कीटोपाख्यान : युद्ध के मैदान में प्राण त्यागने वाले योद्धाओं की गति क्या होती है?
कर्म और तपोबल का प्रभाव
महर्षि वेदव्यास कृत महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान पढ़ें।
अनुशासनपर्व → दानधर्मपर्व · अध्याय 117–119 · पृष्ठ 1021–1033
भीष्म ने युधिष्ठिर से कहा
कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र में युधिष्ठिर द्वारा प्राण त्याग की दुश्चर्या पर पूछे गए प्रश्न के उत्तर हेतु।
कुरुक्षेत्र के युद्धक्षेत्र की नीरवता के बीच, युधिष्ठिर ने पितामह भीष्म की ओर दृष्टिपात करते हुए अत्यन्त गम्भीर स्वर में पूछा— "पितामह! जो योद्धा महासमर में इच्छा या अनिच्छा से मारे गये हैं, वे किस गतिको प्राप्त हुए है? यह मुझे बताइये महाप्राज्ञ! आप तो जानते ही हैं कि महा सङ्ग्राम में मनुष्यों के लिये प्राणों का परित्याग करना कितना दुःखदायक होता है।" युधिष्ठिर की आँखों में उस भीषण सङ्घर्ष का दर्द था। उन्होंने आगे कहा— "प्राणों का त्याग करना अत्यन्त दुष्कर कार्य है। प्राणी उन्नति या अवनति, शुभ या अशुभ किसी भी अवस्थामें मरना नहीं चाहते हैं। इसका क्या कारण है? यह मुझे बताइये; क्योंकि मेरी दृष्टि में आप सर्वज्ञ हैं।"
दुःखं प्राणपरित्यागः पुरुषाणां महामृधे ।
जानासि त्वं महाप्राज्ञ प्राणत्यागं सुदुष्करम् ॥
महाप्राज्ञ! आप तो जानते ही हैं कि महा संग्राममें मनुष्योंके लिये प्राणोंका परित्याग करना कितना दुःखदायक होता है । प्राणोंका त्याग करना अत्यन्त दुष्कर कार्य है ।
भीष्म ने युधिष्ठिर की ओर देखा और धीमे स्वर में कहा— "पृथ्वीनाथ! इस संसार में आये हुए प्राणी उन्नति में या अवनति में तथा शुभ या अशुभ अवस्थामें ही सुख मानते हैं। मरना नहीं चाहते। इसका क्या कारण है, यह बताता हूँ, सुनो।" भीष्म ने एक ठहराव लिया और कहा— "युधिष्ठिर! यह तुमने बहुत अच्छा प्रश्न उपस्थित किया है। इस विषय में द्वैपायन व्यास और एक कीड़े का संवाद रूप जो यह प्राचीन वृत्तान्त प्रसिद्ध है, वही तुम्हें बता रहा हूँ।"
अत्र ते वर्तयिष्यामि पुरावृत्तमिदं नृप ।
द्वैपायनस्य संवादं कीटस्य च युधिष्ठिर ॥
नरेश्वर! युधिष्ठिर! इस विषयमें द्वैपायन व्यास और एक कीड़ेका संवादरूप जो यह प्राचीन वृत्तान्त प्रसिद्ध है, वही तुम्हें बता रहा हूँ ।
प्राचीन काल की बात है, ब्रह्मस्वरूप श्रीकृष्णद्वैपायन विप्रवर व्यासजी कहीं जा रहे थे। तभी उनकी दृष्टि एक कीट पर पड़ी जो गाड़ी की लीक से बड़ी तेजी के साथ भाग रहा था। व्यासजी ने उसे देखकर पूछा— "कीट! आज तुम बहुत डरे हुए और उतावले दिखाई दे रहे हो, बताओ तो सही— कहाँ भागे जा रहे हो? कहाँ से तुम्हें भय प्राप्त हुआ है?" \कीट ने अत्यन्त व्याकुल होकर उत्तर दिया— "महामते! यह जो बहुत बड़ी बैलगाड़ी आ रही है, इसी की घर्घराहट सुनकर मुझे भय हो गया है; क्योंकि उसकी यह आवाज बड़ी भयङ्कर है। यह आवाज जब कानों में पड़ती है, तब यह सन्देह होता है कि कहीं गाड़ी आकर मुझे कुचल न डाले। इसलिये मैं यहाँ से जल्दी-जल्दी भाग रहा हूँ।" कीट ने हाँफते हुए आगे कहा— "यह देखिये बैलों पर चाबुक की मार पड़ रही है और वे बहुत भारी बोझ लिये इधर आ रहे हैं। प्रभो! मुझे उनकी आवाज बहुत निकट सुनाई पड़ती है। गाड़ी पर बैठे मनुष्यों के भी नाना प्रकार के शब्द कानों में पड़ रहे हैं। मेरे जैसे कीड़े के लिये इस भयङ्कर शब्द को धैर्यपूर्वक सुन सकना असम्भव है। अतः इस अत्यन्त दारुण भय से अपनी रक्षा करने के लिये मैं यहाँ से भाग रहा हूँ। प्राणियों के लिये मृत्यु बड़ी दुःखदायिनी होती है। अपना जीवन सबको अत्यन्त दुर्लभ जान पड़ता है।"
भीष्म कहते हैं— राजन्! कीड़े के ऐसा कहने पर व्यासजी ने उससे पूछा— "कीट! तुम्हें सुख कहाँ है? मेरी समझ में तो तुम्हारा मर जाना ही तुम्हारे लिये सुख की बात है; क्योंकि तुम तिर्यक् योनि- अधम कीट- योनि में पड़े हो। तुम्हें शब्द, स्पर्श, रस, गन्ध तथा बहुत-से छोटे-बड़े भोगों का अनुभव नहीं होता है। अतः तुम्हारा तो मर जाना ही अच्छा है।" कीड़े ने उत्तर दिया— "महाप्राज्ञ! जीव सभी योनियों में सुख का अनुभव करते हैं। मुझे भी इस योनि में सुख मिलता है और यही सोचकर जीवित रहना चाहता हूँ। यहाँ भी इस शरीर के अनुसार सारे विषय उपलब्ध होते हैं। मनुष्यों और स्थावर प्राणियों के भोग अलग-अलग हैं। प्रभो! पहले जन्म में मैं एक मनुष्य, उसमें भी बहुत धनी शूद्र हुआ था। ब्राह्मणों के प्रति मेरे मन में आदर का भाव न था। मैं कञ्जूस, क्रूर और व्याजखोर था। सबसे तीखे वचन बोलना, बुद्धिमानी के साथ लोगों को ठगना और संसार के सभी लोगों से द्वेष रखना— यही मेरा स्वभाव था। झूठ बोलकर लोगों को धोखा देना और दूसरों के माल को हड़प लेना— यही मेरा काम था।"
अहमासं मनुष्यो वै शूद्रो बहुधनः प्रभो ।
अब्रह्मण्यो नृशंसश्च कदर्यो वृद्धिजीवनः ॥
प्रभो! पहले जन्ममें मैं एक मनुष्य, उसमें भी बहुत धनी शूद्र हुआ था । ब्राह्मणोंके प्रति मेरे मनमें आदरका भाव न था । मैं कंजूस, क्रूर और व्याजखोर था ।
कीट ने अपने हृदय की पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा— "मैं इतना निर्दयी था कि केवल स्वाद लेने की कामना से अकेला ही भोजन की इच्छा रखता और ईर्ष्यावश घर पर आये हुए अतिथियों और आश्रितजनों को भोजन कराये बिना ही भोजन कर लेता था। पूर्वजन्म में मैं देवताओं और पितरों के यजन के लिये श्रद्धापूर्वक अन्न एकत्र करता; परन्तु धन-सङ्ग्रह की कामना से वह देने योग्य अन्न का दान नहीं करता था। भय के समय अभय पाने की इच्छा से कितने ही शरणार्थी मेरे पास आते, किन्तु मैं उन्हें सुरक्षित स्थान में पहुँचाकर भी अकस्मात् वहाँ से निकाल देता। दूसरे मनुष्यों के पास धन-धान्य, सुन्दरी स्त्री और उत्तम लक्ष्मी देखकर मैं अकारण ही उनसे कुढ़ता रहता था। दूसरों का सुख देखकर मुझे ईर्ष्या होती थी; मैं औरों के धर्म, अर्थ और काम में बाधा डालता था। पूर्वजन्म में मैंने प्रायः वे ही कर्म किये हैं जिनमें निर्दयता अधिक थी। उनकी याद आने से मुझे उसी तरह पश्चात्ताप होता है, जैसे कोई अपने प्यारे पुत्र को त्यागकर पछताता है।"
ईर्ष्याः परसुखं दृष्ट्वा अन्यस्य न बुभूषकः ।
त्रिवर्गहन्ता चान्येषामात्मकामानुवर्तकः ॥
दूसरोंका सुख देखकर मुझे ईर्ष्या होती थी, दूसरे किसीकी उन्नति हो यह मैं नहीं चाहता था, औरोंके धर्म, अर्थ और काममें बाधा डालता और अपनी ही इच्छाका अनुसरण करता था ।
कीट ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा— "मुझे पहले के अपने किये हुए शुभकर्मों के फल का अब तक अनुभव नहीं हुआ है। पूर्वजन्म में मैंने केवल अपनी बूढ़ी माता की सेवा की थी तथा एकวัน किसी ब्राह्मण अतिथि का, जो अपने जातीय गुणों से सम्पन्न थे, स्वागत-सत्कार किया था। ब्रह्मन्! उसी पुण्य के प्रभाव से मुझे आज तक पूर्वजन्म की स्मृति छोड़ न सकी है।" \व्यासजी ने कहा— "कीट! तुम जिस शुभकर्म के प्रभाव से तिर्यग् योनि में जन्म लेकर भी मोहित नहीं हुए हो, वह मेरा ही कर्म है। मेरे दर्शन के प्रभाव से ही तुम्हें मोह नहीं हो रहा है। मैं अपने तपोबल से केवल दर्शनमात्र देकर तुम्हारा उद्धार कर दूँगा; क्योंकि तपोबल से बढ़कर दूसरा कोई श्रेष्ठ बल नहीं है। कीट! मैं जानता हूँ, अपने पूर्वकृत पापों के कारण तुम्हें कीट-योनि में आना पड़ा है। यदि इस समय तुम्हारी धर्म के प्रति श्रद्धा है तो तुम्हें धर्म अवश्य प्राप्त होगा।" \व्यासजी ने समझाया कि देवता, मनुष्य और तिर्यग् योनि में पड़े हुए प्राणी कर्मभूमि में किये हुए कर्मों का ही फल भोगते हैं। अज्ञानी मनुष्य का धर्म भी कामना को लेकर ही होता है।"
अहं त्वां दर्शनादेव तारयामि तपोबलात् ।
तपोबलाद्धि बलवद् बलमन्यन्न विद्यते ॥
मैं अपने तपोबलसे केवल दर्शनमात्र देकर तुम्हारा उद्धार कर दूँगा; क्योंकि तपोबलसे बढ़कर दूसरा कोई श्रेष्ठ बल नहीं है ।
भीष्मजी युधिष्ठिर से कहते हैं—एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहते थे, जो सदा सूर्य और चन्द्रमा की पूजा करते तथा लोगों को पवित्र कथाएँ सुनाते थे। व्यासजी ने उस कीट से कहा था, 'एक जगह एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहते हैं। वे जीवन में सदा सूर्य और चन्द्रमा की पूजा किया करते हैं तथा लोगों को पवित्र कथाएँ सुनाया करते हैं। उन्हीं के यहाँ तुम क्रमशः पुत्र रूप से जन्म लोगे। वहाँ विषयों को पञ्चभूतों का विकार मानकर अनासक्त भाव से उपभोग करोगे। उस समय मैं तुम्हारे पास आकर ब्रह्मविद्या का उपदेश करूँगा तथा तुम जिस लोक में जाना चाहोगे, वहीं तुम्हें पहुँचा दूँगा।'
व्यासजी के इन वचनों को सुनकर कीट ने 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली और बीच रास्ते में ही ठहर गया। तभी अचानक एक विशाल छकड़ा वहाँ आ पहुँचा और उसके पहिये से दबकर वह कीट चूर-चूर हो गया और उसने अपने प्राण त्याग दिए। इसके पश्चात, वह क्रमशः शाही, गोधा, सूअर, मृग, पक्षी, चाण्डाल, शूद्र और वैश्य की योनि में जन्म लेता हुआ अन्ततः क्षत्रिय जाति में उत्पन्न हुआ। अमित तेजस्वी व्यासजी की कृपा से जब वह क्षत्रिय कुल में जन्मा, तो वह उन महर्षि के दर्शन करने के लिए उनके पास गया। \व्यासजी के दर्शन कर उस क्षत्रिय ने हाथ जोड़कर ऋषिक के चरणों में अपना मस्तक रख दिया और कहा—'भगवन्! आज मुझे वह स्थान मिला है जिसकी कहीं तुलना नहीं है। इसे मैं दस जन्मों से पाना चाहता था। यह आप ही की कृपा है कि मैं अपने दोष से कीड़ा होकर भी आज राजकुमार हो गया हूँ। अब सोने की मालाओं से सुशोभित अत्यन्त बलवान गजराज मेरी सवारी में रहते हैं। उत्तम जाति के काबुली घोड़े मेरे रथों में जोते जाते हैं। ऊँटों और खच्चरों से जुती हुई गाड़ियाँ मुझे ढोती हैं। मैं भाई-बन्धुओं और मन्त्रियों के साथ मांस-भात खाता हूँ। महाभाग! श्रेष्ठ पुरुषों में रहने योग्य अपने निवासभूत सुन्दर महलों के भीतर सुखद शय्याओं पर मैं बड़े सम्मान के साथ शयन करता हूँ। प्रतिदिन रात के पिछले पहरों में सूत, मागध और वन्दीजन मेरी स्तुति करते हैं, ठीक वैसे ही जैसे देवता प्रिय वचन बोलकर महेन्द्र के गुण गाते हैं। आप सत्यप्रतिज्ञ हैं, अमित तेजस्वी हैं; आपके प्रसाद से ही आज मैं कीड़े से राजपूत हो गया हूँ। महाप्राज्ञ! आपको नमस्कार है, मुझे आज्ञा दीजिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ? आपके तपोबल से ही मुझे राजपद प्राप्त हुआ है।' \व्यासजी ने कहा—'राजन्! आज तुमने अपनी वाणी से मेरा भली-भाँति स्तवन किया है। अभी तक तुम्हें अपनी कीट-योनिकी घृणित स्मृति अर्थात् मांस खाने की वृत्ति बनी हुई है। तुमने पूर्व जन्म में अर्थपरायण, नृशंस और आततायी शूद्र होकर जो पाप सञ्चय किया था, उसका सर्वदा नाश नहीं हुआ है। किन्तु कीट-योनिकी में जन्म लेकर भी जो तुमने मेरा दर्शन किया, उस पुण्य का यह फल है कि तुम राजपूत हुए। आज जो तुमने मेरी पूजा की, उसके फलस्वरूप तुम इस क्षत्रिय-योनिके पश्चात् ब्राह्मणत्व को प्राप्त करोगे। राजकुमार! तुम नाना प्रकार के सुख भोगकर अन्त में गौ और ब्राह्मणों की रक्षा के लिये सङ्ग्रामभूमि में अपने प्राणों की आहुति दोगे। तदनन्तर ब्राह्मण रूप में पर्याप्त दक्षिणा वाले यज्ञों का अनुष्ठान करके स्वर्ग सुख का उपभोग करोगे। तत्पश्चात् अविनाशी ब्रह्म स्वरूप होकर अक्षय आनन्द का अनुभव करोगे।' \भीष्मजी कहते हैं—वह पूर्व भूतपूर्व कीट महर्षि वेदव्यास के वचन सुनकर धर्म के अनुसार प्रजा का पालन करने लगा और बड़ी भारी तपस्या करने लगा। जब धर्म और अर्थ के तत्त्व को जानने वाले उस राजकुमार की उग्र तपस्या देखकर विप्रवर श्रीकृष्ण द्वैपायन व्यासजी उसके पास आए, तब व्यासजी ने कहा—'पूर्व जन्म के कीट! प्राणियों की रक्षा करना देवताओं का व्रत है और यही क्षात्रधर्म है। इसका चिन्तन और पालन करके तुम अगले जन्म में ब्राह्मण हो जाओगे। शुभ और अशुभ का ज्ञान प्राप्त करो तथा अपने मन और इन्द्रियों को वश में करके भली-भाँति प्रजा का पालन करो। उत्तम भोगों का दान करते हुए अशुभ दोषों का मार्जन करके, प्रजा को पावन बनाकर आत्मज्ञानी एवं सुप्रसन्न हो जाओ तथा सदा स्वधर्म के आचरण में तत्पर रहो। तदनन्तर क्षत्रिय शरीर का त्याग करके ब्राह्मणत्व को प्राप्त करोगे।' \वह पूर्व भूतपूर्व कीट महर्षि वेदव्यास का वचन सुनकर धर्म के अनुसार प्रजा का पालन करने लगा। तत्पश्चात् वह पुनः वन में जाकर थोड़े ही समय में परलोकवासी हो गया और प्रजापालनरूप धर्म के प्रभाव से ब्राह्मण कुल में जन्म पा गया। उसे ब्राह्मण हुआ जानकर महायशस्वी महाज्ञानी श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास पुनः उसके पास आए। व्यासजी ने कहा—'ब्राह्मण शिरोमणे! अब तुम्हें किसी प्रकार व्यथित नहीं होना चाहिये। उत्तम कर्म करने वाला उत्तम योनियों में और पाप करने वाला पाप-योनियों में जन्म लेता है। धर्मज्ञ! मनुष्य जैसा पाप करता है, उसके अनुसार ही उसे फल भोगना पड़ता है। अतः भूतपूर्व कीट! अब तुम मृत्यु के भय से किसी प्रकार व्यथित न होओ। हाँ, तुम्हें धर्म के लोप का भय अवश्य होना चाहिये, इसलिये उत्तम धर्म का आचरण करते रहो।' \तब उस ब्राह्मण ने कहा—'भगवन्! आपके ही प्रयत्न से मैं अधिकाधिक सुख की अवस्था को प्राप्त होता गया हूँ। अब इस जन्म में धर्ममूलक सम्पत्ति पाकर मेरा सारा पाप नष्ट हो गया।' भीष्मजी कहते हैं—राजन्! भगवान् व्यास के कथनानुसार उस भूतपूर्व कीट ने दुर्लभ ब्राह्मणत्व को पाकर पृथ्वी को सैकड़ों यज्ञयूपों से अङ्कित कर दिया। तदनन्तर ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ होकर उसने ब्रह्मसालोक्य प्राप्त किया, अर्थात् ब्रह्मलोक में जाकर सनातन ब्रह्म को प्राप्त किया। क्योंकि उस कीटने ने क्षत्रिय योनि में युद्ध करके प्राण त्याग दिये थे, इसलिये उसे उत्तम गति प्राप्त हुई। इसी प्रकार जो प्रधान क्षत्रिय अपनी शक्ति का परिचय देते हुए रणभूमि में मारे गये हैं, वे भी पुण्यमयी गति को प्राप्त हुए हैं; अतः उसके लिये तुम शोक न करो।'
In English
Bhishma and the Story of the Insect
Yudhisthira asks Bhishma why living beings fear death. Bhishma tells a story about Vyasa and an insect that was reborn through many stages, eventually becoming a Kshatriya prince due to Vyasa's grace.
This page answers
- Why did yudhisthira ask bhishma about death?
- What happened to the insect in vyasa's story?
- How did the insect become a kshatriya?
- Why was the insect afraid of the bullock cart?
Also written: Kitopakhyana, Kita, Yudhishthira, Bhishma, Vyasa, कीटोपाख्यान