श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1021–1030

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1021–1030

पृष्ठ 1021

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अहिंसा परम यज्ञ है, अहिंसा परम फल है, अहिंसा परम मित्र है और अहिंसा परम सुख है ॥ २ ९ ॥

सर्वयज्ञेषु वा दानं सर्वतीर्थेषु वाऽऽप्लुतम् ।

सर्वदानफलं वापि नैतत्तुल्यमहिंसया ॥ ३० ॥

सम्पूर्ण यज्ञोंमें जो दान किया-जाता है, समस्त तीर्थोंमें जो गोता लगाया जाता है तथासम्पूर्ण दानोंका जो फल यह सब मिलकर भी अहिंसाके बराबर नहीं हो सकता ॥ ३० ||

अहिंस्रस्य तपोऽक्षय्यमहिंस्रो यजते सदा ।

अहिंस्रः सर्वभूतानां यथा माता यथा पिता ॥ ३१ ॥

जो हिंसा नहीं करता, उसकी तपस्या अक्षय होती है । वह सदा यज्ञ करनेका फल पाता है । हिंसा न करनेवाला मनुष्य सम्पूर्ण प्राणियोंके माता-पिताके समान है ॥ ३१ ॥

एतत् फलमहिंसाया भूयश्च कुरुपुंगव ।

न हि शक्या गुणा वक्तुमपि वर्षशतैरपि ॥ ३२ ॥

कुरुश्रेष्ठ! यह अहिंसाका फल है । यही क्या, अहिंसाका तो इससे भी अधिक फल है ।

अहिंसासे होनेवाले लाभोंका सौ वर्षोंमें भी वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ ३२ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि अहिंसाफलकथने षोडशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्म पर्वमें अहिंसाके फलका वर्णनविषयक एक सौ सोलहवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ११६ ॥

पृष्ठ 1022

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सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः शुभ कर्मसे एक कीड़ेको पूर्व जन्मकी स्मृति होना और कीट - योनिमें भी मृत्युका भय एवं सुखकी अनुभूति बताकर कीड़ेका अपने कल्याणका उपाय पूछना युधिष्ठिर उवाच

अकामाश्च सकामाश्च ये हताः स्म महामृधे ।

कां गतिं प्रतिपन्नास्ते तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने पूछा- पितामह! जो योद्धा महासमरमें इच्छा या अनिच्छासे मारे गये हैं, वे किस गतिको प्राप्त हुए है? यह मुझे बताइये ॥ १ ॥

दुःखं प्राणपरित्यागः पुरुषाणां महामृधे ।

जानासि त्वं महाप्राज्ञ प्राणत्यागं सुदुष्करम् ॥ २ ॥

महाप्राज्ञ! आप तो जानते ही हैं कि महा संग्राममें मनुष्योंके लिये प्राणोंका परित्याग

करना कितना दुःखदायक होता है । प्राणोंका त्याग करना अत्यन्त दुष्कर कार्य है ॥ २ ॥

समृद्धौ वासमृद्धौ वा शुभे वा यदि वाशुभे ।

कारणं तत्र मे ब्रूहि सर्वज्ञो ह्यसि मे मतः ॥ ३ ॥

प्राणी उन्नति या अवनति, शुभ या अशुभ किसी भी अवस्थामें मरना नहीं चाहते हैं ।

इसका क्या कारण है? यह मुझे बताइये; क्योंकि मेरी दृष्टिमें आप सर्वज्ञ हैं ॥ ३ ॥

भीष्म उवाच

समृद्धौ वासमृद्धौ वा शुभे वा यदि वाशुभे ।

संसारेऽस्मिन् समायाताः प्राणिनः पृथिवीपते ॥ ४ ॥

निरता येन भावेन तत्र मे शृणु कारणम् ।

सम्यक् चायमनुप्रश्नस्त्वयोक्तस्तु युधिष्ठिर ॥ ५ ॥

भीष्मजीने कहा – पृथ्वीनाथ! इस संसारमें आये हुए प्राणी उन्नतिमें या अवनतिमें तथा शुभ या अशुभ अवस्थामें ही सुख मानते हैं । मरना नहीं चाहते । इसका क्या कारण है, यह बताता हूँ, सुनो । युधिष्ठिर! यह तुमने बहुत अच्छा प्रश्न उपस्थित किया है ॥ ४-५ ॥

अत्र ते वर्तयिष्यामि पुरावृत्तमिदं नृप ।

द्वैपायनस्य संवादं कीटस्य च युधिष्ठिर ॥ ६ ॥

नरेश्वर! युधिष्ठिर! इस विषयमें द्वैपायन व्यास और एक कीड़ेका संवादरूप जो यह प्राचीन वृत्तान्त प्रसिद्ध है, वही तुम्हें बता रहा हूँ ॥ ६ ॥

ब्रह्मभूतश्चरन् विप्रः कृष्णद्वैपायनः पुरा ।

पृष्ठ 1023

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ददर्श कीटं धावन्तं शीघ्रं शकटवर्त्मनि ॥ ७ ॥

पहलेकी बात है, ब्रह्मस्वरूप श्रीकृष्णद्वैपायन विप्रवर व्यासजी कहीं जा रहे थे । उन्होंने एक कीड़ेको गाड़ीकी लीकसे बड़ी तेजीके साथ भागते देखा ॥ ७ ॥

गतिज्ञः सर्वभूतानां भाषाज्ञश्च शरीरिणाम् ।

सर्वज्ञः स तदा दृष्ट्वा कीटं वचनमब्रवीत् ॥ ८ ॥

सर्वज्ञ व्यासजी सम्पूर्ण प्राणियोंकी गतिके ज्ञाता तथा सभी देहधारियोंकी भाषाको समझनेवाले हैं । उन्होंने उस कीड़ेको देखकर उससे इस प्रकारकी बातचीत की ॥ व्यास उवाच

कीट संत्रस्तरूपोऽसि त्वरितश्चैव लक्ष्यसे ।

क्व धावसि तदाचक्ष्व कुतस्ते भयमागतम् ॥ ९ ॥

व्यासजीने पूछा — कीट! आज तुम बहुत डरे हुए और उतावले दिखायी दे रहे हो, बताओ तो सही — कहाँ भागे जा रहे हो? कहाँसे तुम्हें भय प्राप्त हुआ है? ॥ ९ ॥

कीटउवाच

शकटस्यास्य महतो घोषं श्रुत्वा भयं मम ।

आगतं वै महाबुद्धे स्वन एष हि दारुणः ॥ १० ॥

कीड़ेने कहा – महामते! यह जो बहुत बड़ी बैलगाड़ी आ रही है, इसीकी घर्घराहट सुनकर मुझे भय हो गया है; क्योंकि उसकी यह आवाज बड़ी भयंकर है ॥

श्रूयते न च मां हन्यादिति ह्यस्मादपक्रमे ।

श्वसतां च शृणोम्येनं गोपुत्राणां प्रतोद्यताम् ॥ ११ ॥

वहतां सुमहाभारं संनिकर्षे स्वनं प्रभो ।

नृणां च संवाहयतां श्रूयते विविधः स्वनः ॥ १२ ॥

यह आवाज जब कानोंमें पड़ती है, तब यह संदेह होता है कि कहीं गाड़ी आकर मुझे कुचल न डाले । इसीलिये यहाँसे जल्दी -जल्दी भाग रहा हूँ । यह देखिये बैलोंपर चाबुककी मार पड़ रही है और वे बहुत भारी बोझ लिये हाँफते हुए इधर आ रहे हैं । प्रभो! मुझे उनकी आवाज बहुत निकट सुनायी पड़ती है । गाड़ीपर बैठे हुए मनुष्योंके भी नाना प्रकारके शब्द कानोंमें पड़ रहे हैं ॥ ११-१२ ॥

श्रोतुमस्मद्विधेनैष न शक्यः कीटयोनिना ।

तस्मादतिक्रमाम्येष भयादस्मात् सुदारुणात् ॥ १३ ॥

मेरे- जैसे कीड़ेके लिये इस भयंकर शब्दको धैर्यपूर्वक सुन सकना असम्भव है । अतः इस अत्यन्त दारुण भयसे अपनी रक्षा करनेके लिये मैं यहाँसे भाग रहा हूँ ॥ १३ ॥

दुःखं हि मृत्युर्भूतानां जीवितं च सुदुर्लभम् ।

अतो भीतः पलायामि गच्छेयं ना सुखं सुखात् ॥ १४ ॥

पृष्ठ 1024

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प्राणियोंके लिये मृत्यु बड़ी दुःखदायिनी होती है । अपना जीवन सबको अत्यन्त दुर्लभ जान पड़ता है । अतः डरकर भागा जा रहा हूँ। कहीं ऐसा न हो कि मैं सुखसे दुःखमें पड़ जाऊँ ॥ १४ ॥

भीष्म उवाच

इत्युक्तः स तु तं प्राह कुतः कीट सुखं तव ।

मरणं ते सुखं मन्ये तिर्यग्योनौ तु वर्तसे ॥ १५ ॥

भीष्मजी कहते हैं - राजन्! कीड़ेके ऐसा कहनेपर व्यासजीने उससे पूछा — ‘ कीट! तुम्हे सुख कहाँ है? ' मेरी समझमें तो तुम्हारा मर जाना ही तुम्हारे लिये सुखकी बात है; क्योंकि तुम तिर्यक् योनि- अधम कीट- योनिमें पड़े हो ॥

शब्दं स्पर्शं रसं गन्धं भोगांश्चोच्चावचान् बहून् ।

नाभिजानासि कीट त्वं श्रेयो मरणमेव ते ॥ १६ ॥

‘ कीट! तुम्हें शब्द, स्पर्श, रस, गन्ध तथा बहुत -से छोटे -बड़े भोगोंका अनुभव नहीं होता है । अतः तुम्हारा तो मर जाना ही अच्छा है ' ॥ १६ ॥

कीटउवाच

सर्वत्र निरतो जीव इतश्चापि सुखं मम ।

चिन्तयामि महाप्राज्ञ तस्मादिच्छामि जीवितुम् ॥ १७ ॥

कीड़ेने कहा - महाप्राज्ञ! जीव सभी योनियोंमें सुखका अनुभव करते हैं । मुझे भी इस योनिमें सुख मिलता है और यही सोचकर जीवित रहना चाहता हूँ ॥

इहापि विषयः सर्वो यथादेहं प्रवर्तितः ।

मानुषाः स्थैर्यजाश्चैव पृथग्भोगा विशेषतः ॥ १८ ॥

यहाँ भी इस शरीरके अनुसार सारे विषय उपलब्ध होते हैं । मनुष्यों और स्थावर प्राणियोंके भोग अलग - अलग हैं ॥ १८ ॥

अहमासं मनुष्यो वै शूद्रो बहुधनः प्रभो ।

अब्रह्मण्यो नृशंसश्च कदर्यो वृद्धिजीवनः ॥ १ ९ ॥

प्रभो! पहले जन्ममें मैं एक मनुष्य, उसमें भी बहुत धनी शूद्र हुआ था । ब्राह्मणोंके प्रति

मेरे मनमें आदरका भाव न था । मैं कंजूस, क्रूर और व्याजखोर था ॥ १ ९ ॥

वाक्तीक्ष्णो निकृतिप्रज्ञो द्वेष्टा विश्वस्य सर्वशः ।

मिथ्याकृतोऽपि विधिना परस्वहरणे रतः ॥ २० ॥

सबसे तीखे वचन बोलना, बुद्धिमानीके साथ लोगोंको ठगना और संसारके सभी लोगोंसे द्वेष रखना, यह मेरा स्वभाव हो गया था । झूठ बोलकर लोगोंको धोखा देना और दूसरोंके मालको हड़प लेनेमें संलग्न रहना - यही मेरा काम था ॥ २० ॥

भृत्यातिथिजनश्चापि गृहे पर्यशितो मया ।

पृष्ठ 1025

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मात्सर्यात् स्वादुकामेन नृशंसेन बुभुक्षता ॥ २१ ॥

मैं इतना निर्दयी था कि केवल स्वाद लेनेकी कामनासे अकेला ही भोजनकी इच्छा रखता और ईर्ष्यावश घरपर आये हुए अतिथियों और आश्रितजनोंको भोजन कराये बिना ही भोजन कर लेता था ॥ २१ ॥

देवार्थं पितृयज्ञार्थमन्नं श्रद्धाऽऽहृतं मया ।

न दत्तमर्थकामेन देयमन्नं पुरा किल ॥ २२ ॥

पूर्वजन्ममें मैं देवताओं और पितरोंके यजनके लिये श्रद्धापूर्वक अन्न एकत्र करता; परंतु धन- संग्रहकी कामनासे उस देनेयोग्य अन्नका भी दान नहीं करता था ॥ २२ ॥

गुप्तं शरणमाश्रित्य भयेषु शरणागताः ।

अकस्मात् ते मया त्यक्ता न त्राता अभयैषिणः ॥ २३ ॥

भयके समय अभय पानेकी इच्छासे कितने ही शरणार्थी मेरे पास आते, किन्तु मैं उन्हें शरण लेनेयोग्य सुरक्षित स्थानमें पहुँचाकर भी अकस्मात् वहाँसे निकाल देता । उनकी रक्षा नहीं करता था ॥ २३ ॥

धनं धान्यं प्रियान् दारान् यानं वासस्तथाद्भुतम् ।

श्रियं दृष्ट्वा मनुष्याणामसूयामि निरर्थकम् ॥ २४ ॥

दूसरे मनुष्योंके पास धन- धान्य, सुन्दरी स्त्री, अच्छी - अच्छी सवारियाँ, अद्भुत वस्त्र और उत्तम लक्ष्मी देखकर मैं अकारण ही उनसे कुढ़ता रहता था ॥ २४ ॥

ईर्ष्याः परसुखं दृष्ट्वा अन्यस्य न बुभूषकः ।

त्रिवर्गहन्ता चान्येषामात्मकामानुवर्तकः ॥ २५ ॥

दूसरोंका सुख देखकर मुझे ईर्ष्या होती थी, दूसरे किसीकी उन्नति हो यह मैं नहीं चाहता था, औरोंके धर्म, अर्थ और काममें बाधा डालता और अपनी ही इच्छाका अनुसरण करता था ॥ २५ ॥

नृशंसगुणभूयिष्ठं पुरा कर्म कृतं मया ।

स्मृत्वा तदनुतप्येऽहं हित्वा प्रियमिवात्मजम् ॥ २६ ॥

पूर्वजन्ममें प्रायः मैंने वे ही कर्म किये हैं, जिनमें निर्दयता अधिक थी । उनकी याद आनेसे मुझे उसी तरह पश्चात्ताप होता है, जैसे कोई अपने प्यारे पुत्रको त्यागकर पछताता है ॥ २६ ॥

शुभानां नाभिजानामि कृतानां कर्मणां फलम् ।

माता च पूजिता वृद्धा ब्राह्मणश्चार्चितो मया ॥ २७ ॥

सकृज्जातिगुणोपेतः संगत्या गृहमागतः ।

अतिथिः पूजितो ब्रह्मंस्तेन मां नाजहात् स्मृतिः ॥ २८ ॥

मुझे पहलेके अपने किये हुए शुभकर्मोंके फलका अबतक अनुभव नहीं हुआ है । पूर्वजन्ममें मैंने केवल अपनी बूढ़ी माताकी सेवा की थी तथा एक दिन किसीके साथ हो

पृष्ठ 1026

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जानेसे अपने घरपर आये हुए ब्राह्मण अतिथिका जो अपने जातीय गुणोंसे सम्पन्न थे, स्वागत - सत्कार किया था । ब्रह्मन्! उसी पुण्यके प्रभावसे मुझे आजतक पूर्वजन्मकी स्मृति छोड़ न सकी है ॥ २७-२८ ॥

कर्मणा पुनरेवाहं सुखमागामि लक्षये ।

तच्छ्रोतुमहमिच्छामि त्वत्तः श्रेयस्तपोधन ॥ २ ९ ॥

तपोधन! अब मैं पुनः किसी शुभकर्मके द्वारा भविष्यमें सुख पानेकी आशा रखता हूँ ।

वह कल्याणकारी कर्म क्या है, इसे मैं आपके मुखसे सुनना चाहता हूँ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि कीटोपाख्याने सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें कीटका उपाख्यानविषयक एक सौ सत्रहवाँअध्याय पूराहुआ ॥ ११७ ॥

पृष्ठ 1027

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अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः कीड़ेका क्रमशः क्षत्रिययोनिमें जन्म लेकर व्यासजीका दर्शन करना और व्यासजीका उसे ब्राह्मण होने तथा स्वर्गसुख और अक्षय सुखकी प्राप्ति होनेका वरदान देना व्यासउवाच

शुभेन कर्मणा यद्वै तिर्यग्योनौ न मुह्यसे ।

ममैव कीट तत् कर्म येन त्वं न प्रमुह्यसे ॥ १ ॥

व्यासजीने कहा — कीट! तुम जिस शुभकर्मके प्रभावसे तिर्यग् योनिमें जन्म लेकर भी मोहित नहीं हुए हो, वह मेरा ही कर्म है । मेरे दर्शनके प्रभावसे ही तुम्हें मोह नहीं हो रहा है ॥ १ ॥

अहं त्वां दर्शनादेव तारयामि तपोबलात् ।

तपोबलाद्धि बलवद् बलमन्यन्न विद्यते ॥ २ ॥

मैं अपने तपोबलसे केवल दर्शनमात्र देकर तुम्हारा उद्धार कर दूँगा; क्योंकि तपोबलसे बढ़कर दूसरा कोई श्रेष्ठ बल नहीं है ॥ २ ॥

जानामि पापैः स्वकृतैर्गतं त्वां कीट कीटताम् ।

अवाप्स्यसि पुनर्धर्मं धर्मं तु यदि मन्यसे ॥ ३ ॥

कीट! मैं जानता हूँ, अपने पूर्वकृत पापोंके कारण तुम्हें कीटयोनिमें आना पड़ा है । यदि इस समय तुम्हारी धर्मके प्रति श्रद्धा है तो तुम्हें धर्म अवश्य प्राप्त होगा ॥

कर्म भूमिकृतं देवा भुञ्जते तिर्यगाश्च ये ।

धर्मोऽपि हि मनुष्येषु कामार्थश्च तथा गुणाः ॥ ४ ॥

देवता, मनुष्य और तिर्यग् योनिमें पड़े हुए प्राणी कर्मभूमिमें किये हुए कर्मोंका ही फल भोगते हैं । अज्ञानी मनुष्यका धर्म भी कामनाको लेकर ही होता है तथा वे कामनाकी सिद्धिके लिये ही गुणोंको अपनाते हैं ॥ ४ ॥

वाग्बुद्धिपाणिपादैश्च व्यपेतस्य विपश्चितः ।

किं हास्यति मनुष्यस्य मन्दस्यापि हि जीवतः ॥ ५ ॥

मनुष्य मूर्ख हो या विद्वान्, यदि वह वाणी, बुद्धि और हाथ - पैरसे रहित होकर जीवित है तो उसे कौन - सी वस्तु त्यागेगी, वह तो सभी पुरुषार्थोंसे स्वयं ही परित्यक्त है ॥

जीवन् हि कुरुते पूजां विप्राग्रयः शशिसूर्ययोः ।

ब्रुवन्नपि कथां पुण्यां तत्र कीट त्वमेष्यसि ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1028

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कीट! एक जगह एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहते हैं । वे जीवनमें सदा सूर्य और चन्द्रमाकी पूजा किया करते हैं तथा लोगोंको पवित्र कथाएँ सुनाया करते हैं । उन्हींके यहाँ तुम (क्रमशः ) पुत्ररूपसे जन्म लोगे ॥ ६ ॥

गुणभूतानि भूतानि तत्र त्वमुपभोक्ष्यसे ।

तत्र तेऽहं विनेष्यामि ब्रह्म त्वं यत्र वैष्यसि ॥ ७ ॥

वहाँ विषयोंको पंचभूतोंका विकार मानकर अनासक्तभावसे उपभोग करोगे । उस समय मैं तुम्हारे पास आकर ब्रह्मविद्याका उपदेश करूँगा तथा तुम जिस लोकमें जाना चाहोगे, वहीं तुम्हें पहुँचा दूँगा ॥ ७ ॥

स तथेति प्रतिश्रुत्य कीटो वर्त्मन्यतिष्ठत ।

शकटो व्रजंश्च सुमहानागतश्च यदृच्छया ॥ ८ ॥

चक्राक्रमेण भिन्नश्च कीटः प्राणान् मुमोच ह । व्यासजीके इस प्रकार कहनेपर उस कीड़ेने बहुत अच्छा कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली और बीच रास्तेमें जाकर वह ठहर गया । इतनेहीमें वह विशाल छकड़ा अकस्मात् वहाँ आ पहुँचा और उसके पहियेसे दबकर चूर- चूर हो कीड़ेने प्राण त्याग दिये ॥ ८३ ॥

सम्भूतः क्षत्रियकुले प्रसादादमितौजसः ॥ ९ ॥

तमृषिं द्रष्टुमगमत् सर्वास्वन्यासु योनिषु ।

श्वाविद्गोधावराहाणां तथैव मृगपक्षिणाम् ॥ १० ॥

श्वपाकशूद्रवैश्यानां क्षत्रियाणां च योनिषु । तत्पश्चात् वह क्रमशः शाही, गोधा, सूअर, मृग, पक्षी, चाण्डाल, शूद्र और वैश्यकी योनिमें जन्म लेता हुआ क्षत्रिय -जातिमें उत्पन्न हुआ । अन्य सारी योनियोंमें भ्रमण करनेके बाद अमित तेजस्वी व्यासजीकी कृपासे क्षत्रियकुलमें उत्पन्न होकर वह उन महर्षिका दर्शन करनेके लिये उनके पास गया ॥ ९ -१०३ ॥

स कीट एवमाभाष्य ऋषिणा सत्यवादिना ।

प्रतिस्मृत्याथ जग्राह पादौ मूर्ध्नि कृताञ्जलिः ॥ ११ ॥

वह कीट- योनिमें उन सत्यवादी महर्षि वेदव्यासजीके साथ बातचीत करके जो इस प्रकार उन्नतिशील हुआ था, उसकी याद करके उस क्षत्रियने हाथ जोड़कर ऋषिके चरणोंमें अपना मस्तक रख दिया ॥ ११ ॥

कीटउवाच

इदं तदतुलं स्थानमीप्सितं दशभिर्गुणैः ।

यदहं प्राप्य कीटत्वमागतो राजपुत्रताम् ॥ १२ ॥

कीट ( क्षत्रिय ) ने कहा - भगवन्! आज मुझे वह स्थान मिला है, जिसकी कहीं तुलना नहीं है । इसे मैं दस जन्मोंसे पाना चाहता था । यह आपहीकी कृपा है कि मैं अपने दोषसे

पृष्ठ 1029

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कीड़ा होकर भी आज राजकुमार हो गया हूँ ॥ १२ ॥

वहन्ति मामतिबलाः कुञ्जरा हेममालिनः ।

स्यन्दनेषु च काम्बोजा युक्ताः परमवाजिनः ॥ १३ ॥

अब सोनेकी मालाओंसे सुशोभित अत्यन्त बलवान् गजराज मेरी सवारीमें रहते हैं ।

उत्तम जातिके काबुली घोड़े मेरे रथोंमें जोते जाते हैं ॥ १३ ॥

उष्ट्राश्वतरयुक्तानि यानानि च वहन्ति माम् ।

सबान्धवः सहामात्यश्चाश्नामि पिशितौदनम् ॥ १४ ॥

ऊँटों और खच्चरोंसे जुती हुई गाड़ियाँ मुझे ढोती हैं । मैं भाई- बन्धुओं और मन्त्रियोंके साथ मांस - भात खाता हूँ ॥ १४ ॥

गृहेषु स्वनिवासेषु सुखेषु शयनेषु च ।

वरार्हेषु महाभाग स्वपामि च सुपूजितः ॥ १५ ॥

महाभाग! श्रेष्ठ पुरुषोंमें रहने योग्य अपने निवासभूत सुन्दर महलोंके भीतर सुखद शय्याओंपर मैं बड़े सम्मानके साथ शयन करता हूँ ॥ १५ ॥

सर्वेष्वपररात्रेषु सूमागधबन्दिनः ।

स्तुवन्ति मां यथा देवा महेन्द्रं प्रियवादिनः ॥ १६ ॥

प्रतिदिन रातके पिछले पहरोंमें सूत, मागध और वन्दीजन मेरी स्तुति करते हैं, ठीक वैसे ही जैसे देवता प्रिय वचन बोलकर महेन्द्रके गुण गाते हैं ॥ १६ ॥

प्रसादात् सत्यसंधस्य भवतोऽमिततेजसः ।

यदहं कीटतां प्राप्य सम्प्राप्तो राजपुत्रताम् ॥ १७ ॥

आप सत्यप्रतिज्ञ हैं, अमित तेजस्वी हैं, आपके प्रसादसे ही आज मैं कीड़ेसे राजपूत हो गया हूँ ॥ १७ ॥

नमस्तेऽस्तु महाप्राज्ञ किं करोमि प्रशाधि माम् ।

त्वत्तपोबलनिर्दिष्टमिदं ह्यधिगतं मया ॥ १८ ॥

महाप्राज्ञ! आपको नमस्कार है, मुझे आज्ञा दीजिये, मैं आपकी क्या सेवा करूँ; आपके तपोबलसे ही मुझे राजपद प्राप्त हुआ है ॥ १८ ॥

व्यास उवाच

अर्चितोऽहं त्वया राजन् वाग्भिरद्य यदृच्छया ।

अद्य ते कीटतां प्राप्य स्मृतिर्जाता जुगुप्सिता ॥ १ ९ ॥

व्यासजीने कहा — राजन्! आज तुमने अपनी वाणीसे मेरा भलीभाँति स्तवन किया है । अभीतक तुम्हें अपनी कीट - योनिकी घृणित स्मृति अर्थात् मांस खानेकी वृत्ति बनी हुई है ॥ १ ९ ॥ न तु नाशोऽस्ति पापस्य यस्त्वयोपचितः पुरा ।

पृष्ठ 1030

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शूद्रेणार्थप्रधानेन नृशंसेनाततायिना ॥ २० ॥

तुमने पूर्वजन्ममें अर्थपरायण, नृशंस और आततायी शूद्र होकर जो पाप संचय किया था, उसका सर्वदा नाश नहीं हुआ है ॥ २० ॥

मम ते दर्शनं प्राप्तं तच्च वै सुकृतं त्वया ।

तिर्यग्योनौ स्म जातेन मम चाभ्यर्चनात् तथा ॥ २१ ॥

इतस्तवं राजपुत्रत्वाद् ब्राह्मण्यं समवाप्स्यसि । कीट- योनिमें जन्म लेकर भी जो तुमने मेरा दर्शन किया, उसी पुण्यका यह फल है कि तुम राजपूत हुए और आज जो तुमने मेरी पूजा की, इसके फलस्वरूप तुम इस क्षत्रिय-योनिके पश्चात् ब्राह्मणत्वको प्राप्त करोगे ॥ गोब्राह्मणकृते प्राणान् हुत्वाऽऽत्मानं रणाजिरे ॥ २२ ॥

राजपुत्र सुखं प्राप्य क्रतूंश्चैवाप्तदक्षिणान् ।

अथ मोदिष्यसे स्वर्गे ब्रह्मभूतोऽव्ययः सुखी ॥ २३ ॥

राजकुमार! तुम नाना प्रकारके सुख भोगकर अन्तमें गौ और ब्राह्मणोंकी रक्षाके लिये संग्रामभूमिमें अपने प्राणोंकी आहुति दोगे । तदनन्तर ब्राह्मणरूपमें पर्याप्त दक्षिणावाले यज्ञोंका अनुष्ठान करके स्वर्गसुखका उपभोग करोगे । तत्पश्चात् अविनाशी ब्रह्मस्वरूप होकर अक्षय आनन्दका अनुभव करोगे ॥ २२-२३ ॥ तिर्यग्योन्याः शूद्रतामभ्युपैति शूद्रो वैश्यं क्षत्रियत्वं च वैश्यः । वृत्तश्लाघी क्षत्रियो ब्राह्मणत्वं स्वर्गं पुण्यं ब्राह्मणः साधुवृत्तः ॥ २४ ॥

तिर्यग्- योनिमें पड़ा हुआ जीव जब ऊपरकी ओर उठता है, तब वहाँसे पहले शूद्र-भावको प्राप्त होता है । शूद्र वैश्ययोनिको, वैश्य क्षत्रिययोनिको और सदाचारसे सुशोभित क्षत्रिय ब्राह्मणयोनिको प्राप्त होता है । फिर सदाचारी ब्राह्मण पुण्यमय स्वर्गलोकको जाता है ॥ २४ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि कीटोपाख्याने अष्टादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें कीड़ेका उपाख्यानविषयक एक सौ अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११८ ॥