श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1031–1040
महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1031–1040
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एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः कीड़ेका ब्राह्मणयोनिमें जन्म लेकर ब्रह्मलोकमें जाकर सनातनब्रह्मको प्राप्त करना भीष्म उवाच
क्षत्रधर्ममनुप्राप्तः स्मरन्नेव च वीर्यवान् ।
त्यक्त्वा स कीटतां राजंश्चचार विपुलं तपः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजा युधिष्ठिर! इस प्रकार कीटयोनिका त्याग करके अपने पूर्वजन्मका स्मरण करनेवाला वह जीव अब क्षत्रिय धर्मको प्राप्त हो विशेष शक्तिशाली हो गया और बड़ी भारी तपस्या करने लगा ॥ १ ॥
तस्य धर्मार्थविदुषो दृष्ट्वा तद् विपुलं तपः ।
आजगाम द्विजश्रेष्ठः कृष्णद्वैपायनस्तदा ॥ २ ॥
तब धर्म और अर्थके तत्त्वको जाननेवाले उस राजकुमारकी उग्र तपस्या देखकर विप्रवर श्रीकृष्ण द्वैपायन व्यासजी उसके पास आये ॥ २ ॥
व्यासउवाच
क्षात्रं देवव्रतं कीट भूतानां परिपालनम् ।
क्षात्रं देवव्रतं ध्यायंस्ततो विप्रत्वमेष्यसि ॥ ३ ॥
व्यासजीने कहा — पूर्वजन्मके कीट! प्राणियोंकी रक्षा करना देवताओंका व्रत है और यही क्षात्रधर्म है । इसका चिंतन और पालन करके तुम अगले जन्ममें ब्राह्मण हो जाओगे ॥ ३ ॥
पाहि सर्वाः प्रजाः सम्यक् शुभाशुभविदात्मवान् ।
शुभैः संविभजन् कामैरशुभानां च पावनैः ॥ ४ ॥
आत्मवान् भव सुप्रीतः स्वधर्माचरणे रतः ।
क्षात्रीं तनुं समुत्सृज्य ततो विप्रत्वमेष्यसि ॥ ५ ॥
तुम शुभ और अशुभका ज्ञान प्राप्त करो तथा अपने मन और इन्द्रियोंको वशमें करके भलीभाँति प्रजाका पालन करो । उत्तम भोगोंका दान करते हुए अशुभ दोषोंका मार्जन करके प्रजाको पावन बनाकर आत्मज्ञानी एवं सुप्रसन्न हो जाओ तथा सदा स्वधर्मके आचरणमें तत्पर रहो । तदनन्तर क्षत्रिय- शरीरका त्याग करके ब्राह्मणत्वको प्राप्त करोगे ॥ ४-५ ॥ भीष्म उवाच सोऽप्यरण्यमनुप्राप्य पुनरेव युधिष्ठिर ।
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महर्षेर्वचनं श्रुत्वा प्रजा धर्मेण पाल्य च ॥ ६ ॥
अचिरेणैव कालेन कीटः पार्थिवसत्तम ।
प्रजापालनधर्मेण प्रेत्य विप्रत्वमागतः ॥ ७ ॥
भीष्मजी कहते हैं- नृपश्रेष्ठ युधिष्ठिर! वह भूतपूर्व कीट महर्षि वेदव्यासका वचन सुनकर धर्मके अनुसार प्रजाका पालन करने लगा । तत्पश्चात् वह पुनः वनमें जाकर थोड़े ही समयमें परलोकवासी हो प्रजापालनरूप धर्मके प्रभावसे ब्राह्मण- कुलमें जन्म पा गया ॥ ६-७ ॥
ततस्तं ब्राह्मणं दृष्ट्वा पुनरेव महायशाः ।
आजगाम महाप्राज्ञः कृष्णद्वैपायनस्तदा ॥ ८ ॥
उसे ब्राह्मण हुआ जान महायशस्वी महाज्ञानी श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास पुनः उसके पास आये ॥ ८ ॥
व्यास उवाच
भो भो ब्रह्मर्षभ श्रीमन् मा व्यथिष्ठाः कथंचन ।
शुभकृच्छुभयोनीषु पापकृत् पापयोनिषु ॥ ९ ॥
व्यासजीने कहा –ब्राह्मणशिरोमणे! अब तुम्हें किसी प्रकार व्यथित नहीं होना चाहिये । उत्तम कर्म करनेवाला उत्तम योनियोंमें और पाप करनेवाला पाप- योनियोंमें जन्म लेता है ॥ ९ ॥
उपपद्यति धर्मज्ञ यथापापफलोपगम् ।
तस्मान्मृत्युभयात् कीट मा व्यथिष्ठाः कथंचन ॥ १० ॥
धर्मलोपभयं ते स्यात् तस्माद् धर्मं चरोत्तमम् । धर्मज्ञ! मनुष्य जैसा पाप करता है, उसके अनुसार ही उसे फल भोगना पड़ता है । अतः भूतपूर्व कीट! अब तुम मृत्युके भयसे किसी प्रकार व्यथित न होओ । हाँ, तुम्हें धर्मके लोपका भय अवश्य होना चाहिये, इसलिये उत्तम धर्मका आचरण करते रहो ॥ १०३ ॥
कीटउवाच सुखात् सुखतरं प्राप्तो भगवंस्त्वत्कृते ह्यहम् ॥ ११ ॥
धर्ममूलां श्रियं प्राप्य पाप्मा नष्ट इहाद्य मे । भूतपूर्व कीटने कहा- भगवन्! आपके ही प्रयत्नसे मैं अधिकाधिक सुखकी अवस्थाको प्राप्त होता गया हूँ। अब इस जन्ममें धर्ममूलक सम्पत्ति पाकर मेरा सारा पाप नष्ट हो गया ॥ ११३ ॥
भीष्म उवाच भगवद्वचनात् कीटो ब्राह्मण्यं प्राप्य दुर्लभम् ॥ १२ ॥
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अकरोत् पृथिवीं राजन् यज्ञयूपशताङ्किताम् ।
ततः सालोक्यमगमद् ब्रह्मणो ब्रह्मवित्तमः ॥ १३ ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! भगवान् व्यासके कथनानुसार उस भूतपूर्व कीटने दुर्लभ ब्राह्मणत्वको पाकर पृथ्वीको सैकड़ों यज्ञयूपोंसे अंकित कर दिया । तदनन्तर ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ होकर उसने ब्रह्मसालोक्य प्राप्त किया अर्थात् ब्रह्मलोकमें जाकर सनातन ब्रह्मको प्राप्त किया ॥ १२-१३ ॥
अवाप च पदं कीटः पार्थ ब्रह्म सनातनम् ।
स्वकर्मफलनिर्वृत्तं व्यासस्य वचनात् तदा ॥ १४ ॥
पार्थ! व्यासजीके कथनानुसार उसने स्वधर्मका पालन किया था । उसीका यह फल हुआ कि उस कीटने सनातन ब्रह्मपद प्राप्त कर लिया ॥ १४ ॥
तेऽपि यस्मात् प्रभावेण हताः क्षत्रियपुंगवाः ।
सम्प्राप्तास्ते गतिं पुण्यां तस्मान्मा शोच पुत्रक ॥ १५ ॥
बेटा! ( क्षत्रिययोनिमें उस कीटने युद्ध करके प्राण त्याग किया था, इसलिये उसे उत्तम गतिकी प्राप्ति हुई । ) इसी प्रकार जो प्रधान प्रधान क्षत्रिय अपनी शक्तिका परिचय देते हुए इस रणभूमिमें मारे गये हैं, वे भी पुण्यमयी गतिको प्राप्त हुए हैं । अतः उसके लिये तुम शोक न करो ॥ १५ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि कीटोपाख्याने एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें कीड़ेका उपाख्यानविषयक एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११९ ॥
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विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः व्यास और मैत्रेयका संवाद - दानकी प्रशंसा और कर्मका रहस्य युधिष्ठिर उवाच
विद्या तपश्च दानं च किमेतेषां विशिष्यते ।
पृच्छामि त्वां सतां श्रेष्ठ तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १ ॥
= युधिष्ठिरने पूछा- सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ पितामह! विद्या, तप और दान – इनमें से कौन -सा श्रेष्ठ है? यह मैं आपसे पूछता हूँ, मुझे बताइये ॥ १ ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
मैत्रेयस्य च संवादं कृष्णद्वैपायनस्य च ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— राजन्! इस विषयमें श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास और मैत्रेयके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है ॥ २ ॥
कृष्णद्वैपायनो राजन्नज्ञातचरितं चरन् ।
वाराणस्यामुपातिष्ठन्मैत्रेयं स्वैरिणीकुले ॥ ३ ॥
नरेश्वर! एक समयकी बात है – भगवान् श्रीकृष्ण द्वैपायन व्यासजी गुप्तरूपसे विचरते हुए वाराणसी - पुरीमें जा पहुँचे । वहाँ मुनियोंकी मण्डलीमें बैठे हुए मुनिवर मैत्रेयजीके यहाँ वे उपस्थित हुए ॥ ३ ॥
तमुपस्थितमासीनं ज्ञात्वा स मुनिसत्तम ।
अर्चित्वा भोजयामास मैत्रेयोऽशनमुत्तमम् ॥ ४ ॥
पास आकर बैठे हुए मुनिवर व्यासजीको पहचानकर मैत्रेयजीने उनका पूजन किया और उन्हें उत्तम अन्न भोजन कराया ॥ ४ ॥
तदन्नमुत्तमं भुक्त्वा गुणवत् सार्वकामिकम् ।
प्रतिष्ठमानोऽस्मयत प्रीतः कृष्णो महामनाः ॥ ५ ॥
वह उत्तम लाभदायक और सबकी रुचिके अनुकूल अन्न भोजन करके महामना
व्यासजी बहुत संतुष्ट हुए । फिर जब वे वहाँसे चलने लगे तो मुस्कराये ॥ ५ ॥
तमुत्स्मयन्तं सम्प्रेक्ष्य मैत्रेयः कृष्णमब्रवीत् ।
कारणं ब्रूहि धर्मात्मन् व्यस्मयिष्ठाः कुतश्च ते ॥ ६ ॥
तपस्विनो धृतिमतः प्रमोदः समुपागतः ।
एतत् पृच्छामि ते विद्वन्नभिवाद्य प्रणम्य च ॥ ७ ॥
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उन्हें मुस्कराते देख मैत्रेयजीने व्यासजीसे पूछा— ' धर्मात्मन्! विद्वन्! मैं आपको अभिवादन एवं प्रणाम करके यह पूछता हूँ कि आप अभी- अभी जो मुस्कराये हैं, उसका क्या कारण है? आपको हँसी कैसे आयी? आप तो तपस्वी और धैर्यवान् हैं । आपको कैसे सहसा उल्लास हो आया? यह मुझे बताइये ॥ ६-७ ॥ आत्मनश्च तपोभाग्यं महाभाग्यं तवेह च ।
पृथगाचरतस्तात पृथगात्मसुखात्मनोः ।
अल्पान्तरमहं मन्ये विशिष्टमपि चान्वयात् ॥ ८ ॥
‘ तात! मैं अपनेमें तपस्याजनित सौभाग्य देखता हूँ और आपमें यहाँ सहज महाभाग्य प्रतिष्ठित है ( क्योंकि आप मेरे गुरुपुत्र हैं ) । जीवात्मा और परमात्मामें मैं बहुत थोड़ा अनार मानता हूँ । परमात्माका सभी पदार्थोंके साथ सम्बन्ध है; क्योंकि वह सर्वव्यापी है । इसीलिये मैं उसे जीवात्माकी अपेक्षा श्रेष्ठ भी मानता हूँ, किंतु आप तो जीवात्माको परमात्मासे अभिन्न जाननेवाले हैं, फिर आपका आचरण इस मान्यतासे भिन्न हो रहा है; क्योंकि आपकोकुछविस्मय हुआ है और मुझे नहीं हुआ है ' ॥ ८ ॥
व्यासउवाच
अतिच्छन्दातिवादाभ्यां स्मयोऽयं समुपागतः ।
असत्यं वेदवचनं कस्माद् वेदोऽनृतं वदेत् ॥ ९ ॥
व्यासजीने कहा — ब्रह्मन्! अतिथिको अत्यन्त गौरव प्रदान करते हुए उसकी इच्छाके अनुसार सत्कार करना ' अतिच्छन्द ' कहलाता है और वाणीद्वारा अतिथिके गौरवका जो प्रकाशन किया जाता है, उसे ' अतिवाद ' कहते हैं । मुझे यहाँ अतिच्छन्द और अतिवाद दोनों प्राप्त हुए हैं, इसीलिये मेरा यह विस्मय एवं हर्षोल्लास प्रकट हुआ है । ( दान और आतिथ्य आदिका महत्त्व वेदोंके द्वारा प्रतिपादित हुआ है । ) वेदोंका वचन कभी मिथ्या नहीं हो सकता । भला, वेद क्यों असत्य कहेगा? ॥ ९ ॥
त्रीण्येव तु पदान्याहुः पुरुषस्योत्तमं व्रतम् ।
न द्रुह्येच्चैव दद्याच्च सत्यं चैव परं वदेत् ॥ १० ॥
वेद मनुष्यके लिये तीन बातोंको उत्तम व्रत बताते हैं - ( १ ) किसीके प्रति द्रोह न करे, ( २ ) दान दे तथा ( ३ ) दूसरोंसे सदा सत्य बोले ॥ १० ॥
इति वेदोक्तमृषिभिः पुरस्तात् परिकल्पितम् ।
इदानीं चैव नः कृत्यं पुरस्ताच्च परिश्रुतम् ॥ ११ ॥
वेदके इस कथनका सबसे पहले ऋषियोंने पालन किया । हमने भी बहुत पहलेसे इसे सुन रखा है और इस समय भी वेदकी इस आज्ञाका पालन करना हमारा कर्तव्य है ॥ ११ ॥
अल्पोऽपि तादृशो दायो भवत्युत महाफलः ।
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तृषिताय च ते दत्तं हृदयेनानसूयता ॥ १२ ॥
शास्त्रविधिके अनुसार दिया हुआ थोड़ा-सा भी दान महान् फल देनेवाला होता है ।
तुमने ईर्ष्या -रहित हृदयसे भूखे- प्यासे अतिथिको अन्न -जलका दान किया है ॥ १२ ॥
तृषितस्तृषिताय त्वं दत्त्वैतद् दर्शनं मम ।
अजैषीर्महतो लोकान् महायज्ञैरिव प्रभो ॥ १३ ॥
प्रभो! मैं भूखा और प्यासा था । तुमने मुझ भूखे - प्यासेको अन्न- जल देकर तृप्त किया । इस पुण्यके प्रभावसे महान् यज्ञोंद्वारा प्राप्त होनेवाले बड़े - बड़े लोकोंपर तुमने विजय पायी है – यह मुझे प्रत्यक्ष दिखायी देता है ॥ १३ ॥
ततो दानपवित्रेण प्रीतोऽस्मि तपसैव च ।
पुण्यस्यैव हि ते सत्त्वं पुण्यस्यैव च दर्शनम् ॥ १४ ॥
इस दानके द्वारा पवित्र हुई तुम्हारी तपस्यासे मैं बहुत संतुष्ट हुआ हूँ । तुम्हारा बल पुण्यका ही बल है और तुम्हारा दर्शन भी पुण्यका ही दर्शन है ॥ १४ ॥
पुण्यस्यैवाभिगन्धस्ते मन्ये कर्मविधानजम् ।
अधिकं मार्जनात् तात तथा चैवानुलेपनात् ॥ १५ ॥
तुम्हारे शरीरसे जो सदा पुण्यकी ही सुगन्ध फैलती रहती है, इसे मैं इस दानरूप पुण्यकर्मके अनुष्ठानका फल मानता हूँ । तात! दान करना तीर्थ- स्नान तथा वैदिक व्रतकी पूर्ति से भी बढ़कर है ॥ १५ ॥
शुभं सर्वपवित्रेभ्यो दानमेव परं द्विज ।
नो चेत् सर्वपवित्रेभ्यो दानमेव परं भवेत् ॥ १६ ॥
ब्रह्मन्! जितने पवित्र कर्म हैं, उन सबमें दान ही सबसे बढ़कर पवित्र एवं कल्याणकारी है । यदि दान ही समस्त पवित्र वस्तुओंसे श्रेष्ठ न होता तो वेद - शास्त्रोंमें उसकी इतनी प्रशंसा नहीं की जाती ॥ १६ ॥
यानीमान्युत्तमानीह वेदोक्तानि प्रशंससि ।
तेषां श्रेष्ठतरं दानमिति मे नात्र संशयः ॥ १७ ॥
तुम जिन - जिन वेदोक्त उत्तम कर्मोंकी यहाँ प्रशंसा करते हो, उन सबमें दान ही श्रेष्ठतर है, इस विषयमें मुझे संशय नहीं है ॥ १७ ॥
दानकृद्भिः कृतः पन्था येन यान्ति मनीषिणः ।
ते हि प्राणस्य दातारस्तेषु धर्मः प्रतिष्ठितः ॥ १८ ॥
दाताओंने जो मार्ग बना दिया है, उसीसे मनीषी पुरुष चलते हैं । दान करनेवाले
प्राणदाता समझे जाते हैं । उन्हींमें धर्म प्रतिष्ठित है ॥ १८ ॥
यथा वेदाः स्वधीताश्च यथा चेन्द्रियसंयमः ।
सर्वत्यागो यथा चेह तथा दानमनुत्तमम् ॥ १ ९ ॥
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जैसे वेदोंका स्वाध्याय, इन्द्रियोंका संयम और सर्वस्वका त्याग उत्तम है, उसी प्रकार इस संसारमें दान भी अत्यन्त उत्तम माना गया है ॥ १ ९ ॥
त्वं हि तात महाबुद्धे सुखमेष्यसि शोभनम् ।
सुखात् सुखतरप्राप्तिमाप्नुते मतिमान्नरः ॥ २० ॥
तात! महाबुद्धे! तुमको इस दानके कारण उत्तम सुखकी प्राप्ति होगी । बुद्धिमान् मनुष्य दान करके उत्तरोत्तर सुख प्राप्त करता है ॥ २० ॥
तन्नः प्रत्यक्षमेवेदमुपलभ्यमसंशयम् ।
श्रीमन्तः प्राप्नुवन्त्यर्थान् दानं यज्ञं तथा सुखम् ॥ २१ ॥
यह बात हमलोगोंके सामने प्रत्यक्ष है । हमें निःसंदेह ऐसा ही समझना चाहिये । तुम-जैसे श्रीसम्पन्न पुरुष जब धन पाते हैं, तब उससे दान, यज्ञ और सुख भोग करते हैं ॥ २१ ॥
सुखादेव परं दुःखं दुःखादप्यपरं सुखम् ।
दृश्यते हि महाप्राज्ञ नियतं वै स्वभावतः ॥ २२ ॥
महाप्राज्ञ! किंतु जो लोग विषयसुखोंमें आसक्त हैं, वे सुखसे ही महान् दुःखमें पड़ते हैं और जो तपस्या आदिके द्वारा दुःख उठाते हैं, उन्हें दुःखसे ही सुखकी प्राप्ति होती देखी जाती है । सुख और दुःख मनुष्यके स्वभावके अनुसार नियत हैं ॥ २२ ॥
त्रिविधानीह वृत्तानि नरस्याहुर्मनीषिणः ।
पुण्यमन्यत् पापमन्यन्न पुण्यं न च पापकम् ॥ २३ ॥
इस जगत्में मनीषी पुरुषोंने मनुष्यके तीन प्रकारके आचरण बतलाये हैं- पुण्यमय, पापमय तथा पुण्य- पाप दोनोंसे रहित ॥ २३ ॥
न वृत्तं मन्यते तस्य मन्यते न च पातकम् ।
तथा स्वकर्मनिर्वृत्तं न पुण्यं न च पापकम् ॥ २४ ॥
ब्रह्मनिष्ठ पुरुष कर्तापनके अभिमानसे रहित होता है । अतः उसके किये हुए कर्मको न पुण्य माना जाता है न पाप । उसे अपने कर्मजनित पुण्य और पापकी प्राप्ति होती ही नहीं है ॥ २४ ॥
यज्ञदानतपःशीला नरा वै पुण्यकर्मिणः ।
येऽभिद्रुह्यन्ति भूतानि ते वै पापकृतो जनाः ॥ २५ ॥
जो यज्ञ, दान और तपस्यामें प्रवीण रहते हैं, वे ही मनुष्य पुण्य कर्म करनेवाले हैं तथा जो प्राणियोंसे द्रोह करते हैं, वे ही पापाचारी समझे जाते हैं ॥ २५ ॥
द्रव्याण्याददते चैव दुःखं यान्ति पतन्ति च ।
ततोऽन्यत् कर्म यत्किंचिन्न पुण्यं न च पातकम् ॥ २६ ॥
जो मनुष्य दूसरोंके धन चुराते हैं, वे दुःख पाते और नरकमें पड़ते हैं । इन उपर्युक्त शुभाशुभ कर्मोंसे भिन्न जो साधारण चेष्टा है, वह न तो पुण्य है और न तो पाप ही
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है ॥ २६ ॥
रमस्वैधस्व मोदस्व देहि चैव यजस्व च ।
न त्वामभिभविष्यन्ति वैद्या न च तपस्विनः ॥ २७ ॥
महर्षे! तुम आनन्दपूर्वक स्वधर्म- पालनमें रत रहो, तुम्हारी निरन्तर उन्नति हो, तुम प्रसन्न रहो, दान दो और यज्ञ करो । विद्वान् और तपस्वी तुम्हारा पराभव नहीं कर सकेंगे ॥ २७ ॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि मैत्रेयभिक्षायां विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १२० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें मैत्रेयकीभिक्षाविषयक एक सौ बीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १२० ॥
* आदरणीय पुरुषके चरणोंको हाथसे पकड़कर जो नमस्कार किया जाता है, उसे अभिवादन कहते हैं और दोनों हाथोंकी अंजलि बाँधकर उसे अपने ललाटसे लगाकर जो वन्दनीय पुरुषको मस्तक झुकाया जाता है उसका नाम प्रणाम है ।
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एकविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः व्यास - मैत्रेय - संवाद- विद्वान् एवं सदाचारी ब्राह्मणको अन्नदानकी प्रशंसा भीष्म उवाच
एवमुक्तः प्रत्युवाच मैत्रेयः कर्मपूजकः ।
अत्यन्तश्रीमति कुले जातः प्राज्ञो बहुश्रुतः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं – राजन्! व्यासजीके ऐसा कहनेपर कर्मपूजक मैत्रेयने जो अत्यन्त श्रीसम्पन्न कुलमें उत्पन्न हुए बहुश्रुत विद्वान् थे, उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया ॥ मैत्रेय उवाच
असंशयं महाप्राज्ञ यथैवात्थ तथैव तत् ।
अनुज्ञातश्च भवता किंचिद् ब्रूयामहं विभो ॥ २ ॥
मैत्रेय बोले — महाप्राज्ञ! आप जैसा कहते हैं ठीक वैसी ही बात है, इसमें संशय नहीं है । प्रभो! यदि आप आज्ञा दें तो मैं कुछ कहूँ ॥ २ ॥
व्यासउवाच
यद् यदिच्छसि मैत्रेय यावद् यावद् यथा यथा ।
ब्रूहि तत्त्वं महाप्राज्ञ शुश्रूषे वचनं तव ॥ ३ ॥
व्यासजीने कहा — महाप्राज्ञ मैत्रेय! तुम जो जो, जितनी- जितनी और जैसी - जैसी बातें
कहना चाहो, कहो । मैं तुम्हारी बातें सुनूँगा ॥ ३ ॥
मैत्रेय उवाच
निर्दोषं निर्मलं चैवं वचनं दानसंहितम् ।
विद्यातपोभ्यां हि भवान् भावितात्मा न संशयः ॥ ४ ॥
मैत्रेय बोले- मुने! आपने दानके सम्बन्धमें जो बातें बतायी हैं, वे दोषरहित और निर्मल हैं । इसमें संदेह नहीं कि आपने विद्या और तपस्यासे अपने अन्तःकरणको परम पवित्र बना लिया है ॥ ४ ॥
भवतो भावितात्मत्वाल्लाभोऽयं सुमहान् मम ।
भूयो बुद्ध्यानुपश्यामि सुसमृद्धतपा इव ॥ ५ ॥
आप शुद्धचित्त हैं, इसलिये आपके समागमसे मुझे यह महान् लाभ पहुँचा है । यह बात मैं समृद्धिशाली तपवाले महर्षिके समान बुद्धिसे बारंबार विचारकर प्रत्यक्ष देखता हूँ ॥ अपि नो दर्शनादेव भवतोऽभ्युदयो भवेत् ।
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मन्ये भवत्प्रसादोऽयं तद्धि कर्म स्वभावतः ॥ ६ ॥
आपके दर्शनसे ही हमलोगोंका महान् अभ्युदय हो सकता है । आपने जो दर्शन दिया, यह आपकी बहुत बड़ी कृपा है । मैं ऐसा ही मानता हूँ । यह कर्म भी आपकी कृपासे ही स्वभावतः बन गया है ॥ ६ ॥
तपः श्रुतं च योनिश्चाप्येतद् ब्राह्मण्यकारणम् ।
त्रिभिर्गुणैः समुदितस्ततो भवति वै द्विजः ॥ ७ ॥
ब्राह्मणत्वके तीन कारण माने गये हैं-तपस्या, शास्त्रज्ञान और विशुद्ध ब्राह्मणकुलमें जन्म । जो इन तीनों गुणोंसे सम्पन्न है, वही सच्चा ब्राह्मण है ॥ ७ ॥
अस्मिंस्तृप्ते च नृप्यन्ते पितरो दैवतानि च ।
न हि श्रुतवतां किंचिदधिकं ब्राह्मणादृते ॥ ८ ॥
ऐसे ब्राह्मणके तृप्त होनेपर देवता और पितर भी तृप्त हो जाते हैं । विद्वानोंके लिये ब्राह्मणसे बढ़कर दूसरा कोई मान्य नहीं है ॥ ८ ॥
अन्धं स्यात् तम एवेदं न प्रज्ञायेत किंचन ।
चातुर्वर्ण्य न वर्तेत धर्माधर्मावृतानृते ॥ ९ ॥
यदि ब्राह्मण न हों तो यह सारा जगत् अज्ञानान्धकारसे आच्छन्न हो जाय । किसीको कुछ सूझ न पड़े तथा चारों वर्णोंकी स्थिति, धर्म- अधर्म और सत्यासत्य कुछ भी न रह जाय ॥ ९ ॥
यथा हि सुकृते क्षेत्रे फलं विन्दति मानवः ।
एवं दत्त्वा श्रुतवति फलं दाता समश्नुते ॥ १० ॥
जैसे मनुष्य अच्छी तरह जोतकर तैयार किये हुए खेतमें बीज डालनेपर उसका फल पाता है, उसी प्रकार विद्वान् ब्राह्मणको दान देकर दाता निश्चय ही उसके फलका भागी होता है ॥ १० ॥
ब्राह्मणश्चेत्र विन्देत श्रुतवृत्तोपसंहितः ।
प्रतिग्रहीता दानस्य मोघं स्यात् धनिनां धनम् ॥ ११ ॥
यदि विद्या और सदाचारसे सम्पन्न ब्राह्मण जो दान लेनेका प्रधान अधिकारी है, धन न पा सके तो धनियोंका धन व्यर्थ हो जाय ॥ ११ ॥
अदन्नविद्वान् हन्त्यन्नमद्यमानं च हन्ति तम् ।
तं चान्नं पाति यश्चान्नं स हन्ता हन्यतेऽबुधः ॥ १२ ॥
मूर्ख मनुष्य यदि किसीका अन्न खाता है तो वह उस अन्नको नष्ट करता है ( अर्थात् कर्ताको उसका कुछ फल नहीं मिलता ) । इसी प्रकार वह अन्न भी उस मूर्खको नष्ट कर डालता है । जो सुपात्र होनेके कारण अन्न और दाताकी रक्षा करता है, उसकी भी वह अन्न रक्षा करता है । जो मूर्ख दानके फलका हनन करता है, वह स्वयं भी मारा जाता है ॥ १२ ॥
प्रभुर्ह्यन्नमदन् विद्वान् पुनर्जनयतीश्वरः ।