महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 791–800
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 791–800
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जनमेजय! उन चोरोंका बहुत- से सैनिक पीछा कर रहे थे । कुरुश्रेष्ठ! वे दस्यु वह चोरीका माल महर्षिके आश्रममें रखकर भयके मारे प्रजा रक्षक सेनाके आनेके पहले वहीं कहीं छिप गये । उनके छिप जानेपर रक्षकोंकी सेना शीघ्रतापूर्वक वहाँ आ पहुँची । राजन्! चोरोंका पीछा करनेवाले लोगोंने इस प्रकार तपस्यामें लगे हुए उन महर्षिको जब वहाँ देखा, तो पूछा कि ' द्विजश्रेष्ठ! बताइये, चोर किस रास्तेसे भगे हैं? जिससे वही मार्ग पकड़कर हम तीव्र गतिसे उनका पीछा करें ' ॥ ५–८ ॥
तथा तु रक्षिणां तेषां ब्रुवतां स तपोधनः ।
न किंचिद् वचनं राजन्नब्रवीत् साध्वसाधु वा ॥ ९ ॥
राजन्! उन रक्षकोंके इस प्रकार पूछनेपर तपस्याके धनी उन महर्षिने भला- बुरा कुछ भी नहीं कहा ॥ ९ ॥
ततस्ते राजपुरुषा विचिन्वानास्तमाश्रमम् ।
ददृशुस्तत्र लीनांस्तांश्चौरांस्तद् द्रव्यमेव च ॥ १० ॥
तब उन राजपुरुषोंने उस आश्रममें ही चोरोंको खोजना आरम्भ किया और वहीं छिपे हुए चोरों तथा चोरीके मालको भी देख लिया ॥ १० ॥
ततः शङ्का समभवद् रक्षिणां तं मुनिं प्रति ।
संयम्यैनं ततो राज्ञे दस्यूंश्चैव न्यवेदयन् ॥ ११ ॥
फिर तो रक्षकोंको मुनिके प्रति मनमें संदेह उत्पन्न हो गया और वे उन्हें बाँधकर राजाके पास ले गये । वहाँ पहुँचकर उन्होंने राजासे सब बातें बतायीं और उन चोरोंको भी राजाके हवाले कर दिया ॥ ११ ॥
तं राजा सह तैश्चौरैरन्वशाद् वध्यतामिति ।
स रक्षिभिस्तैरज्ञातः शूले प्रोतो महातपाः ॥ १२ ॥
राजाने उन चोरोंके साथ महर्षिको भी प्राणदण्डकी आज्ञा दे दी । रक्षकोंने उन महातपस्वी मुनिको नहीं पहचाना और उन्हें शूलीपर चढ़ा दिया ॥ १२ ॥
ततस्ते शूलमारोप्य तं मुनिं रक्षिणस्तदा ।
प्रतिजग्मुर्महीपालं धनान्यादाय तान्यथ ॥ १३ ॥
इस प्रकार वे रक्षक माण्डव्य मुनिको शूलीपर चढ़ाकर वह सारा धन साथ ले राजाके पास लौट गये ॥ १३ ॥
शूलस्थः स तु धर्मात्मा कालेन महता ततः ।
निराहारोऽपि विप्रर्षिर्मरणं नाभ्यपद्यत ॥ १४ ॥
धर्मात्मा ब्रह्मर्षि माण्डव्य दीर्घकालतक उस शूलके अग्रभागपर बैठे रहे । वहाँ भोजन न मिलनेपर भी उनकी मृत्यु नहीं हुई ॥ १४ ॥
धारयामास च प्राणानृषींश्च समुपानयत् ।
शूलाग्रे तप्यमानेन तपस्तेन महात्मना ॥ १५ ॥
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संतापं परमं जग्मुर्मुनयस्तपसान्विताः ।
ते रात्रौ शकुना भूत्वा संनिपत्य तु भारत ।
दर्शयन्तो यथाशक्ति तमपृच्छन् द्विजोत्तमम् ॥ १६ ॥
वे प्राण धारण किये रहे और स्मरणमात्र करके ऋषियोंको अपने पास बुलाने लगे । शूलीकी नोकपर तपस्या करनेवाले उन महात्मासे प्रभावित होकर सभी तपस्वी मुनियोंको बड़ा संताप हुआ । वे रातमें पक्षियोंका रूप धारण करके वहाँ उड़ते हुए आये और अपनी शक्तिके अनुसार स्वरूपको प्रकाशित करते हुए उन विप्रवर माण्डव्य मुनिसे पूछने लगे - ॥ १५-१६ ॥
श्रोतुमिच्छामहे ब्रह्मन् किं पापं कृतवानसि ।
येनेह समनुप्राप्तं शूले दुःखभयं महत् ॥ १७ ॥
‘ब्रह्मन्! हम सुनना चाहते हैं कि आपने कौन- सा पाप किया है, जिससे यहाँ शूलपर बैठनेका यह महान् कष्ट आपको प्राप्त हुआ है? ' ॥ १७ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि अणीमाण्डव्योपाख्याने षडधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें अणीमाण्डव्योपाख्यानविषयक एक सौ छठा अध्याय पूराहुआ ॥ १०६ ॥
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सप्ताधिकशततमोऽध्यायः माण्डव्यका धर्मराजको शाप देना वैशम्पायन उवाच
ततः स मुनिशार्दूलस्तानुवाच तपोधनान् ।
दोषतः कं गमिष्यामि न हि मेऽन्योऽपराध्यति ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! तब उन मुनिश्रेष्ठने उन तपस्वी मुनियोंसे कहा- ' मैं किसपर दोष लगाऊँ; दूसरे किसीने मेरा अपराध नहीं किया है' ॥ १ ॥
तं दृष्ट्वा रक्षिणस्तत्र तथा बहुतिथेऽहनि ।
न्यवेदयंस्तथा राज्ञे यथावृत्तं नराधिप ॥ २ ॥
महाराज! रक्षकोंने बहुत दिनोंतक उन्हें शूलपर बैठे देख राजाके पास जा वह सब समाचार ज्यों-का- त्यों निवेदन किया ॥ २ ॥
श्रुत्वा च वचनं तेषां निश्चित्य सह मन्त्रिभिः ।
प्रसादयामास तथा शूलस्थमृषिसत्तमम् ॥ ३ ॥
उनकी बात सुनकर मन्त्रियोंके साथ परामर्श करके राजाने शूलीपर बैठे हुए उन मुनिश्रेष्ठको प्रसन्न करनेका प्रयत्न किया ॥ ३ ॥
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धर्मराज और अणीमाण्डव्य अणीमाण्डव्य ऋषि शूलीपर
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राजोवाच
यन्मयापकृतं मोहादज्ञानादृषिसत्तम ।
प्रसादये त्वां तत्राहं न मे त्वं क्रोद्धुमर्हसि ॥ ४ ॥
राजाने कहा – मुनिवर! मैंने मोह अथवा अज्ञानवश जो अपराध किया है, उसके लिये आप मुझपर क्रोध न करें । मैं आपसे प्रसन्न होनेके लिये प्रार्थना करता हूँ ॥ ४ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्ततो राज्ञा प्रसादमकरोन्मुनिः ।
कृतप्रसादं राजा तं ततः समवतारयत् ॥ ५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! राजाके यों कहनेपर मुनि उनपर प्रसन्न हो गये ।
राजाने उन्हें प्रसन्न जानकर शूलीसे उतार दिया ॥ ५ ॥
अवतार्य च शूलाग्रात् तच्छूलं निश्चकर्ष ह ।
अशक्नुवंश्च निष्क्रष्टुं शूलं मूले स चिच्छिदे ॥ ६ ॥
नीचे उतारकर उन्होंने शूलके अग्रभागके सहारे उनके शरीरके भीतरसे शूलको निकालनेके लिये खींचा । खींचकर निकालनेमें असफल होनेपर उन्होंने उस शूलको मूलभागमें काट दिया ॥ ६ ॥
स तथान्तर्गतेनैव शूलेन व्यचरन्मुनिः ।
तेनातितपसा लोकान् विजिग्ये दुर्लभान् परैः ॥ ७ ॥
तबसे वे मुनि शूलाग्रभागको अपने शरीरके भीतर लिये हुए ही विचरने लगे । उस अत्यन्त घोर तपस्याके द्वारा महर्षिने ऐसे पुण्यलोकोंपर विजय पायी, जो दूसरोंके लिये दुर्लभ हैं ॥ ७ ॥
अणीमाण्डव्य इति च ततो लोकेषु गीयते ।
स गत्वा सदनं विप्रो धर्मस्य परमात्मवित् ॥ ८ ॥
आसनस्थं ततो धर्मं दृष्ट्वोपालभत प्रभुः ।
किं'नु तद् दुष्कृतं कर्म मया कृतमजानता ॥ ९ ॥
यस्येयं फलनिर्वृत्तिरीदृश्यासादिता मया ।
शीघ्रमाचक्ष्व मे तत्त्वं पश्य मे तपसो बलम् ॥ १० ॥
अणी कहते हैं शूलके अग्रभागको, उससे युक्त होनेके कारण वे मुनि तभीसे सभी लोकोंमें ‘ अणी - माण्डव्य' कहलाने लगे । एक समय परमात्मतत्त्वके ज्ञाता विप्रवर माण्डव्यने धर्मराजके भवनमें जाकर उन्हें दिव्य आसनपर बैठे देखा । उस समय उन शक्तिशाली महर्षिने उन्हें उलाहना देते हुए पूछा — ' मैंने अनजानमें कौन - सा ऐसा पाप किया
था, जिसके फलका भोग मुझे इस रूपमें प्राप्त हुआ? मुझे शीघ्र इसका रहस्य बताओ ।
फिर मेरी तपस्याका बल देखो' ॥ ८-१० ॥
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धर्मउवाच
पतङ्गिकानां पुच्छेषु त्वयेषीका प्रवेशिता ।
कर्मणस्तस्य ते प्राप्तं फलमेतत् तपोधन ॥ ११ ॥
धर्मराज बोले – तपोधन! तुमने फतिंगोंके पुच्छ- भागमें सींक घुसेड़ दी थी । उसी कर्मका यह फल तुम्हें प्राप्त हुआ हैहै ॥ ११ ॥
स्वल्पमेव यथा दत्तं दानं बहुगुणं भवेत् ।
अधर्म एवं विप्रर्षे बहुदुःखफलप्रदः ॥ १२ ॥
विप्रर्षे! जैसे थोड़ा - सा भी किया हुआ दान कई गुना फल देनेवाला होता है, वैसे ही अधर्म भी बहुत दुःखरूपी फल देनेवाला होता है ॥ १२ ॥
अणीमाण्डव्य उवाच
कस्मिन् काले मया तत् तु कृतं ब्रूहि यथातथम् ।
तेनोक्तो धर्मराजेन बालभावे त्वया कृतम् ॥ १३ ॥
अणीमाण्डव्यने पूछा - अच्छा, तो ठीक-ठीक बताओ, मैंने किस समय — किस आयुमें वह पाप किया था? धर्मराजने उत्तर दिया — ' बाल्यावस्थामें तुम्हारे द्वारा यह पाप हुआ था' ॥ १३ ॥
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अणीमाण्डव्य उवाच
बालो हि द्वादशाद् वर्षाज्जन्मतो यत् करिष्यति ।
न भविष्यत्यधर्मोऽत्र न प्रज्ञास्यन्ति वै दिशः ॥ १४ ॥
अणीमाण्डव्यने कहा - धर्मशास्त्रके अनुसार जन्मसे लेकर बारह वर्षकी आयुतक बालक जो कुछ भी करेगा, उसमें अधर्म नहीं होगा; क्योंकि उस समयतक बालकको धर्मशास्त्रके आदेशका ज्ञान नहीं हो सकेगा ॥
अल्पेऽपराधेऽपि महान् मम दण्डस्त्वया कृतः ।
गरीयान् ब्राह्मणवधः सर्वभूतवधादपि ॥ १५ ॥
धर्मराज! तुमने थोड़े - से अपराधके लिये मुझे बहुत बड़ा दण्ड दिया है । ब्राह्मणका वध सम्पूर्ण प्राणियोंके वधसे भी अधिक भयंकर है ॥ १५ ॥
शूद्रयोनावतो धर्म मानुषः सम्भविष्यसि ।
मर्यादां स्थापयाम्यद्य लोके धर्मफलोदयाम् ॥ १६ ॥
अतः धर्म! तुम मनुष्य होकर शूद्रयोनिमें जन्म लोगे । आजसे संसारमें मैं धर्मके फलको प्रकट करनेवाली मर्यादा स्थापित करता हूँ ॥ १६ ॥
आ चतुर्दशकाद् वर्षान्न भविष्यति पातकम् ।
परतः कुर्वतामेवं दोष एव भविष्यति ॥ १७ ॥
चौदह वर्षकी उम्रतक किसीको पाप नहीं लगेगा । उससे अधिककी आयुमें पाप करनेवालोंको ही दोष लगेगा ॥ १७ ॥
वैशम्पायन उवाच
एतेन त्वपराधेन शापात् तस्य महात्मनः ।
धर्मो विदुररूपेण शूद्रयोनावजायत ॥ १८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! इसी अपराधके कारण महात्मा माण्डव्यके शापसे साक्षात् धर्म ही विदुररूपसे शूद्रयोनिमें उत्पन्न हुए ॥ १८ ॥
धर्मे चार्थे च कुशलो लोभक्रोधविवर्जितः ।
दीर्घदर्शी शमपरः कुरूणां च हिते रतः ॥ १९ ॥
वे धर्मशास्त्र एवं अर्थशास्त्रके पण्डित, लोभ और क्रोधसे रहित, दीर्घदर्शी, शान्तिपरायण तथा कौरवोंके हितमें तत्पर रहनेवाले थे ॥ १ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि अणीमाण्डव्योपाख्याने सप्ताधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें अणीमाण्डव्योपाख्यानविषयक एक सौ सातवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १०७ ॥
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अष्टाधिकशततमोऽध्यायः धृतराष्ट्र आदिके जन्म तथा भीष्मजीके धर्मपूर्ण शासनसे कुरुदेशकी सर्वांगीण उन्नतिका दिग्दर्शन वैशम्पायन उवाच ( धृतराष्ट्रे च पाण्डौ च विदुरे च महात्मनि । )
तेषु त्रिषु कुमारेषु जातेषु कुरुजाङ्गलम् ।
कुरवोऽथ कुरुक्षेत्रं त्रयमेतदवर्धत ॥ १ ॥
- वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! धृतराष्ट्र, पाण्डु और महात्मा विदुर – इन तीनों कुमारोंके जन्मसे कुरुवंश, कुरुजांगल देश और कुरुक्षेत्र– इन तीनोंकी बड़ी उन्नति हुई ॥ १ ॥
ऊर्ध्वसस्याभवद् भूमिः सस्यानि रसवन्ति च ।
यथर्तुवर्षी पर्जन्यो बहुपुष्पफला द्रुमाः ॥ २ ॥
पृथ्वीपर खेतीकी उपज बहुत बढ़ गयी, सभी अन्न सरस होने लगे, बादल ठीक समयपर वर्षा करते थे, वृक्षोंमें बहुत - से फल और फूल लगने लगे ॥ २ ॥
वाहनानि प्रहृष्टानि मुदिता मृगपक्षिणः ।
गन्धवन्ति च माल्यानि रसवन्ति फलानि च ॥ ३ ॥
घोड़े - हाथी आदि वाहन हृष्ट - पुष्ट रहते थे, मृग और पक्षी बड़े आनन्दसे दिन बिताते थे, फूलों और मालाओंमें अनुपम सुगन्ध होती थी और फलोंमें अनोखा रस होता था ॥ ३ ॥
वणिग्भिश्चान्वकीर्यन्त नगराण्यथ शिल्पिभिः ।
शूराश्च कृतविद्याश्च सन्तश्च सुखिनोऽभवन् ॥ ४ ॥
सभी नगर व्यापार-कुशल वैश्यों तथा शिल्पकलामें निपुण कारीगरोंसे भरे रहते थे ।
शूर- वीर, विद्वान् और संत सुखी हो गये ॥ ४ ॥
नाभवन् दस्यवः केचिन्नाधर्मरुचयो जनाः ।
प्रदेशेष्वपि राष्ट्राणां कृतं युगमवर्तत ॥ ५ ॥
कोई भी मनुष्य डाकू नहीं था । पापमें रुचि रखनेवाले लोगोंका सर्वथा अभाव था ।
राष्ट्रके विभिन्न प्रान्तोंमें सत्ययुग छा रहा था ॥ ५ ॥
धर्मक्रिया यज्ञशीलाः सत्यव्रतपरायणाः ।
अन्योन्यप्रीतिसंयुक्ता व्यवर्धन्त प्रजास्तदा ॥ ६ ॥
उस समयकी प्रजा सत्य व्रतके पालनमें तत्पर हो स्वभावतः यज्ञ- कर्ममें लगी रहती और धर्मानुकूल कर्मोंमें संलग्न रहकर एक- दूसरेको प्रसन्न रखती हुई सदा उन्नतिके पथपर
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बढ़ती जाती थी ॥ ६ ॥
मानक्रोधविहीनाश्च नरा लोभविवर्जिताः ।
अन्योन्यमभ्यनन्दन्त धर्मोत्तरमवर्तत ॥ ७ ॥
सब लोग अभिमान और क्रोधसे रहित तथा लोभसे दूर रहनेवाले थे; सभी एक-दूसरेको प्रसन्न रखनेकी चेष्टा करते थे । लोगोंके आचार- व्यवहारमें धर्मकी ही प्रधानता थी ॥ ७ ॥
तन्महोदधिवत् पूर्णं नगरं वै व्यरोचत ।
द्वारतोरणनिर्यूहैर्युक्तमभ्रचयोपमैः ॥ ८ ॥
समुद्रकी भाँति सब प्रकारसे भरा - पूरा कौरवनगर मेघसमूहोंके समान बड़े - बड़े दरवाजों, फाटकों और गोपुरोंसे सुशोभित था ॥ ८ ॥
प्रासादशतसम्बाधं महेन्द्रपुरसंनिभम् ।
नदीषु वनखण्डेषु वापीपल्वलसानुषु ।
काननेषु च रम्येषु विजहुर्मुदिता जनाः ॥ ९ ॥
सैकड़ों महलोंसे संयुक्त वह पुरी देवराज इन्द्रकी अमरावतीके समान शोभा पाती थी । वहाँके लोग नदियों, वनखण्डों, बावलियों, छोटे -छोटे जलाशयों, पर्वतशिखरों तथा रमणीय काननोंमें प्रसन्नतापूर्वक विहार करते थे ॥ ९ ॥
उत्तरैः कुरुभिः सार्धं दक्षिणाः कुरवस्तथा ।
विस्पर्धमाना व्यचरंस्तथा देवर्षिचारणैः ॥ १० ॥
उस समय दक्षिणकुरु देशके निवासी उत्तरकुरुमें रहनेवाले लोगों, देवताओं, ऋषियों तथा चारणोंके साथ होड़- सी लगाते हुए स्वच्छन्द विचरण करते थे ॥ १० ॥
नाभवत् कृपणः कश्चिन्नाभवन् विधवाः स्त्रियः ।
तस्मिञ्जनपदे रम्ये कुरुभिर्बहुलीकृते ॥ ११ ॥
कौरवोंद्वारा बढ़ाये हुए उस रमणीय जनपदमें न तो कोई कंजूस था और न विधवा स्त्रियाँ देखी जाती थीं ॥ ११ ॥
कूपारामसभावाप्यो ब्राह्मणावसथास्तथा ।
बभूवुः सर्वर्द्धियुतास्तस्मिन् राष्ट्रे सदोत्सवाः ॥ १२ ॥
उस राष्ट्रके कुओं, बगीचों, सभाभवनों, बावलियों तथा ब्राह्मणोंके घरोंमें सब प्रकारकी समृद्धियाँ भरी रहती थीं और वहाँ नित्य - नूतन उत्सव हुआ करते थे ॥ १२ ॥
भीष्मेण धर्मतो राजन् सर्वतः परिरक्षिते ।
बभूव रमणीयश्च चैत्ययूपशताङ्कितः ॥ १३ ॥
जनमेजय! भीष्मजीके द्वारा सब ओरसे धर्मपूर्वक सुरक्षित भूमण्डलमें वह कुरुदेश सैकड़ों देवस्थानों और यज्ञस्तम्भोंसे चिह्नित होनेके कारण बड़ी शोभा पाता था ॥ १३ ॥
देश: परराष्ट्राणि विमृज्याभिप्रवर्धितः ।