स्कन्दोपाख्यान : अत्यधिक शक्तिशाली योद्धा को सत्ता का पद क्यों नहीं दिया जाता?
शक्ति और उत्तरदायित्व का सन्तुलन
महर्षि वेदव्यास कृत महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान पढ़ें।
वनपर्व → मार्कण्डेयसमास्यापर्व · अध्याय 229 · पृष्ठ 1557–1566
मार्कण्डेय ऋषि ने युधिष्ठिर से कहा
एक महान और कल्याणकारी कुमार की कथा सुनाने हेतु
मार्कण्डेय ऋषि ने युधिष्ठिर से कहा— राजन्! सुनिए उस महातेजस्वी कुमार की कथा, जो समस्त लोकों के लिए कल्याणकारी है।
उस समय स्कन्द स्वर्ण का कवच, स्वर्ण की माला और स्वर्ण की कलँगी से सुशोभित मुकुट धारण किए एक सुन्दर आसन पर विराजमान थे। उनके नेत्रों से सुवर्ण जैसी ज्योति छिटक रही थी और उनके शरीर से महान तेजपुञ्ज प्रकट हो रहा था। उन्होंने लाल रङ्ग के वस्त्रों से अपने अङ्गों को आच्छादित कर रखा था। उनके दाँत तीखे थे और उनकी आकृति मन को लुभा लेने वाली थी। वे समस्त शुभ लक्षणों से सम्पन्न और तीनों लोकों के लिए अत्यन्त प्रिय थे। वे स्वयं कमल के समान कान्तिवाली मूर्तिमती शोभा से सुशोभित थे। वहाँ बैठे हुए उस यशस्वी सुन्दर कुमार को सब प्राणी पूर्णमासी के चन्द्रमा की भाँति देखते थे। महामना ब्राह्मणों ने महाबली स्कन्द की पूजा की और महर्षियों ने वहाँ आकर उनका स्तवन किया।
ऋषि बोले— "हे हिरण्यगर्भ! तुम्हारा कल्याण हो। तुम समस्त जगत् के लिए कल्याणकारी बनो। तुम्हारे पैदा हुए अभी छः रातें ही बीती होंगी और इतने में तुमने समस्त लोकों को अपने वश में कर लिया है। सुरश्रेष्ठ! फिर तुम्हींने इन सब लोकों को अभय दान दिया है। अतः आज से तुम इन्द्र होकर रहो और तीनों लोकों के भय का निवारण करो।"
अभयं च पुनर्दत्तं त्वयैवैषां सुरोत्तम ।
तस्मादिन्द्रो भवानस्तु त्रैलोक्यस्याभयंकरः ॥
सुरश्रेष्ठ! फिर तुम्हींने इन सब लोकोंको अभय दान दिया है । अतः आजसे तुम इन्द्र होकर रहो और तीनों लोकोंके भयका निवारण करो ।
स्कन्द ने विनम्रतापूर्वक पूछा— "तपोधनो! इन्द्र इस पद पर रहकर सम्पूर्ण लोकों के लिये क्या करते हैं तथा वे देवेश्वर सदा समस्त देवताओं की किस प्रकार रक्षा करते हैं?"
ऋषि ने उत्तर दिया— "देवराज इन्द्र सन्तुष्ट होने पर सम्पूर्ण प्राणियों को बल, तेज, सन्तान और सुख की प्राप्ति कराते हैं तथा उनकी समस्त कामनाएँ पूर्ण करते हैं। वे दुष्टों का संहार करते हैं और उत्तम व्रत का पालन करने वाले सत्पुरुषों को जीवन दान देते हैं। बल नामक दैत्य का विनाश करने वाले इन्द्र सभी प्राणियों को आवश्यक कार्यों में लगने का आदेश देते हैं। सूर्य के अभाव में वे स्वयं ही सूर्य होते हैं और चन्द्रमा के न रहने पर स्वयं ही चन्द्रमा बनकर उनका कार्य सम्पादन करते हैं। आवश्यकता पड़ने पर वे ही अग्नि, वायु, पृथ्वी और जल का स्वरूप धारण कर लेते हैं। यह सब इन्द्र का कार्य है। वीर! तुम भी श्रेष्ठ बलवान् हो, अतः तुम्हीं हमारे इन्द्र हो जाओ।"
एतदिन्द्रेण कर्तव्यमिन्द्रे हि विपुलं बलम् ।
त्वं च वीर बली श्रेष्ठस्तस्मादिन्द्रो भवस्व नः ॥
यह सब इन्द्रका कार्य है । इन्द्रमें अपरिमित बल होता है । वीर! तुम भी श्रेष्ठ बलवान् हो । अतः तुम्हीं हमारे इन्द्र हो जाओ ।
इन्द्र ने कहा— "महाबाहो! तुम्हीं इन्द्र बनो और हम सबको सुख पहुँचाओ। सज्जन शिरोमणे! तुम इस पद के सर्वथा योग्य हो। अतः आज ही इस पद पर अपना अभिषेक करा लो।"
भवस्वेन्द्रो महाबाहो सर्वेषां नः सुखावहः ।
अभिषिच्यस्व चैवाद्य प्राप्तरूपोऽसि सत्तम ॥
इन्द्रने कहा — महाबाहो! तुम्हीं इन्द्र बनो और हम सबको सुख पहुँचाओ । सज्जनशिरोमणे! तुम इस पदके सर्वथा योग्य हो । अतः आज ही इस पदपर अपना अभिषेक करा लो ।
स्कन्द ने उत्तर दिया— "इन्द्रदेव! आप ही स्वस्थचित्त होकर तीनों लोकों का शासन कीजिये और विजय प्राप्ति के कार्य में संलग्न रहिये। मैं तो आपका सेवक हूँ, मुझे इन्द्र बनने की इच्छा नहीं है।"
शाधि त्वमेव त्रैलोक्यमव्यग्रो विजये रतः ।
अहं ते किङ्करः शक्र न ममेन्द्रत्वमीप्सितम् ॥
स्कन्द बोले — इन्द्रदेव! आप ही स्वस्थचित्त होकर तीनों लोकोंका शासन कीजिये और विजयप्राप्तिके कार्यमें संलग्न रहिये । मैं तो आपका सेवक हूँ । मुझे इन्द्र बननेकी इच्छा नहीं है ।
परन्तु इन्द्र ने आग्रह करते हुए कहा— "वीर! तुम्हारा बल अद्भुत है, अतः तुम्हीं देव-शत्रुओं का संहार करो। वीरवर! मैं तुम्हारे सामने पराजित होकर बलहीन सिद्ध हो गया हूँ। यदि मैं इन्द्र पद पर स्थित रहूँ, तो भी सब लोग मेरा उपहास करेंगे और आलस्य छोड़कर हम दोनों में परस्पर फूट डालने का प्रयत्न करेंगे। प्रभो! यदि तुम फूट जाओगे तो जगत् के प्राणी दो भागों में बँट जाएँगे। महाबलवान् वीर! सम्पूर्ण लोकों के निश्चय ही दो दलों में बँट जाने तथा लोगों द्वारा भेद-बुद्धि उत्पन्न किये जाने पर हम लोगों में युद्ध प्रारम्भ हो सकता है। तात! उस युद्ध में तुम्हीं विजयी होओगे, अतः तुम्हीं इन्द्र हो जाओ। इस विषय में कोई दूसरी बात मत सोचो।"
स्कन्द ने पूछा— "देवेन्द्र! आप ही देवराज के पद पर प्रतिष्ठित रहें। आपका कल्याण हो। आप ही तीनों लोकों के तथा मेरे भी स्वामी हैं। आपकी किस आज्ञा का पालन करूँ?"
इन्द्र ने कहा— "महाबलवान् स्कन्द! यदि तुम वास्तव में मेरी आज्ञा का पालन करना चाहते हो, तो मेरी यह बात सुनो— महावीर! तुम देवताओं के सेनापतिके पद पर अपना अभिषेक करा लो।"
स्कन्द बोले— "देवराज! दानवों के विनाश, देवताओं के कार्य की सिद्धि तथा गौओं और ब्राह्मणों के हित के लिये आप सेनापतिके पद पर मेरा अभिषेक कीजिये।"
तदनन्तर समस्त देवताओं सहित इन्द्र ने कुमार का देव-सेनापतिके पद पर अभिषेक कर दिया। उस समय वहाँ महर्षियों द्वारा पूजित होकर स्कन्द की बड़ी शोभा हुई। उनके ऊपर तना हुआ वह सुवर्णमय छत्र उद्भासित हो रहा था, मानो प्रज्वलित अग्निका अपना ही मण्डल प्रकाशित करता हो। भगवान वृषध्वज शिव ने अत्यन्त प्रसन्न होकर स्कन्द का समादर किया और उपस्थित होकर उन्हें स्वर्ण की दिव्य माला पहनाई।
जब देवताओं ने रुद्र के इस पुत्र को सेनापति के रूप में देखा, तो वे हर्षित हो उठे। उस समय वेदमन्त्रों की ध्वनि गूँज उठी, देवताओं के उत्तम वाद्य बजने लगे, देव और गन्धर्व गीत गाने लगे और समस्त अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। समस्त देवता स्कन्द को घेरे खड़े थे। तदनन्तर सारी देवसेनाएँ सहस्रों की सङ्ख्या में सब दिशाओं से उनके पास आयीं और कहने लगीं— "आप ही हमारे पति हैं!"
शतक्रतुश्चाभिषिच्य स्कन्दं सेनापतिं तदा ॥
सस्मार तां देवसेनां या सा तेन विमोक्षिता । उस समय इन्द्रने स्कन्दको सेनापति पदपर अभिषिक्त करनेके पश्चात् उस कुमारी देवसेनाका स्मरण किया, जिसका उन्होंने केशीके हाथसे उद्धार किया था ।
उस समय इन्द्र ने स्कन्द को सेनापति पद पर अभिषिक्त करने के पश्चात् कुमारी देवसेना का स्मरण किया। उन्होंने सोचा कि स्वयं ब्रह्माजी ने निश्चय ही कुमार कार्तिकेय को ही उसका पति नियत किया है। यह सोचकर वे देवसेना को वस्त्राभूषणों से भूषित करके ले आये। इन्द्र ने स्कन्द से कहा— "सुरश्रेष्ठ! तुम्हारे जन्म लेने के पहले से ही ब्रह्माजी ने इस कन्या को तुम्हारी पत्नी नियत की है। अतः तुम वेदमन्त्रों के उच्चारणपूर्वक इसका विधिवत् पाणिग्रहण करो। अपने कमल की कान्तिवाले हाथ से इस देवी का दायाँ हाथ पकड़ो।"
अजाते त्वयि निर्दिष्टा तव पत्नी स्वयम्भुवा ।
तस्मात् त्वमस्या विधिवत् पाणिं मन्त्रपुरस्कृतम् ॥
गृहाण दक्षिणं देव्याः पाणिना पद्मवर्चसा ।
एवमुक्तः स जग्राह तस्याः पाणिं यथाविधि ॥
फिर बलसंहारक इन्द्रने स्कन्दसे कहा – ' सुरश्रेष्ठ! तुम्हारे जन्म लेनेके पहलेसे ही ब्रह्माजीने इस कन्याको तुम्हारी पत्नी नियत की है, अतः तुम वेदमन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक इसका विधिवत् पाणिग्रहण करो । अपने कमलकी - सी कान्तिवाले हाथसे इस देवीका दायाँ हाथ पकड़ो । ‘ इन्द्रके ऐसा कहनेपर स्कन्दने विधिपूर्वक देवसेनाका पाणिग्रहण किया ।
इन्द्र के ऐसा कहने पर स्कन्द ने विधिपूर्वक देवसेना का पाणिग्रहण किया और वे दोनों एक हुए। उस समय मन्त्रवेत्ता बृहस्पतिजी ने वेदमन्त्रों का जप और होम किया। इस प्रकार सब लोग जान गये कि देवसेना कुमार कार्तिकेय की पटरानी है। जब देवसेना ने स्कन्द को अपने सनातन पति के रूप में प्राप्त कर लिया, तब लक्ष्मीदेवी ने स्वयं उनका आश्रय लिया। ब्राह्मणों ने इस विवाह को पञ्चाङ्ग की तिथियों से जोड़कर सम्मानित किया; पञ्चमी तिथि को वे श्री-पञ्चमी कहलाए और षष्ठी को कृतार्थ होने के कारण महातिथि मानी गई।
श्रीजुष्टः पञ्चमीं स्कन्दस्तस्माच्छ्रीपञ्चमी स्मृता ।
षष्ठ्यां कृतार्थोऽभूद् यस्मात् तस्मात् षष्ठी महातिथिः ॥
पंचमी तिथिको स्कन्ददेव श्री अर्थात् शोभासे सेवित हुए, इसलिये उस तिथिको श्रीपञ्चमी कहते हैं और षष्ठीको कृतार्थ हुए थे, इसलिये षष्ठी महातिथि मानी गयी ।
In English
Skanda becomes the commander of the gods
Indra offers the position of Indra to the young Skanda, but Skanda declines and instead accepts the role of commander of the gods. After Skanda is consecrated as the leader of the divine armies, he marries Devasena according to the instructions of Indra.
This page answers
- Why did indra want skanda to become indra?
- What is the duty of an indra?
- What position did skanda accept instead of being indra?
- Who is the wife of skanda?
- How did skanda marry devasena?
Also written: Skandopakhyana, Skanda, Indra, Markandeya, Shiva, Parvati, Brahaspati, Devasena, स्कन्दोपाख्यान