शार्ङ्गकोपाख्यान : अभिभावक की अनुपस्थिति में सङ्कट काल में आत्म-रक्षा का निर्णय कैसे लें?
सङ्कट में विवेक और साहस
महर्षि वेदव्यास कृत महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान पढ़ें।
आदिपर्व → मयदर्शनपर्व · अध्याय 230–232 · पृष्ठ 1585–1598
वैशम्पायन ने जनमेजय से कहा
मन्दपाल के पुत्रों की सुरक्षा और पुनर्मिलन की कथा सुनाने हेतु
वैशम्पायन जी ने जनमेजय से कहा— हे राजन! मन्दपाल के पुत्रों की सुरक्षा और उनके माता-पिता के पुनर्मिलन की कथा इस प्रकार है।
एक बिल के भीतर घोर सङ्कट का वातावरण था। माँ जरिता अपने बच्चों को ढाँढस बँधा रही थी। उसने कहा, "बच्चो! चूहा इस बिल से निकला था, उस समय उसे बाज उठा ले गया; उस छोटे से चूहे को वह अपने दोनों पञ्जों से पकड़कर उड़ गया। अतः अब इस बिल में तुम्हारे लिये भय नहीं है।"
परन्तु बालक शार्ङ्गक आशङ्कित था। उसने अपनी माता की बात सुनकर कहा, "हम किसी तरह यह नहीं समझ सकते कि बाज चूहे को उठा ले गया। उस बिल में दूसरे चूहे भी तो हो सकते हैं; हमारे लिये तो उनसे भी भय ही है। आग यहाँ तक आयेगी, इसमें सन्देह है; क्योंकि वायु के वेग से अग्निका दूसरी ओर पलट जाना भी देखा गया है। परन्तु बिल में तो उसके भीतर रहने वाले जीवों से हमारी मृत्यु होने में कोई संशय ही नहीं है।"
शार्ङ्गका ऊचुः न हृतं तं वयं विद्मः श्येनेनाखुं कथंचन ।
अन्येऽपि भवितारोऽत्र तेभ्योऽपि भयमेव नः ॥
शार्ङ्गक बोले- हम किसी तरह यह नहीं समझ सकते कि बाज चूहेको उठा ले गया । उस बिलमें दूसरे चूहे भी तो हो सकते हैं; हमारे लिये तो उनसे भी भय ही है ।
शार्ङ्गक ने आगे तर्क दिया, "माँ! संशयरहित मृत्यु से संशययुक्त मृत्यु अच्छी है; क्योंकि उसमें बच जाने की आशा होती है। अतः तुम आकाश में उड़ जाओ। तुम्हें फिर धर्मानुकूल रीति से सुन्दर पुत्रों की प्राप्ति हो जाएगी।"
निःसंशयात् संशयितो मृत्युर्मातर्विशिष्यते ।
चर खे त्वं यथान्यायं पुत्रानाप्स्यसि शोभनान् ॥
माँ! संशयरहित मृत्युसे संशययुक्त मृत्यु अच्छी है ( क्योंकि उसमें बच जानेकी भी आशा होती है ); अतः तुम आकाशमें उड़ जाओ । तुम्हें फिर ( धर्मानुकूल रीतिसे ) सुन्दर पुत्रोंकी प्राप्ति हो जायगी ।
जरिता ने अपने बच्चों को समझाते हुए कहा, "बच्चो! जब पक्षियों में श्रेष्ठ महाबली बाज बिल से चूहे को लेकर वेगपूर्वक उड़ा जा रहा था, उस समय महान् वेग से उड़ने वाले उस बाज के पीछे मैं भी बड़ी तीव्र गति से गयी और बिल से चूहे को ले जाने के कारण उसे आशीर्वाद देती हुई बोली— ‘श्येनराज! तुम मेरे शत्रु को लेकर उड़े जा रहे हो, इसलिये स्वर्ग में जाने पर तुम्हारा शरीर सोने का हो जाय और तुम्हारे कोई शत्रु न रह जाय'। जब उस पक्षिप्रवर बाज ने चूहे को खा लिया, तब मैं उसकी आज्ञा लेकर पुनः घर लौट आयी। अतः बच्चो! तुम लोग विश्वासपूर्वक बिल में घुसो। वहाँ तुम्हारे लिये भय नहीं है। महान् बाज ने मेरी आँखों के सामने ही चूहे का अपहरण किया था।"
यो नो द्वेष्टारमादाय श्येनराज प्रधावसि ।
भव त्वं दिवमास्थाय निरमित्रो हिरण्मयः ॥
‘ श्येनराज! तुम मेरे शत्रुको लेकर उड़े जा रहे हो, इसलिये स्वर्गमें जानेपर तुम्हारा शरीर सोनेका हो जाय और तुम्हारे कोई शत्रु न रह जाय '
परन्तु शार्ङ्गक अपनी बात पर अडिग था। उसने कहा, "माँ! बाज ने चूहे को पकड़ लिया, इसको हम नहीं जानते और जाने बिना हम इस बिल में कभी प्रवेश नहीं कर सकते।"
जरिता ने पुनः प्रयास किया, "बेटो! मैं जानती हूँ, बाज ने अवश्य चूहे को पकड़ लिया। तुम लोग मेरी बात मानो। इस बिल में तुम्हें कोई भय नहीं है।"
शार्ङ्गक ने तल्खी से कहा, "माँ! तुम झूठे बहाने बनाकर हमें भय से छुड़ाने की चेष्टा न करो। सन्दिग्ध कार्यों में प्रवृत्त होना बुद्धिमानी का काम नहीं है। हमने तुम्हारा कोई उपकार नहीं किया है और हम पहले कौन थे, इस बात को भी तुम नहीं जानतीं। फिर तुम क्यों कष्ट सहकर हमारी रक्षा करना चाहती हो? तुम हमारी कौन हो और हम तुम्हारे कौन हैं? माँ! अभी तुम्हारी तरुण अवस्था है, तुम दर्शनीय सुन्दरी हो और पतिके अन्वेषण में समर्थ भी हो। अतः पतिका ही अनुसरण करो। तुम्हें फिर सुन्दर पुत्र मिल जायेंगे। हम आग में जलकर उत्तम लोक प्राप्त करेंगे और यदि अग्नि ने हमें नहीं जलाया तो तुम फिर हमारे पास चली आना।"
वयमग्निं समाविश्य लोकानाप्स्याम शोभनान् ।
अथास्मान् न दहेदग्निरायास्त्वं पुनरेव नः ॥
हम आगमें जलकर उत्तम लोक प्राप्त करेंगे और यदि अग्निने हमें नहीं जलाया तो तुम फिर हमारे पास चली आना ।
बच्चों के इस व्यवहार से व्याकुल होकर जरिता उन्हें खाण्डववन में छोड़कर तुरन्त ऐसे स्थान में चली गयी, जहाँ आग से कुशलपूर्वक बिना किसी कष्ट के बच जाने की सम्भावना थी।
एवमुक्ता ततः शार्ङ्गं पुत्रानुत्सृज्य खाण्डवे ।
जगाम त्वरिता देशं क्षेममग्नेरनामयम् ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! बच्चोंके ऐसा कहनेपर शाङ्ग उन्हें खाण्डववनमें छोड़कर तुरंत ऐसे स्थानमें चली गयी, जहाँ आगसे कुशलपूर्वक बिना किसी कष्टके बच जानेकी सम्भावना थी ।
जब वे पक्षी जलती हुई आग को देख रहे थे, तब जरिता ने अग्निदेव को यह बात सुनाई। उस समय जीव आपस में वार्तालाप कर रहे थे। सारिसृक्क ने कहा, "भैया! तुम धीर और बुद्धिमान हो और हमारे लिये यह प्राणसङ्कटका समय है; क्योंकि बहुतों में कोई एक ही बुद्धिमान और शूरवीर होता है, इसमें संशय नहीं है।"
स्तम्बमित्र ने अपने बड़े भाई को सम्बोधित करते हुए कहा, "बड़ा भाई पिता के तुल्य है। यदि बड़ा भाई ही आने वाले भय और उससे बचने के उपाय को न जाने तो छोटा भाई क्या करेगा?"
ज्येष्ठस्तातो भवति वै ज्येष्ठो मुञ्चति कृच्छ्रतः ।
ज्येष्ठश्चेन्न प्रजानाति कनीयान् किं करिष्यति ॥
स्तम्बमित्र बोला — बड़ा भाई पिताके तुल्य है, बड़ा भाई ही संकटसे छुड़ाता है । यदि बड़ा भाई ही आनेवाले भय और उससे बचनेके उपायको न जाने तो छोटा भाई क्या करेगा?
वैशम्पायन जी कहते हैं— राजन्! इस प्रकार आपस में बातें करके मन्दपाल के वे पुत्र एकाग्रचित्त होकर अग्निदेव की स्तुति करने लगे।
एवं सम्भाष्य तेऽन्योन्यं मन्दपालस्य पुत्रकाः ।
तुष्टुवुः प्रयता भूत्वा यथाग्निं शृणु पार्थिव ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! इस प्रकार आपसमें बातें करके मन्दपालके वे पुत्र एकाग्रचित्त हो अग्निदेवकी स्तुति करने लगे; वह स्तुति सुनो ।
द्रोण ने कहा, "जगत्पते! आप ही शरीर के भीतर रहकर प्राणियों द्वारा खाए हुए अन्न को सदा उद्दीप्त होकर पचाते हैं। सम्पूर्ण विश्व आपमें ही प्रतिष्ठित है। शुक्लवर्ण वाले सर्वज्ञ अग्निदेव! आप ही सूर्य होकर अपनी किरणों द्वारा पृथ्वी से जल को और सम्पूर्ण पार्थिव रसों को ग्रहण करते हैं तथा पुनः समय आने पर आवश्यकता देखकर वर्षा के द्वारा इस पृथ्वी पर जलरूप में उन सब रसों को प्रस्तुत कर देते हैं।"
अग्निदेव की स्तुति जारी थी। जरिता ने कहा, "अग्निदेव! आप वायु के आत्मस्वरूप और वनस्पतियों के शरीर हैं। तृण-लता आदि की योनि पृथ्वी और जल तुम्हारे वीर्य हैं, जल की योनि भी तुम्हीं हो। महावीर्य! आपकी ज्वालाएँ सूर्य की किरणों के समान ऊपर-नीचे, आगे-पीछे तथा अगल-बगल सब ओर फैल रही हैं।"
सारिसृक्क ने व्याकुल होकर कहा, "धूममयी ध्वजा से सुशोभित अग्निदेव! हमारी माता चली गयी, पिता का भी हमें पता नहीं है और हमारे अभी पङ्ख तक नहीं निकले हैं। हमारा आपके सिवा दूसरा कोई रक्षक नहीं है; अतः आप ही हम बालकों की रक्षा करें। हे अग्ने! आपका जो कल्याणमय स्वरूप है तथा आपकी जो सात ज्वालाएँ हैं, उन सबके द्वारा आप शरण में आने की इच्छा रखने वाले हम आर्त प्राणियों की रक्षा कीजिये। हे जातवेदा! एकमात्र आप ही सर्वत्र तपते हैं। देव! सूर्य की किरणों में तपने वाला पुरुष भी आपसे भिन्न नहीं है। हव्यवाहन! हम बालक ऋषि हैं; हमारी रक्षा कीजिये। हमसे दूर चले जाइये।"
यदग्ने ते शिवं रूपं ये च ते सप्त हेतयः ।
तेन नः परिपाहि त्वमार्त्तान् वै शरणैषिणः ॥
अग्ने! आपका जो कल्याणमय स्वरूप है तथा आपकी जो सात ज्वालाएँ हैं, उन सबके द्वारा आप शरणमें आनेकी इच्छावाले हम आर्त प्राणियोंकी रक्षा कीजिये ।
स्तम्बमित्र ने स्तुति को आगे बढ़ाते हुए कहा, "अग्ने! एकमात्र आप ही सब कुछ हैं। यह सम्पूर्ण जगत् आपमें ही प्रतिष्ठित है। आप ही प्राणियों का पालन और जगत् को धारण करते हैं। आप ही अग्नि, आप ही हव्य का वहन करने वाले और आप ही उत्तम हविष्य हैं। मनीषी पुरुष आपको ही अनेक और एकरूप में स्थित जानते हैं। हव्यवाह! आप इन तीनों लोकों की सृष्टि करके प्रलयकाल आने पर पुनः प्रज्वलित हो इन सबका संहार कर देते हैं। अतः अग्ने! आप सम्पूर्ण जगत् के उत्पत्तिस्थान हैं और आप ही इसके लयस्थान भी हैं।"
सर्वमग्ने त्वमेवैकस्त्वयि सर्वमिदं जगत् ।
त्वं धारयसि भूतानि भुवनं त्वं बिभर्षि च ॥
स्तम्बमित्रने कहा — अग्ने! एकमात्र आप ही सब कुछ हैं, यह सम्पूर्ण जगत् आपमें ही प्रतिष्ठित है । आप ही प्राणियोंका पालन और जगत्को धारण करते हैं ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—हे जनमेजय! जब द्रोण ऋषि ने अग्निदेव की स्तुति की, तब अग्निदेव प्रसन्न हुए। उन्होंने मन्दपाल से की गई अपनी प्रतिज्ञा का स्मरण किया और द्रोण से बोले—"जान पड़ता है, तुम द्रोण ऋषि हो; क्योंकि तुमने उस ब्रह्मका ही प्रतिपादन किया है। मैं तुम्हारा अभीष्ट सिद्ध करूँगा, तुम्हें कोई भय नहीं है। मन्दपाल मुनि ने पहले ही मुझसे तुमलोगों के विषय में निवेदन किया था कि 'आप खाण्डववन का दाह करते समय मेरे पुत्रों को बचा लीजियेगा'। द्रोण! तुम्हारे पिता का यह वचन और तुमने यहाँ जो कुछ कहा है, वह भी मेरे लिये गौरव की वस्तु है। बोलो, तुम्हारी और कौन-सी इच्छा पूर्ण करूँ? तुम्हारा कल्याण हो।"
अग्निरुवाच ऋषिर्द्रोणस्त्वमसि वै ब्रह्म तद् व्याहृतं त्वया ।
ईप्सितं ते करिष्यामि न च ते विद्यते भयम् ॥
अग्नि बोले — जान पड़ता है, तुम द्रोण ऋषि हो; क्योंकि तुमने उस ब्रह्मका ही प्रतिपादन किया है । मैं तुम्हारा अभीष्ट सिद्ध करूँगा, तुम्हें कोई भय नहीं है ।
द्रोण ने तुरन्त कहा—"शुक्लस्वरूप अग्ने! ये बिलाव हमें प्रतिदिन उद्विग्न करते रहते हैं। आप इन्हें बन्धु-बान्धवों सहित भस्म कर डालिये।" शार्ङ्गकों की अनुमति पाकर अग्निदेव प्रज्वलित होकर सम्पूर्ण खाण्डववन को जलाने लगे।
इमे मार्जारकाः शुक्र नित्यमुद्वेजयन्ति नः ।
एतान् कुरुष्व दग्धांस्त्वं हुताशन सबान्धवान् ॥
द्रोणने कहा- शुक्लस्वरूप अग्ने! ये बिलाव हमें प्रतिदिन उद्विग्न करते रहते हैं । हुताशन! आप इन्हें बन्धु बान्धवोंसहित भस्म कर डालिये ।
मन्दपाल भी अपने पुत्रों की चिन्ता में व्याकुल थे। यद्यपि उन्होंने अग्निदेव से प्रार्थना कर ली थी, फिर भी उन्हें शान्ति नहीं मिल रही थी। वे अपने पुत्रों के लिए सन्तप्त होकर अपनी पत्नी लपिता से बोले—"लपते! मेरे बच्चे अपने घोंसले में कैसे बच सकेंगे? जब अग्निका वेग बढ़ेगा और हवा तीव्र गति से चलने लगेगी, उस समय मेरे बच्चे अपने को आग से बचाने में असमर्थ हो जाएँगे। उनकी तपस्विनी माता स्वयं असमर्थ है, वह बेचारी उनकी रक्षा कैसे करेगी? अपने बच्चों के बचने का कोई उपाय न देखकर वह शोक से आतुर हो जाएगी। मेरे बच्चे उड़ने और पङ्ख फड़फड़ाने में असमर्थ हैं। उन्हें उस दशा में देखकर, बार-बार चीत्कार करती और दौड़ती हुई जरिता किस दशा में होगी? मेरा बेटा जरितारि कैसे होगा, सारिसृक्क की क्या अवस्था होगी, स्तम्बमित्र और द्रोण कैसे होंगे? तथा वह तपस्विनी जरिता किस हालत में होगी?"
मन्दपाल जब इस प्रकार वन में अपनी स्त्री एवं बच्चों के लिए विलाप कर रहे थे, तब लपिता ने ईर्ष्यापूर्वक कहा—"तुम्हें पुत्रों को देखने की चिन्ता नहीं है। तुमने जिन ऋषियों के नाम लिये हैं, वे तेजस्वी और शक्तिशाली हैं; उन्हें अग्नि से तनिक भी भय नहीं है। मेरे पास ही तुमने अग्निदेव को स्वयं अपने पुत्र सौंपे थे और उन महात्मा अग्नि ने भी उनकी रक्षा के लिये प्रतिज्ञा की थी। वे लोकपाल हैं; जब बात दे चुके हैं, तब उसे झूठी नहीं करेंगे। अतः स्वस्थ पुरुष! तुम्हारा मन अपने बच्चों की रक्षारूप बन्धुजनोचित कर्तव्य के पालने के लिये उत्सुक नहीं है। तुम तो मेरी दुश्मन उसी जरिता सौत के लिये चिन्ता करते हुए सन्तप्त हो रहे हो। पहले जरिता में तुम्हारा जैसा स्नेह था, वैसा अवश्य ही मुझ पर नहीं है। जो सहायकों से सम्पन्न और शक्तिशाली है, वह मुझ जैसे अपने सुहृद् व्यक्ति पर स्नेह नहीं रखे और अपने आत्मीय जन को पीड़ित देखकर उसकी उपेक्षा करे, यह किसी प्रकार उचित नहीं कहा जा सकता। अतः अब तुम उस जरिता के ही पास जाओ, जिसके लिये तुम इतने सन्तप्त हो रहे हो। मैं भी दुष्ट पुरुष के आश्रय में पड़ी हुई स्त्री की भाँति अकेली ही विचरूँगी।"
गच्छ त्वं जरितामेव यदर्थं परितप्यसे ।
चरिष्याम्यहमप्येका यथा कुपुरुषाश्रिता ॥
‘ अतः अब तुम उस जरिताके ही पास जाओ, जिसके लिये तुम इतने संतप्त हो रहे हो । मैं भी दुष्ट पुरुषके आश्रयमें पड़ी हुई स्त्रीकी भाँति अकेली ही विचरूंगी '
मन्दपाल ने क्रोधित होकर कहा—"अरी! तू जैसा समझती है, उस भाव से मैं इस संसार में नहीं विचरता हूँ। मेरा विचरना तो केवल सन्तान के लिये होता है। मेरी वह सन्तान ही सङ्कट में पड़ी है। जो पैदा हुए बच्चों का परित्याग कर भविष्य में होने वालों का भरोसा करता है, वह मूर्ख है; सब लोग उसका अनादर करते हैं; तेरी जैसी इच्छा हो, वैसा कर। यह प्रज्वलित आग सारे वृक्षों को अपनी लपटों में लपेटती हुई मेरे उद्विग्न हृदय में अमङ्गलसूचक सन्ताप उत्पन्न कर रही है।"
एष हि प्रज्वलन्नग्निर्लेलिहानो महीरुहान् ।
आविग्ने हृदि संतापं जनयत्यशिवं मम ॥
यह प्रज्वलित आग सारे वृक्षोंको अपनी लपटोंमें लपेटती हुई मेरे उद्विग्न हृदयमें अमंगलसूचक संताप उत्पन्न कर रही है ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जब अग्निदेव उस स्थान से हट गये, तब पुत्रों की लालसा रखने वाली जरिता शीघ्रता से अपने बच्चों के पास पहुँची। उसने देखा कि सभी बच्चे आग से बच गये हैं और सकुशल हैं; उन्हें कोई कष्ट नहीं हुआ है और वे वन में जोर-जोर से चहक रहे हैं। उन्हें बार-बार देखकर वह नेत्रों से आँसू बहाने लगी और बारी-बारी से पुकारकर अपने सभी बच्चों से मिली।
अश्रूणि मुमुचे तेषां दर्शनात् सा पुनः पुनः ।
एकैकश्येन तान् सर्वान् क्रोशमानान्वपद्यत ॥
उन्हें बार- बार देखकर वह नेत्रोंसे आँसू बहाने लगी और बारी - बारीसे पुकारकर वह सभी बच्चोंसे मिली ।
इतने में ही मन्दपाल मुनि सहसा वहाँ पहुँचे; किन्तु उन बच्चों में से किसी ने भी उस समय उनका अभिनन्दन नहीं किया। वे एक-एक बच्चे से बोलते और जरिता को भी बार-बार बुलाते, परन्तु वे लोग उस मुनि से भला या बुरा कुछ भी नहीं बोले।
मन्दपाल ने पूछा—"प्रिये! तुम्हारा ज्येष्ठ पुत्र कौन है, उससे छोटा कौन है, मझला कौन है और सबसे छोटा कौन है? मैं इस प्रकार दुःख से आतुर होकर तुमसे पूछ रहा हूँ, तुम मुझे उत्तर क्यों नहीं देती? यद्यपि मैंने तुम्हें त्याग दिया था, तो भी यहाँ से जाने पर मुझे शान्ति नहीं मिलती थी।"
एवं ब्रुवन्तं दुःखार्तं किं मां न प्रतिभाषसे ।
कृतवानपि हि त्यागं नैव शान्तिमितो लभे ॥
मैं इस प्रकार दुःखसे आतुर होकर तुमसे पूछ रहा हूँ, तुम मुझे उत्तर क्यों नहीं देती? यद्यपि मैंने तुम्हें त्याग दिया था, तो भी यहाँसे जानेपर मुझे शान्ति नहीं मिलती थी ।
जरिता ने कटुता से कहा—"तुम्हें ज्येष्ठ पुत्र से क्या काम है, उसके बाद वाले से भी क्या लेना है, मझले अथवा छोटे पुत्र से भी तुम्हें क्या प्रयोजन है? पहले तुम मुझे सबसे हीन समझकर त्यागकर जिसके पास चले गये थे, उसी मनोहर मुस्कान वाली तरुणी लपिता के पास जाओ।"
जरितोवाच किं नु ज्येष्ठेन ते कार्यं किमनन्तरजेन ते ।
किं वा मध्यमजातेन किं कनिष्ठेन वा पुनः ॥
जरिता बोली - तुम्हें ज्येष्ठ पुत्रसे क्या काम है, उसके बादवालेसे भी क्या लेना है, मझले अथवा छोटे पुत्रसे भी तुम्हें क्या प्रयोजन है?
मन्दपाल ने उत्तर दिया—"परलोक में स्त्रियों के लिये परपुरुष से सम्बन्ध और सौतिया डाह को छोड़कर दूसरा कोई दोष उनके परमार्थ का नाश करने वाला नहीं है। यह सौतिया डाह वैर की आग को भड़काने वाला और अत्यन्त उद्वेग में डालने वाला है। समस्त प्राणियों में विख्यात और उत्तम व्रत का पालन करने वाली कल्याणमयी अरुन्धती ने उन महात्मा वसिष्ठ पर भी शङ्का की थी, जिनका हृदय अत्यन्त विशुद्ध है, जो सदा उनके प्रिय और हित में लगे रहते हैं और सप्तर्षि मण्डल के मध्य में विराजमान होते हैं। ऐसे धैर्यवान मुनि का भी उन्होंने सौतिया डाह के कारण तिरस्कार किया था। इस अशुभ चिन्तन के कारण उनकी अङ्ग-कान्ति धूम और अरुण के समान हो गयी। वे कभी लक्ष्य और कभी अलक्ष्य रहकर प्रच्छन्न वेष में मानो कोई निमित्त देखा करती हैं। मैं पुत्रों से मिलने के लिये आया हूँ, तो भी तुम मेरा तिरस्कार करती हो और इस प्रकार अभीष्ट वस्तु की प्राप्ति हो जाने पर जैसे तुम मेरे साथ सन्देहयुक्त व्यवहार करती हो, वैसा ही लपिता भी करती है। यह मेरी भार्या है, ऐसा मानकर पुरुष को किसी प्रकार भी स्त्री पर विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि नारी पुत्रवती हो जाने पर पति-सेवा आदि अपने कर्तव्यों पर ध्यान नहीं देती।"
न हि भार्येति विश्वासः कार्यः पुंसा कथंचन ।
न हि कार्यमनुध्याति नारी पुत्रवती सती ॥
यह मेरी भार्या है, ऐसा मानकर पुरुषको किसी प्रकार भी स्त्रीपर विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि नारी पुत्रवती हो जानेपर पतिसेवा आदि अपने कर्तव्योंपर ध्यान नहीं देती ।
तदनन्तर वे सभी पुत्र यथोचित रूप से अपने पिता के पास आ बैठे और वे मुनि भी उन सब पुत्रों को आश्वासन देने के लिये उद्यत हुए।
ततस्ते सर्व एवैनं पुत्राः सम्यगुपासते ।
स च तानात्मजान् सर्वानाश्वासयितुमुद्यतः ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - तदनन्तर वे सभी पुत्र यथोचितरूपसे अपने पिताके पास आ बैठे और वे मुनि भी उन सब पुत्रोंको आश्वासन देनेके लिये उद्यत हुए ।
In English
The Protection of Mandapala's Sons
Jarita leaves her children in the Khandava forest to find safety from a spreading fire. Her sons, Sarisrikka, Stambhamitra, Drona, and Jaritari, pray to Agni to protect them. Agni remembers his promise to Mandapala and spares the children from the flames.
This page answers
- How did agni protect mandapala's sons?
- Why did jarita leave her children in the forest?
- What did drona say to agni?
- Why was mandapala worried about his children?
Also written: Sharngakopakhyana, Sharngaka, Jarita, Agnideva, Mandapala, Drona, Sarisrikka, Stambamitra, Lapita, शार्ङ्गकोपाख्यान