Shatapatha text test
अथापिधायोपनिष्क्रामति । रक्षोभ्यो ह्यबिभयुरथाहादित्येभ्योऽनुब्रूहीत्यत्रसम्पश्येद्यदि कामयेताश्राव्य त्वेव सम्पश्येदादित्येभ्यः प्रेश्य प्रियेभ्यःप्रियधामभ्यः प्रियव्रतेभ्यो महस्वसरस्य पतिभ्यउरोरन्तरिक्षस्याध्यक्षेभ्य इति वषट्कृते जुहोति नानुवषट्करोति नेत्पशूनग्नौप्रवृणजानीति प्रयच्छति प्रतिप्रस्थात्रे संस्रवौ ॥ ४.३.५. फिर धारण करके निकल जाता है। क्योंकि वे राक्षसों से भयभीत नहीं होते। फिर कहता है कि आदित्यों के लिए अनु.वचन कहो। यहाँ देखता है, यदि वह चाहता है तो उसे श्रव्य भी […]
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