अणीमाण्डव्योपाख्यान : धर्मराज को शूद्र योनि में जन्म क्यों लेना पड़ा?
कर्म और शाप का फल
महर्षि वेदव्यास कृत महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान पढ़ें।
आदिपर्व → सम्भवपर्व · अध्याय 106–107 · पृष्ठ 789–797
वैशम्पायन ने जनमेजय से कहा
राजा के प्रश्न पर धर्मराज के शाप का रहस्य बताने हेतु
जनमेजय ने पूछा— 'ब्रह्मन्! धर्मराज ने ऐसा कौन-सा कर्म किया था, जिससे उन्हें शाप प्राप्त हुआ? किस ब्रह्मर्षिके शापसे वे शूद्रयोनिमें उत्पन्न हुए?'
वैशम्पायनजी बोले— 'राजन्! पूर्वकालमें माण्डव्य नामसे विख्यात एक ब्राह्मण थे, जो धैर्यवान्, सब धर्मोंके ज्ञाता, सत्यनिष्ठ एवं तपस्वी थे। वे अपने आश्रमके द्वारपर एक वृक्षके नीचे दोनों बाँहें ऊपरको उठाये हुए मौनव्रत धारण करके बड़ी भारी तपस्या करते थे। उस कठोर तपस्यामें बहुत दिन व्यतीत हो गये। एक दिन कुछ लुटेरे चोरीका माल लियेकर उनके आश्रममें आए और प्रजा रक्षक सेना के भयसे वहीं कहीं छिप गये। जब रक्षकोंकी सेना वहाँ पहुँची, तो उन्होंने तपस्या में लीन उन महर्षिके पास जाकर पूछा— "द्विजश्रेष्ठ! बताइये, चोर किस रास्तेसे भगे हैं? जिससे हम उनका पीछा कर सकें"। उन रक्षकोंके पूछनेपर महर्षि ने भला-बुरा कुछ भी नहीं कहा। रक्षकों ने आश्रम में ही चोरों और चोरीका माल देख लिया। सन्देह होने पर वे मुनि को बाँधकर राजा के पास ले गए। राजा ने उन चोरों के साथ महर्षिको भी प्राणदण्ड की आज्ञा दे दी। रक्षकों ने उन महातपस्वी मुनिको नहीं पहचाना और उन्हें शूलीपर चढ़ा दिया।"
तं राजा सह तैश्चौरैरन्वशाद् वध्यतामिति ।
स रक्षिभिस्तैरज्ञातः शूले प्रोतो महातपाः ॥
राजाने उन चोरोंके साथ महर्षिको भी प्राणदण्डकी आज्ञा दे दी । रक्षकोंने उन महातपस्वी मुनिको नहीं पहचाना और उन्हें शूलीपर चढ़ा दिया ।
धर्मात्मा ब्रह्मर्षि माण्डव्य दीर्घकालतक उस शूलके अग्रभागपर बैठे रहे। भोजन न मिलने पर भी उनकी मृत्यु नहीं हुई; वे केवल स्मरणमात्र करके ऋषियोंको अपने पास बुलाने लगे। शूली की नोक पर तपस्या करनेवाले उन महात्मासे प्रभावित होकर सभी तपस्वी मुनि रात में पक्षियों का रूप धारण करके वहाँ उड़ते हुए आए और अपनी शक्ति से स्वरूप को प्रकाशित करते हुए उनसे पूछा— "ब्रह्मन्! हम सुनना चाहते हैं कि आपने कौन- सा पाप किया है, जिससे यहाँ शूलपर बैठनेका यह महान् कष्ट आपको प्राप्त हुआ है?" तब उन मुनिश्रेष्ठने कहा— "मैं किसपर दोष लगाऊँ; दूसरे किसीने मेरा अपराध नहीं किया है"।
जब रक्षकों ने राजा को सारी बात बताई, तो राजा ने मन्त्रियोंसे परामर्श करके उन्हें प्रसन्न करने का प्रयत्न किया। राजा बोले— "मुनिवर! मैंने मोह अथवा अज्ञानवश जो अपराध किया है, उसके लिये आप मुझपर क्रोध न करें। मैं आपसे प्रसन्न होने के लिये प्रार्थना करता हूँ"। राजा के इन वचनों से मुनि प्रसन्न हुए और राजा ने उन्हें शूलीसे उतार दिया। नीचे उतारकर उन्होंने शूलके अग्रभागको उनके शरीर के भीतर से निकालने का प्रयत्न किया, पर असफल होने पर उस शूलको मूलभाग में ही काट दिया। तबसे वे मुनि शूलाग्रभागको अपने शरीर के भीतर लिये हुए ही विचरने लगे और सभी लोकों में ‘अणी-माण्डव्य’ कहलाने लगे।
एक समय परमात्मतत्त्वके ज्ञाता माण्डव्य ने धर्मराजके भवनमें जाकर उन्हें दिव्य आसनपर बैठे देखा। उन शक्तिशाली महर्षिने उन्हें उलाहना देते हुए पूछा— "मैंने अनजानमें कौन- सा ऐसा पाप किया था, जिसके फलका भोग मुझे इस रूपमें प्राप्त हुआ? मुझे शीघ्र इसका रहस्य बताओ। फिर मेरी तपस्याका बल देखो"।
धर्मराज बोले— "तपोधन! तुमने पतङ्गोंके पुच्छ-भागमें सींक घुसेड़ दी थी। उसी कर्मका यह फल तुम्हें प्राप्त हुआ है"।
ततः स मुनिशार्दूलस्तानुवाच तपोधनान् ।
दोषतः कं गमिष्यामि न हि मेऽन्योऽपराध्यति ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! तब उन मुनिश्रेष्ठने उन तपस्वी मुनियोंसे कहा- ' मैं किसपर दोष लगाऊँ; दूसरे किसीने मेरा अपराध नहीं किया है'
माण्डव्य ने पूछा— "अच्छा, तो ठीक-ठीक बताओ, मैंने किस समय — किस आयुमें वह पाप किया था?"
धर्मराज ने उत्तर दिया— "बाल्यावस्थामें तुम्हारे द्वारा यह पाप हुआ था"।
अणीमाण्डव्य ने कहा— "धर्मशास्त्रके अनुसार जन्मसे लेकर बारह वर्षकी आयुतक बालक जो कुछ भी करेगा, उसमें अधर्म नहीं होगा; क्योंकि उस समयतक उसे धर्मशास्त्रका ज्ञान नहीं होता। धर्मराज! तुमने थोड़े-से अपराधके लिये मुझे बहुत बड़ा दण्ड दिया है। ब्राह्मणका वध सम्पूर्ण प्राणियों के वधसे भी अधिक भयङ्कर है। चौदह वर्षकी उम्रतक किसीको पाप नहीं लगेगा"।
आ चतुर्दशकाद् वर्षान्न भविष्यति पातकम् ।
परतः कुर्वतामेवं दोष एव भविष्यति ॥
चौदह वर्षकी उम्रतक किसीको पाप नहीं लगेगा । उससे अधिककी आयुमें पाप करनेवालोंको ही दोष लगेगा ।
इसी अपराध के कारण महात्मा माण्डव्यके शापसे साक्षात् धर्म ही विदुररूपसे शूद्रयोनिमें उत्पन्न हुए, जो धर्मशास्त्र एवं अर्थशास्त्र के पण्डित, लोभ और क्रोधसे रहित, दीर्घदर्शी, शान्तिपरायण तथा कौरवोंके हितमें तत्पर थे।
एतेन त्वपराधेन शापात् तस्य महात्मनः ।
धर्मो विदुररूपेण शूद्रयोनावजायत ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! इसी अपराधके कारण महात्मा माण्डव्यके शापसे साक्षात् धर्म ही विदुररूपसे शूद्रयोनिमें उत्पन्न हुए ।
In English
The Curse of Mandavya
The sage Mandavya was impaled on a sharp stake by mistake after thieves hid in his ashram. Because he cursed Dharma for this injustice, Dharma was born as Vidura in a Shudra family.
This page answers
- Why was mandavya impaled on a shula?
- How did mandavya get the name ani-mandavya?
- Why did mandavya curse dharma?
- How was vidura born?
Also written: Animandavyopakhyana, Animandavya, Mandavya, Dharmaraja, अणीमाण्डव्योपाख्यान