Essays of gurudeva

वेद स्तुति (नाम-रूप-कर्म) मीमांसा – 3

षट्त्रिंशत्तत्त्वानि विश्वम्। (पर्शुरामकल्पसूत्रम्)। यह विश्व छत्तिश तत्त्वों का समाहार है। यह तत्त्व क्या हैं?

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वेद स्तुति (नाम-रूप-कर्म) मीमांसा – 2

रूपँ रूपक्रि॒याया॑म्, रुपँऽ वि॒मोह॑ने अथवा रु॒ङ् गतिरोष॒णयोः॑ धातु से रूप शब्द निष्पन्न हुआ है। अनेक अवयव द्रव्यगत अनेक रूपों का एक रूप कार्य होता है (रूपाणां रूपम् – रूपयुक्त द्रव्यों के समूह का एक रूप होता है)। अनेकद्रव्य समवेतत्व रूपविशेष होने पर (अनेकद्रव्यवत्व, उद्भूतत्व, रूपवत्व के रहने पर) रूप का प्रत्यक्ष होता है (अनेकद्रव्यसमवायाद् रूपविशेषाच्च

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Interpreting sat-chit-aananda – सत्-चित्-आनन्द

by Basudeba Mishra I will not comment on the interpretation of others, but will confine to the Vedic interpretation based on पर्शुरामकल्पसूत्रम्, छान्दोग्य उपनिषत् and allied texts.  Incidentally, Vedanta is not an independent thought, but resolves the apparent contradictions among the Upanishads. Hence, its original name is Uttara Mimaamsaa (the last resolution). There are two

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कौन अवतार ग्रहण करते हैं ।

कर्म हि जगत् के प्रतिष्ठा का कारण है (न हि कश्चित्क्षणमपि जातु  तिष्ठत्यकर्मकृत् – गीता 3-5) । सततचलन रूपी कर्म के कारण इसे जगत् कहा जाता है (गच्छतीति जगत्) । अपेक्षाबुद्धि (इच्छित फल लाभ करने की आशा) से जो कर्म किया जाता है, उसमें प्रतियत्न रूपी संस्कार (inertia) का उदय होता है । उपेक्षाबुद्धि से

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वैदिक अवतारवाद का वैज्ञानिक विश्लेषण

भगवद्गीता 4.7 में श्रीकृष्ण जी ने कहा है – “यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ।।” जब जब धर्म का ग्लानिः (बल का नाश, रोग) होता है, अधर्म का अभ्युत्थान (वृद्धि) होता है,  तब तब मैं ही अपने को (साकार रूप से) सृजन (सृ॒जँ॒ विस॒र्गे – प्रकट) करता हुँ (पृथ्वी पर अवतार लेता

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Vyasa Sewaka
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