महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 781–790
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 781–790
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आपकी आज्ञासे धर्मको ही दृष्टिमें रखकर ( कामके वश न होकर ही ) आपकी इच्छाके अनुरूप कार्य करूँगा। यह सनातन मार्ग शास्त्रोंमें देखा गया है। मैं अपने भाईके लिये मित्र और वरुणके समान तेजस्वी पुत्र उत्पन्न करूँगा ॥ ३ ९ –४१ ॥
व्रतं चरेतां ते देव्यौ निर्दिष्टमिह यन्मया ।
संवत्सरं यथान्यायं ततः शुद्धे भविष्यतः ॥ ४२ ॥
न हि मामव्रतोपेता उपेयात् काचिदङ्गना । विचित्रवीर्यकी स्त्रियोंको मेरे बताये अनुसार एक वर्षतक विधिपूर्वक व्रत ( जितेन्द्रिय होकर केवल संतानार्थ साधन) करना होगा, तभी वे शुद्ध होंगी । जिसने व्रतका पालन नहीं किया है, ऐसी कोई भी स्त्री मेरे समीप नहीं आ सकती ॥ ४२ ॥
सत्यवत्युवाच सद्यो यथा प्रपद्येते देव्यौ गर्भं तथा कुरु ॥ ४३ ॥
सत्यवतीने कहा — बेटा! ये दोनों रानियाँ जिस प्रकार शीघ्र गर्भ धारण करें, वह उपाय करो ॥ ४३ ॥
अराजकेषु राष्ट्रेषु प्रजानाथा विनश्यति ।
नश्यन्ति च क्रियाः सर्वा नास्ति वृष्टिर्न देवता ॥ ४४ ॥
राज्यमें इस समय कोई राजा नहीं है । बिना राजाके राज्यकी प्रजा अनाथ होकर नष्ट हो जाती है। यज्ञ-दान आदि क्रियाएँ भी लुप्त हो जाती हैं । उस राज्यमें न वर्षा होती है, न देवता वास करते हैं ॥ ४४ ॥
कथं चाराजंक राष्ट्रं शक्यं धारयितुं प्रभो ।
तस्माद् गर्भं समाधत्स्व भीष्मः संवर्धयिष्यति ॥ ४५ ॥
प्रभो! तुम्हीं सोचो, बिना राजाका राज्य कैसे सुरक्षित और अनुशासित रह सकता है । इसलिये शीघ्र गर्भाधान करो । भीष्म बालकको पाल - पोसकर बड़ा कर लेंगे ॥ ४५ ॥
व्यास उवाच
यदि पुत्रः प्रदातव्यो मया भ्रातुरकालिकः ।
विरूपतां मे सहतां तयोरेतत् परं व्रतम् ॥ ४६ ॥
व्यासजी बोले — माँ! यदि मुझे समयका नियम न रखकर शीघ्र ही अपने भाईके लिये पुत्र प्रदान करना है, तो उन देवियोंके लिये यह उत्तम व्रत आवश्यक है कि वे मेरे असुन्दर रूपको देखकर शान्त रहें, डरे नहीं ॥ ४६ ॥
यदि मे सहते गन्धं रूपं वेषं तथा वपुः ।
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अद्यैव गर्भं कौसल्या विशिष्टं प्रतिपद्यताम् ॥ ४७ ॥
यदि कौसल्या ( अम्बिका ) मेरे गन्ध, रूप, वेष और शरीरको सहन कर ले तो वह आज ही एक उत्तम बालकको अपने गर्भमें पा सकती है ॥ ४७ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्त्वा महातेजा व्यासः सत्यवतीं तदा ।
शयने सा च कौसल्या शुचिवस्त्रा ह्यलंकृता ॥ ४८ ॥
समागमनमाकाङ्क्षेदिति सोऽन्तर्हितो मुनिः ।
ततोऽभिगम्य सा देवी स्नुषां रहसि संगताम् ॥ ४ ९ ॥
धर्म्यमर्थसमायुक्तमुवाच वचनं हितम् ।
कौसल्ये धर्मतन्त्रं त्वां यद् ब्रवीमि निबोध तत् ॥ ५० ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! ऐसा कहनेके बाद महातेजस्वी मुनिश्रेष्ठ व्यासजी सत्यवतीसे फिर ' अच्छा तो कौसल्या (ऋतु- स्नानके पश्चात्) शुद्ध वस्त्र और शृंगार धारण करके शय्यापर मिलनकी प्रतीक्षा करे ' यों कहकर अन्तर्धान हो गये । तदनन्तर देवी सत्यवतीने एकान्तमें आयी हुई अपनी पुत्रवधू अम्बिकाके पास जाकर उससे ( आपद्) धर्म और अर्थसे युक्त हितकारक वचन कहा — ' कौसल्ये! मैं तुमसे जो धर्मसंगत बात कह रही हूँ, उसे ध्यान देकर सुनो ॥ ४८–५० ॥
भरतानां समुच्छेदो व्यक्तं मद्भाग्यसंक्षयात् ।
व्यथितां मां च सम्प्रेक्ष्य पितृवंशं च पीडितम् ॥ ५१ ॥
भीष्मो बुद्धिमदान्मह्यं कुलस्यास्य विवृद्धये ।
साच बुद्धिस्त्वय्यधीना पुत्रि प्रापय मां तथा ॥ ५२ ॥
' मेरे भाग्यका नाश हो जानेसे अब भरतवंशका उच्छेद हो चला है, यह स्पष्ट दिखायी दे रहा है । इसके कारण मुझे व्यथित और पितृकुलको पीड़ित देख भीष्मने इस कुलकी वृद्धिके लिये मुझे एक सम्मति दी है । बेटी! उस सम्मतिकी सार्थकता तुम्हारे अधीन है । तुम भीष्मके बताये अनुसार मुझे उस अवस्थामें पहुँचाओ, जिससे मैं अपने अभीष्टकी सिद्धि देख सकूँ ॥ ५१-५२ ॥
नष्टं च भारतं वंशं पुनरेव समुद्धर ।
पुत्रं जनय सुश्रोणि देवराजसमप्रभम् ॥ ५३ ॥
स हि राज्यधुरं गुर्वीमुद्वक्ष्यति कुलस्य नः । ' सुश्रोणि! इस नष्ट होते हुए भरतवंशका पुनः उद्धार करो । तुम देवराज इन्द्रके समान एक तेजस्वी पुत्रको जन्म दो । वही हमारे कुलके इस महान् राज्यभारको वहन करेगा' ॥ ५३३ ॥
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सा धर्मतोऽनुनीयैनां कथंचिद् धर्मचारिणीम् ।
भोजयामास विप्रांश्च देवर्षीनतिथींस्तथा ॥ ५४ ॥
कौसल्या धर्मका आचरण करनेवाली थी । सत्यवतीने धर्मको सामने रखकर ही उसे किसी प्रकार समझा - बुझाकर ( बड़ी कठिनतासे ) इस कार्यके लिये तैयार किया । उसके बाद ब्राह्मणों, देवर्षियों तथा अतिथियोंको भोजन कराया ॥ ५४ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि सत्यवत्युपदेशे चतुरधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें सत्यवती- उपदेशविषयक एक सौचारवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०४ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ५६ श्लोक हैं ) OF FULL * यहाँ गुणवान्का अर्थ है - नियोगकी विधिको जाननेवाला संयमी पुरुष । मनु महाराजने स्त्रियोंके आपद्धर्मके प्रसंगमें लिखा है— विधवायां नियुक्तस्तु घृताक्तो वाग्यतो निशि । एकमुत्पादयेत् पुत्रं न द्वितीयं कथंचन ॥ (मनुस्मृति ९ ।६१ ) विधवा स्त्रीके साथ सहवासके लिये ( पतिपक्षके गुरुजनोंद्वारा ) नियुक्त पुरुष अपने सारे शरीरपर घी चुपड़कर ( सौन्दर्य बिगाड़कर ), वाणीको संयममें रखकर ( चुपचाप रहकर ) रात्रिमें सहवास करे। इस प्रकार वह एक ही पुत्र उत्पन्न करे, दूसरा कभी न करे । विधवायां नियोगार्थे निर्वृत्ते तु यथाविधि । गुरुवच्च स्नुषावच्च वर्तेयातां परस्परम् ॥ ( मनुस्मृति ९ ।६३ ) विधवामें नियोगके लिये विधिके अनुसार ( अर्थात् कामवश न होकर कर्तव्य बुद्धिसे ) चित्तको संयमित और इन्द्रियोंको अनासक्त रखते हुए नियोगका प्रयोजन सिद्ध हो जानेपर दोनों परस्पर पिता और पुत्रवधूके समान बर्ताव करें ( अर्थात् स्त्री उसको पिताके समान समझकर बरते और पुरुष उसे पुत्रवधूके समान मानकर बर्ताव करे) । कलियुगमें मनुष्योंके असंयमी और कामी होनेके कारण नियोग वर्जित है ।
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पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः व्यासजीके द्वारा विचित्रवीर्यके क्षेत्रसे धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुरकी उत्पत्ति वैशम्पायन उवाच
ततः सत्यवती काले वधूं स्नातामृतौ तदा ।
संवेशयन्ती शयने शनैर्वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तदनन्तर सत्यवती ठीक समयपर अपनी ऋतुस्नाता पुत्रवधूको शय्यापर बैठाती हुई धीरेसे बोली— ॥ १ ॥
कौसल्ये देवरस्तेऽस्ति सोऽद्य त्वानुप्रवेक्ष्यति ।
अप्रमत्ता प्रतीक्षैनं निशीथे ह्यागमिष्यति ॥ २ ॥
‘ कौसल्पे! तुम्हारे एक देवर हैं, वे ही आज तुम्हारे पास गर्भाधानके लिये आयेंगे । तुम
सावधान होकर उनकी प्रतीक्षा करो । वे ठीक आधी रातके समय यहाँ पधारेंगे ' ॥ २ ॥
श्वश्र्वास्तद् वचनं श्रुत्वा शयाना शयने शुभे ।
साचिन्तयत् तदा भीष्ममन्यांश्च कुरुपुङ्गवान् ॥ ३ ॥
सासकी यह बात सुनकर कौसल्या पवित्र शय्यापर शयन करके उस समय मन - ही- मन भीष्म तथा अन्य श्रेष्ठ कुरुवंशियोंका चिन्तन करने लगी ॥ ३ ॥
ततोऽम्बिकायां प्रथमं नियुक्तः सत्यवागृषिः ।
दीप्यमानेषु दीपेषु शरणं प्रविवेश ह ॥ ४ ॥
उस समय नियोगविधिके अनुसार सत्यवादी महर्षि व्यासने अम्बिकाके महलमें ( शरीरपर घी चुपड़े हुए, संयतचित्त, कुत्सित रूपमें) प्रवेश किया। उस समय बहुत - से दीपक वहाँ प्रकाशित हो रहे थे ॥ ४ ॥
तस्य कृष्णस्य कपिलां जटां दीप्ते च लोचने ।
बभ्रूणि चैव श्मश्रूणि दृष्ट्वा देवी न्यमीलयत् ॥ ५ ॥
व्यासजीके शरीरका रंग काला था, उनकी जटाएँ पिंगलवर्णकी और आँखें चमक रही थीं तथा दाढ़ी - मूँछ भूरे रंगकी दिखायी देती थी । उन्हें देखकर देवी कौसल्याने ( भयके मारे ) अपने दोनों नेत्र बंद कर लिये ॥ ५ ॥
सम्बभूव तया सार्धं मातुः प्रियचिकीर्षया ।
भयात् काशिसुता तं तु नाशक्नोदभिवीक्षितुम् ॥ ६ ॥
माताका प्रिय करनेकी इच्छासे व्यासजीने उसके साथ समागम किया; परंतु काशिराजकी कन्या भयके मारे उनकी ओर अच्छी तरह देख न सकी ॥ ६ ॥
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ततो निष्क्रान्तमागम्य माता पुत्रमुवाच ह ।
अप्यस्या गुणवान् पुत्र राजपुत्रो भविष्यति ॥ ७ ॥
जब व्यासजी उसके महलसे बाहर निकले, तब माता सत्यवतीने आकर उनसे पूछा — ' बेटा! क्या अम्बिकाके गर्भसे कोई गुणवान् राजकुमार उत्पन्न होगा? ' ॥ ७ ॥
निशम्य तद् वचो मातुर्व्यासः सत्यवतीसुतः ।
नागायुतसमप्राणो विद्वान् राजर्षिसत्तमः ॥ ८ ॥
महाभागो महावीर्यो महाबुद्धिर्भविष्यति ।
तस्य चापि शतं पुत्रा भविष्यन्ति महात्मनः ॥ ९ ॥
माताका यह वचन सुनकर सत्यवतीनन्दन व्यासजी बोले - ' माँ! वह दस हजार हाथियोंके समान बलवान्, विद्वान्, राजर्षियोंमें श्रेष्ठ, परम सौभाग्यशाली, महापराक्रमी तथा
अत्यन्त बुद्धिमान् होगा । उस महामनाके भी सौ पुत्र होंगे ॥ ८ - ९ ॥
किंतु मातुः स वैगुण्यादन्ध एव भविष्यति ।
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा माता पुत्रमथाब्रवीत् ॥ १० ॥
नान्धः कुरूणां नृपतिरनुरूपस्तपोधन ।
ज्ञातिवंशस्य गोप्तारं पितॄणां वंशवर्धनम् ॥ ११ ॥
द्वितीयं कुरुवंशस्य राजानं दातुमर्हसि । ‘किंतु माताके दोषसे वह बालक अन्धा ही होगा । ' व्यासजीकी यह बात सुनकर माताने कहा — ‘ तपोधन! कुरुवंशका राजा अन्धा हो यह उचित नहीं है । अतः कुरुवंशके लिये दूसरा राजा दो, जो जातिभाइयों तथा समस्त कुलका संरक्षक और पिताका वंश बढ़ानेवाला हो ’ ॥ १०-११३ ॥ स तथेति प्रतिज्ञाय निश्चक्राम महायशाः ॥ १२ ॥
महायशस्वी व्यासजी ‘ तथास्तु' कहकर वहाँसे निकल गये ॥ १२ ॥
सापि कालेन कौसल्या सुषुवेऽन्धं तमात्मजम् ।
पुनरेव तु सा देवी परिभाष्य स्नुषां ततः ॥ १३ ॥
ऋषिमावाहयत् सत्या यथा पूर्वमरिंदम ।
ततस्तेनैव विधिना महर्षिस्तामपद्यत ॥ १४ ॥
अम्बालिकामथाभ्यागादृषिं दृष्ट्वा च सापि तम् ।
विवर्णा पाण्डुसंकाशा समपद्यत भारत ॥ १५ ॥
प्रसवका समय आनेपर कौसल्याने उसी अन्धे पुत्रको जन्म दिया । जनमेजय! तत्पश्चात् देवी सत्यवतीने अपनी दूसरी पुत्रवधूको समझा- बुझाकर गर्भाधानके लिये तैयार किया और इसके लिये पूर्ववत् महर्षि व्यासका आवाहन किया । फिर महर्षिने उसी (नियोगकी संयमपूर्ण) विधिसे देवी अम्बालिकाके साथ समागम किया । भारत! महर्षि व्यासको देखकर वह भी कान्तिहीन तथा पाण्डुवर्णकी - सी हो गयी ॥ १३–१५ ॥
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तां भीतां पाण्डुसंकाशां विषण्णां प्रेक्ष्य भारत ।
व्यासः सत्यवतीपुत्र इदं वचनमब्रवीत् ॥ १६ ॥
जनमेजय! उसे भयभीत, विषादग्रस्त तथा पाण्डु- वर्णकी -सी देख सत्यवतीनन्दन व्यासने यों कहा- ॥ १६ ॥
यस्मात् पाण्डुत्वमापन्ना विरूपं प्रेक्ष्य मामिह ।
तस्मादेष सुतस्ते वै पाण्डुरेव भविष्यति ॥ १७ ॥
' अम्बालिके! तुम मुझे विरूप देखकर पाण्डुवर्णकीसी हो गयी थीं, इसलिये तुम्हारा यह पुत्र पाण्डु रंगका ही होगा ॥ १७ ॥
नाम चास्यैतदेवेह भविष्यति शुभानने ।
इत्युक्त्वा स निरक्रामद् भगवानृषिसत्तमः ॥ १८ ॥
' शुभानने! इस बालकका नाम भी संसारमें ' पाण्डु' ही होगा । ' ऐसा कहकर मुनिश्रेष्ठ भगवान् व्यास वहाँसे निकल गये ॥ १८ ॥
ततो निष्क्रान्तमालोक्य सत्या पुत्रमथाब्रवीत् ।
शशंस स पुनर्मात्रे तस्य बालस्य पाण्डुताम् ॥ १ ९ ॥
उस महलसे निकलनेपर सत्यवतीने अपने पुत्रसे उसके विषयमें पूछा । तब व्यासजीने मातासे भी उस बालकके पाण्डुवर्ण होनेकी बात बता दी ॥ १ ९ ॥
तं माता पुनरेवान्यमेकं पुत्रमयाचत ।
तथेति च महर्षिस्तां मातरं प्रत्यभाषत ॥ २० ॥
उसके बाद सत्यवतीने पुनः एक दूसरे पुत्रके लिये उनसे याचना की । महर्षिने ' बहुत अच्छा ' कहकर माताकी आज्ञा स्वीकार कर ली ॥ २० ॥
ततः कुमारं सा देवी प्राप्तकालमजीजनत् ।
पाण्डुं लक्षणसम्पन्नं दीप्यमानमिव श्रिया ॥ २१ ॥
तदनन्तर देवी अम्बालिकाने समय आनेपर एक पाण्डुवर्णके पुत्रको जन्म दिया । वह अपनी दिव्य कान्तिसे उद्भासित हो रहा था ॥ २१ ॥
यस्य पुत्रा महेष्वासा जज्ञिरे पञ्च पाण्डवाः ।
ऋतुकाले ततो ज्येष्ठां वधूं तस्मै न्ययोजयत् ॥ २२ ॥
यह वही बालक था, जिसके पुत्र महाधनुर्धारी पाँच पाण्डव हुए । इसके बाद ऋतुकाल आनेपर सत्यवतीने अपनी बड़ी बहू अम्बिकाको पुनः व्यासजीसे मिलनेके लिये नियुक्त किया ॥ २२ ॥
सा तु रूपं च गन्धं च महर्षेः प्रविचिन्त्य तम् ।
नाकरोद् वचनं देव्या भयात् सुरसुतोपमा ॥ २३ ॥
परंतु देवकन्याके समान सुन्दरी अम्बिकाने महर्षिके उस कुत्सित रूप और गन्धका चिन्तन करके भयके मारे देवी सत्यवतीकी आज्ञा नहीं मानी ॥ २३ ॥
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ततः स्वैर्भूषणैर्दासीं भूषयित्वाप्सरोपमाम् ।
प्रेषयामास कृष्णाय ततः काशिपतेः सुता ॥ २४ ॥
काशिराजकी पुत्री अम्बिकाने अप्सराके समान सुन्दरी अपनी एक दासीको अपने ही आभूषणोंसे विभूषित करके काले - कलूटे महर्षि व्यासके पास भेज दिया ॥ २४ ॥
सा तमृषिमनुप्राप्तं प्रत्युद्गम्याभिवाद्य च ।
संविवेशाभ्यनुज्ञाता सत्कृत्योपचचार ह ॥ २५ ॥
महर्षिके आनेपर उस दासीने आगे बढ़कर उनका स्वागत किया और उन्हें प्रणाम करके उनकी आज्ञा मिलनेपर वह शय्यापर बैठी और सत्कारपूर्वक उनकी सेवा - पूजा करने लगी ॥ २५ ॥
कामोपभोगेन रहस्तस्यां तुष्टिमगादृषिः ।
तया सहोषितो राजन् महर्षिः संशितव्रतः ॥ २६ ॥
उत्तिष्ठन्नब्रवीदेनामभुजिष्या भविष्यसि ।
अयं च ते शुभे गर्भः श्रेयानुदरमागतः ।
धर्मात्मा भविता लोके सर्वबुद्धिमतां वरः ॥ २७ ॥
एकान्तमें मिलकर उसपर महर्षि व्यास बहुत संतुष्ट हुए । राजन्! कठोर व्रतका पालन करनेवाले महर्षि जब उसके साथ शयन करके उठे, तब इस प्रकार बोले — ' शुभे! अब तू दासी नहीं रहेगी । तेरे उदरमें एक अत्यन्त श्रेष्ठ बालक आया है । वह लोकमें धर्मात्मा तथा समस्त बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ होगा' ॥ २६-२७ ॥
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Concret
स जज्ञे विदुरो नाम कृष्णद्वैपायनात्मजः ।
धृतराष्ट्रस्य वै भ्राता पाण्डोश्चैव महात्मनः ॥ २८ ॥
वही बालक विदुर हुआ, जो श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासका पुत्र था । एक पिताका होनेके कारण वह राजा धृतराष्ट्र और महात्मा पाण्डुका भाई था ॥ २८ ॥
धर्मो विदुररूपेण शापात् तस्य महात्मनः ।
माण्डव्यस्यार्थतत्त्वज्ञः कामक्रोधविवर्जितः ॥ २ ९ ॥
महात्मा माण्डव्यके शापसे साक्षात् धर्मराज ही विदुररूपमें उत्पन्न हुए थे । वे अर्थतत्त्वके ज्ञाता और काम-क्रोधसे रहित थे ॥ २ ९ ॥
कृष्णद्वैपायनोऽप्येतत् सत्यवत्यै न्यवेदयत् ।
प्रलम्भमात्मनश्चैव शूद्रायाः पुत्रजन्म च ॥ ३० ॥
श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासने सत्यवतीको भी सब बातें बता दीं । उन्होंने यह रहस्य प्रकट कर दिया कि अम्बिकाने अपनी दासीको भेजकर मेरे साथ छल किया है, अतः शूद्रा दासीके गर्भसे ही पुत्र उत्पन्न होगा ॥ ३० ॥
स धर्मस्यानृणो भूत्वा पुनर्मात्रा समेत्य च ।
तस्यै गर्भं समावेद्य तत्रैवान्तरधीयत ॥ ३१ ॥
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इस तरह व्यासजी ( मातृ- आज्ञापालनरूप ) धर्मसे उऋण होकर फिर अपनी माता सत्यवतीसे मिले और उन्हें गर्भका समाचार बताकर वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ ३१ ॥
एते विचित्रवीर्यस्य क्षेत्रे द्वैपायनादपि ।
जज्ञिरे देवगर्भाभाः कुरुवंशविवर्धनाः ॥ ३२ ॥
विचित्रवीर्यके क्षेत्रमें व्यासजीसे ये तीन पुत्र उत्पन्न हुए, जो देवकुमारोंके समान तेजस्वी और कुरुवंशकी वृद्धि करनेवाले थे ॥ ३२ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि विचित्रवीर्यसुतोत्पत्ती पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०५ । इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें विचित्रवीर्यके पुत्रोंकी उत्पत्तिविषयक एक सौ पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १०५ ॥
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षडधिकशततमोऽध्यायः महर्षि माण्डव्यका शूलीपर चढ़ाया जाना जनमेजय उवाच
किं कृतं कर्म धर्मेण येन शापमुपेयिवान् ।
कस्य शापाच्च ब्रह्मर्षेः शूद्रयोनावजायत ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा — ब्रह्मन्! धर्मराजने ऐसा कौन-सा कर्म किया था, जिससे उन्हें शाप प्राप्त हुआ? किस ब्रह्मर्षिके शापसे वे शूद्रयोनिमें उत्पन्न हुए ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
बभूव ब्राह्मणः कश्चिन्माण्डव्य इति विश्रुतः ।
धृतिमान् सर्वधर्मज्ञः सत्ये तपसि च स्थितः ॥ २ ॥
वैशम्पायनजीने कहा- राजन्! पूर्वकालमें माण्डव्य नामसे विख्यात एक ब्राह्मण थे, जो धैर्यवान्, सब धर्मोंके ज्ञाता, सत्यनिष्ठ एवं तपस्वी थे ॥ २ ॥
स आश्रमपदद्वारि वृक्षमूले महातपाः ।
ऊर्ध्वबाहुर्महायोगी तस्थौ मौनव्रतान्वितः ॥ ३ ॥
वे अपने आश्रमके द्वारपर एक वृक्षके नीचे दोनों बाँहें ऊपरको उठाये हुए मौनव्रत धारण करके खड़े रहकर बड़ी भारी तपस्या करते थे । माण्डव्यजी बहुत बड़े योगी थे ॥ ३ ॥
तस्य कालेन महता तस्मिंस्तपसि वर्ततः ।
तमाश्रममनुप्राप्ता दस्यवो लोप्त्रहारिणः ॥ ४ ॥
उस कठोर तपस्यामें लगे हुए महर्षिके बहुत दिन व्यतीत हो गये । एक दिन उनके आश्रमपर चोरीका माल लिये हुए बहुत - से लुटेरे आये ॥ ४ ॥
अनुसार्यमाणा बहुभी रक्षिभिर्भरतर्षभ ।
ते तस्यावसथे लोप्त्रं दस्यवः कुरुसत्तम ॥ ५ ॥
निधाय च भयाल्लीनास्तत्रैवानागते बले ।
तेषु लीनेष्वथो शीघ्रं ततस्तद् रक्षिणां बलम् ॥ ६ ॥
आजगाम ततोऽपश्यंस्तमृषिं तस्करानुगाः ।
तमपृच्छंस्ततो राजंस्तथावृत्तं तपोधनम् ॥ ७ ॥
कतमेन पथा याता दस्यवो द्विजसत्तम ।
तेन गच्छामहे ब्रह्मन् यथा शीघ्रतरं वयम् ॥ ८ ॥