ॐअथ मङ्गलाचरणम्गणनाथः जगन्नाथः लोकनाथः दीनबन्धुः । इमे हि मामयूयुजन् यथाश्रुतं वदेदिति । मातुरङ्के निषण्णेन यथा बालेन चन्द्रमाः । आहूयमानो नाभ्येति तद्वद् वेदार्थ ईप्सितः । उत्तरेतापनीये च शैव्ये प्रश्ने च काठके । माण्डुक्ये च यदोङ्कारः परापरः विभागतः । एतदालम्बनं श्रेष्ठमियदे श्रुतिमानतः । तदेवाखण्डैकरसः परमात्मेति चोच्यते । व्यतीतो भेदसंसर्गौ भावाभावौ क्रमाक्रमौ । सत्यानृते च विश्वात्मा प्रविवेकात् प्रकाशते […]

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॥ श्रीसरस्वती स्तोत्रम् । वाणीस्तवनं ॥

॥ श्री सरस्वती स्तोत्रम् । वाणीस्तवनं ॥ नारायण उवाच ।।वाग्देवतायाः स्तवनं श्रूयतां सर्वकामदम् ।।महामुनिर्याज्ञवल्क्यो येन तुष्टाव तां पुरा ।।१।।गुरुशापाच्च स मुनिर्हतविद्यो बभूव ह ।।तदाऽऽजगाम दुःखार्तो रविस्थानं च पुण्यदम् ।। २ ।।संप्राप्य तपसा सूर्य्यं कोणार्के दृष्टिगोचरे ।।तुष्टाव सूर्य्यं शोकेन रुरोद च पुनः पुनः ।। ३ ।।सूर्य्यस्तं पाठयामास वेदवेदाङ्गमीश्वरः ।।उवाच स्तुहि वाग्देवीं भक्त्या च स्मृतिहेतवे ।। ४

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हमारी संस्कृति के घरोहर ।

हमारी संस्कृति के घरोहर । -श्रीमद्वासुदेव मिश्रशर्म्मा अनन्तं शास्त्रं बहुवेदितव्यं स्वल्पश्चकालो बहवश्च विघ्नाः ।यत्सारभूतं तदुपासनीयं हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात्॥ सनातन संस्कृति में शास्त्रों की सङ्ख्या अनन्त कहागया है । परन्तु हमारा आयु सीमित है । अतः जैसे हंस पानी में से दुध छान कर पी जाता है, हमें भी शास्त्रों का सार जान लेना चाहिए ।

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Modern science & Me

MODERN SCIENCE & ME.– Basudeba Mishra A scientific group wanted to know my views on science before admitting me. This was my reply. I am a believer of logic. I apply logic to everything. I do not accept or reject anything till I find a logical answer. I leave it open without any conclusion. I

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नोदन तथा अभिघात कर्म्म का प्रतिपादन

नोदन तथा अभिघात कर्म्म का प्रतिपादन– वासुदेव मिश्र “नोदनविशेषाभावान्नोर्ध्वं न तिर्यग्गमनम्। प्रयत्नविशेषान्नोदन विशेषः। नोदनविशेषादुदसनविशेषः।” यह कणादसूत्र के पञ्चमाध्याय प्रथमान्हिक के अष्टम, नवम तथा दशम सूत्र है। पञ्चमाध्याय में कर्म्म का प्रतिपादन कियागया है। यह 3 सूत्र नोदन विशेष से जात क्रिया के नियम है। नोदन (coupling) संयोग विशेष है। इन सूत्रों का अर्थ है –

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सृष्टिरहस्य

सृष्टिरहस्य।– श्रीमद्वासुदेव मिश्रशर्म्मा कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति ॥ मुण्डकोपनिषत् १.१.३ ॥ कुछ शिष्यों ने शौनक महर्षि से प्रश्न किया – वह कौन सी ज्ञान है, (Grand Unified Theory or Theory of Everything) जिसको जानने से सब कुछ जाना जा सकेगा । ऋषि ने उत्तर दिया – द्वे विद्ये वेदितव्ये इति ह स्म यद्ब्रह्मविदो

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