श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1551–1560

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1551–1560

पृष्ठ 1551

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लाल सागरकी एक क्रूर स्वभाववाली कन्या थी, जिसका रक्त ही भोजन था । वह महासेनको पुत्रकी भाँति हृदयसे लगाकर सर्वतोभावेन उनकी रक्षा करने लगी ॥ २८ ॥

अग्निर्भूत्वा नैगमेयश्छागवक्त्रो बहुप्रजः ।

रमयामास शैलस्थं बालं क्रीडनकैरिव ॥ २ ९ ॥

वेदप्रतिपादित अग्नि बकरेका-सा मुख बनाकर अनेक संतानोंके साथ उपस्थित हो पर्वतशिखर पर निवास करनेवाले बालक स्कन्दका इस प्रकार मन बहलाने लगे, मानो उन्हें खिलौनोंसे खेला रहे हों ॥ २ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आङ्गिरसे स्कन्दोत्पत्तौ षड्विंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें आंङ्गिसोपाख्यानके प्रसंगमें स्कन्दकी उत्पत्तिविषयक दो सौ छब्बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२६ ॥

पृष्ठ 1552

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सप्तविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः पराजित होकर शरणमें आये हुए इन्द्रसहित देवताओंको स्कन्दका अभयदान मार्कण्डेय उवाच

ग्रहाः सोपग्रहाश्चैव ऋषयो मातरस्तथा ।

हुताशनमुखाश्चैव दृप्ताः पारिषदां गणाः ॥ १ ॥

एते चान्ये च बहवो घोरास्त्रिदिववासिनः ।

परिवार्य महासेनं स्थिता मातृगणैः सह ॥ २ ॥

मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजन्! ग्रह, उपग्रह, ऋषि, मातृकागण और मुखसे आग उगलनेवाले दर्पयुक्त पार्षदगण –ये तथा दूसरे बहुत-से भयंकर स्वर्गवासी प्राणी मातृकागणोंके साथ रहकर महासेनको सब ओरसे घेरे हुए उनकी रक्षाके लिये खड़े थे ॥ १-२ ॥

संदिग्धं विजयं दृष्ट्वा विजयेप्सुः सुरेश्वरः ।

आरुह्यैरावतस्कन्धं प्रययौ दैवतैः सह ॥ ३ ॥

देवेश्वर इन्द्रको अपनी विजयके विषयमें संदेह ही दिखायी देता था, तो भी वे विजयकी अभिलाषासे ऐरावत हाथीपर आरुढ़ हो देवताओंके साथ आगे बढ़े ॥

आदाय वज्रं बलवान् सर्वैर्देवगणैर्वृतः ।

विजिघांसुर्महासेनमिन्द्रस्तूर्णतरं ययौ ॥ ४ ॥

सब देवताओंसे घिरे हुए बलवान् इन्द्र महासेनको मार डालनेकी इच्छासे हाथमें वज्र ले बड़े वेगसे अग्रसर हो रहे थे ॥ ४ ॥

उग्रं तं च महानादं देवानीकं महाप्रभम् ।

विचित्रध्वजसंनाहं नानावाहनकार्मुकम् ॥ ५ ॥

प्रवराम्बरसंवीतं श्रिया जुष्टमलङ्कृतम् ।

विजिघांसुं तमायान्तं कुमारः शक्रमन्वयात् ॥ ६ ॥

देवताओंकी सेना बड़ी भयानक थी । उसमें जोर- जोरसे विकट गर्जना हो रही थी । उसकी प्रभाका विस्तार महान् था । उसके ध्वज संनाह ( कवच ) विचित्र थे । सभी सैनिकोंके वाहन और धुनष नाना प्रकारके दिखायी देते थे । सबने श्रेष्ठ वस्त्रोंसे अपने शरीरको आच्छादित कर रखा था । सभी लोग श्रीसम्पन्न तथा विविध आभूषणोंसे विभूषित दिखायी देते थे । इन्द्रको अपने वधके लिये आते देख कुमारने भी उनपर धावा बोल दिया ॥ ५-६ ॥ विनदन् पार्थ देवेशो द्रुतं याति महाबलः ।

पृष्ठ 1553

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संहर्षयन् देवसेनां जिघांसुः पावकात्मजम् ॥ ७ ॥

युधिष्ठिर! महाबली देवराज इन्द्र अग्निनन्दन स्कन्दको मार डालनेकी इच्छासे देवताओंकी सेनाका हर्ष बढ़ाते हुए तीव्र गतिसे विकट गर्जनाके साथ आगे बढ़ रहे थे ॥ ७ ॥

सम्पूज्यमानस्त्रिदशैस्तथैव परमर्षिभिः ।

समीपमथ सम्प्राप्तः कार्तिकेयस्य वासवः ॥ ८ ॥

सिंहनादं ततश्चक्रे देवेशः सहितः सुरैः ।

गुहोऽपि शब्दं तं श्रुत्वा व्यनदत् सागरो यथा ॥ ९ ॥

उस समय सम्पूर्ण देवता और महर्षि उनका बड़ा सम्मान कर रहे थे । जब देवराज इन्द्र कुमार कार्तिकेयके निकट पहुँचे, तब उन्होंने देवताओंके साथ सिंहके समान गर्जना की । उनका वह सिंहनाद सुनकर कुमार कार्तिकेय भी समुद्रके समान भयंकर गर्जना करने लगे ॥ ८ - ९ ॥

तस्य शब्देन महता समुद्धूतोदधिप्रभम् ।

बभ्राम तत्र तत्रैव देवसैन्यमचेतनम् ॥ १० ॥

देवताओंकी सेना उमड़ते हुए समुद्रके समान जान पड़ती थी । परंतु स्कन्दकी भारी गर्जनासे अचेत - सी होकर वहीं चक्कर काटने लगी ॥ १० ॥

जिघांसूनुपसम्प्राप्तान् देवान् दृष्ट्वा स पावकिः ।

विससर्ज मुखात् क्रुद्धः प्रवृद्धाः पावकार्चिषः ॥ ११ ॥

अग्निकुमार स्कन्द यह देखकर कि देवतालोग मेरा वध करनेकी इच्छासे यहाँ एकत्र हुए हैं, कुपित हो उठे और अपने मुँहसे आगकी बढ़ती हुई लपटें छोड़ने लगे ॥ ११ ॥

अदहद् देवसैन्यानि वेपमानानि भूतले ।

ते प्रदीप्तशिरोदेहाः प्रदीप्तायुधवाहनाः ॥ १२ ॥

इस प्रकार उन्होंने देवताओंकी सेनाको जलाना प्रारम्भ किया । सारे सैनिक पृथ्वीपर गिरकर छटपटाने लगे । किसीका शरीर जल गया, किसीका सिर, किसीके आयुध जल गये और किसीके वाहन ॥ १२ ॥

प्रच्युताः सहसा भान्ति व्यस्तास्तारागणा इव ।

दह्यमानाः प्रपन्नास्ते शरणं पावकात्मजम् ॥ १३ ॥

देवा वज्रधरं त्यक्त्वा ततः शान्तिमुपागताः ।

त्यक्तो देवैस्ततः स्कन्दे वज्रं शक्रो न्यपातयत् ॥ १४ ॥

वे सब - के - सब सहसा तितर- बितर हो आकाशमें बिखरे हुए तारोंके समान जान पड़ते थे । इस तरह जलते हुए देवता वज्रधारी इन्द्रका साथ छोड़कर अग्निनन्दन स्कन्दकी ही शरणमें आये, तब उन्हें शान्ति मिली । देवताओंके त्याग देनेपर इन्द्रने स्कन्दपर अपने वज्रका प्रहार किया ॥ १३-१४ ॥

पृष्ठ 1554

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तद्विसृष्टं जघानाशु पार्श्वं स्कन्दस्य दक्षिणम् ।

बिभेद च महाराज पार्श्वं तस्य महात्मनः ॥ १५ ॥

महाराज! इन्द्रके छोड़े हुए उस वज्रने शीघ्र ही कुमार कार्तिकेयकी दायीं पसलीपर गहरी चोट पहुँचायी और उन महामना स्कन्दके पार्श्वभागको क्षत-विक्षत कर दिया ॥

वज्रप्रहारात् स्कन्दस्य संजातः पुरुषोऽपरः ।

युवा काञ्चनसंनाहः शक्तिधृग् दिव्यकुण्डलः ॥ १६ ॥

वज्रका प्रहार होनेपर स्कन्दके ( उस दक्षिण पार्श्वसे ) एक दूसरा वीर पुरुष प्रकट हुआ, जिसकी युवावस्था थी । उसने सुवर्णमय कवच धारण कर रखा था । उसके एक हाथमें शक्ति चमक रही थी और कानोंमें दिव्य कुण्डल झलमला रहे थे ॥ १६ ॥

यद्वज्रविशनाज्जातो विशाखस्तेन सोऽभवत् ।

संजातमपरं दृष्ट्वा कालानलसमद्युतिम् ॥ १७ ॥

भयादिन्द्रस्तु तं स्कन्दं प्राञ्जलिः शरणं गतः । वज्रके प्रविष्ट होनेसे उसकी उत्पत्ति हुई थी, इसलिये वह विशाख नामसे प्रसिद्ध हुआ । प्रलयकालकी अग्निके समान अत्यन्त तेजस्वी उस द्वितीय वीरको प्रकट हुआ देख इन्द्र भयसे थर्रा उठे और हाथ जोड़कर उन स्कन्ददेवकी शरणमें आये ॥ १७३ ॥

तस्याभयं ददौ स्कन्दः सह सैन्यस्य सत्तमः ।

ततः प्रहृष्टास्त्रिदशा वादित्राण्यभ्यवादयन् ॥ १८ ॥

तब सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ कुमार स्कन्दने सेनासहित इन्द्रको अभयदान दिया । इससे प्रसन्न होकर सब देवता ( हर्षसूचक ) बाजे बजाने लगे ॥ १८ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आङ्गिरसे इन्द्रस्कन्दसमागमे सप्तविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानके प्रसंगमें इन्द्र-स्कन्दसमागमविषयक दो सौ सत्ताईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२७ ॥

पृष्ठ 1555

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अष्टाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः स्कन्दके पार्षदोंका वर्णन मार्कण्डेय उवाच

स्कन्दपारिषदान् घोराञ्शृणुष्वाद्भुतदर्शनान् ।

वज्रप्रहारात् स्कन्दस्य जज्ञुस्तत्र कुमारकाः ॥ १ ॥

मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजन्! अब तुम स्कन्दके भयंकर पार्षदोंका वर्णन सुनो, जो देखनेमें बड़े अद्भुत हैं। वज्रका प्रहार होनेपर स्कन्दके शरीरसे वहाँ बहुत- से कुमार ग्रह उत्पन्न हुए ॥ १ ॥

ये हरन्ति शिशूञ्जातान् गर्भस्थांश्चैव दारुणाः ।

वज्रप्रहारात् कन्याश्च जज्ञिरेऽस्य महाबलाः ॥ २ ॥

वे क्रूर स्वभाववाले कुमारग्रह नवजात तथा गर्भस्थ शिशुओंको भी हर ले जाते हैं । इन्द्रके वज्र — प्रहारसे स्कन्दके शरीरसे वहाँ अत्यन्त बलशालिनी कन्याएँ भी उत्पन्न हुई थीं ॥ २ ॥

कुमारास्ते विशाखं च पितृत्वे समकल्पयन् ।

स भूत्वा भगवान् संख्ये रक्षंश्छागमुखस्तदा ॥ ३ ॥

वृतः कन्यागणैः सर्वैरात्मीयैः सह पुत्रकैः ।

मातॄणां प्रेक्षमाणानां भद्रशाखश्च कौसलः ॥ ४ ॥

पूर्वोक्त कुमार- ग्रहोंने विशाख ( स्कन्द ) - को अपना पिता माना । भगवान् स्कन्द बकरेके समान मुख धारण करके समस्त कन्यागणों और अपने पुत्रोंसे घिरकर मातृकाओंके देखते-देखते युद्धमें अपने पक्षकी रक्षा करते हैं । वे ही ' भद्रशाख ' तथा ' कौसल ' नामसे प्रसिद्ध हुए हैं ॥

ततः कुमारपितरं स्कन्दमाहुर्जना भुवि ।

रुद्रमग्निमुमां स्वाहां प्रदेशेषु महाबलाम् ॥ ५ ॥

यजन्ति पुत्रकामाश्च पुत्रिणश्च सदा जनाः । इसीलिये भूतलके मनुष्य स्कन्दको कुमार-ग्रहोंका पिता कहते हैं । भिन्न- भिन्न स्थानोंमें पुत्रवान् तथा पुत्रकी इच्छा रखनेवाले मनुष्य अग्निस्वरूप रुद्र और स्वाहास्वरूपा महाबलवती उमाकी सदा आराधना करते हैं ॥ ५३ ॥

यास्तास्त्वजनयत् कन्यास्तपो नाम हुताशनः ॥ ६ ॥

किं करोमीति ताः स्कन्दं सम्प्राप्ताः समभाषयन् । तप नामक अग्निने जिन कन्याओंको जन्म दिया, वे सब स्कन्दके पास आयीं और पूछने लगीं - ' हम क्या करें? ' ॥ ६३ ॥

पृष्ठ 1556

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कुमार्य ऊचुः भवेम सर्वलोकस्य मातरो वयमुत्तमाः ॥ ७ ॥

प्रसादात् तव पूज्याश्च प्रियमेतत् कुरुष्व नः । कुमारियाँ बोलीं- हम सब लोग सम्पूर्ण जगत्की श्रेष्ठ माताएँ हों और आपकी कृपासे हम सदा पूजनीय मानी जायँ, यही हमारा प्रिय मनोरथ है, आप इसे पूर्ण कीजिये ॥ ७३ ॥

सोऽब्रवीद् बाढमित्येवं भविष्यध्वं पृथग्विधाः ॥ ८ ॥

शिवाश्चैवाशिवाश्चैव पुनः पुनरुदारधीः ।

ततः संकल्प्य पुत्रत्वे स्कन्दं मातृगणोऽगमत् ॥ ९ ॥

तब उदारबुद्धि स्कन्दने बार-बार कहा -' बहुत अच्छा, तुम सब लोग पृथक् - पृथक् पूजनीया माता मानी जाओगी । तुम्हारे दो भेद होंगे -शिवा और अशिवा। ' तदनन्तर स्कन्दको अपना पुत्र मानकर मातृकाएँ वहाँसे विदा हो गयीं ॥ ८ - ९ ॥

काकी च हलिमा चैव मालिनी बृंहता तथा ।

आर्या पलाला वैमित्रा सप्तैताः शिशुमातरः ॥ १० ॥

काकी, हलिमा, मालिनी, बृंहता, आर्या, पलाला और वैमित्रा - ये सातों शिशुकी माताएँ हैं ॥ १० ॥

एतासां वीर्यसम्पन्नः शिशर्नामातिदारुणः ।

स्कन्दप्रसादजः पुत्रो लोहिताक्षो भयंकरः ॥ ११ ॥

भगवान् स्कन्दकी कृपासे इन्हें शिशु नामक एक अत्यन्त पराक्रमी पुत्र प्राप्त हुआ, जो

अत्यन्त दारुण और भयंकर था । उसकी आँखें रक्तवर्णकी थीं ॥ ११ ॥

एष वीराष्टकः प्रोक्तः स्कन्दमातृगणोद्भवः ।

छागवक्त्रेण सहितो नवकः परिकीर्त्यते ॥ १२ ॥

शिशु और मातृगणोंको लेकर जो आठ व्यक्ति होते हैं, उन्हें ' वीराष्टक' कहा गया है । बकरेके - से मुखसे युक्त स्कन्दको सम्मिलित करनेसे यह समुदाय वीर- नवक कहा जाता है ॥ १२ ॥

षष्ठं छागमयं वक्त्रं स्कन्दस्यैवेति विद्धि तत् ।

षट्शिरोऽभ्यन्तरं राजन् नित्यं मातृगणार्चितम् ॥ १३ ॥

युधिष्ठिर! स्कन्दका ही छठा मुख छागमय है, यह जान लो । राजन्! वह छः सिरोंके बीचमें स्थित है और मातृकाएँ सदा उसकी पूजा करती हैं ॥ १३ ॥

षण्णां तु प्रवरं तस्य शीर्षाणामिह शब्द्यते ।

शक्तिं येनासृजद् दिव्यां भद्रशाख इति स्म ह ॥ १४ ॥

स्कन्दके छहों मस्तकोंमें वही सर्वश्रेष्ठ बताया जाता है । उन्होंने दिव्यशक्तिका प्रयोग किया था; इसलिये उनका नाम भद्रशाख हुआ ॥ १४ ॥

पृष्ठ 1557

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इत्येतद् विविधाकारं वृत्तं शुक्लस्य पञ्चमीम् ।

तत्र युद्धं महाघोरं वृत्तं षष्ठ्यां जनाधिप ॥ १५ ॥

नरेश्वर! इस प्रकार शुक्लपक्षकी पंचमी तिथिको विविध आकारवाले पार्षदोंकी सृष्टि हुई और षष्ठीको वहाँ अत्यन्त भयंकर युद्ध हुआ ॥ १५ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आङ्गिरसे कुमारोत्पत्तौ अष्टाविंशत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानके प्रसंगमें कुमारोत्पत्तिविषयक दो सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ २२८ ॥

पृष्ठ 1558

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एकोनत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः स्कन्दका इन्द्रके साथ वार्तालाप, देवसेनापतिके पदपर अभिषेक तथा देवसेनाके साथ उनका विवाह मार्कण्डेय उवाच

उपविष्टं तु तं स्कन्दं हिरण्यकवचस्रजम् ।

हिरण्यचूडमुकुटं हिरण्याक्षं महाप्रभम् ॥ १ ॥

मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजन्! स्कन्द सोनेका कवच, सोनेकी माला और सोनेकी कलँगीसे सुशोभित मुकुट धारण किये ( सुन्दर आसनपर) बैठे थे । उनके नेत्रोंसे सुवर्णकी- सी ज्योति छिटक रही थी और उनके शरीरसे महान् तेजःपुंज प्रकट हो रहा था ॥ १ ॥

लोहिताम्बरसंवीतं तीक्ष्णदंष्ट्रं मनोरमम् ।

सर्वलक्षणसम्पन्नं त्रैलोक्यस्यापि सुप्रियम् ॥ २ ॥

उन्होंने लाल रंगके वस्त्रसे अपने अंगोंको आच्छादित कर रखा था । उनके दाँत बड़े तीखे थे और उनकी आकृति मनको लुभा लेनेवाली थी । वे समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न तथा तीनों लोकोंके लिये अत्यन्त प्रिय थे ॥ २ ॥

ततस्तं वरदं शूरं युवानं मृष्टकुण्डलम् ।

अभजत् पद्मरूपा श्रीः स्वयमेव शरीरिणी ॥ ३ ॥

तदनन्तर वर देनेमें समर्थ, शौर्यसम्पन्न, युवा अवस्थासे सुशोभित तथा सुन्दर कुण्डलोंसे अलंकृत कुमार कार्तिकेयका कमलके समान कान्तिवाली मूर्तिमती शोभाने स्वयं ही सेवन किया ॥ ३ ॥

श्रिया जुष्टः पृथुयशाः स कुमारवरस्तदा ।

निषण्णो दृश्यते भूतैः पौर्णमास्यां यथा शशी ॥ ४ ॥

मूर्तिमती शोभासे सेवित हो वहाँ बैठे हुए महा- यशस्वी सुन्दरकुमारको उस समय सब प्राणी पूर्णमासीके चन्द्रमाकी भाँति देखते थे ॥ ४ ॥

अपूजयन् महात्मानो ब्राह्मणास्तं महाबलम् ।

इदमाहुस्तदा चैव स्कन्दं तत्र महर्षयः ॥ ५ ॥

महामना ब्राह्मणोंने महाबली स्कन्दकी पूजा की और सब महर्षियोंने वहाँ आकर उनका इस प्रकार स्तवन किया ॥ ५ ॥

ऋषय ऊचुः

हिरण्यगर्भ भद्रं ते लोकानां शङ्करो भव ।

त्वया षड्रात्रजातेन सर्वे लोका वशीकृताः ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1559

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ऋषि बोले – हिरण्यगर्भ! तुम्हारा कल्याण हो । तुम समस्त जगत्के लिये कल्याणकारी बनो । तुम्हारे पैदा हुए अभी छः रातें ही बीती होंगी । इतनेमें ही तुमने समस्त लोकोंको अपने वशमें कर लिया है ॥ ६ ॥

अभयं च पुनर्दत्तं त्वयैवैषां सुरोत्तम ।

तस्मादिन्द्रो भवानस्तु त्रैलोक्यस्याभयंकरः ॥ ७ ॥

सुरश्रेष्ठ! फिर तुम्हींने इन सब लोकोंको अभय दान दिया है । अतः आजसे तुम इन्द्र होकर रहो और तीनों लोकोंके भयका निवारण करो ॥ ७ ॥

स्कन्द उवाच

किमिन्द्रः सर्वलोकानां करोतीह तपोधनाः ।

कथं देवगणांश्चैव पाति नित्यं सुरेश्वरः ॥ ८ ॥

स्कन्द बोले – तपोधनो! इन्द्र इस पदपर रहकर सम्पूर्ण लोकोंके लिये क्या करते हैं तथा वे देवेश्वर सदा समस्त देवताओंकी किस प्रकार रक्षा करते हैं? ॥ ८ ॥

ऋषय ऊचुः

इन्द्रो दधाति भूतानां बलं तेजः प्रजाः सुखम् ।

तुष्टः प्रयच्छति तथा सर्वान् कामान् सुरेश्वरः ॥ ९ ॥

ऋषि बोले— देवराज इन्द्र संतुष्ट होनेपर सम्पूर्ण प्राणियोंको बल, तेज, संतान और सुखकी प्राप्ति कराते हैं तथा उनकी समस्त कामनाएँ पूर्ण करते हैं ॥ ९ ॥

दुर्वृत्तानां संहरति व्रतस्थानां प्रयच्छति ।

अनुशास्ति च भूतानि कार्येषु बलसूदनः ॥ १० ॥

वे दुष्टोंका संहार करते और उत्तम व्रतका पालन करनेवाले सत्पुरुषोंको जीवन दान देते हैं । बल नामक दैत्यका विनाश करनेवाले इन्द्र सभी प्राणियोंको आवश्यक कार्योंमें लगनेका आदेश देते हैं ॥ १० ॥

असूर्ये च भवेत् सूर्यस्तथाचन्द्रे च चन्द्रमाः ।

भवत्यग्निश्च वायुश्च पृथिव्यापश्च कारणैः ॥ ११ ॥

सूर्यके अभावमें वे स्वयं ही सूर्य होते हैं और चन्द्रमाके न रहनेपर स्वयं ही चन्द्रमा बनकर उनका कार्य सम्पादन करते हैं । आवश्यकता पड़नेपर वे ही अग्नि, वायु, पृथिवी और जलका स्वरूप धारण कर लेते हैं ॥ ११ ॥

एतदिन्द्रेण कर्तव्यमिन्द्रे हि विपुलं बलम् ।

त्वं च वीर बली श्रेष्ठस्तस्मादिन्द्रो भवस्व नः ॥ १२ ॥

यह सब इन्द्रका कार्य है । इन्द्रमें अपरिमित बल होता है । वीर! तुम भी श्रेष्ठ बलवान् हो । अतः तुम्हीं हमारे इन्द्र हो जाओ ॥ १२ ॥

शक्र उवाच

पृष्ठ 1560

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भवस्वेन्द्रो महाबाहो सर्वेषां नः सुखावहः ।

अभिषिच्यस्व चैवाद्य प्राप्तरूपोऽसि सत्तम ॥ १३ ॥

इन्द्रने कहा — महाबाहो! तुम्हीं इन्द्र बनो और हम सबको सुख पहुँचाओ । सज्जनशिरोमणे! तुम इस पदके सर्वथा योग्य हो । अतः आज ही इस पदपर अपना अभिषेक करा लो ॥ १३ ॥

स्कन्द उवाच

शाधि त्वमेव त्रैलोक्यमव्यग्रो विजये रतः ।

अहं ते किङ्करः शक्र न ममेन्द्रत्वमीप्सितम् ॥ १४ ॥

स्कन्द बोले — इन्द्रदेव! आप ही स्वस्थचित्त होकर तीनों लोकोंका शासन कीजिये और विजयप्राप्तिके कार्यमें संलग्न रहिये । मैं तो आपका सेवक हूँ । मुझे इन्द्र बननेकी इच्छा नहीं है ॥ १४ ॥

शक्र उवाच

बलं तवाद्भुतं वीर त्वं देवानामरीन् जहि ।

अवज्ञास्यन्ति मां लोका वीर्येण तव विस्मिताः ॥ १५ ॥

इन्द्रत्वे तु स्थितं वीर बलहीनं पराजितम् ।

आवयोश्च मिथो भेदे प्रयतिष्यन्त्यतन्द्रिताः ॥ १६ ॥

इन्द्रने कहा — वीर! तुम्हारा बल अद्भुत है, अतः तुम्हीं देव- शत्रुओंका संहार करो । वीरवर! मैं तुम्हारे सामने पराजित होकर बलहीन सिद्ध हो गया हूँ। अतः तुम्हारे पराक्रमसे चकित होकर लोग मेरी अवहेलना करेंगे । यदि मैं इन्द्र पदपर स्थित रहूँ, तो भी सब लोग मेरा उपहास करेंगे और आलस्य छोड़कर हम दोनोंमें परस्पर फूट डालनेका प्रयत्न करेंगे ॥ १५-१६ ॥

भेदिते च त्वयि विभो लोको द्वैधमुपेष्यति ।

द्विधाभूतेषु लोकेषु निश्चितेष्वावयोस्तथा ॥ १७ ॥

विग्रहः सम्प्रवर्तेत भूतभेदान्महाबल ।

तत्र त्वं मां रणे तात यथाश्रद्धं विजेष्यसि ॥ १८ ॥

तस्मादिन्द्रो भवानेव भविता मा विचारय । प्रभो! यदि तुम फूट जाओगे तो जगत्के प्राणी दो भागोंमें बट जायँगे । महाबलवान् वीर! सम्पूर्ण लोकोंके निश्चय ही दो दलोंमें बट जाने तथा लोगोंके द्वारा भेदबुद्धि उत्पन्न किये जानेपर हम लोगोंमें युद्ध प्रारम्भ हो सकता है । तात! उस युद्धमें जैसा कि मेरा विश्वास है, तुम्हीं विजयी होओगे । अतः तुम्हीं इन्द्र हो जाओ । इस विषयमें कोई दूसरी बात मत सोचो ॥ १७-१८३ ॥ स्कन्द उवाच