श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1741–1750

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1741–1750

पृष्ठ 1741

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निराहारस्तु स मुनिरुञ्छमार्जयते पुनः ।

न चैनं विक्रियां नेतुमशकन्मुद्गलं क्षुधा ॥ १९ ॥

मुनि निराहार रहकर पुनः अन्नके दाने बीनने लगे । भूखका कष्ट उनके मनमें विकार उत्पन्न करनेमें समर्थ न हो सका ॥ १ ९ ॥

न क्रोधो न च मात्सर्यं नावमानो न सम्भ्रमः ।

सपुत्रदारमुञ्छन्तमाविवेश द्विजोत्तमम् ॥ २० ॥

स्त्री- पुत्रसहित अन्नके दाने चुनते हुए विप्रवर मुद्गलके हृदयमें क्रोध, द्वेष, घबराहट तथा अपमान प्रवेश नहीं कर सके ॥ २० ॥

तथा तमुञ्छधर्माणं दुर्वासा मुनिसत्तमम् ।

उपतस्थे यथाकालं षट्कृत्वः कृतनिश्चयः ॥ २१ ॥

इस प्रकार उञ्छधर्मका पालन करनेवाले मुनिश्रेष्ठ मुद्गलके घरपर महर्षि दुर्वासा उनका धैर्य छुड़ानेका दृढ़ निश्चय लेकर लगातार छः बार ठीक पर्वके समय उपस्थित हुए ॥ २१ ॥

न चास्य मनसा कंचिद् विकारं ददृशे मुनिः ।

शुद्धसत्त्वस्य शुद्धं स ददृशे निर्मलं मनः ॥ २२ ॥

पृष्ठ 1742

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किंतु उन्होंने उनके मनमें कभी कोई विकार नहीं देखा । शुद्ध अन्तःकरणवाले महर्षि मुद्गलके मनको दुर्वासाने सदा शुद्ध और निर्मल ही पाया ॥ २२ ॥

तमुवाच ततः प्रीतः स मुनिर्मुद्गलं ततः ।

त्वत्समो नास्ति लोकेऽस्मिन् दाता मात्सर्यवर्जितः ॥ २३ ॥

तब वे प्रसन्न होकर मुद्गलसे बोले – ' ब्रह्मन्! इस संसारमें ईर्ष्यासे रहित होकर दान देनेवाला मनुष्य तुम्हारे समान दूसरा कोई नहीं है ॥ २३ ॥

क्षुद् धर्मसंज्ञां प्रणुदत्यादत्ते धैर्यमेव च ।

रसानुसारिणी जिह्वा कर्षत्येव रसान् प्रति ॥ २४ ॥

' भूख ( बड़े - बड़े लोगोंके ) धर्मज्ञानको विलुप्त कर देती है, धैर्य हर लेती है तथा रसका अनुसरण करनेवाली रसना सदा रसीले पदार्थोंकी ओर मनुष्यको खींचती रहती है ॥ २४ ॥

आहारप्रभवाः प्राणा मनो दुर्निग्रहं चलम् ।

मनसश्चेन्द्रियाणां चाप्यैकाग्रयं निश्चितं तपः ॥ २५ ॥

‘ भोजनसे ही प्राणोंकी रक्षा होती है । चंचल मनको रोकना अत्यन्त कठिन होता है । मन और इन्द्रियोंकी एकाग्रताको ही निश्चितरूपसे तप कहा गया है ' ॥ २५ ॥

श्रमेणोपार्जितं त्यक्तुं दुःखं शुद्धेन चेतसा ।

तत् सर्वं भवता साधो यथावदुपपादितम् ॥ २६ ॥

‘ परिश्रमसे उपार्जित किये हुए धनका शुद्ध हृदयसे दान करना अत्यन्त दुष्कर है । परंतु श्रेष्ठ पुरुष! तुमने यह सब कुछ यथार्थरूपसे सिद्ध कर लिया है ॥ २६ ॥

प्रीताः स्मोऽनुगृहीताश्च समेत्य भवता सह ।

इन्द्रियाभिजयो धैर्यं संविभागो दमः शमः ॥ २७ ॥

दया सत्यं च धर्मश्च त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम् । ( विशुद्धसत्त्वसम्पन्नो न त्वदन्योऽस्ति कश्चन । ) जितास्ते कर्मभिर्लोकाः प्राप्तोऽसि परमां गतिम् ॥ २८ ॥

' तुमसे मिलकर हम बहुत प्रसन्न हैं और अपने ऊपर तुम्हारा अनुग्रह मानते हैं । इन्द्रियसंयम, धैर्य, संविभाग (दान ), शम, दम, दया, सत्य और धर्म – ये सब गुण तुममें पूर्णरूपसे विद्यमान हैं । तुम्हारे -जैसा पवित्र अन्तःकरणवाला दूसरा कोई नहीं है । तुमने अपने शुभ कर्मोंसे सभी लोकोंको जीत लिया; परमपदको प्राप्त कर लिया ॥ २७-२८ ॥

अहो दानं विघुष्टं ते सुमहत् स्वर्गवासिभिः ।

सशरीरो भवान् गन्ता स्वर्गं सुचरितव्रत ॥ २ ९ ॥

‘ अहो! स्वर्गवासी देवताओंने भी तुम्हारे महान् दानकी सर्वत्र घोषणा की है । उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षे! तुम सदेह स्वर्गलोकको जाओगे ' ॥ २ ९ ॥ इत्येवं वदतस्तस्य तदा दुर्वाससो मुनेः ।

पृष्ठ 1743

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देवदूतो विमानेन मुद्गलं प्रत्युपस्थितः ॥ ३० ॥

दुर्वासा मुनि इस प्रकार कह ही रहे थे कि एक देवदूत विमानके साथ मुद्गल ऋषिके पास आ पहुँचा ॥

हंससारसयुक्तेन किङ्किणीजालमालिना ।

कामगेन विचित्रेण दिव्यगन्धवता तथा ॥ ३१ ॥

उस विमानमें हंस एवं सारस जुते हुए थे । क्षुद्र- घण्टिकाओंकी जालीसे उसे सुसज्जित किया गया था तथा उससे दिव्य सुगन्ध फैल रही थी । वह विमान देखनेमें बड़ा विचित्र और इच्छानुसार चलनेवाला था ॥ ३१ ॥

उवाच चैनं विप्रर्षिं विमानं कर्मभिर्जितम् ।

समुपारोह संसिद्धिं प्राप्तोऽसि परमां मुने ॥ ३२ ॥

देवदूतने ब्रह्मर्षि मुद्गलसे कहा-' मुने! यह विमान आपको शुभ कर्मोंसे प्राप्त हुआ है । इसपर बैठिये । आप परम सिद्धि प्राप्त कर चुके हैं' ॥ ३२ ॥

तमेवंवादिनमृषिर्देवदूतमुवाच ह ।

इच्छामि भवता प्रोक्तान् गुणान् स्वर्गनिवासिनाम् ॥ ३३ ॥

के गुणास्तत्र वसतां किं तपः कश्च निश्चयः ।

स्वर्गे तत्र सुखं किं च दोषो वा देवदूतक ॥ ३४ ॥

पृष्ठ 1744

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देवदूतके ऐसा कहनेपर महर्षि मुद्गलने उससे कहा– 'देवदूत! मैं तुम्हारे मुखसे स्वर्गवासियोंके गुण सुनना चाहता हूँ। वहाँ रहनेवालोंमें कौन- कौनसे गुण होते हैं? कैसी तपस्या होती है? और उनका निश्चित विचार कैसा होता है? स्वर्गमें क्या सुख है और वहाँ क्या दोष है? ॥

सतां साप्तपदं मैत्रमाहुः सन्तः कुलोचिताः ।

मित्रतां च पुरस्कृत्य पृच्छामि त्वामहं विभो ॥ ३५ ॥

‘ प्रभो! सत्पुरुषोंमें सात पग एक साथ चलनेसे ही मित्रता हो जाती है, ऐसा कुलीन सत्पुरुषोंका कथन है । मैं उसी मैत्रीको सामने रखकर तुमसे उपर्युक्त प्रश्न पूछ रहा हूँ ॥ ३५ ॥

यदत्र तथ्यं पथ्यं च तद् ब्रवीह्यविचारयन् ।

श्रुत्वा तथा करिष्यामि व्यवसायं गिरा तव ॥ ३६ ॥

‘ इसके उत्तरमें जो सत्य एवं हितकर बात हो, उसे बिना किसी हिचकिचाहटके कहो ।

तुम्हारी बात सुनकर उसीके द्वारा मैं अपने कर्तव्यका निश्चय करूँगा' ॥ ३६ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि व्रीहिद्रौणिकपर्वणि मुद्गलोपाख्याने षष्टयधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २६० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत व्रीहिद्रौणिकपर्वमें मुद्गलोपाख्यानसम्बन्धीदो सौसाठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २६० ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठका श्लोक मिलाकर कुल ३६३ श्लोक हैं ) 3. कुछ विद्वानोंके मतसे यह सोलह सेरका होता है । २. ‘ उञ्छः कणश आदानं कणिशाद्यर्जनं शिलम्। ' इस कोषवाक्यके अनुसार बाजार उठ जानेपर या खेत कटनेपर वहाँ बिखरेहुए अन्नके दाने बीनना ‘ उञ्छ' कहलाता है और खेत कट जानेपर वहाँ गिरी हुई गेहूँ- धान आदिकी बालें बीनना ' शील' कहा गया

पृष्ठ 1745

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एकषष्टयधिकद्विशततमोऽध्यायः देवदूतद्वारा स्वर्गलोकके गुण - दोषोंका तथा दोषरहित विष्णुधामका वर्णन सुनकर मुद्गलका देवदूतको लौटा देना एवं व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाकर अपने आश्रमको लौट जाना देवदूत उवाच

महर्षे आर्यबुद्धिस्त्वं यः स्वर्गसुखमुत्तमम् ।

सम्प्राप्तं बहु मन्तव्यं विमृशस्यबुधो यथा ॥ १ ॥

देवदूत बोला- महर्षे! तुम्हारी बुद्धि बड़ी उत्तम है । जिस उत्तम स्वर्गीय सुखको दूसरे लोग बहुत बड़ी चीज समझते हैं, वह तुम्हें प्राप्त ही है, फिर भी तुम अनजान से बनकर इसके सम्बन्धमें विचार करते हो - इसके गुण- दोषकी समीक्षा कर रहे हो ॥ १ ॥

उपरिष्टादसौ लोको योऽयं स्वरिति संज्ञितः ।

ऊर्ध्वगः सत्पथः शश्वद् देवयानचरो मुने ॥ २ ॥

मुने! जिसे स्वर्लोक कहते हैं, वह यहाँसे बहुत ऊपर है । वहाँ पहुँचनेके लिये ऊपरको जाया जाता है, इसलिये उसका एक नाम ऊर्ध्वग भी है । वहाँ जानेके लिये जो मार्ग है, वह बहुत उत्तम है । वहाँके लोग सदा विमानोंपर विचरा करते हैं ॥ २ ॥

नातप्ततपसः पुंसो नामहायज्ञयाजिनः ।

नानृता नास्तिकाश्चैव तत्र गच्छन्ति मुद्गल ॥ ३ ॥

मुद्गल! जिन्होंने तपस्या नहीं की है, बड़े -बड़े यज्ञोंद्वारा यजन नहीं किया है तथा जो असत्यवादी एवं नास्तिक हैं, वे उस लोकमें नहीं जा पाते हैं ॥ ३ ॥

धर्मात्मानो जितात्मानः शान्ता दान्ता विमत्सराः ।

दानधर्मरता मर्त्याः शूराश्चाहवलक्षणाः ॥ ४ ॥

तत्र गच्छन्ति धर्माग्रयं कृत्वा शमदमात्मकम् ।

लोकान् पुण्यकृतां ब्रह्मन् सद्भिराचरितान् नृभिः ॥ ५ ॥

ब्रह्मन्! धर्मात्मा, मनको वशमें रखनेवाले, शम-दमसे सम्पन्न, ईर्ष्यारहित, दानधर्मपरायण तथा युद्धकलामें प्रसिद्ध शूरवीर मनुष्य ही वहाँ सब धर्मोंमें श्रेष्ठ इन्द्रिय-संयम और मनोनिग्रहरूपी योगको अपनाकर सत्पुरुषों द्वारा सेवित पुण्यवानोंके लोकोंमें जाते हैं ॥ ४-५ ॥

देवाः साध्यास्तथा विश्वे तथैव च महर्षयः ।

यामा धामाश्च मौद्गल्य* गन्धर्वाप्सरसस्तथा ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1746

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एषां देवनिकायानां पृथक् पृथगनेकशः ।

भास्वन्तः कामसम्पन्ना लोकास्तेजोमयाः शुभाः ॥ ७ ॥

मुद्गल! वहाँ देवता, साध्य, विश्वेदेव, महर्षिगण, याम, धाम, गन्धर्व तथा अप्सरा — इन सब देवसमूहोंके अलग- अलग अनेक प्रकाशमान लोक हैं, जो इच्छानुसार प्राप्त होनेवाले भोगोंसे सम्पन्न, तेजस्वी तथा मंगलकारी हैं ॥ ६-७ ॥

त्रयस्त्रिंशत्सहस्राणि योजनानि हिरण्मयः ।

मेरुः पर्वतराड् यत्र देवोद्यानानि मुद्गल ॥ ८ ॥

नन्दनादीनि पुण्यानि विहाराः पुण्यकर्मणाम् ।

न क्षुत्पिपासे न ग्लानिर्न शीतोष्णे भयं तथा ॥ ९ ॥

स्वर्गमें तैंतीस हजार योजनका सुवर्णमय एक बहुत ऊँचा पर्वत है जो मेरुगिरिके नामसे विख्यात है । मुद्गल! वहीं देवताओंके नन्दन आदि पवित्र उद्यान तथा पुण्यात्मा पुरुषोंके विहारस्थल हैं । वहाँ किसीको भूख- प्यास नहीं लगती, मनमें कभी ग्लानि नहीं होती, गरमी और जाड़ेका कष्ट भी नहीं होता और न कोई भय ही होता है ॥ ८- ९ ॥

बीभत्समशुभं वापि तत्र किंचिन्न विद्यते ।

मनोज्ञाः सर्वतो गन्धाः सुखस्पर्शाश्च सर्वशः ॥ १० ॥

शब्दाः श्रुतिमनोग्राह्याः सर्वतस्तत्र वै मुने ।

न शोको न जरा तत्र नायासपरिदेवने ॥ ११ ॥

वहाँ कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है, जो घृणा करने योग्य एवं अशुभ हो । वहाँ सब ओर मनोरम सुगन्ध, सुखदायक स्पर्श तथा कानों और मनको प्रिय लगनेवाले मधुर शब्द सुननेमें आते हैं । मुने! स्वर्गलोकमें न शोक होता है, न बुढ़ापा। वहाँ थकावट तथा करुणाजनक विलाप भी श्रवणगोचर नहीं होते ॥ १०-११ ॥

ईदृशः स मुने लोकः स्वकर्मफलहेतुकः ।

सुकृतैस्तत्र पुरुषाः सम्भवन्त्यात्मकर्मभिः ॥ १२ ॥

महर्षे! स्वर्गलोक ऐसा ही है । अपने सत्कर्मोंके फलरूप ही उसकी प्राप्ति होती है ।

मनुष्य वहाँ अपने किये हुए पुण्यकर्मोंसे ही रह पाते हैं ॥ १२ ॥

तैजसानि शरीराणि भवन्त्यत्रोपपद्यताम् ।

कर्मजान्येव मौद्गल्य न मातृपितृजान्युत ॥ १३ ॥

मुद्गल! स्वर्गवासियोंके शरीरमें तैजस तत्त्वकी प्रधानता होती है । वे शरीर पुण्यकर्मोंसे ही उपलब्ध होते हैं । माता - पिताके रजोवीर्यसे उनकी उत्पत्ति नहीं होती है ॥ १३ ॥

न संस्वेदो न दौर्गन्ध्यं पुरीषं मूत्रमेव च ।

तेषां न च रजो वस्त्रं बाधते तत्र वै मुने ॥ १४ ॥

उन शरीरोंमें कभी पसीना नहीं निकलता, दुर्गन्ध नहीं आती तथा मल -मूत्रका भी अभाव होता है । मुने! उनके कपड़ोंमें कभी मैल नहीं बैठती है ॥ १४ ॥

पृष्ठ 1747

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न लायन्ति स्रजस्तेषां दिव्यगन्धा मनोरमाः ।

संयुज्यन्ते विमानैश्च ब्रह्मन्नेवंविधैश्च ते ॥ १५ ॥

स्वर्गवासियोंकी जो ( दिव्य कुसुमोंकी ) मालाएँ होती हैं, वे कभी कुम्हलाती नहीं हैं ।

उनसे निरन्तर दिव्य सुगन्ध फैलती रहती है तथा वे देखनेमें भी बड़ी मनोरम होती हैं ।

ब्रह्मन्! स्वर्गके सभी निवासी ऐसे ही विमानोंसे सम्पन्न होते हैं ॥ १५ ॥

ईर्ष्याशोकक्लमापेता मोहमात्सर्यवर्जिताः ।

सुखं स्वर्गजितस्तत्र वर्तयन्ते महामुने ॥ १६ ॥

महामुने! जो अपने सत्कर्मोंद्वारा स्वर्गलोकपर विजय पा चुके हैं, वे वहाँ बड़े सुखसे जीवन बिताते हैं । उनमें किसीके प्रति ईर्ष्या नहीं होती, वे कभी शोक तथा थकावटका अनुभव नहीं करते एवं मोह तथा मात्सर्य ( द्वेषभाव ) - से सदा दूर रहते हैं ॥ १६ ॥

तेषां तथाविधानां तु लोकानां मुनिपुङ्गव ।

उपर्युपरि लोकस्य लोका दिव्या गुणान्विताः ॥ १७ ॥

मुनिश्रेष्ठ! देवताओंके जो पूर्वोक्त प्रकारके लोक हैं, उन सबसे ऊपर अन्य कितने ही विविध गुणसम्पन्न दिव्य लोक हैं ॥ १७ ॥

पुरस्ताद् ब्राह्मणास्तत्र लोकास्तेजोमयाः शुभाः ।

यत्र यान्त्यृषयो ब्रह्मन् पूताः स्वैः कर्मभिः शुभैः ॥ १८ ॥

उन सबसे ऊपर ब्रह्माजीके लोक हैं, जो अत्यन्त तेजस्वी एवं मंगलकारी हैं । ब्रह्मन्! वहाँ अपने शुभ कर्मोंसे पवित्र ऋषि, मुनि जाते हैं ॥ १८ ॥

ऋभवो नाम तत्रान्ये देवानामपि देवताः ।

तेषां लोकात् परतरे यान् यजन्तीह देवताः ॥ १ ९ ॥

वहीं ऋभु नामक दूसरे देवता रहते हैं, जो देवगणोंके भी आराध्यदेव हैं । देवताओंके लोकोंसे उनका स्थान उत्कृष्ट है । देवतालोग भी यज्ञोंद्वारा उनका यजन करते हैं ॥ १ ९ ॥

स्वयंप्रभास्ते भास्वन्तो लोकाः कामदुघाः परे ।

न तेषां स्त्रीकृतस्तापो न लोकैश्वर्यमत्सरः ॥ २० ॥

उनके उत्तम लोक स्वयंप्रकाश, तेजस्वी और सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति करनेवाले हैं । उन्हें स्त्रियोंके लिये संताप नहीं होता । लोकोंके ऐश्वर्यके लिये उनके मनमें कभी ईर्ष्या नहीं होती ॥ २० ॥

न वर्तयन्त्याहुतिभिस्ते नाप्यमृतभोजनाः ।

तथा दिव्यशरीरास्ते न च विग्रहमूर्तयः ॥ २१ ॥

वे देवताओंकी तरह आहुतियोंसे जीविका नहीं चलाते । उन्हें अमृत पीनेकी आवश्यकता नहीं होती । उनके शरीर दिव्य ज्योतिर्मय हैं । उनकी कोई विशेष आकृति नहीं होती ॥ २१ ॥

न सुखे सुखकामास्ते देवदेवाः सनातनाः ।

पृष्ठ 1748

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न कल्पपरिवर्तेषु परिवर्तन्ति ते तथा ॥ २२ ॥

वे सुखमें प्रतिष्ठित हैं, परंतु सुखकी कामना नहीं रखते । वे देवताओंके भी देवता और सनातन हैं । कल्पका अन्त होनेपर भी उनकी स्थितिमें कोई परिवर्तन नहीं होता – वे ज्यों-के - त्यों बने रहते हैं ॥ २२ ॥

जरा मृत्युः कुतस्तेषां हर्षः प्रीतिः सुखं न च ।

न दुःखं न सुखं चापि रागद्वेषौ कुतो मुने ॥ २३ ॥

मुने! उनमें जरा- मृत्युकी सम्भावना तो हो ही कैसे सकती है? हर्ष, प्रीति तथा सुख आदि विकारोंका भी उनमें सर्वथा अभाव ही है । ऐसी स्थितिमें उनके भीतर दुःख - सुख तथा राग - द्वेषादि कैसे रह सकते हैं? ॥ २३ ॥

देवानामपि मौद्गल्य कांक्षिता सा गतिः परा ।

दुष्प्रापा परमा सिद्धिरगम्या कामगोचरैः ॥ २४ ॥

मौद्गल्य! स्वर्गवासी देवता भी उस (ऋभु नामक देवताओंकी ) परमगतिको प्राप्त करनेकी इच्छा रखते हैं । वह परा सिद्धिकी अवस्था है, जो अत्यन्त दुर्लभ है । विषयभोगोंकी इच्छा रखनेवाले लोगोंकी वहाँतक पहुँच नहीं होती ॥ २४ ॥

त्रयस्त्रिंशदिमे देवा येषां लोका मनीषिभिः ।

गम्यन्ते नियमैः श्रेष्ठैर्दानैर्वा विधिपूर्वकैः ॥ २५ ॥

ये जो तैंतीस देवता हैं, उन्हींके लोकोंको मनीषी पुरुष उत्तम नियमोंके आचरणसे अथवा विधिपूर्वक दिये हुए दानोंसे प्राप्त करते हैं ॥ २५ ॥

सेयं दानकृता व्युष्टिरनुप्राप्ता सुखं त्वया ।

तां भुङ्क्ष्व सुकृतैर्लब्धां तपसा द्योतितप्रभः ॥ २६ ॥

ब्रह्मन्! तुमने अपने दानके प्रभावसे अनायास ही वह स्वर्गीय सुख- सम्पत्ति प्राप्त कर ली है । अपनी तपस्याके तेजसे देदीप्यमान होकर अब तुम अपने पुण्यसे प्राप्त हुए उस दिव्य वैभवका उपभोग करो ॥ २६ ॥

एतत् स्वर्गसुखं विप्र लोका नानाविधास्तथा ।

गुणाः स्वर्गस्य प्रोक्तास्ते दोषानपि निबोध मे ॥ २७ ॥

विप्रवर! यही स्वर्गका सुख है और ऐसे ही वहाँ भाँति- भाँतिके लोक हैं । यहाँतक मैंने तुम्हें स्वर्गके गुण बताये हैं; अब वहाँके दोष भी मुझसे सुन लो ॥ २७ ॥

कृतस्य कर्मणस्तत्र भुज्यते यत् फलं दिवि ।

न चान्यत् क्रियते कर्म मूलच्छेदेन भुज्यते ॥ २८ ॥

अपने किये हुए सत्कर्मोंका जो फल होता है, वही स्वर्गमें भोगा जाता है । वहाँ कोई नया कर्म नहीं किया जाता । अपना पुण्यरूप मूलधन गँवानेसे ही वहाँके भोग प्राप्त होते हैं ॥ २८ ॥

सोऽत्र दोषो मम मतस्तस्यान्ते पतनं च यत् ।

पृष्ठ 1749

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सुखव्याप्तमनस्कानां पतनं यच्च मुद्गल ॥ २ ९ ॥ मुद्गल! स्वर्गमें सबसे बड़ा दोष मुझे यह जान पड़ता है कि कर्मोंका भोग समाप्त होनेपर एक दिन वहाँसे पतन हो ही जाता है । जिनका मन सुखभोगमें लगा हुआ है, उनको सहसा पतन कितना दुःखदायी होता है ॥ २ ९ ॥

असंतोषः परीतापो दृष्ट्वा दीप्ततराः श्रियः ।

यद् भवत्यवरे स्थाने स्थितानां तत् सुदुष्करम् ॥ ३० ॥

स्वर्गमें भी जो लोग नीचेके स्थानोंमें स्थित हैं, उन्हें अपनेसे ऊपरके लोकोंकी समुज्ज्वल श्रीसम्पत्ति देखकर जो असंतोष और संताप होता है, उसका वर्णन करना अत्यन्त कठिन है ॥ ३० ॥

संज्ञामोहश्च पततां रजसा च प्रधर्षणम् ।

प्रम्लानेषु च माल्येषु ततः पिपतिषोर्भयम् ॥ ३१ ॥

स्वर्गलोकसे गिरते समय वहाँके निवासियोंकी चेतना लुप्त हो जाती है । रजोगुणके आक्रमणसे उनकी बुद्धि बिगड़ जाती है । पहले उनके गलेकी मालाएँ कुम्हला जाती हैं; इससे उन्हें पतनकी सूचना मिल जानेसे उनके मनमें बड़ा भारी भय समा जाता है ॥ ३१ ॥

आब्रह्मभवनादेते दोषा मौद्गल्य दारुणाः ।

नाकलोके सुकृतिनां गुणास्त्वयुतशो नृणाम् ॥ ३२ ॥

मौद्गल्य! ब्रह्मलोकपर्यन्त जितने लोक हैं, उन सबमें ये भयंकर दोष देखे जाते हैं ।

स्वर्गलोकमें रहते समय तो पुण्यात्मा पुरुषोंमें सहस्रों गुण होते हैं ॥ ३२ ॥

अयं त्वन्यो गुणः श्रेष्ठयुतानां स्वर्गतो मुने ।

शुभानुशययोगेन मनुष्येषूपजायते ॥ ३३ ॥

मुने! परंतु वहाँसे भ्रष्ट हुए जीवोंका भी यह एक अन्य श्रेष्ठ गुण देखा जाता है कि वे अपने शुभ कर्मों - के संस्कारसे युक्त होनेके कारण मनुष्ययोनिमें ही जन्म पाते हैं ॥ ३३ ॥

तत्रापि स महाभागः सुखभागभिजायते ।

न चेत् सम्बुध्यते तत्र गच्छत्यधमतां ततः ॥ ३४ ॥

वहाँ भी वह महाभाग मानव सुखके साधनोंसे सम्पन्न होकर ही उत्पन्न होता है । परंतु यदि मानवयोनिमें वह अपने कर्तव्यको न समझे, तो उससे भी नीची योनिमें चला जाता है ॥ ३४ ॥

इह यत् क्रियते कर्म तत् परत्रोपभुज्यते ।

कर्मभूमिरियं ब्रह्मन् फलभूमिरसौ मता ॥ ३५ ॥

- इस मनुष्यलोकमें मानव शरीरद्वारा जो कर्म किया जाता है, उसीको परलोकमें भोगा जाता है । ब्रह्मन्! यह कर्मभूमि और वह फलभोगकी भूमि मानी गयी है ॥ ३५ ॥

मुद्गल उवाच

पृष्ठ 1750

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महान्तस्तु अमी दोषास्त्वया स्वर्गस्य कीर्तिताः ।

निर्दोष एव यस्त्वन्यो लोकं तं प्रवदस्व मे ॥ ३६ ॥

मुद्गल बोले — देवदूत! तुमने स्वर्गके महान् दोष बताये, परंतु स्वर्गकी अपेक्षा यदि कोई दूसरा लोक इन दोषोंसे सर्वथा रहित हो तो मुझसे उसीका वर्णन करो ॥ देवदूत उवाच

ब्रह्मणः सदनादूर्ध्वं तद् विष्णोः परमं पदम् ।

शुद्धं सनातनं ज्योतिः परं ब्रह्मेति यद् विदुः ॥ ३७ ॥

देवदूतने कहा – ब्रह्माजीके भी लोकसे ऊपर भगवान् विष्णुका परम धाम है । वह

शुद्ध सनातन ज्योतिर्मय लोक है । उसे परब्रह्म भी कहते हैं ॥ ३७ ॥

न तत्र विप्र गच्छन्ति पुरुषा विषयात्मकाः ।

दम्भलोभमहाक्रोधमोहद्रोहैरभिद्रुताः ॥ ३८ ॥

विप्रवर! जिनका मन विषयोंमें रचा- पचा रहता है, वे लोग वहाँ नहीं जा सकते । दम्भ, लोभ, महाक्रोध, मोह और द्रोहसे युक्त मनुष्य भी वहाँ नहीं पहुँच सकते ॥ ३८ ॥

निर्ममा निरहङ्कारा निर्द्वन्द्वाः संयतेन्द्रियाः ।

ध्यानयोगपराश्चैव तत्र गच्छन्ति मानवाः ॥ ३ ९ ॥

जो ममता और अहंकारसे रहित, सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंसे ऊपर उठे हुए, जितेन्द्रिय तथा ध्यानयोगमें तत्पर हैं, वे मनुष्य ही उस लोकमें जा सकते हैं ॥ ३ ९ ॥

एतत् ते सर्वमाख्यातं यन्मां पृच्छसि मुद्गल ।

तवानुकम्पया साधो साधु गच्छाम मा चिरम् ॥ ४० ॥

मुद्गल! तुमने जो कुछ मुझसे पूछा था, वह सब मैंने कह सुनाया । साधो! अब आपकी कृपासे हमलोग सुखपूर्वक स्वर्गकी यात्रा करें, विलम्ब नहीं होना चाहिये ॥ ४० ॥

व्यास उवाच

एतच्छ्रुत्वा तु मौद्गल्यो वाक्यं विममृशे धिया ।

विमृश्य च मुनिश्रेष्ठो देवदूतमुवाच ह ॥ ४१ ॥

व्यासजी कहते हैं – राजन्! देवदूतकी यह बात सुनकर मुनिश्रेष्ठ मुद्गलने उसपर

बुद्धिपूर्वक विचार किया । विचार करके उन्होंने देवदूतसे कहा— ॥ ४१ ॥

देवदूत नमस्तेऽस्तु गच्छ तात यथासुखम् ।

महादोषेण मे कार्यं न स्वर्गेण सुखेन वा ॥ ४२ ॥

' देवदूत! तुम्हें नमस्कार है । तात! तुम सुखपूर्वक पधारो । स्वर्ग अथवा वहाँका सुख महान् दोषसे युक्त है; इसलिये मुझे उसकी आवश्यकता नहीं है ॥ ४२ ॥

पतनान्ते महद् दुःखं परितापः सुदारुणः ।

स्वर्गभाजश्चरन्तीह तस्मात् स्वर्गं न कामये ॥ ४३ ॥