श्रीरामोपाख्यान : अदम्य शक्ति और विकराल क्रोध को नियन्त्रित कैसे करें?

क्रोध पर विवेक की विजय

महर्षि वेदव्यास कृत महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान पढ़ें।

वनपर्व · अध्याय 289 · पृष्ठ 1935–1941

मार्कण्डेय ने युधिष्ठिर से कहा

धर्म के मार्ग पर अडचनों और आत्म-नियन्त्रण की शिक्षा हेतु

मार्कण्डेयजी ने कहा— युधिष्ठिर! उस समय जब इन्द्रजित ने देवताओं से प्राप्त वरदान के बल पर युद्ध किया, तो उसने उन दोनों भाइयों, श्रीराम और लक्ष्मण को बाणों के बन्धन से भूमि पर गिरा दिया। सैकड़ों बाणों से व्याप्त वे दोनों वीर पुरुष, श्रीराम और लक्ष्मण, पृथ्वी पर इस प्रकार पड़े थे मानो पिञ्जड़े में बन्द दो पक्षी हों। उन्हें इस अवस्था में देखकर वानरों सहित सुग्रीव वहाँ आए और उन दोनों बन्धुओं की रक्षा करने लगे। सुषेण, मैन्द, द्विविद, कुमुद, अङ्गद, हनुमान्, नील, तार तथा नल के साथ कपिराज सुग्रीव ने उन दोनों को चारों ओर से घेर लिया।

मार्कण्डेय उवाच

तौ दृष्ट्वा पतितौ भूमौ शतशः सायकैश्चितौ ।
सुग्रीवः कपिभिः सार्धं परिवार्य ततः स्थितः ॥

उन दोनोंको सैकड़ों बाणोंसे व्याप्त एवं पृथ्वीपर पड़े देख वानरोंसहित सुग्रीव उन्हें सब ओरसे घेरकर खड़े हो गये ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 289 · श्लोक 3पृष्ठ 1936

ततपश्चात विभीषण अपने कर्तव्य कर्म को पूरा करके उस स्थान पर आए। उन्होंने प्रज्ञास्त्र का प्रयोग किया और उन दोनों वीरों को होश में लाकर जगाया। उसी समय सुग्रीव ने दिव्य मन्त्रों द्वारा अभिमन्त्रित 'विशल्या' नामक महौषधि के माध्यम से उनके अङ्गों से बाण निकालकर उन्हें क्षणभर में स्वस्थ कर दिया। होश में आते ही वे दोनों नरश्रेष्ठ महारथी वीर, बाणों के बन्धन और थकावट को त्यागकर क्षणभर में उठ खड़े हुए। विभीषण ने इक्ष्वाकुकुलनन्दन श्रीरामचन्द्रजी को नीरोग और स्वस्थ देख हाथ जोड़कर कहा— ‘परन्तप! शत्रुदमन! राजाधिराज कुबेर की आज्ञा से एक गुह्यक यह जल लेकर श्वेतपर्वत से आपके समीप आया है। महाराज कुबेर आपको यह जल इस उद्देश्य से समर्पित कर रहे हैं कि आप इसे नेत्रों में लगाकर माया से अदृश्य हुए प्राणियों को देख सकें। उन्होंने कहा है कि आप इस जल से अपने दोनों नेत्र धोकर अदृश्य प्राणियों को भी देख सकेंगे और जिसे आप यह जल अर्पित करेंगे, वह मनुष्य भी अदृश्य भूतों को देखने में समर्थ होगा।’ श्रीरामचन्द्रजी ने ‘बहुत अच्छा’ कहकर वह अभिमन्त्रित जल ले लिया और महामना लक्ष्मण ने भी उससे अपने नेत्र धोए। देखते ही देखते उन सबकी आँखें अतीन्द्रिय वस्तुओं का साक्षात्कार करने वाली हो गईं।

तथा समभवच्चापि यदुवाच विभीषणः ।
क्षणेनातीन्द्रियाण्येषां चक्षूंष्यासन् युधिष्ठिर ॥

युधिष्ठिर! जैसा विभीषणने बताया था, उसका वैसा ही प्रभाव देखनेमें आया । इन सबकी आँखें क्षणभरमें अतीन्द्रिय वस्तुओंका साक्षात्कार करनेवाली हो गयीं ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 289 · श्लोक 14पृष्ठ 1938

इन्द्रजित ने युद्ध में जो पराक्रम दिखाया था, उसे अपने पिता को बताकर वह पुनः युद्ध के मुहाने की ओर लौटने लगा। उसे क्रोध में भरकर आते देख विभीषण की सम्मति से लक्ष्मण ने उस पर धावा बोल दिया। इन्द्रजित विजय के उल्लास में था और उसने अभी नित्यकर्म भी नहीं किया था; उसी अवस्था में सचेत हुए लक्ष्मण ने कुपित होकर उस पर बाणों से प्रहार करना आरम्भ कर दिया। दोनों ही एक-दूसरे को जीतने के लिए उत्सुक थे और उनके बीच इन्द्र तथा प्रह्लाद की भाँति अद्भुत युद्ध होने लगा। इन्द्रजित ने तीखे बाणों से सुमित्रा-कुमार लक्ष्मण को बींध डाला, किन्तु लक्ष्मण ने भी अग्निके समान दाहक स्पर्श वाले तीखे सायकों से इन्द्रजित को घायल कर दिया। वीर लक्ष्मण ने एक बाण से इन्द्रजित की धनुष धारण करने वाली भुजा काट दी, दूसरे बाण से उसकी दूसरी भुजा को धराशायी कर दिया और तीसरे चमकीले बाण से उसकी सुन्दर नासिका और कुण्डलों से विभूषित मस्तक को उसके धड़ से अलग कर दिया। भुजाओं और कन्धों के कट जाने से उसका धड़ अत्यन्त भयङ्कर दिख रहा था। लक्ष्मण ने अपने अस्त्रों द्वारा उसके सारथी को भी मार गिराया।

विनिकृत्तभुजस्कन्धं कबन्धं भीमदर्शनम् ।
तं हत्वा सूतमप्यस्त्रैर्जघान बलिनां वरः ॥

भुजाओं और कंधोंके कट जानेसे उसका धड़ बड़ा भयंकर दिखायी देता था । इन्द्रजित्को मारकर बलवानोंमें श्रेष्ठ लक्ष्मणने अपने अस्त्रोंद्वारा उसके सारथिको भी मार गिराया ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 289 · श्लोक 24पृष्ठ 1939

जब खाली रथ बिना रावण के लङ्कापुरी पहुँचा, तो उसने देखा कि उसका पुत्र मारा गया है। यह देखकर रावण का मन शोक और मोह से व्याकुल हो उठा और वह विदेहनन्दिनी सीता को मारने के लिए उद्यत हो गया। दुष्टात्मा दशानन हाथ में तलवार लेकर अशोक वाटिका में बैठी हुई सीताजी के पास बड़े वेग से दौड़ा गया। उस निशाचर के इस पापपूर्ण निश्चय को जानकर मन्त्री अविन्ध्य ने उसे समझाया— ‘राक्षसराज! आप लङ्का के समुज्ज्वल सम्राट पद पर विराजमान होकर एक अबला को न मारें। यह स्त्री आपके वश में है और आपके घर में कैद है; ऐसी स्थिति में यह तो मरी हुई ही है। मेरा विचार है कि इसके शरीर के टुकड़े-टुकड़े करने से इसका वध नहीं होगा, इसके पति को ही मार डालिये; उसके मारे जाने पर यह स्वतः मर जाएगी। साक्षात् इन्द्र भी आपके पराक्रम की समानता नहीं कर सकते, आपने तो अनेक बार देवताओं को भयभीत किया है।’ इस प्रकार अविन्ध्य ने रावण का क्रोध शान्त किया और रावण ने उसकी बात मान ली। फिर उस निशाचर ने युद्ध के लिए प्रस्थान करने का निश्चय किया, तलवार रख दी और आदेश दिया— ‘मेरा रथ तैयार किया जाए!’

न चैषा देहभेदेन हता स्यादिति मे मतिः ।
जहि भर्तारमेवास्या हते तस्मिन् हता भवेत् ॥

‘ इसके शरीरके टुकड़े - टुकड़े कर देनेसे ही इसका वध नहीं होगा, ऐसा मेरा विचार है । इसके पतिको ही मार डालिये । उसके मारे जानेपर यह स्वतः मर जायगी ।

महाभारत · वनपर्व · अध्याय 289 · श्लोक 30पृष्ठ 1940

In English

The battle between Lakshmana and Indrajit

Indrajit uses weapons to strike down Rama and Lakshmana, but Sugriva and Vibhishana help them recover using medicinal herbs and divine water. Lakshmana then engages Indrajit in combat, eventually killing him by cutting off his arms and head. Upon hearing of his son's death, Ravana decides to target Rama instead of Sita.

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