श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1581–1590
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1581–1590
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इसप्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत मयदर्शनपर्वमेंशार्ङ्गकोपाख्यानविषयक त अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२८ ॥
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एकोनत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः जरिताका अपने बच्चोंकी रक्षाके लिये चिन्तित होकर विलाप करना वैशम्पायन उवाच
ततः प्रज्वलिते वह्नौ शार्ङ्गकास्ते सुदुःखिताः ।
व्यथिताः परमोद्विग्ना नाधिजग्मुः परायणम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तदनन्तर जब आग प्रज्वलित हुई, तब वे शार्ङ्गक शिशु बहुत दुःखी, व्यथित और अत्यन्त उद्विग्न हो गये । उस समय उन्हें अपना कोई रक्षक नहीं जान पड़ता था ॥ १ ॥
निशम्य पुत्रकान् बालान् माता तेषां तपस्विनी ।
जरिता शोकदुःखार्ता विललाप सुदुःखिता ॥ २ ॥
उन बच्चोंको छोटे जानकर उनकी तपस्विनी माता शोक और दुःखसे आतुर हुई जरिता बहुत दुःखी होकर विलाप करने लगी ॥ २ ॥
जरितोवाच
अयमग्निर्दहन् कक्षमित आयाति भीषणः ।
जगत् संदीपयन् भीमो मम दुःखविवर्धनः ॥ ३ ॥
जरिता बोली- यह भयानक आग इस वनको जलाती हुई इधर ही बढ़ी आ रही है । जान पड़ता है, यह सम्पूर्ण जगत्को भस्म कर डालेगी । इसका स्वरूप भयंकर और मेरे दुःखको बढ़ानेवाला है ॥ ३ ॥
इमे च मां कर्षयन्ति शिशवो मन्दचेतसः ।
अबर्हाश्चरणैर्हीनाः पूर्वेषां नः परायणाः ॥ ४ ॥
ये सांसारिक ज्ञानसे शून्य चित्तवाले शिशु मुझे अपनी ओर आकर्षित करते हैं। इन्हें पाँखें नहीं निकलीं और अभीतक ये पैरोंसे भी हीन हैं, हमारे पितरोंके ये ही आधार हैं ॥ ४ ॥
त्रासयंश्चायमायाति लेलिहानो महीरुहान् ।
अजातपक्षाश्च सुता न शक्ताः सरणे मम ॥ ५ ॥
सबको त्रास देती और वृक्षोंको चाटती हुई यह आगकी लपट इधर ही चली आ रही है ।
हाय! मेरे बच्चे बिना पंखके हैं, मेरे साथ उड़ नहीं सकते ॥ ५ ॥
आदाय च न शक्नोमि पुत्रांस्तरितुमात्मना ।
न च त्यक्तुमहं शक्ता हृदयं दूयतीव मे ॥ ६ ॥
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मैं स्वयं भी इन्हें लेकर इस आगसे पार नहीं हो सकूँगी । इन्हें छोड़ भी नहीं सकती । मेरे हृदयमें इनके लिये बड़ी व्यथा हो रही है ॥ ६ ॥
कं तु जह्यामहं पुत्रं कमादाय व्रजाम्यहम् ।
किं नु मे स्यात् कृतं कृत्वा मन्यध्वं पुत्रकाः कथम् ॥ ७ ॥
मैं किस बच्चेको छोड़ दूँ और किसे साथ लेकर जाऊँ? क्या करनेसे कृतकृत्य हो सकती हूँ? मेरे बच्चो! तुमलोगोंकी क्या राय है? ॥ ७ ॥
चिन्तयाना विमोक्षं वो नाधिगच्छामि किंचन ।
छादयिष्यामि वो गात्रैः करिष्ये मरणं सह ॥ ८ ॥
मैं तुमलोगोंके छुटकारेका उपाय सोचती हूँ; किंतु कुछ भी समझमें नहीं आता । अच्छा; अपने अंगोंसे तुमलोगोंको ढक लूँगी और तुम्हारे साथ ही मैं भी मर जाऊँगी ॥ ८ ॥
जरितारौ कुलं ह्येतज्ज्येष्ठत्वेन प्रतिष्ठितम् ।
सारसृक्कः प्रजायेत पितॄणां कुलवर्धनः ॥ ९ ॥
स्तम्बमित्रस्तपः कुर्याद् द्रोणो ब्रह्मविदां वरः ।
इत्येवमुक्त्वा प्रययौ पिता वो निर्घृणः पुरा ॥ १० ॥
पुत्रो! तुम्हारे निर्दयी पिता पहले ही यह कहकर चल दिये कि ' जरितारि ज्येष्ठ है, अतः इस कुलकी रक्षाका भार इसीपर होगा । दूसरा पुत्र सारिसृक्क अपने पितरोंके कुलकी वृद्धि करनेवाला होगा । स्तम्बमित्र तपस्या करेगा और द्रोण ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ होगा ' ॥ ९ -१० ॥ कमुपादाय शक्येयं गन्तुं कष्टापदुत्तमा ।
किंनु कृत्वा कृतं कार्यं भवेदिति च विह्वला ।
नापश्यत् स्वधिया मोक्षं स्वसुतानां तदानलात् ॥ ११ ॥
हाय! मुझपर बड़ी भारी कष्टदायिनी आपत्ति आ पड़ी । इन चारों बच्चोंमेंसे किसको लेकर मैं इस आगको पार कर सकूँगी । क्या करनेसे मेरा कार्य सिद्ध हो सकता है? इस प्रकार विचार करते - करते जरिता अत्यन्त विह्वल हो गयी; परंतु अपने पुत्रोंको उस आगसे बचानेका कोई उपाय उस समय उसके ध्यानमें नहीं आया ॥ ११ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं ब्रुवाणां शार्ङ्गस्ते प्रत्यूचुरथ मातरम् ।
स्नेहमुत्सृज्य मातस्त्वं पत यत्र न हव्यवाट् ॥ १२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! इस प्रकार बिलखती हुई अपनी मातासे वे शार्ङ्गपक्षीके बच्चे बोले- 'माँ! तुम स्नेह छोड़कर जहाँ आग न हो, उधर उड़ जाओ ॥ १२ ॥
अस्मास्विह विनष्टेषु भवितारः सुतास्तव ।
त्वयि मातर्विनष्टायां न नः स्यात् कुलसंततिः ॥ १३ ॥
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‘ माँ! यदि हम यहाँ नष्ट हो जायँ तो भी तुम्हारे दूसरे बच्चे हो सकते हैं; परंतु तुम्हारे नष्ट हो जानेपर तो हमारे इस कुलकी परम्परा ही लुप्त हो जायगी ॥ १३ ॥
अन्ववेक्ष्यैतदुभयं क्षेमं स्याद् यत् कुलस्य नः ।
तद् वै कर्तुं परः कालो मातरेष भवेत् तव ॥ १४ ॥
‘ माँ! इन दोनों बातोंपर विचार करके जिस प्रकार हमारे कुलका कल्याण हो, वही करनेको तुम्हारे लिये यह उत्तम अवसर है ॥ १४ ॥
मा त्वं सर्वविनाशाय स्नेहं कार्षीः सुतेषु नः ।
न हीदं कर्म मोघं स्याल्लोककामस्य नः पितुः ॥ १५ ॥
'तुम हम सब पुत्रोंपर ऐसा स्नेह न करो, जिससे सबका विनाश हो जाय । उत्तम लोककी इच्छा रखनेवाले मेरे पिताका यह कर्म व्यर्थ न हो जाय ' ॥ १५ ॥
जरितोवाच
इदमाखोर्बिलं भूमौ वृक्षस्यास्य समीपतः ।
तदाविशध्वं त्वरिता वह्नेरत्र न वो भयम् ॥ १६ ॥
जरिता बोली- मेरे बच्चो! इस वृक्षके पास भूमिमें यह चूहेका बिल है । तुमलोग
जल्दी - से - जल्दी इसके भीतर घुस जाओ । इसके भीतर तुम्हें आगसे भय नहीं है ॥ १६ ॥
ततोऽहं पांसुना छिद्रमपिधास्यामि पुत्रकाः ।
एवं प्रतिकृतं मन्ये ज्वलतः कृष्णवर्त्मनः ॥ १७ ॥
तुमलोगोंके घुस जानेपर मैं इस बिलका छेद धूलसे बंद कर दूँगी । बच्चो! मेरा विश्वास है, ऐसा करनेसे इस जलती आगसे तुम्हारा बचाव हो सकेगा ॥ १७ ॥
तत एष्याम्यतीतेऽग्नौ विहन्तुं पांसुसंचयम् ।
रोचतामेष वो वादो मोक्षार्थं च हुताशनात् ॥ १८ ॥
फिर आग बुझ जानेपर मैं धूल हटानेके लिये यहाँ आ जाऊँगी । आगसे बचनेके लिये मेरी यह बात तुमलोगोंको पसंद आनी चाहिये ॥ १८ ॥
शार्ङ्गका ऊचुः
अबर्हान् मांसभूतान् नः क्रव्यादाखुर्विनाशयेत् ।
पश्यमाना भयमिदं प्रवेष्टुं नात्र शक्नुमः ॥ १ ९ ॥
शार्ङ्गक बोले — अभी हम बिना पंखोंके बच्चे हैं, हमारा शरीर मांसका लोथड़ामात्र है । चूहा मांसभक्षी जीव है, वह हमें नष्ट कर देगा । इस भयको देखते हुए हम इस बिलमें प्रवेश नहीं कर सकते ॥ १ ९ ॥
कथमग्निर्न नो धक्ष्येत् कथमाखुर्न नाशयेत् ।
कथं न स्यात् पिता मोघः कथं माता ध्रियेत नः ॥ २० ॥
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हम तो यह सोचते हैं कि क्या उपाय हो, जिससे अग्नि हमें न जलावे, चूहा हमें न मारे एवं हमारे पिताका संतानोत्पादनविषयक प्रयत्न निष्फल न हो और हमारी माता भी जीवित रहे? ॥ २० ॥
बिल आखोर्विनाशः स्यादग्नेराकाशचारिणाम् ।
अन्ववेक्ष्यैतदुभयं श्रेयान् दाहो न भक्षणम् ॥ २१ ॥
बिलमें चूहेसे हमारा विनाश हो जायगा और आकाशमें उड़नेपर अग्निसे । इन दोनों परिणामोंपर विचार करनेसे हमें आगसे जल जाना ही श्रेष्ठ जान पड़ता है, चूहेका भोजन बनना नहीं ॥ २१ ॥
गर्हितं मरणं नः स्यादाखुना भक्षिते बिले ।
शिष्टादिष्टः परित्यागः शरीरस्य हुताशनात् ॥ २२ ॥
यदि हमलोगोंको बिलमें चूहेने खा लिया तो वह हमारी निन्दित मृत्यु होगी । आगसे जलकर शरीरका परित्याग करनेके लिये शिष्ट पुरुषोंकी आज्ञा है ॥ २२ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि मयदर्शनपर्वणि जरिताविलापे एकोनत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २२ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत मयदर्शनपर्वमें जरिताविलापविषयक दो सौ उन्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२९ ॥
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त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः जरिता और उसके बच्चोंका संवाद जरितोवाच
अस्माद् बिलान्निष्पतितमाखुं श्येनो जहार तम् ।
क्षुद्रं पद्भ्यां गृहीत्वा च यातो नात्र भयं हि वः ॥ १ ॥
जरिताने कहा- बच्चो! चूहा इस बिलसे निकला था, उस समय उसे बाज उठा ले गया; उस छोटेसे चूहेको वह अपने दोनों पंजोंसे पकड़कर उड़ गया । अतः अब इस बिलमें तुम्हारे लिये भय नहीं है ॥ १ ॥
शार्ङ्गका ऊचुः
न हृतं तं वयं विद्मः श्येनेनाखुं कथंचन ।
अन्येऽपि भवितारोऽत्र तेभ्योऽपि भयमेव नः ॥ २ ॥
शार्ङ्गक बोले- हम किसी तरह यह नहीं समझ सकते कि बाज चूहेको उठा ले गया । उस बिलमें दूसरे चूहे भी तो हो सकते हैं; हमारे लिये तो उनसे भी भय ही है ॥ २ ॥
संशयो वह्निरागच्छेद् दृष्टं वायोर्निवर्तनम् ।
मृत्युर्नो बिलवासिभ्यो बिले स्यान्नात्र संशयः ॥ ३ ॥
आग यहाँतक आयेगी, इसमें संदेह है; क्योंकि वायुके वेगसे अग्निका दूसरी ओर पलट जाना भी देखा गया है । परंतु बिलमें तो उसके भीतर रहनेवाले जीवोंसे हमारी मृत्यु होनेमें कोई संशय ही नहीं है ॥ ३ ॥
निःसंशयात् संशयितो मृत्युर्मातर्विशिष्यते ।
चर खे त्वं यथान्यायं पुत्रानाप्स्यसि शोभनान् ॥ ४ ॥
माँ! संशयरहित मृत्युसे संशययुक्त मृत्यु अच्छी है ( क्योंकि उसमें बच जानेकी भी आशा होती है ); अतः तुम आकाशमें उड़ जाओ । तुम्हें फिर ( धर्मानुकूल रीतिसे ) सुन्दर पुत्रोंकी प्राप्ति हो जायगी ॥ ४ ॥
जरितोवाच
अहं वेगेन तं यान्तमद्राक्षं पततां वरम् ।
बिलादाखुं समादाय श्येनं पुत्रा महाबलम् ॥ ५ ॥
तं पतन्तं महावेगात् त्वरिता पृष्ठतोऽन्वगाम् ।
आशिषोऽस्य प्रयुञ्जाना हरतो मूषिकं बिलात् ॥ ६ ॥
जरिताने कहा – बच्चो! जब पक्षियोंमें श्रेष्ठ महाबली बाज बिलसे चूहेको लेकर वेगपूर्वक उड़ा जा रहा था, उस समय महान् वेगसे उड़नेवाले उस बाजके पीछे मैं भी बड़ी
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तीव्र गतिसे गयी और बिलसे चूहेको ले जानेके कारण उसे आशीर्वाद देती हुई बोली ॥ ५-६ ॥
यो नो द्वेष्टारमादाय श्येनराज प्रधावसि ।
भव त्वं दिवमास्थाय निरमित्रो हिरण्मयः ॥ ७ ॥
‘ श्येनराज! तुम मेरे शत्रुको लेकर उड़े जा रहे हो, इसलिये स्वर्गमें जानेपर तुम्हारा शरीर सोनेका हो जाय और तुम्हारे कोई शत्रु न रह जाय ' ॥ ७ ॥
स यदा भक्षितस्तेन श्येनेनाखुः पतत्त्रिणा ।
तदाहं तमनुज्ञाप्य प्रत्युपायां पुनर्गृहम् ॥ ८ ॥
जब उस पक्षिप्रवर बाजने चूहेको खा लिया, तब मैं उसकी आज्ञा लेकर पुनः घर लौट आयी ॥ ८ ॥
प्रविशध्वं बिलं पुत्रा विश्रब्धा नास्ति वो भयम् ।
श्येनेन मम पश्यन्त्या हृत आखुर्महात्मना ॥ ९ ॥
अतः बच्चो! तुमलोग विश्वासपूर्वक बिलमें घुसो । वहाँ तुम्हारे लिये भय नहीं है । महान् बाजने मेरी आँखोंके सामने ही चूहेका अपहरण किया था ॥ ९ ॥
शार्ङ्गका ऊचुः
न विद्महे हृतं मातः श्येनेनाखुं कथंचन ।
अविज्ञाय न शक्यामः प्रवेष्टुं विवरं भुवः ॥ १० ॥
शार्ङ्गका बोले — माँ! बाजने चूहेको पकड़ लिया, इसको हम नहीं जानते और जाने बिना हम इस बिलमें कभी प्रवेश नहीं कर सकते ॥ १० ॥
जरितोवाच
अहं तमभिजानामि हृतं श्येनेन मूषिकम् ।
नास्ति वोऽत्र भयं पुत्राः क्रियतां वचनं मम ॥ ११ ॥
जरिताने कहा — बेटो! मैं जानती हूँ, बाजने अवश्य चूहेको पकड़ लिया । तुमलोग मेरी बात मानो । इस बिलमें तुम्हें कोई भय नहीं है ॥ ११ ॥
शार्ङ्गका ऊचुः
न त्वं मिथ्योपचारेण मोक्षयेथा भयाद्धि नः ।
समाकुलेषु ज्ञानेषु न बुद्धिकृतमेव तत् ॥ १२ ॥
शार्ङ्गका बोले – माँ! तुम झूठे बहाने बनाकर हमें भयसे छुड़ानेकी चेष्टा न करो ।
संदिग्ध कार्योंमें प्रवृत्त होना बुद्धिमानीका काम नहीं है ॥ १२ ॥
न चोपकृतमस्माभिर्न चास्मान् वेत्थ ये वयम् ।
पीड्यमाना बिभर्ष्यस्मान् का सती के वयं तव ॥ १३ ॥
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हमने तुम्हारा कोई उपकार नहीं किया है और हम पहले कौन थे, इस बातको भी तुम नहीं जानतीं । फिर तुम क्यों कष्ट सहकर हमारी रक्षा करना चाहती हो? तुम हमारी कौन हो और हम तुम्हारे कौन हैं? ॥ १३ ॥
तरुणी दर्शनीयासि समर्था भर्तुरेषणे ।
अनुगच्छ पतिं मातः पुत्रानाप्स्यसि शोभनान् ॥ १४ ॥
माँ! अभी तुम्हारी तरुण अवस्था है, तुम दर्शनीय सुन्दरी हो और पतिके अन्वेषणमें समर्थ भी हो । अतः पतिका ही अनुसरण करो । तुम्हें फिर सुन्दर पुत्र मिल जायँगे ॥ १४ ॥
वयमग्निं समाविश्य लोकानाप्स्याम शोभनान् ।
अथास्मान् न दहेदग्निरायास्त्वं पुनरेव नः ॥ १५ ॥
हम आगमें जलकर उत्तम लोक प्राप्त करेंगे और यदि अग्निने हमें नहीं जलाया तो तुम फिर हमारे पास चली आना ॥ १५ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्ता ततः शार्ङ्गं पुत्रानुत्सृज्य खाण्डवे ।
जगाम त्वरिता देशं क्षेममग्नेरनामयम् ॥ १६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! बच्चोंके ऐसा कहनेपर शाङ्ग उन्हें खाण्डववनमें छोड़कर तुरंत ऐसे स्थानमें चली गयी, जहाँ आगसे कुशलपूर्वक बिना किसी कष्टके बच जानेकी सम्भावना थी ॥ १६ ॥
ततस्तीक्ष्णार्चिरभ्यागात् त्वरितो हव्यवाहनः ।
यत्र शार्ङ्ग बभूवुस्ते मन्दपालस्य पुत्रकाः ॥ १७ ॥
तदनन्तर तीखी लपटोंवाले अग्निदेव तुरंत वहाँ आ पहुँचे, जहाँ मन्दपालके पुत्र शार्ङ्गक पक्षी मौजूद थे ॥ १७ ॥
ततस्तं ज्वलितं दृष्ट्वा ज्वलनं ते विहंगमाः ।
जरितारिस्ततो वाक्यं श्रावयामास पावकम् ॥ १८ ॥
तब उस जलती हुई आगको देखकर वे पक्षी आपसमें वार्तालाप करने लगे । उनमेंसे जरितारिने अग्निदेवको यह बात सुनायी ॥ १८ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि मयदर्शनपर्वणि शार्ङ्गकोपाख्याने त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत मयदर्शनपर्वमें शार्ङ्गकोपाख्यानविषयक दो सौ तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३० ॥
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एकत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः शार्ङ्गकोंके स्तवनसे प्रसन्न होकर अग्निदेवका उन्हें अभय देना जरितारिरुवाच
पुरतः कृच्छ्रकालस्य धीमाञ्जागर्ति पूरुषः ।
स कृच्छ्रकालं सम्प्राप्य व्यथां नैवैति कर्हिचित् ॥ १ ॥
जरितारि बोला — बुद्धिमान् पुरुष संकटकाल आनेके पहले ही सजग हो जाता है, वह संकटका समय आ जानेपर कभी व्यथित नहीं होता ॥ १ ॥
यस्तु कृच्छ्रमनुप्राप्तं विचेता नावबुध्यते ।
स कृच्छ्रकाले व्यथितो न श्रेयो विन्दते महत् ॥ २ ॥
जो मूढचित्त जीव आनेवाले संकटको नहीं जानता, वह संकटके समय व्यथित होनेके कारण महान् कल्याणसे वंचित रह जाता है ॥ २ ॥
सारिसृक्क उवाच
धीरस्त्वमसि मेधावी प्राणकृच्छ्रमिदं च नः ।
प्राज्ञः शूरो बहूनां हि भवत्येको न संशयः ॥ ३ ॥
सारिसृक्कने कहा- भैया! तुम धीर और बुद्धिमान् हो और हमारे लिये यह प्राणसंकटका समय है ( अतः इससे तुम्हीं हमारी रक्षा कर सकते हो ); क्योंकि बहुतोंमें कोई एक ही बुद्धिमान् और शूरवीर होता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ३ ॥
स्तम्बमित्र उवाच
ज्येष्ठस्तातो भवति वै ज्येष्ठो मुञ्चति कृच्छ्रतः ।
ज्येष्ठश्चेन्न प्रजानाति कनीयान् किं करिष्यति ॥ ४ ॥
स्तम्बमित्र बोला — बड़ा भाई पिताके तुल्य है, बड़ा भाई ही संकटसे छुड़ाता है । यदि बड़ा भाई ही आनेवाले भय और उससे बचनेके उपायको न जाने तो छोटा भाई क्या करेगा? ॥ ४ ॥
द्रोणउवाच
हिरण्यरेतास्त्वरितो ज्वलन्नायाति नः क्षयम् ।
सप्तजिह्वाननः क्रूरो लेलिहानो विसर्पति ॥ ५ ॥
द्रोणने कहा- यह जाज्वल्यमान अग्नि हमारे घोंसलेकी ओर तीव्र वेगसे आ रहा है । इसके मुखमें सात जिह्वाएँ हैं और यह क्रूर अग्नि समस्त वृक्षोंको चाटता हुआ सब ओर
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फैल रहा है ॥ ५ । | वैशम्पायन उवाच
एवं सम्भाष्य तेऽन्योन्यं मन्दपालस्य पुत्रकाः ।
तुष्टुवुः प्रयता भूत्वा यथाग्निं शृणु पार्थिव ॥ ६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! इस प्रकार आपसमें बातें करके मन्दपालके वे पुत्र एकाग्रचित्त हो अग्निदेवकी स्तुति करने लगे; वह स्तुति सुनो ॥ ६ ॥
जरितारिरुवाच
आत्मासि वायोर्ज्वलन शरीरमसि वीरुधाम् ।
योनिरापश्च ते शुक्रं योनिस्त्वमसि चाम्भसः ॥ ७ ॥
जरितारिने कहा— अग्निदेव! आप वायुके आत्मस्वरूप और वनस्पतियोंके शरीर हैं । तृण- लता आदिकी योनि पृथ्वी और जल तुम्हारे वीर्य हैं, जलकी योनि भी तुम्हीं हो ॥ ७ ॥
ऊर्ध्वं चाधश्च सर्पन्ति पृष्ठतः पार्श्वतस्तथा ।
अर्चिषस्ते महावीर्य रश्मयः सवितुर्यथा ॥ ८ ॥
महावीर्य! आपकी ज्वालाएँ सूर्यकी किरणोंके समान ऊपर- नीचे, आगे - पीछे तथा अगल - बगल सब ओर फैल रही हैं ॥ ८ ॥
सारसृक्क उवाच माता प्रणष्टा पितरं न विद्मः
पक्षा जाता नैव नो धूमकेतो ।
न नस्त्राता विद्यते वै त्वदन्य- स्तस्मादस्मांस्त्राहि बालांस्त्वमग्ने ॥ ९ ॥
सारिसृक्क बोला - धूममयी ध्वजासे सुशोभित अग्निदेव! हमारी माता चली गयी, पिताका भी हमें पता नहीं है और हमारे अभी पंखतक नहीं निकले हैं । हमारा आपके सिवा दूसरा कोई रक्षक नहीं है; अतः आप ही हम बालकोंकी रक्षा करें ॥ ९ ॥
यदग्ने ते शिवं रूपं ये च ते सप्त हेतयः ।
तेन नः परिपाहि त्वमार्त्तान् वै शरणैषिणः ॥ १० ॥
अग्ने! आपका जो कल्याणमय स्वरूप है तथा आपकी जो सात ज्वालाएँ हैं, उन सबके द्वारा आप शरणमें आनेकी इच्छावाले हम आर्त प्राणियोंकी रक्षा कीजिये ॥ १० ॥
त्वमेवैकस्तपसे जातवेदो नान्यस्तप्ता विद्यते गोषु देव । ऋषीनस्मान् बालकान् पालयस्व परेणास्मान् प्रेहि वै हव्यवाह ॥ ११ ॥