Essays of gurudeva

हमारी संस्कृति के धरोहर ।

हमारी संस्कृति के धरोहर ।श्रीमद्वासुदेव मिश्रशर्मा अनन्तं शास्त्रं बहुवेदितव्यं स्वल्पश्चकालो बहवश्च विघ्नाः ।यत्सारभूतं तदुपासनीयं हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात्॥ सनातन संस्कृति में शास्त्रों की सङ्ख्या अनन्त कहागया है । परन्तु हमारी आयु सीमित है । अतः जैसे हंस पानी में से दुध छान कर पी जाता है, हमें भी शास्त्रों का सार जान लेना चाहिए । हमारे […]

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पुराणों के दशलक्षण ।

श्रीमद्वासुदेव मिश्रशर्मा पुराणों के दशलक्षण । अत्र सर्गो विसर्गश्च स्थानं पोषणमूतयः । मन्वन्तरेशानुकथा निरोधो मुक्तिराश्रयः ॥ श्रीमद्भागवतम् द्वितीयस्कन्ध दशमोऽध्यायः में पुराणों के दशलक्षण नहीं, परन्तु श्रीमद्भागवत के विषयवस्तु का निर्द्देश हैं । यह है सर्ग, विसर्ग, स्थान, पोषण, ऊति (कर्मवासना से बन्धन), मन्वन्तर, ईशानुकथा, निरोध, मुक्ति, आश्रय । श्रीमद्भागवतपुराणम् द्वादशस्कन्धः सप्तमोऽध्य़ायः  में पुराणों के दशलक्षण

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ज्योतिष

ज्योतिष । श्रीमद्वासुदेव मिश्रशर्म्मा वेद हि यज्ञार्थमभिप्रवृत्ताः कालानुपूर्व्या विहिताश्च यज्ञाः ।तस्मादिदं कालविधानशास्त्रं यो ज्योतिषं वेद स वेद यज्ञान् ॥ याजुषज्योतिषम् ३॥ ज्योतिषामयनं चक्षुः । ज्योतिष वेद के चक्षुस्थानीय है, जिससे भूत-भविष्यत जाना जा सकता है । वेदाङ्गज्योतिष कालगणना शास्त्र है । लगध कृत ऋक्, यज्जुः, अथर्व ज्योतिष प्राप्त होते हैँ । ज्योतिशील पिण्ड यय़ा स्वज्योति

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छन्दः

छन्दः । श्रीमद्वासुदेव मिश्रशर्म्मा। मा छन्दः । प्रमा छन्दः । प्रतिमा छन्दः । ऽ अस्रीवयश्छन्दः । पङ्क्तिश्छन्दः । ऽ उष्णिक् छन्दः । बृहती छन्दः । ऽअनुष्टुप् छन्दः । विराट् छन्दः । गायत्री छन्दः । त्रिष्टुप् छन्दः । जगती छन्दः ॥ शुक्लयजुर्वेदः –१४.१८ ॥पृथिवी छन्दः । ऽअन्तरिक्षं छन्दः । द्यौश्छन्दः । समाश्छन्दः । नक्षत्राणि छन्दः ।

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व्याकरणम् ।

व्याकरणम् । श्रीमद्वासुदेव मिश्रशर्म्मा। मुखं व्याकरणं स्मृतम् – व्याकरण वेद का मुखस्थानीय है । अर्थात् पदपदार्थज्ञानशक्ति है । व्यक्त, व्युत्पन्न एवं सार्थक शब्द ही संस्कृतभाषाको अन्यतरीभाषासे विशेष वनाता है । शब्द तथा अर्थका सम्पूर्ण समन्वय ही वागार्थ है । कोष तथा व्याकरणके द्वारा उस शब्दभण्डारकी सृष्टि तथा चयन एवं समीचिन प्रयोग का यत्किञ्चित शक्ति आती

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Vyasa Sewaka
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