श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 1561–1570
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1561–1570
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त्वमेव राजा भद्रं ते त्रैलोक्यस्य ममैव च ॥ १ ९ ॥ करोमि किं च ते शक्र शासनं तद् ब्रवीहि मे । स्कन्द बोले — देवेन्द्र! आप ही देवराजके पदपर प्रतिष्ठित रहें । आपका कल्याण हो । आप ही तीनों लोकोंके तथा मेरे भी स्वामी हैं । आपकी किस आज्ञाका पालन करूँ—? यह मुझे बतानेकी कृपा करें ॥ १ ९ ३ ॥ इन्द्र उवाच अहमिन्द्रो भविष्यामि तव वाक्यान्महाबल ॥ २० ॥
यदि सत्यमिदं वाक्यं निश्चयाद् भाषितं त्वया ।
यदि वा शासनं स्कन्द कर्तुमिच्छसि मे शृणु ॥ २१ ॥
अभिषिच्यस्व देवानां सैनापत्ये महाबल । इन्द्रने कहा — महाबलवान् स्कन्द! मैं तुम्हारे कहनेसे इन्द्र- पदपर प्रतिष्ठित रहूँगा । यदि वास्तवमें तुम मेरी आज्ञाका पालन करना चाहते हो, यदि तुमने यह निश्चित बात कही है, अथवा यदि तुम्हारा यह कथन सत्य है तो मेरी यह बात सुनो- महावीर! तुम देवताओंके सेनापतिके पदपर अपना अभिषेक करा लो ॥ २०-२१ ॥ स्कन्द उवाच दानवानां विनाशाय देवानामर्थसिद्धये ॥ २२ ॥
गोब्राह्मणहितार्थाय सैनापत्येऽभिषिञ्च माम् । स्कन्द बोले — देवराज! दानवोंके विनाश, देवताओंके कार्यकी सिद्धि तथा गौओं और ब्राह्मणोंके हितके लिये आप सेनापतिके पदपर मेरा अभिषेक कीजिये ॥ २२ ॥
मार्कण्डेय उवाच सोऽभिषिक्तो मघवता सर्वैर्देवगणैः सह ॥ २३ ॥
अतीव शुशुभे तत्र पूज्यमानो महर्षिभिः ।
तत्र तत् काञ्चनं छत्रं ध्रियमाणं व्यरोचत ॥ २४ ॥
यथैव सुसमिद्धस्य पावकस्यात्ममण्डलम् । मार्कण्डेयजी कहते हैं- युधिष्ठिर! तदनन्तर समस्त देवताओं सहित इन्द्रने कुमारका देवसेनापतिके पदपर अभिषेक कर दिया । उस सयम वहाँ महर्षियोंद्वारा पूजित होकर स्कन्दकी बड़ी शोभा हुई । उनके ऊपर तना हुआ वह सुवर्णमय छत्र उद्भासित हो रहा था, मानो प्रज्वलित अग्निका अपना ही मण्डल प्रकाशित होता हो ॥ २३-२४३ ॥ विश्वकर्मकृता चास्य दिव्या माला हिरण्मयी ॥ २५ ॥
आबद्धा त्रिपुरघ्नेन स्वयमेव यशस्विना ।
आगम्य मनुजव्याघ्र सह देव्या परंतप ॥ २६ ॥
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नरश्रेष्ठ परंतप युधिष्ठिर! साक्षात् त्रिपुरनाशक यशस्वी भगवान् शिव तथा देवी पार्वतीने वहाँ पधारकर स्कन्दके गलेमें विश्वकर्माकी बनायी हुई सोनेकी दिव्य माला पहनायी ॥ २५-२६ ॥
अर्चयामास सुप्रीतो भगवान् गोवृषध्वजः ।
रुद्रमग्निं द्विजाः प्राहू रुद्रसूनुस्ततस्तु सः ॥ २७ ॥
भगवान् वृषध्वज ( शिव ) - ने अत्यन्त प्रसन्न होकर स्कन्दका समादर किया । ब्राह्मणलोग अग्निको रुद्रका स्वरूप बताते हैं, इसलिये स्कन्द भगवान् रुद्रके ही पुत्र हैं ॥ २७ ॥
रुद्रेण शुक्रमुत्सृष्टं तच्छ्वेतः पर्वतोऽभवत् ।
पावकस्येन्द्रियं श्वेते कृत्तिकाभिः कृतं नगे ॥ २८ ॥
रुद्रने जिस वीर्यका त्याग किया था, वही श्वेत पर्वतके रूपमें परिणत हो गया । फिर कृत्तिकाओंने अग्निके वीर्यको श्वेत पर्वतपर पहुँचाया था ॥ २८ ॥
पूज्यमानं तु रुद्रेण दृष्ट्वा सर्वे दिवौकसः ।
रुद्रसूनुं ततः प्राहुर्गुहं गुणवतां वरम् ॥ २ ९ ॥
भगवान् रुद्रके द्वारा गुणवानोंमें श्रेष्ठ कुमार कार्तिकेयका सम्मान होता देख सब देवता कहने लगे, ये रुद्रके ही पुत्र हैं ॥ २ ९ ॥
अनुप्रविश्य रुद्रेण वह्नि जातो ह्ययं शिशुः ।
तत्र जातस्ततः स्कन्दो रुद्रसूनुस्ततोऽभवत् ॥ ३० ॥
‘ रुद्रने अग्निमें प्रवेश करके इस शिशुको जन्म दिया है । रुद्रस्वरूप अग्निसे उत्पन्न होनेके कारण स्कन्द रुद्रके ही पुत्र कहलाये ' ॥ ३० ॥
रुद्रस्य वह्नेः स्वाहायाः षण्णां स्त्रीणां च भारत ।
जातः स्कन्दः सुरश्रेष्ठो रुद्रसूनुस्ततोऽभवत् ॥ ३१ ॥
भारत! सुरश्रेष्ठ स्कन्दका जन्म रुद्रस्वरूप अग्निसे, स्वाहासे तथा छः स्त्रियोंसे हुआ था । इसलिये वे भगवान् रुद्रके पुत्र हुए ॥ ३१ ॥
अरजे वाससी रक्ते वसानः पावकात्मजः ।
भाति दीप्तवपुः श्रीमान् रक्ताभ्राभ्यामिवांशुमान् ॥ ३२ ॥
अग्निनन्दन स्कन्द लाल रंगके दो स्वच्छ वस्त्र धारण किये कान्तिमान् एवं तेजस्वी शरीरसे ऐसी शोभा पा रहे थे, मानो दो लाल बादलोंके साथ भगवान् अंशुमाली ( सूर्य ) सुशोभित हो रहे हों ॥ ३२ ॥
कुक्कुटश्चाग्निना दत्तस्तस्य केतुरलंकृतः ।
रथे समुच्छ्रितो भाति कालाग्निरिव लोहितः ॥ ३३ ॥
अग्निदेवने स्कन्दके लिये कुक्कुटके चिह्नसे अलंकृत ऊँचा ध्वज प्रदान किया था, जो रथपर अपनी अरुण प्रभासे प्रलयाग्निके समान उद्भासित होता था ॥ ३३ ॥
या चेष्टा सर्वभूतानां प्रभा शान्तिर्बलं तथा ।
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अग्रतस्तस्य सा शक्तिर्देवानां जयवर्धिनी ॥ ३४ ॥
सम्पूर्ण भूतोंमें जो चेष्टा, प्रभा, शान्ति और बल है, वही कुमार कार्तिकेयके सम्मुख
शक्तिरूपमें उपस्थित है । वह देवताओंकी विजयश्रीको बढ़ानेवाली है ॥ ३४ ॥
विवेश कवचं चास्य शरीरे सहजं तथा ।
युध्यमानस्य देवस्य प्रादुर्भवति तत् सदा ॥ ३५ ॥
तथा उन स्कन्ददेवके शरीरमें सहज ( स्वाभाविक ) कवचका प्रवेश हो गया, जो सदा उनके युद्ध करते समय प्रकट होता था ॥ ३५ ॥
शक्तिर्धर्मो बलं तेजः कान्तत्वं सत्यमुन्नतिः ।
ब्रह्मण्यत्वमसम्मोहो भक्तानां परिरक्षणम् ॥ ३६ ॥
निकृन्तनं च शत्रूणां लोकानां चाभिरक्षणम् ।
स्कन्देन सह जातानि सर्वाण्येव जनाधिप ॥ ३७ ॥
राजन्! शक्ति, धर्म, बल, तेज, कान्ति, सत्य, उन्नति, ब्राह्मणभक्ति, असम्मोह ( विवेक ), भक्तजनोंकी रक्षा, सुनका संहार और समस्त लोकोंका पालन- ये सारे गुण स्कन्दके साथ ही उत्पन्न हुए थे ॥ ३६-३७ ॥
एवं देवगणैः सर्वैः सोऽभिषिक्तः स्वलंकृतः ।
बभौ प्रतीतः सुमनाः परिपूर्णेन्दुमण्डलः ॥ ३८ ॥
इस प्रकार समस्त देवताओंद्वारा सेनापतिके पदपर अभिषिक्त होकर विविध आभूषणोंसे विभूषित, विशुद्ध एवं प्रसन्न हृदयवाले स्कन्द पूर्ण चन्द्रमण्डलके समान सुशोभित हुए ॥ ३८ ॥
इष्टैः स्वाध्यायघोषैश्च देवतूर्यवरैरपि ।
देवगन्धर्वगीतैश्च सर्वैरप्सरसां गणैः ॥ ३ ९ ॥
एतैश्चान्यैश्च बहुभिस्तुष्टैर्हृष्टैः स्वलंकृतैः ।
सुसंवृतः पिशाचानां गणैर्देवगणैस्तथा ॥ ४० ॥
उस समय अत्यन्त प्रिय लगनेवाले वेदमन्त्रोंकी ध्वनि सब ओर गूँज उठी, देवताओंके उत्तम वाद्य भी बजने लगे, देव और गन्धर्व गीत गाने लगे और समस्त अप्सराएँ नृत्य करने लगीं । ये तथा और भी बहुत- से देवगण एवं पिशाचसमूह विविध अलंकारोंसे अलंकृत, हर्षोत्फुल्ल और संतुष्ट हो स्कन्दको घेरकर खड़े थे ॥ ३ ९-४० ॥
क्रीडन् भाति तदा देवैरभिषिक्तश्च पावकिः ।
अभिषिक्तं महासेनमपश्यन्त दिवौकसः ॥ ४१ ॥
विनिहत्य तमः सूर्यं यथेहाभ्युदितं तथा ।
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उस समय इन सबसे घिरे हुए अग्निनन्दन कार्तिकेय देवताओंद्वारा अभिषिक्त हो भाँति- भाँतिकी क्रीडाएँ करते हुए बड़ी शोभा पा रहे थे । देवताओंने सेनापति पदपर अभिषिक्त हुए कुमार महासेनको इस प्रकार देखा, मानो सूर्यदेव अन्धकारका नाश करके उदित हुए हों ॥ ४१३ ॥
अथैनमभ्ययुः सर्वा देवसेनाः सहस्रशः ॥ ४२ ॥
अस्माकं त्वं पतिरिति ब्रुवाणाः सर्वतो दिशः । तदनन्तर सारी देवसेनाएँ सहस्रोंकी संख्यामें सब दिशाओंसे उनके पास आयीं और कहने लगीं- ' आप ही हमारे पति हैं ' ॥ ४२३ ॥
ताः समासाद्य भगवान् सर्वभूतगणैर्वृतः ॥ ४३ ॥
अर्चितस्तु स्तुतश्चैव सान्त्वयामास ता अपि । समस्त भूतगणोंसे घिरे हुए भगवान् स्कन्दने उन देवसेनाओंको अपने समीप पाकर उन्हें सान्त्वना दी और स्वयं भी उनके द्वारा पूजित तथा प्रशंसित हुए ॥ ४३३ ॥
शतक्रतुश्चाभिषिच्य स्कन्दं सेनापतिं तदा ॥ ४४ ॥
सस्मार तां देवसेनां या सा तेन विमोक्षिता । उस समय इन्द्रने स्कन्दको सेनापति पदपर अभिषिक्त करनेके पश्चात् उस कुमारी देवसेनाका स्मरण किया, जिसका उन्होंने केशीके हाथसे उद्धार किया था ॥ ४४ ॥
अयं तस्याः पतिर्नूनं विहितो ब्रह्मणा स्वयम् ॥ ४५ ॥
विचिन्त्येत्यानयामास देवसेनां ह्यलंकृताम् । उन्होंने सोचा, स्वयं ब्रह्माजीने निश्चय ही कुमार कार्तिकेयको ही उसका पति नियत किया है । यह सोचकर वे देवसेनाको वस्त्राभूषणोंसे भूषित करके ले आये ॥ स्कन्दं प्रोवाच बलभिदियं कन्या सुरोत्तम ॥ ४६ ॥
अजाते त्वयि निर्दिष्टा तव पत्नी स्वयम्भुवा ।
तस्मात् त्वमस्या विधिवत् पाणिं मन्त्रपुरस्कृतम् ॥ ४७ ॥
गृहाण दक्षिणं देव्याः पाणिना पद्मवर्चसा ।
एवमुक्तः स जग्राह तस्याः पाणिं यथाविधि ॥ ४८ ॥
फिर बलसंहारक इन्द्रने स्कन्दसे कहा – ' सुरश्रेष्ठ! तुम्हारे जन्म लेनेके पहलेसे ही ब्रह्माजीने इस कन्याको तुम्हारी पत्नी नियत की है, अतः तुम वेदमन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक इसका विधिवत् पाणिग्रहण करो । अपने कमलकी - सी कान्तिवाले हाथसे इस देवीका दायाँ हाथ पकड़ो । ‘ इन्द्रके ऐसा कहनेपर स्कन्दने विधिपूर्वक देवसेनाका पाणिग्रहण किया ॥ ४६–४८ ॥
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बृहस्पतिर्मन्त्रविद्धि जजाप च जुहाव च ।
एवं स्कन्दस्य महिषीं देवसेनां विदुर्जनाः ॥ ४ ९ ॥
उस समय मन्त्रवेत्ता बृहस्पतिजीने वेदमन्त्रोंका जप और होम किया । इस प्रकार सब लोग यह जान गये कि देवसेना कुमार कार्तिकेयकी पटरानी है ॥ ४ ९ ॥
षष्ठीं यां ब्राह्मणाः प्राहुर्लक्ष्मीमाशां सुखप्रदाम् ।
सिनीवालीं कुहूं चैव सद्वृत्तिमपराजिताम् ॥ ५० ॥
उसीको ब्राह्मणलोग पष्ठी, लक्ष्मी, आशा, सुखप्रदा, सिनीवाली, कुहू, सद्वृत्ति तथा अपराजिता कहते हैं ॥
यदा स्कन्दः पतिर्लब्धः शाश्वतो देवसेनया ।
तदा तमाश्रयल्लक्ष्मीः स्वयं देवी शरीरिणी ॥ ५१ ॥
जब देवसेनाने स्कन्दको अपने सनातन पतिके रूपमें प्राप्त कर लिया, तब ( शोभास्वरूपा ) लक्ष्मीदेवीने स्वयं मूर्तिमती होकर उनका आश्रय लिया ॥ ५१ ॥
श्रीजुष्टः पञ्चमीं स्कन्दस्तस्माच्छ्रीपञ्चमी स्मृता ।
षष्ठ्यां कृतार्थोऽभूद् यस्मात् तस्मात् षष्ठी महातिथिः ॥ ५२ ॥
पंचमी तिथिको स्कन्ददेव श्री अर्थात् शोभासे सेवित हुए, इसलिये उस तिथिको श्रीपञ्चमी कहते हैं और षष्ठीको कृतार्थ हुए थे, इसलिये षष्ठी महातिथि मानी गयी ॥ ५२ ॥
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इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आङ्गिरसे स्कन्दोपाख्याने एकोनत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२ ९ ॥ इसप्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानके प्रसंगमें स्कन्दोपाख्यानसम्बन्धी दो सौ उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२९ ॥
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त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः कृत्तिकाओंको नक्षत्रमण्डलमें स्थानकी प्राप्ति तथा मनुष्योंको कष्ट देनेवाले विविध ग्रहोंका वर्णन मार्कण्डेय उवाच
श्रिया जुष्टं महासेनं देवसेनापतिं कृतम् ।
सप्तर्षिपत्न्यः षड् देव्यस्तत्सकाशमथागमन् ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजन्! कुमार महासेनको श्रीसम्पन्न और देवताओंका सेनापति हुआ देख सप्तर्षियोंमेंसे छः की पत्नियाँ उनके पास आयीं ॥ १ ॥
ऋषिभिः सम्परित्यक्ता धर्मयुक्ता महाव्रताः ।
द्रुतमागम्य चोचुस्ता देवसेनापतिं प्रभुम् ॥ २ ॥
वे धर्मपरायणा तथा महान् पातिव्रत्यका पालन करनेवाली थीं, तो भी ऋषियोंने उन्हें त्याग दिया था । अतः उन्होंने देवसेनाके स्वामी भगवान् स्कन्दके पास शीघ्रतापूर्वक आकर कहा— ॥ २ ॥
वयं पुत्र परित्यक्ता भर्तृभिर्देवसम्मितैः ।
अकारणाद् रुषा तैस्तु पुण्यस्थानात् परिच्युताः ॥ ३ ॥
‘ बेटा! हमारे देवतुल्य पतियोंने अकारण रुष्ट होकर हमें त्याग दिया है, इसलिये ( हम) पुण्यलोकसे च्युत हो गयी हैं ॥ ३ ॥
अस्माभिः किल जातस्त्वमिति केनाप्युदाहृतम् ।
तत् सत्यमेतत् संश्रुत्य तस्मान्नस्त्रातुमर्हसि ॥ ४ ॥
‘ उन्हें किसीने यह बता दिया है कि तुम हमारे गर्भसे उत्पन्न हुए हो, ( परंतु ऐसी बात नहीं है । ) अतः हमारे सत्य कथनको सुनकर तुम इस संकटसे हमारी रक्षा करो ॥ ४ ॥
अक्षयश्च भेवत् स्वर्गस्त्वत्प्रसादाद्धि नः प्रभो ।
त्वां पुत्रं चाप्यभीप्सामः कृत्वैतदनृणो भव ॥ ५ ॥
‘ प्रभो! तुम्हारी कृपासे हमें अक्षय स्वर्गकी प्राप्ति हो सकती है । इसके सिवा हम तुम्हें अपना पुत्र भी बनाये रखना चाहती हैं । यह सब कार्य सम्पन्न करके तुम हमसे उऋण हो जाओ' ॥ ५ ॥
स्कन्द उवाच
मातरो हि भवत्यो मे सुतो वोऽहमनिन्दिताः ।
यद्वापीच्छत तत् सर्वं सम्भविष्यति वस्तथा ॥ ६ ॥
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स्कन्द बोले — वन्दनीय सतियो! आपलोग मेरी माताएँ हैं और मैं आप सबका पुत्र हूँ ।
इसके सिवा यदि आप लोगोंकी और कोई इच्छा हो तो वह भी पूर्ण हो जायगी ॥ ६ ॥
मार्कण्डेय उवाच
विवक्षन्तं ततः शक्रं किं कार्यमिति सोऽब्रवीत् ।
उक्तः स्कन्देन ब्रूहीति सोऽब्रवीद् वासवस्ततः ॥ ७ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर इन्द्रको कुछ कहनेके लिये उत्सुक देख स्कन्दने पूछा — ‘ क्या काम है, कहिये । ' स्कन्दके इस प्रकार आदेश देनेपर इन्द्र बोले ॥ ७ ॥
अभिजित् स्पर्धमाना तु रोहिण्या अनुजा स्वसा ।
इच्छन्ती ज्येष्ठतां देवी तपस्तप्तुं वनं गता ॥ ८ ॥
‘ रोहिणीकी छोटी बहिन अभिजित् देवी स्पर्धाके कारण ज्येष्ठता पानेकी इच्छासे तपस्या करनेके लिये वनमें चली गयी है ॥ ८ ॥
तत्र मूढोऽस्मि भद्रं ते नक्षत्रं गगनाच्च्युतम् ।
कालं त्विमं परं स्कन्द ब्रह्मणा सह चिन्तय ॥ ९ ॥
' तुम्हारा कल्याण हो, आकाशसे यह एक नक्षत्र च्युत हो गया है; ( इसकी पूर्ति कैसे हो? ) इस प्रश्नको लेकर मैं किंकर्तव्यविमूढ हो गया हूँ । स्कन्द! तुम ब्रह्माजीके साथ मिलकर
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इस उत्तम काल ( मुहूर्त या नक्षत्र) की पूर्तिके उपायका विचार करो ॥ ९ ॥
धनिष्ठादिस्तदा कालो ब्रह्मणा परिकल्पितः ।
रोहिणी ह्यभवत् पूर्वमेवं संख्या समाभवत् ॥ १० ॥
‘ अभिजित्का पतन होनेसे ब्रह्माजीने धनिष्ठासे ही ( सत्ययुग आदि ) कालकी गणनाका क्रम निश्चित किया ( क्योंकि वही उस समय युगादि नक्षत्र था ) । इसके पूर्व रोहिणीको ही युगादि नक्षत्र माना जाता था ( क्योंकि उसीके प्रारम्भकालमें चन्द्रमा, सूर्य तथा गुरुका योग होता था )- इस प्रकार नाक्षत्र मासकी दिन- संख्या उन दिनों सम थी ' ॥ १० ॥
एवमुक्ते तु शक्रेण त्रिदिवं कृत्तिका गताः ।
नक्षत्रं सप्तशीर्षाभं भाति तद् वह्निदैवतम् ॥ ११ ॥
इन्द्रके उपर्युक्त प्रस्ताव करनेपर उनका आशय समझकर छहों कृत्तिकाएँ अभिजित्के स्थानकी पूर्ति करनेके लिये आकाशमें चली गयीं । वह अग्निदेवता- सम्बन्धी कृत्तिका नक्षत्र सात सिरोंकी आकृतिमें प्रकाशित हो रहा है ॥ ११ ॥
विनता चाब्रवीत् स्कन्दं मम त्वं पिण्डदः सुतः ।
इच्छामि नित्यमेवाहं त्वया पुत्र सहासितुम् ॥ १२ ॥
गरुड़जातीय विनताने स्कन्दसे कहा– ' बेटा! तुम मेरे पिण्डदाता पुत्र हो । मैं सदा तुम्हारे साथ रहना चाहती हूँ' ॥ १२ ॥
स्कन्द उवाच
एवमस्तु नमस्तेऽस्तु पुत्रस्नेहात् प्रशाधि माम् ।
स्नुषया पूज्यमाना वै देवि वत्स्यसि नित्यदा ॥ १३ ॥
स्कन्दने कहा — एवमस्तु ( ऐसा ही हो ), मा! तुम्हें नमस्कार है । तुम मेरे ऊपर पुत्रोचित स्नेह रखकर कर्तव्यका आदेश देती रहो । देवि! तुम यहाँ सदा अपनी पुत्रवधू देवसेनाद्वारा सम्मानित होकर रहोगी ॥ १३ ॥
मार्कण्डेय उवाच अथ मातृगणः सर्वः स्कन्दं वचनमब्रवीत् ।
वयं सर्वस्य लोकस्य मातरः कविभिः स्तुताः ।
इच्छामो मातरस्तुभ्यं भवितुं पूजयस्व नः ॥ १४ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर समस्त मातृगणोंने आकर स्कन्दसे कहा – ' बेटा! विद्वानोंने हमें सम्पूर्ण लोकोंकी माताएँ कहकर हमारी स्तुति की है । अब हम
तुम्हारी माता होना चाहती हैं । तुम मातृभावसे हमारा पूजन करो' ॥ १४ ॥
स्कन्द उवाच मातरो हि भवत्यो मे भवतीनामहं सुतः ।
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उच्यतां यन्मया कार्यं भवतीनामथेप्सितम् ॥ १५ ॥
स्कन्दने कहा - आप मेरी माताएँ हैं । मैं आपलोगोंका पुत्र हूँ। मुझसे सिद्ध होनेयोग्य जो आपका अभीष्ट कार्य हो, उसे बताइये ॥ १५ ॥
मातर ऊचुः
यास्तु ता मातरः पूर्वं लोकस्यास्य प्रकल्पिताः ।
अस्माकं तु भवेत् स्थानं तासां चैव न तद् भवेत् ॥ १६ ॥
माताओंने कहा –( ब्राह्मी, माहेश्वरी आदि ) सुप्रसिद्ध लोकमाताएँ जो पहलेसे इस सम्पूर्ण जगत्की माताओंके स्थानपर प्रतिष्ठित हों, ( वे अपना पद छोड़ दें । ) उनके उस
स्थानपर अब हमारा अधिकार हो जाय । उनका उसपर कोई अधिकार न रहे ॥ १६ ॥
भवेम पूज्या लोकस्य न ताः पूज्याः सुरर्षभ ।
प्रजाऽस्माकं हृतास्ताभिस्त्वत्कृते ताः प्रयच्छ नः ॥ १७ ॥
सुरश्रेष्ठ! हम सम्पूर्ण जगत्की पूजनीया हों । जो पहले मातृकाएँ थीं, उनकी अब पूजा न हो । उन्होंने तुम्हारे लिये हमपर मिथ्या अपवाद लगाकर हमारे पतियोंको कुपित करके हमारे संतानसुखको छीन लिया है । अतः तुम हमें संतान प्रदान करो ( हमारे पतियोंको अनुकूल करके हमें संतान सुखकी प्राप्ति कराओ ) ॥ १७ ॥
स्कन्द उवाच
वृत्ताः प्रजा न ताः शक्या भवतीभिर्निषेवितुम् ।
अन्यां वः कां प्रयच्छामि प्रजां यां मनसेच्छथ ॥ १८ ॥
स्कन्द बोले- माताओ! जिन प्रजाओंकी उत्पत्तिका अवसर बीत गया, उन्हें आपलोग अब नहीं पा सकतीं । यदि दूसरी कोई प्रजा पानेकी आपके मनमें इच्छा हो तो कहिये, मैं उसे प्रदान करूँगा ॥ १८ ॥
मातर ऊचुः
इच्छाम तासां मातॄणां प्रजा भोक्तुं प्रयच्छ नः ।
त्वया सह पृथग्भूता ये च तासामथेश्वराः ॥ १ ९ ॥
माताओंने कहा – यदि ऐसी बात है, तो हमें इन लोकमाताओंकी संतानें सौंप दो । हम उन्हें खाना चाहती हैं । तुमसे पृथक् जो उन संतानोंके पिता आदि अभिभावक हैं, उन्हें भी हम खाना चाहती हैं ॥ १ ९ ॥ स्कन्द उवाच
प्रजा वो दद्मि कष्टं तु भवतीभिरुदाहृतम् ।
परिरक्षत भद्रं वः प्रजाः साधु नमस्कृताः ॥ २० ॥