श्रीरामोपाख्यान : अदृश्य शत्रुओं को देखने की शक्ति कैसे प्राप्त हुई?
विजय और नीति का समन्वय
महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।
महाभारत — खण्ड २ · वनपर्व · अध्याय 289 · पृष्ठ 1935–1941
613 शब्द · 4 मिनटका पाठ · 5 श्लोक
मार्कण्डेय ने युधिष्ठिर से कहा
युद्ध के पश्चात की घटनाओं का वर्णन करते हुए
मार्कण्डेयजी ने कहा— हे युधिष्ठिर! उस समय का दृश्य अत्यन्त हृदयविदारक था। देवताओं का वर प्राप्त इन्द्रजित ने युद्धभूमि में उन दोनों भाइयों, श्रीराम और लक्ष्मण को बाणों के बन्धन में जकड़ दिया था। वे दोनों वीर पुरुष, जो सिंह के समान तेजस्वी थे, अब उन बाणों द्वारा बन्धे हुए पिञ्जरे में बन्द दो पक्षियों की भाँति पृथ्वी पर पड़े शोभा पा रहे थे। उन्हें सैकड़ों बाणों से व्याप्त देखकर सुग्रीव, हनुमान्, नील, तार, नल सहित अन्य वानर उन्हें सब ओर से घेरकर खड़े हो गए और उन दोनों बन्धुओं की रक्षा करने लगे।
तावुभौ पतितौ दृष्ट्वा भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ।
बबन्ध रावणिर्भूयः शरैर्दत्तवरैस्तदा ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - युधिष्ठिर! उन दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणको पृथ्वीपर पड़े देख रावणकुमार इन्द्रजित्ने जिनके लिये देवताओंका वर प्राप्त था, उन बाणोंद्वारा उन्हें सब ओरसे बाँध लिया ।
तदनन्तर विभीषण अपने कर्तव्य को पूरा करते हुए उस स्थान पर आए। उन्होंने प्रज्ञास्त्र का प्रयोग कर उन दोनों वीरों को होश में लाकर जगाया। इसके पश्चात सुग्रीव ने दिव्य मन्त्रों द्वारा अभिमन्त्रित 'विशल्या' नामक महौषधि से उनके अङ्गों से बाण निकालकर उन्हें क्षणभर में स्वस्थ कर दिया। होश में आते ही वे दोनों नरश्रेष्ठ महारथी, बाणों के ताप और थकावट को त्यागकर क्षणभर में उठ खड़े हुए।
तौ वीरौ शरबन्धेन बद्धाविन्द्रजिता रणे ।
रेजतुः पुरुषव्याघ्रौ शकुन्ताविव पञ्जरे ॥
इन्द्रजित्द्वारा बाणोंके बन्धनसे बँधे हुए वे दोनों वीर पुरुषसिंह श्रीराम और लक्ष्मण पिंजड़ेमें बंद हुए दो पक्षियोंकी भाँति शोभा पा रहे थे ।
विभीषण ने इक्ष्वाकुकुलनन्दन श्रीरामचन्द्रजी को नीरोग और स्वस्थ देखकर हाथ जोड़कर कहा— 'शत्रुदमन! राजाधिराज कुबेर की आज्ञा से एक गुह्यक यह जल लेकर श्वेतपर्वत से आपके समीप आया है। परन्तप! महाराज कुबेर आपको यह जल इस उद्देश्य से समर्पित कर रहे हैं कि आप इसे नेत्रों में लगाकर माया से अदृश्य हुए प्राणियों को देख सकें। उन्होंने कहा है कि आप इस जल से अपने दोनों नेत्र धोकर अदृश्य प्राणियों को भी देख सकेंगे और आप जिसे यह जल अर्पित करेंगे, वह मनुष्य भी अदृश्य भूतों को देखने में समर्थ होगा।'
इदमम्भः कुबेरस्ते महाराजः प्रयच्छति ।
अन्तर्हितानां भूतानां दर्शनार्थं परंतप ॥
‘ परंतप! महाराज कुबेर आपको यह जल इस उद्देश्यसे समर्पित कर रहे हैं कि आप इसे नेत्रोंमें लगाकर मायासे अदृश्य हुए प्राणियोंको देख सकें ।
'बहुत अच्छा' कहकर श्रीरामचन्द्रजी ने वह अभिमन्त्रित जल ले लिया और महामना लक्ष्मण ने भी उससे अपने दोनों नेत्र धोये। देखते ही देखते उनकी आँखें अतीन्द्रिय वस्तुओं का साक्षात्कार करने वाली हो गईं। उधर, इन्द्रजित ने युद्ध में जो पराक्रम दिखाया था, उसे पिता को बताकर वह पुनः युद्ध के मुँहाने की ओर लौटने लगा। विभीषण की सम्मति पाकर लक्ष्मण ने उस पर धावा बोल दिया।
इन्द्रजित विजय के उल्लास से सुशोभित था और उसने अभी नित्यकर्म भी नहीं किया था। सचेत हुए लक्ष्मण ने कुपित होकर उस पर बाणों से प्रहार करना आरम्भ कर दिया। दोनों ही एक-दूसरे को जीतने के लिए उत्सुक थे और उनके बीच इन्द्र तथा प्रह्लाद की भाँति अद्भुत युद्ध होने लगा। इन्द्रजित ने तीखे बाणों से सुमित्रा-कुमार लक्ष्मण को बींध डाला, किन्तु लक्ष्मण ने भी अग्निके समान दाहक तीन बाणों द्वारा इन्द्रजित के प्राण ले लिए। एक बाण से उन्होंने उसकी धनुष धारण करने वाली भुजा काट दी, दूसरे से दूसरी भुजा को धराशायी कर दिया और तीसरे चमकीले बाण से उसके मस्तक को कन्धों से अलग कर धड़ से अलग कर दिया। लक्ष्मण ने अपने अस्त्रों से उसके सारथी का भी वध कर दिया।
तृतीयेन तु बाणेन पृथुधारेण भास्वता ।
जहार सुनसं चापि शिरो भ्राजिष्णुकुण्डलम् ॥
तत्पश्चात् मोटी धारवाले और चमकीले तीसरे बाणसे उन्होंने सुन्दर नासिका और शोभाशाली कुण्डलोंसे विभूषित शत्रुके मस्तकको भी धड़से अलग कर दिया ।
जब खाली रथ लङ्कापुरी पहुँचा, तो रावण ने देखा कि पुत्र का रथ बिना उसके लौट आया है। पुत्र की मृत्यु के भय से उसका मन उद्भ्रान्त हो उठा। वह शोक और मोह से भरकर सीताजी को मारने हेतु हाथ में तलवार लेकर अशोक वाटिका की ओर वेग से दौड़ा। तभी मन्त्री अविन्ध्य ने उसे रोककर समझाते हुए कहा— 'राक्षसराज! आप लङ्का के समुज्ज्वल सम्राट् पद पर विराजमान होकर एक अबला को न मारें। यह स्त्री आपके वश में है और आपके घर में कैद है; ऐसी दशा में यह तो मरी हुई ही है। मेरा विचार है कि इसके शरीर के टुकड़े-टुकड़े करने के स्थान पर इसके पति को ही मार डालिये, उसके मारे जाने पर यह स्वतः मर जाएगी। साक्षात् इन्द्र भी आपके पराक्रम की समानता नहीं कर सकते।'
अविन्ध्य के इन वचनों ने रावण का क्रोध शान्त किया और उसने उनकी बात मान ली। फिर उस निशाचर ने युद्ध के लिए प्रस्थान करने का निश्चय किया और तलवार रखकर आज्ञा दी— 'मेरा रथ तैयार किया जाए!'
महाराज्ये स्थितो दीप्ते न स्त्रियं हन्तुमर्हसि ।
हतैवैषा यदा स्त्री च बन्धनस्था च ते वशे ॥
‘ राक्षसराज! आप लंकाके समुज्ज्वल सम्राट्- पदपर विराजमान होकर एक अबलाको न मारें । यह स्त्री होकर आपके वशमें पड़ी है, आपके घरमें कैद है; ऐसी दशामें यह तो मरी हुई है ।
In English
The Death of Indrajit
Indrajit binds Rama and Lakshmana with arrows, but Vibhishana uses the Pragyastra and Vishalya medicine to heal them. After drinking divine water from Kubera to see invisible beings, Lakshmana kills Indrajit in battle. Ravana learns of his son's death and decides to prepare for war instead of killing Sita.
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