्रीतः स मुनिर्मुद्गलं ततः ।
त्वत्समो नास्ति लोकेऽस्मिन् दाता मात्सर्यवर्जितः ॥

तब वे प्रसन्न होकर मुद्गलसे बोले – ' ब्रह्मन्! इस संसारमें ईर्ष्यासे रहित होकर दान देनेवाला मनुष्य तुम्हारे समान दूसरा कोई नहीं है ।

महाभारत · वनपर्व · व्रीहिद्रौणिकपर्व · अध्याय 260 · श्लोक 23पृष्ठ 1742

दुर्वासा मुनि इस प्रकार कह ही रहे थे कि एक देवदूत विमान के साथ मुद्गल ऋषि के पास आ पहुँचा। वह विमान हंस एवं सारस से जुते हुए थे; उसे क्षुद्र-घण्टिकाओं की जाली से सुसज्जित किया गया था तथा उससे दिव्य सुगन्ध फैल रही थी। वह विमान देखने में बड़ा विचित्र और इच्छानुसार चलने वाला था। देवदूत ने ब्रह्मर्षि मुद्गल से कहा— 'मुने! यह विमान आपको शुभ कर्मों से प्राप्त हुआ है। इस पर बैठिये। आप परम सिद्धि प्राप्त कर चुके हैं।'

उवाच चैनं विप्रर्षिं विमानं कर्मभिर्जितम् ।
समुपारोह संसिद्धिं प्राप्तोऽसि परमां मुने ॥

देवदूतने ब्रह्मर्षि मुद्गलसे कहा-' मुने! यह विमान आपको शुभ कर्मोंसे प्राप्त हुआ है । इसपर बैठिये । आप परम सिद्धि प्राप्त कर चुके हैं'

महाभारत · वनपर्व · व्रीहिद्रौणिकपर्व · अध्याय 260 · श्लोक 32पृष्ठ 1743

देवदूत के ऐसा कहने पर महर्षि मुद्गल ने उससे कहा— 'देवदूत! मैं तुम्हारे मुख से स्वर्गवासियों के गुण सुनना चाहता हूँ। वहाँ रहने वालों में कौन-कौन से गुण होते हैं? कैसी तपस्या होती है और उनका निश्चित विचार कैसा होता है? स्वर्ग में क्या सुख है और वहाँ क्या दोष है?'"

यदत्र तथ्यं पथ्यं च तद् ब्रवीह्यविचारयन् ।
श्रुत्वा तथा करिष्यामि व्यवसायं गिरा तव ॥

‘ इसके उत्तरमें जो सत्य एवं हितकर बात हो, उसे बिना किसी हिचकिचाहटके कहो । तुम्हारी बात सुनकर उसीके द्वारा मैं अपने कर्तव्यका निश्चय करूँगा'

महाभारत · वनपर्व · व्रीहिद्रौणिकपर्व · अध्याय 260 · श्लोक 36पृष्ठ 1744

In English

The Charity of Sage Mudgala

Sage Mudgala lives a life of strict austerity and shares his limited food with guests. Sage Durvasa visits him six times to test his patience and hunger, but Mudgala remains calm and generous. Pleased by this, Durvasa tells Mudgala that he has achieved great spiritual success.

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