विश्वामित्रोपाख्यान : एक क्षत्रिय पुरुष ने ब्राह्मणत्व प्राप्त करने की कठिन परीक्षा कैसे पार की?

तपस्या और आत्मिक रूपान्तरण

महर्षि वेदव्यास कृत महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान पढ़ें।

अनुशासनपर्व → दानधर्मपर्व · अध्याय 3–4 · पृष्ठ 52–74

सूत ने युधिष्ठिर से कहा

क्षत्रिय मूल के होते हुए भी विश्वामित्र द्वारा ब्राह्मणत्व प्राप्त करने की जिज्ञासा शान्त करने हेतु।

धर्मराज युधिष्ठिर ने जिज्ञासावश पूछा— "महाराज! नरेश्वर! यदि अन्य तीन वर्णों के लिये ब्राह्मणत्व प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है, तो क्षत्रियकुल में उत्पन्न महात्मा विश्वामित्र ने कैसे ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया? धर्मात्मन्! नरश्रेष्ठ पितामह! मैं इस बात को यथार्थ रूप से सुनना चाहता हूँ। आप मुझे बताइये पितामह!"

भीष्म बोले— "कुन्तीनन्दन! अमित पराक्रमी विश्वामित्र ने अपनी तपस्या के प्रभाव से महात्मा वसिष्ठ के सौ पुत्रों को तत्काल नष्ट कर दिया था। उन्होंने क्रोध के आवेश में आकर बहुत से प्रचण्ड तेजस्वी यातुधान एवं राक्षस रच डाले थे, जो काल और यमराज के समान भयानक थे। इतना ही नहीं, इस मनुष्य-लोक में उन्होंने उस महान कुशिक-वंश को स्थापित किया, जो अब सैकड़ों ब्रह्मर्षियों से व्याप्त और विद्वान् ब्राह्मणों से प्रशंसित है।"

युधिष्ठिर उवाच

यातुधानाश्च बहवो राक्षसास्तिग्मतेजसः ।
मन्युनाऽऽविष्टदेहेन सृष्टाः कालान्तकोपमाः ॥

उन्होंने क्रोधके आवेशमें आकर बहुत से प्रचण्ड तेजस्वी यातुधान एवं राक्षस रच डाले थे जो काल और यमराजके समान भयानक थे ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 3 · श्लोक 4पृष्ठ 54

ऋचीक का महातपस्वी पुत्र शुनःशेप एक यज्ञ में यज्ञ-पशु बनाकर लाया गया था; किन्तु विश्वामित्र जी ने उस महायज्ञ से उसको छुटकारा दिला दिया। उन्होंने अपने तेज से देवताओं को सन्तुष्ट करके शुनःशेप को मुक्त किया, इसलिये वह बुद्धिमान् विश्वामित्र के पुत्रभाव को प्राप्त हो गया। देवताओं के देने से 'देवरात' नाम से प्रसिद्ध हुआ वह शुनःशेप विश्वामित्र का ज्येष्ठ पुत्र हुआ। उसके छोटे भाई—विश्वामित्र के अन्य पचास पुत्र उसे बड़ा मानकर प्रणाम नहीं करते थे; इस कारण विश्वामित्र के शाप से वे सब के सब चाण्डाल हो गये।"

नाभिवादयते ज्येष्ठं देवरातं नराधिप ।
पुत्राः पञ्चाशदेवापि शप्ताः श्वपचतां गताः ॥

नरेश्वर! शुनःशेप देवताओंके देनेसे देवरात नामसे प्रसिद्ध हो विश्वामित्रका ज्येष्ठ पुत्र हुआ । उसके छोटे भाई– विश्वामित्रके अन्य पचास पुत्र उसे बड़ा मानकर प्रणाम नहीं करते थे; इसलिये विश्वामित्रके शापसे वे सब - के - सब चाण्डाल हो गये ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 3 · श्लोक 8पृष्ठ 55

विश्वामित्र के प्रभाव से ही पवित्र एवं विशाल कौशिकी नदी प्रकट हुई। पाँच चोटी वाली लोकप्रिय रम्भा नामक अप्सरा उनकी तपस्या में विघ्न डालने गयी थी, जिसे उन्होंने शाप देकर पत्थर बना दिया। पूर्वकाल में विश्वामित्र के भय से श्रीमान् वसिष्ठ जी ने स्वयं को रस्सी से बाँधकर एक नदी के जल में डुबो दिया था; परन्तु उस नदी द्वारा बन्धनमुक्त होकर वे पुनः ऊपर उठ आये। महात्मा वसिष्ठ के उस महान कर्म से विख्यात होकर वह पवित्र नदी उसी दिन से 'विपाशा' कहलाने लगी।"

तथैवास्य भयाद् बद्ध्वा वसिष्ठः सलिले पुरा ।
आत्मानं मज्जयन् श्रीमान् विपाशः पुनरुत्थितः ॥

तदाप्रभृति पुण्या हि विपाशाभून्महानदी ।
विख्याता कर्मणा तेन वसिष्ठस्य महात्मनः ॥

पूर्वकालमें विश्वामित्रके ही भयसे अपने शरीरको रस्सीसे बाँधकर श्रीमान् वसिष्ठजी अपने- आपको एक नदीके जलमें डुबो रहे थे; परंतु उस नदीके द्वारा पाशरहित ( बन्धनमुक्त) हो पुनः ऊपर उठ आये । महात्मा वसिष्ठके उस महान् कर्मसे विख्यात हो वह पवित्र नदी उसी दिनसे ' विपाशा ' कहलाने लगी ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 3 · श्लोक 12-13पृष्ठ 55

जब विश्वामित्र ने वाणी द्वारा स्तुति की, तब सामर्थ्यशाली भगवान इन्द्र प्रसन्न होकर उन्हें शापमुक्त कर चुके थे। जो विश्वामित्र उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव तथा सप्तर्षियों के बीच उत्तर दिशा के आकाश में तारारूप से सदा प्रकाशित होते हैं, वे क्षत्रिय ही रहे हैं। भरतश्रेष्ठ! ये उनके अद्भुत कर्म हैं।"

मध्यं ज्वलति यो नित्यमुदीचीमाश्रितो दिशम् ॥

तस्यैतानि च कर्माणि तथान्यानि च कौरव ।
क्षत्रियस्येत्यतो जातमिदं कौतूहलं मम ॥

जो विश्वामित्र उत्तानपादके पुत्र ध्रुव तथा ब्रह्मर्षियों ( सप्तर्षियों ) - के बीचमें उत्तर दिशाके आकाशका आश्रय ले तारारूपसे सदा प्रकाशित होते रहते हैं, वे क्षत्रिय ही रहे हैं । कुरुनन्दन! उनके ये तथा और भी बहुत- से अद्भुत कर्म हैं, उन्हें याद करके मेरे हृदयमें यह जाननेका कौतूहल उत्पन्न हुआ है कि वे ब्राह्मण कैसे हो गये?

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 3 · श्लोक 15-16पृष्ठ 56

भीष्म बोले— "तात! कुन्तीनन्दन! पूर्वकाल में विश्वामित्र जी ने जिस प्रकार ब्राह्मणत्व तथा ब्रह्मर्षित्व प्राप्त किया, वह प्रसङ्ग यथार्थ रूप से बता रहा हूँ, सुनो। भरतवंश में अजमीढ नाम के प्रसिद्ध राजा हुए, जो यज्ञकर्ता एवं धर्मात्माओं में श्रेष्ठ थे। उनके पुत्र महाराज जह्नु हुए, जिनके समीप जाकर गङ्गाजी पुत्रीभाव को प्राप्त हुईं। जह्नु के पुत्र सिन्धुद्वीप थे और उनसे महाबली राजा बलाकाश्व का जन्म हुआ। वल्लभ के पुत्र कुशिक हुए, जो इन्द्र के समान तेजस्वी थे।"

कुशिक के पुत्र महाराज गाधि हुए, जो दीर्घकाल तक पुत्रहीन रहे। सन्तान की इच्छा से वे वन में रहने लगे। वहाँ सोमयाग करने से उनकी एक कन्या हुई, जिसका नाम सत्यवती था; जिसका रूप और सौन्दर्य भूतल पर कहीं भी नहीं था।"

इस प्रकार श्रीमहाभारत के अनुशासनपर्व के अन्तर्गत दानधर्मपर्व में विश्वामित्र का उपाख्यान विषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ।"

युधिष्ठिर ने जब पूछा कि क्षत्रिय कुल में उत्पन्न महात्मा विश्वामित्र ने कैसे ब्राह्मणत्व प्राप्त किया, तब सूत जी ने कहा— उन दिनों च्यवन के पुत्र भृगुवंशी श्रीमान् ऋचीक विख्यात तपस्वी थे और बड़ी भारी तपस्या में संलग्न रहते थे। उन्होंने राजा गाधि से उस कन्या को माँगा। शत्रुसूदन गाधि ने महात्मा ऋचीक को दरिद्र समझकर उन्हें अपनी कन्या नहीं दी। उनके इनकार कर देने पर जब महर्षि लौटने लगे, तब नृपश्रेष्ठ गाधि ने उनसे कहा— 'महसे! मुझे शुल्क दीजिये, तब आप मेरी पुत्री को विवाह द्वारा प्राप्त कर सकेंगे।'

प्रत्याख्याय पुनर्यातमब्रवीद् राजसत्तमः ।
शुल्कं प्रदीयतां मह्यं ततो वत्स्यसि मे सुताम् ॥

उनके इनकार कर देनेपर जब महर्षि लौटने लगे तब नृपश्रेष्ठ गाधिने उनसे कहा —' महर्षे! मुझे शुल्क दीजिये, तब आप मेरी पुत्रीको विवाहद्वारा प्राप्त कर सकेंगे'

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 4 · श्लोक 10पृष्ठ 67

ऋचीक ने पूछा— 'राजेन्द्र! मैं आपकी पुत्री के लिये आपको क्या शुल्क दूँ? आप निस्सङ्कोच होकर बताइये। इसमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये।' गाधि ने कहा— 'भृगुनन्दन! आप मुझे शुल्करूप में एक हजार ऐसे घोड़े ला दीजिये जो चन्द्रमा के समान कान्तिमान् और वायु के समान वेगवान् हों तथा जिनका एक-एक कान श्याम रङ्ग का हो।'

ऋचीक उवाच

किं प्रयच्छामि राजेन्द्र तुभ्यं शुल्कमहं नृप ।
दुहितुर्ब्रह्यसंसक्तो माभूत् तत्र विचारणा ॥

ऋचीकने पूछा – राजेन्द्र! मैं आपकी पुत्रीके लिये आपको क्या शुल्क दूँ? आप निस्संकोच होकर बताइये । नरेश्वर! इसमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 4 · श्लोक 11पृष्ठ 67

भीष्म जी कहते हैं— राजन्! तब भृगुश्रेष्ठ च्यवनपुत्र शक्तिशाली महर्षि ऋचीक जल के स्वामी वरुणदेव के पास जाकर बोले— 'देवशिरोमणे! मैं आपसे चन्द्रमा के समान कान्तिमान् तथा वायु के समान वेगवान् एक हजार ऐसे घोड़ों की भिक्षा माँगता हूँ जिनका एक ओर का कान श्याम रङ्ग का हो।' तब वरुणदेव ने कहा— 'बहुत अच्छा, जहाँ आपकी इच्छा होगी, वहीं से इस तरह के घोड़े प्रकट हो जायेंगे।' तदनन्तर ऋचीक के चिन्तन करते ही गङ्गाजी के जल से चन्द्रमा के समान कान्ति वाले एक हजार तेजस्वी घोड़े प्रकट हो गये।

तथेति वरुणो देव आदित्यो भृगुसत्तमम् ।
उवाच यत्र ते छन्दस्तत्रोत्थास्यन्ति वाजिनः ॥

तब अदितिनन्दन वरुणदेवने उन भृगुश्रेष्ठ ऋचीकसे कहा- बहुत अच्छा, जहाँ आपकी इच्छा होगी, वहींसे इस तरहके घोड़े प्रकट हो जायँगे'

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 4 · श्लोक 15पृष्ठ 68

तपस्वी मुनियों में श्रेष्ठ ऋचीक मुनि ने प्रसन्न होकर शुल्क के लिये राजा गाधिको वे एक हजार सुन्दर घोड़े दे दिये। आश्चर्यचकित हुए राजा गाधि ने शाप के भय से डरकर अपनी कन्या को वस्त्राभूषणों से विभूषित करके भृगुनन्दन ऋचीक को दे दिया। ब्रह्मर्षिशिरोमणि ऋचीक ने उसका विधिवत् पाणिग्रहण किया और तेजस्वी पति को पाकर उस कन्या को भी बड़ा हर्ष हुआ।

अपनी पत्नी के सद्व्यवहार से ब्रह्मर्षि बहुत सन्तुष्ट हुए। उन्होंने उस परम सुन्दरी पत्नी को मनोवाञ्छित वर देने की इच्छा प्रकट की। तब राजकन्या ने अपनी माता से मुनि की कही हुई सब बातें बताईं। उसकी माता ने सङ्कोच से सिर नीचे करके कहा— 'बेटी! तुम्हारे पति को पुत्र प्रदान करने के लिये मुझ पर भी कृपा करनी चाहिये, क्योंकि वे महान् तपस्वी और समर्थ हैं।'

गुणवन्तमपत्यं सा अचिराज्जनयिष्यति ।
मम प्रसादात् कल्याणि माभूत् ते प्रणयोऽन्यथा ॥

‘ कल्याणि! मेरे प्रसादसे तुम्हारी माता शीघ्र ही गुणवान् पुत्रको जन्म देगी । तुम्हारा प्रेमपूर्ण अनुरोध असफल नहीं होगा ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 4 · श्लोक 25पृष्ठ 69

सत्यवती ने तुरन्त जाकर माता की वह सारी इच्छा ऋचीक से निवेदन की। तब ऋचीक ने कहा— 'कल्याणि! मेरे प्रसाद से तुम्हारी माता शीघ्र ही गुणवान् पुत्र को जन्म देगी। तुम्हारा प्रेमपूर्ण अनुरोध असफल नहीं होगा। तुम्हारे गर्भ से भी एक अत्यन्त गुणवान् और महान् तेजस्वी पुत्र उत्पन्न होगा, जो हमारी वंश-परम्परा को चलायेगा। मैं तुमसे यह सच्ची बात कहता हूँ। कल्याणि! तुम्हारी माता ऋतुस्नान के पश्चात् पीपल के वृक्ष का आलिङ्गन करे और तुम गूलर के वृक्ष का। इससे तुम दोनों को अभीष्ट पुत्र की प्राप्ति होगी। पवित्र मुस्कान वाली देवी! मैंने ये दो मन्त्रपूत चरु तैयार किये हैं। इनमें से एक को तुम खा लो और दूसरे को तुम्हारी माता।'

चरुद्वयमिदं चैव मन्त्रपूतं शुचिस्मिते ।
त्वं च सा चोपभुञ्जीतं ततः पुत्राववाप्स्यथः ॥

‘पवित्र मुसकानवाली देवि! मैंने ये दो मन्त्रपूत चरु तैयार किये हैं । इनमेंसे एकको तुम खा लो और दूसरेको तुम्हारी माता । इससे तुम दोनोंको पुत्र प्राप्त होंगे'

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 4 · श्लोक 28पृष्ठ 70

सत्यवती ने हर्षमग्न होकर यह सब अपनी माता को बताया। उस समय माता ने कहा— 'बेटी! माता होने के कारण पहले से मेरा तुम पर अधिकार है; अतः तुम मेरी बात मानो। तुम्हारे पतिने जो चरु तुम्हारे लिये दिया है, वह तुम मुझे दे दो और मेरा चरु तुम ले लो। यदि तुम मेरी बात मानने योग्य समझो तो हमलोग वृक्षों में भी अदल-बदल कर लें। प्रायः सभी लोग अपने लिये श्रेष्ठ पुत्र की इच्छा करते हैं; अवश्य ही भगवान् ऋचीक ने भी चरु निर्माण करते समय ऐसा तारतम्य रखा होगा। सुमध्यमे! इसलिये तुम्हारे लिये नियत किये गये चरु और वृक्ष में मेरा अनुराग हुआ है। तुम भी यही चिन्तन करो कि मेरा भाई किसी तरह श्रेष्ठ गुणों से सम्पन्न हो।'

इस प्रकार सलाह करके सत्यवती और उसकी माता ने उन दोनों वस्तुओं का अदल-बदल कर उपयोग किया। फिर वे दोनों गर्भवती हो गयीं। अपनी पत्नी को गर्भवती अवस्था में देखकर भृगुश्रेष्ठ महर्षि ऋचीक का मन खिन्न हो गया। उन्होंने कहा— 'शुभे! जान पड़ता है तुमने बदलकर चरु का उपयोग किया है। इसी तरह तुमलोगोंने वृक्षों के आलिङ्गन में भी उलट-फेर कर दिया है। मैंने तुम्हारे चरु में सम्पूर्ण ब्रह्मतेज का सन्निवेश किया था और तुम्हारी माता के चरु में समस्त क्षत्रियोचित शक्ति की स्थापना की थी। मैंने सोचा था कि तुम त्रिभुवन में विख्यात गुणवाले ब्राह्मण को जन्म दोगी और तुम्हारी माता सर्वश्रेष्ठ क्षत्रिय की जननी होगी। शुभे! तुमने और तुम्हारी माता ने अदल-बदली कर ली है, इसलिये तुम्हारी माता श्रेष्ठ ब्राह्मणपुत्र को जन्म देगी और तुम भयङ्कर कर्म करने वाले क्षत्रिय की जननी होओगी।'

व्यत्यासस्तु कृतो यस्मात् त्वया मात्रा च ते शुभे ।
तस्मात् सा ब्राह्मणं श्रेष्ठं माता ते जनयिष्यति ॥

क्षत्रियं तूग्रकर्माणं त्वं भद्रे जनयिष्यसि ।
न हि ते तत् कृतं साधु मातृस्नेहेन भाविनि ॥

' शुभे! तुमने और तुम्हारी माताने अदला- बदली कर ली है, इसलिये तुम्हारी माता श्रेष्ठ ब्राह्मणपुत्रको जन्म देगी और भद्रे! तुम भयंकर कर्म करनेवाले क्षत्रियकी जननी होओगी । भाविनि! माताके स्नेहमें पड़कर तुमने यह अच्छा काम नहीं किया '

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 4 · श्लोक 40-41पृष्ठ 71

पतिकी यह बात सुनकर सुन्दरी सत्यवती शोक से सन्तप्त होकर वृक्ष से कटी हुई मनोहर लता के समान मूर्च्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ी। थोड़ी देर में जब उसे चेत आया, तब वह अपने स्वामी ऋचीक के चरणों में सिर रखकर बोली— 'ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ ब्रह्मर्षे! मैं आपकी पत्नी हूँ, अतः आपसे कृपा-प्रसाद की भीख चाहती हूँ। आप ऐसी कृपा करें जिससे मेरे गर्भ से क्षत्रिय पुत्र उत्पन्न न हो; मेरा पौत्र चाहे उग्रकर्मा क्षत्रिय स्वभाव का हो जाय, परन्तु मेरा पुत्र वैसा न हो। ब्रह्मन्! मुझे यही वर दीजिये।'

प्रतिलभ्य च सा संज्ञां शिरसा प्रणिपत्य च ।
उवाच भार्या भर्तारं गाधेयी भार्गवर्षभम् ॥

प्रसादयन्त्यां भार्यायां मयि ब्रह्मविदां वर ।
प्रसादं कुरु विप्रर्षे न मे स्यात् क्षत्रियः सुतः ॥

थोड़ी देरमें जब उसे चेत हुआ, तब वह गाधिकुमारी अपने स्वामी भृगुभूषण ऋचीकके चरणोंमें सिर रखकर प्रणामपूर्वक बोली– ' ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ ब्रह्मर्षे! मैं आपकी पत्नी हूँ, अतः आपसे कृपा- प्रसादकी भीख चाहती हूँ । आप ऐसी कृपा करें जिससे मेरे गर्भसे क्षत्रिय पुत्र उत्पन्न न हो ।

महाभारत · अनुशासनपर्व · दानधर्मपर्व · अध्याय 4 · श्लोक 43-44पृष्ठ 72

तपस्वी ऋषि ने कहा— 'अच्छा, ऐसा ही हो।' तदनन्तर सत्यवती ने जमदग्नि नामक शुभगुणसम्पन्न पुत्र को जन्म दिया। इस तरह महातपस्वी विश्वामित्र, यद्यपि क्षत्रिय थे, तथापि ऋचीक मुनि ने उनमें परम उत्कृष्ट ब्रह्मतेज का आधान किया था और वे ब्राह्मणवंश के प्रवर्तक हुए।

In English

The lineage of Vishvamitra and Satyavati

Bhishma explains to Yudhishthira how the Kshatriya Vishvamitra attained Brahmin status through his penance. He describes how the sage Richika married Satyavati after providing a dowry of horses, but because Satyavati and her mother swapped ritual offerings, Satyavati gave birth to a son with Kshatriya qualities instead of Brahmin qualities.

This page answers

  • How did vishvamitra become a brahmin?
  • Who was the father of satyavati?
  • Why did satyavati give birth to a son with kshatriya qualities?
  • What dowry did richika give to king gadhi?
  • How did shunahshepa become the eldest son of vishvamitra?

Also written: Vishvamitropakhyana, Vishvamitra, Yudhishthira, Suta, Vasishtha, Shunahshepa, Ikshvaku, Rambha, Richika, Satyavati, विश्वामित्रोपाख्यान