पञ्चम सुमन · प्रकरण 11

अन्नप्राशन- रहस्य

मुद्रित पृष्ठ 245–246 2 पृष्ठ

245है । इससे वह प्रेरणा करती है कि अब इसकेलिए शनैःशनैः स्वतन्त्रतासे अन्नका अभ्यास अपेक्षित है । इस प्रकार उस शिशुकी क्रम - क्रमसे शारीरिक - स्वतन्त्रतार्थ ' अन्नप्राशन ' संस्कार किया जाता है कि — यह केवल परावलम्बी न बना रहे । धीरे - धीरे स्वाबलम्बी बन जाय । यही माताका भोजन लेनेवाला शिशु समयपर ऐसा स्वतन्त्र हो जाय कि स्वयं भी अपना भोजन जुटावे और समर्थ होकर फिर माता - पिताको भी स्वार्जित भोजन खिलावे – यह उदात्त भावना भी इस संस्कारमें निहित होती है । इस संस्कार से धीरे- धीरे अन्न अभ्यस्त होकर शिशु क्रमशः स्तन्य ( माताके दूध ) को छोड़ देता है, जिससे माताकी निर्बलता तथा पीने से होनेवाली माता की पीड़ा हट जाती है । शास्त्रीय अन्न खानेसे अन्नसंकरता ह जाती है । इसमें बालकके भविष्य स्वभावकी परीक्षा भी हो जाती है । उसके आगे पुस्तक, शस्त्र, वस्त्र, खिलौना आदि रक्खे जाते हैं । वह जिस वस्तुको पहले उठावे, उसमें उसकी भविष्यकी वृत्ति अनुमित हो जाती है । अन्नप्राशनसे शिशुके मुखसे स्तन्यपानजन्य गन्ध भी क्रमशः दूर हो जाता है, आगे अन्न खानेका उसका अभ्यास बढ़ता है । तेजकी वृद्धिकेलिए उसे दधि - मधुसे मिला भोजन कराया जाता है ।

सूचना – पृष्ठ २११ पं ० १७ में ' बालकोंका भी अग्निसंस्कार ' इसके आगे ' नहीं किया जाता । इस वचन में अन्त्येष्टिको भी अग्नि- संस्कार ' यह छूटी हुई पंक्ति पढ़ें ।

246( ८ ) चूडाकरण - रहस्य

' चूडाकर्म कुलोचितम् ' ( व्यास ० ११८ )

यह संस्कार पहले वा तीसरे वर्ष अथवा कुलधर्मानुसार करना पड़ता है । माताके गर्भ से आये हुए बाल अशुद्ध होते हैं, इधर वे झड़ते रहते हैं, उनसे शिशुके तेजकी वृद्धि नहीं हो पाती । उन केशोंको मुडवाकर शिशुकी शिखा रक्खी जाती है, जिससे वह कर्मके योग्य हो सके । शिखासे आयु एवं तेजकी वृद्धि होती है । इन्द्रशक्ति प्राप्त होती है । कम - से - कम एक वर्ष देरी इस कारण की जाती है कि उसके सिरकी कोमल त्वचा कुछ कठोर हो जाय, चुरके प्रयोगको सह सके ।

दाँत निकलनेके समय बालकको अनेक प्रकारके सिरके रोग होते हैं । छठे मास से बच्चा दाँत निकालने लगता है, तीन वर्ष में जाकर दाँत प्रायः बन जाते हैं । तन्मूलक शिरोरोग वृद्धि न पावें, अतः उसका सावधानतासे मुण्डन करना पड़ता है । फिर सिरपर माखन - दही आदि लगानेसे वे शिरोरोग दूर हो जाते हैं । किसीका सिर पक गया हो, फोड़े - फुंसियाँ निकल आई हों तो सिरके बाल कटानेसे ही आराम आता है; क्योंकि —- तब सुविधापूर्वक दवाईका लेप लग सकता है और लाभ पहुँचाता है । उस समय सिरमें उष्णता बढ़ जाती है । इधर बाल रहनेसे वह गरमी न निकल पानेसे ही वे शिरोरोग हो जाते हैं, साथ ही दस्त भी लग जाते हैं, जुएँ भी पड़ जाती हैं, आंखें भी आ जाती हैं । मुण्डन हो जानेसे, बाह्य वायुके लगनेसे तथा माखन लगा देनेसे, सिरके अन्दर ठंडक

In English

Annaprashan and Chudakarma Rituals

This text explains the rituals of introducing solid food to an infant and shaving the child's head. It describes how these rites promote independence, physical health, and the prevention of skin ailments.

This chapter answers

  • Purpose of annaprashan sanskar?
  • How to predict a child's future temperament?
  • Benefits of shaving a baby's head?
  • Why is a shika left on the head?
  • How to treat skin ailments in infants through hair removal?

Also written: Annaprashana, Rahasya, Annaprashana Rahasya, अन्नप्राशन- रहस्य

मूल ग्रन्थ

यह पाठ सनातन धर्मालोक ५के मुद्रित पृष्ठ 245–246 से ज्यों-का-त्यों लिया गया है — न कुछ जोड़ा गया है, न घटाया। स्कैन किया हुआ मूल पृष्ठ देखनेके लिये —

पृष्ठ 245 से मूल ग्रन्थ पढ़ें →