पञ्चम सुमन · प्रकरण 12

चूडाकरण - रहस्य

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247पहुँच जाने से उन रोगोंकी शङ्का नहीं रह जाती वा कम पड़ जाती है । सिर हल्का हो जाता है, बालकके चर्मसम्बन्धी तथा भीतरी सिरकी गरमी से होनेवाले अन्य रोग हट जाते हैं ।

इसके अतिरिक्त माताके गर्भ से आये हुए बाल बहुत कोमल होने से गिरते रहते हैं । मुण्डनके पश्चात् उगनेवाले बाल पुष्ट वाढ होते हैं, पहले की तरह टूटते नहीं । खोपड़ी भी दृढ़ होजाती है । शिरोमुण्डन हो जानेसे खून भी सिरकी ओर ठीक गति करने लगता है, तथा सिरके सब स्थानोंमें बराबर पहुँचता है । ' सुश्रुतसंहिता ' चिकित्सा-

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. स्थान ( २४/७ १ ) में कहा है- ' पापोपशमनं केशनखरोमापमार्जनम् । हर्षलाघवसौभाग्यकरमुत्साहवर्धनम् ' ॥ ( केश, नख और रोमका कटा देना पापकी शान्ति करनेवाला, हर्ष, हल्कापन और शोभाका देनेवाला तथा उत्साह बढ़ानेवाला है । )

' चरकसंहिता ' के सूत्रस्थान ( ५६ ) में भी केशकर्तन पौष्टिक तथा आयुष्यवर्धक एवं मलरूप- पाप निवारक माना गया है । इससे बच्चोंके सिरमें ठंडक पहुँचकर रोगोत्पादक गरमी नष्ट होती है । इस कारण उसे चतूरोग भी नहीं होता । शिशुके प्रथम वर्षमें पहली दाढ़े ' आती हैं, अन्तिम तीसरे वर्ष में अन्य दाढ़े उगती हैं । इसी प्रथम वा तृतीय वर्ष में शिरोरोगोंकी, आँखें आनेकी विशेष आशङ्का रहती है । अतः वपन भी इन्हीं वर्षों में किया जाता है । साथ ही चूडा ( शिखा ) भी रक्खी जाती है । समन्त्रक चूडाकरणसे आयुवृद्धि, जठराग्निसंदीपन, बलवृद्धि तथा सौभाग्यबल होता है । यह हिन्दुत्वको बाह्यमें प्रकट करनेवाला विशेष संस्कार है, 248क्योंकि इसीमें जातीय - चिह्न शिखा रक्खी जाती है । जैसे रानाका चिह्न ध्वजा होता है, वैसा यह भी हिन्दुत्वका ध्वज है । इस शिखाका महत्त्व पहले वर्णित किया जा चुका है ।

( E ) कर्णवेध - रहस्य

' कृतचूडस्य बालस्य कर्णवेधो विधीयते । ' ( व्यासस्मृति १ । १८ ) जिसका चूडाकरण हो गया हो, उस वालकका कर्णवेध करना चाहिये ।

शिखायुक्त पाँचवें वर्षके बालकका यह संस्कार किया जाता है । इसमें दोनों कानोंमें वेध करके उसकी नसको ठीक रखने के लिए उसमें सुवर्णका कुण्डल धारण किया जाता है । इससे शारीरिक रक्षा होती है । ' सुश्रुतसंहिता ' सूत्रस्थान में कहा है-

' रक्षाभूषणनिमित्तं वालस्य कर्णौ विध्येते । तौ षष्ठे मासि सप्तमे वा शुक्लपक्षे, प्रशस्तेषु तिथिकरणमुहूर्तनक्षत्रेषु कृतमङ्गल- स्वस्तिवाचनं धात्र्यङ्के कुमारमुपवेश्य... विध्येत् । पूर्वं दक्षिणं कुमारस्य, वामं कुमार्याः । ' ( १६।३ )

( रक्षा और आभूषणकेलिए बालकके दोनों कान छेदे जाते हैं । छठे या सातवें महीने में शुक्लपक्षके अन्तर्गत उत्तम तिथि, करण, मुहूर्त और नक्षत्रमें माङ्गलिक कृत्य एवं स्वस्तिवाचन करके कुमारको माताके अङ्कमें बिठाकर उसके दोनों कान छेदने चाहियें । • यदि पुत्र हो तो पहले दाहिना कान छेदे और कन्याका पहले बायाँ कान छेदना चाहिये । )

सुवर्ण शिशुके शरीर से स्पृष्ट रहे - इस कारण यह संस्कार

249कर्णवेध - रहस्य

किया जाता है । सुवर्णस्पृष्ट शरीर कीटाणुओं के संक्रमण न होनेसे स्वस्थ तथा शतायु रहता है । जैसा कि वेद में कहा है- ' नैनं रक्षांसि न पिशाचाः सहन्ते ' ' यो विभर्ति दाक्षायणं हिरण्यम् । ’ ( शौ ० अथर्व सं ० ११३५२ ) ' जरामृत्युर्यो विभति । ' ( अथ ०१६।२६।१ ) ( जो दाहिने कानमें सुवर्ण धारण करता है, उसके तेजको राक्षस और पिशाच नहीं दवा सकते | )

यह संस्कार मनुस्मृति तथा गृह्यसूत्रों में नहीं आया; परन्तु ' सुश्रुतसंहिता ' ( सूत्रस्थान १६ । ३ ) तथा व्यासस्मृति ( १1१८ ) में सूचित है । कात्यायनगृह्यसूत्रमें भी इसकी सत्ता सुनी जाती है । मनुजीको भी यह संस्कार - ' यज्ञोपवीतं वेदं च शुभे रौक्मे च कुण्डले । ' ( ४।३६ ) इस वचनमें कहे हुए सुवर्ण कुण्डल

- - धारणसे इष्ट अवश्य प्रतीत होता है । कर्णवेध विशेष- रोगोंको निवृत्तिके लिए भी है । सात प्रकार के अण्डवृद्धिके रोग हुआ करते हैं । उनमें सातवाँ भेद अन्त्र अण्डवृद्धि ( हर्निया ) भी है । उसके उपशमनार्थ कर्णवेध संस्कार भी उपाय है; क्योंकि कानकी नसका अण्डकोषकी नसके साथ सम्बन्ध हुआ करता है । ' सुश्रुतसंहिता ' के चिकित्सितस्थानमें — ‘ शङ्खोपरि च कर्णान्ते त्यक्त्वा यत्नेन सेवनीम् । व्यत्यासाद् वा शिरां विध्येद्न्त्रवृद्धिनिवृत्तये ' । ( १६।२१ ) ( गलेसे ऊपर, कानके निचले भाग में, सेवनी ( सीवनके स्थान ) को यत्नपूर्वक छोड़कर अथवा व्यत्यासपूर्वक ( दाहिने ओरकी आँत बढ़ी हो तो बायें कान और बायें ओरकी बढ़ी हो तो दाहिने कानकी ) नसको छेदे । इससे आँतकी वृद्धि दूर होती है । )

250श्रीसनातनधर्मालोक ( २ )

इस प्रकार कही हुई अन्त्रवृद्धिसे भावी रोगकी आशङ्काको हटानेकेलिए कर्णवेध हुआ करता है । इसलिए लघुशङ्का आदिके समय यज्ञोपवीत - सूत्रको कानपर लपेटा जाता है, वहाँ भी यही कारण है । उस समय मूत्र अण्डवृद्धिको आशङ्का के दूरीकरणार्थ वैसा किया जाता है ।

इस समय कानोंकी त्वचा कोमल होनेसे तथा बच्चे के कुछ बलवाला होनेसे यह संस्कार करना ठीक भी है । आगे क्रम - क्रमसे लड़केकी कर्ण - त्वचा कड़ी होती जाती है; उस समय बालक कर्ण- वेधनमें बाधा उपस्थित करता है । इस कर्णवेध तथा उस स्थान में सुवर्ण - धारण करनेसे बढ़ने की आशङ्कावाला अण्डकोष वा नल प्रकृतिस्थ रहता है । अण्डकोष स्थित जल भी क्षीण हो जाता है । तन्मूलक पुरुषकी नपुंसकता तथा स्त्रीका वन्ध्यात्व भी दूर हो जाता है । कर्णेन्द्रियकी नसोंका सम्बन्ध वीर्यवाहिनी नसोंसे हुआ करता है;, तब यह संस्कार अण्डवृद्धिसे अतिरिक्त पुस्त्वनाशकं रोगोंसे संरक्षण करनेवाला भी सिद्ध हुआ ।

( १० ) उपनयन रहस्य

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( क ) विप्रो गर्भाष्टमे वर्षे क्षत्र एकादशे तथा ।

द्वादशे वैश्यजातिस्तु व्रतोपनयमर्हति ॥ ( व्यासस्मृति १।१६ )

ब्राह्मण - बालक गर्भसे आठवें वर्ष में, क्षत्रिय बालक ग्यारहवें वर्ष में और वैश्य जातिका बालक बारहवें वर्ष में ब्रह्मचर्यव्रत की दीक्षा एवं उपनयन संस्कारका अधिकारी होता है ।

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्योंका यह संस्कार आठ, ग्यारह, बारह

251उपनयन- रहस्य III वर्षोंमें किया जाता है । पहले जीव माता - पिताके गर्भमें शरीर- धारणार्थ आता है, फिर आचार्य के गर्भ ( आचार्यकुल ) में विद्या- शरीर प्राप्त्यर्थ जाता है; अतः यह संस्कार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यका एकजत्वसे द्विजत्व - सम्पादक है । यह संस्कार आचार्यकुलमें विद्याग्रहण करनेकेलिए अधिकार पट्ट है । शूद्रको इसका अधिकार नहीं; क्योंकि उसकेलिए अन्य कठिन कार्य हैं- जिनसे वह संसारकी सेवा करता है । इधर के कठिन कार्योंमें भी प्रवृत्त होनेसे उसकी ' इतो भ्रष्टस्ततो नष्टः ' की आशङ्का रहती है । देशकी भी महती हानि होती है ।

उपनयनमें मौञ्जी भी धारण करनी पड़ती है । वह अण्डवृद्धि रोगकी आशङ्काको दूर करनेवाली भी होती है । उपनयन द्विजत्वका विशेष संस्कार है । इस संस्कार में भिक्षा भी की जाती है; उसमें एक तो धनी - निर्धनकी समता, दूसरा देशका ऋण अपने ऊपर चढ़वाना लक्ष्य है, जिससे हम अपने आपको देशका ऋणी समझकर आगे देशका ऋण - संशोधन करने के उपलक्ष्य में देशकी सेवा कर सकें ।

यह संस्कार भी लड़कियोंका नहीं होता । उनका पतिके पास वैध - नयनरूप विवाह ही द्विजत्व - सम्पादक उपनयन है । वैवाहिक वरदत्त उपवस्त्रको ही विवाहतक यज्ञोपवीतकी तरह लपेटना कन्याओंका उपनयनसूत्र - धारण होता है । वैवाहिक स्वयोग्य कई मन्त्रोंका वरके आश्रयसे ( जैसे कि माणवक पहले आचार्यके आश्रय से गायत्री मन्त्रको बोलता है ) बोलना ही उनका वेदारम्भ 252२५४. श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ )

( मनु ० २२६५ ) । केशान्त में शिखातिरिक्त केशोंका छेदन इष्ट है, शिखाका छेदन इष्ट नहीं । उसका श्रीमनुके मतमें उष्ण देश - काल से भी कुछ सम्वन्ध नहीं । ' केश ' से ' शिखा ' का ग्रहण भी नहीं होता; तभी — ' केशा न शीर्षन् यशसे, श्रियै शिखा ( यजु ० १६।६२ ) । ' इस मन्त्रमें केश और शिखाको पृथक - पृथक कहा है; और ब्राह्मणादिका १६-२२-२४ वर्ष में उष्णता से कोई भी सम्बन्ध नहीं । : इस संस्कारको आश्वलायनगृह्यमें पृथक नहीं माना गया । इसीको सूत्रग्रन्थोंमें ' ' गोदान ' शब्दसे भी कहा है । ' रघुवंश ' के ३।३३ पद्यकी व्याख्यामें श्रीमल्लिनाथने ' गोदान ' का – -'गावो

' - लोमानि, केशा दीयन्ते - खण्ड्यन्तेऽस्मिन्निति व्युत्पत्त्या ' गोदानं नाम ब्राह्मणा- दीनां षोडशादिषु वर्षेषु कर्तव्यं केशान्ताख्यं कर्म उच्यते । ' यह अर्थ किया है । यह मध्यम शिरोमुण्डन है ।

( १२ ) समावर्तन ( स्नान ) संस्कार

' समाप्य वेदान् वेदौ वा वेदं वा प्रसभं द्विजः ।

• स्नायीत गुर्वभ्यनुज्ञातः प्रवृत्तोदितदक्षिणः ' ॥

( व्यासस्मृति १/४२ )

द्विज को चाहिये कि तीन, दो या एक वेदको पूर्णरूपसे समाप्त करके गुरु - दक्षिणा देकर उनसे आज्ञा ले व्रतान्त - स्नान ( समावर्तन- संस्कार ) करे ।

: इस संस्कार में विद्या- समाप्ति होती है । २४ वें वर्षमें आचार्य- कुलमें विशेष स्नान भी करना होता है । ब्रह्मचर्यके चिह्न मेखला आदिका त्याग करना पड़ता है । जदा - लोम आदिका छेदन करके

253विवाह तथा अग्न्याधानका - रहस्य २११. गार्हस्थ्यके उपयुक्त चन्दन, पुष्पमाला, पगड़ी, भूषण, शीशा देखना सुरमा लगाना, छाता करना, जूता पहनना यह नियम आचार्यकी देख - रेख में किये जाते हैं । फिर आचार्यको दक्षिणा देकर आचार्य- कुलको छोड़कर अपने घरमें आ जाना पड़ता है । ऐसा नियम. ठीक भी था । विद्याकी प्राप्ति आचार्यकुलमें जैसी हो सकती है, वैसी अपने घर में नहीं । घरमें कई विघ्न आते हैं । लड़का घरमें उतने नियम पालन भी नहीं कर सकता । पिता आदिका गुरु - इतना भय भी नहीं रहता । आचार्यकुलमें आचार्यके भयसे तथा अन्य साथियोंके देखनेसे नियमोंके अनुसरण में प्रेरणा एवं प्रोत्साहन. प्राप्त होता है । विद्या एवं व्यायामके अतिरिक्त वहाँ पर कोई कार्य नहीं करना पड़ता । गुरु - शुश्रूषा के निमित्तसे वटु स्वकार्य - पटु भी हो जाता है । घर में रहनेवाले लड़केकी भांति वह आलसी नहीं रहता । इसमें अन्तमें उपदेश दिया जाता है कि जो विद्या पढ़ी है, जो आचार - विचार सीखे हैं, जो ज्ञान लिया है, इनका ' अधीति- बोधाचरणप्रचारणैः ' से जीवनमें उपयोग लो । उनके स्वयं उदाहरण बनो, दूसरोंमें उनका प्रचार करो । इस संस्कार में ब्रह्मचर्याश्रमकी समाप्ति होती है ।

( १३ ) विवाह तथा अग्न्याधानका रहस्य

' एवं स्नातकतां प्राप्तो द्वितीयाश्रमकाङ्क्षया । प्रतीक्षेत विवाहार्थ- मनिन्द्याऽन्वयसम्भवाम् ' ( व्यासस्मृति २1१ ) । ' अनन्यपूर्विका लघ्वीं विख्यातदशपुरुषाम् ' ( ३ ) ।

. इस प्रकार स्नातक होकर दूसरे आश्रम ( गार्हस्थ्य ) में प्रवेश 254करने की इच्छासे विवाह के लिए उच्चकुलकी कन्याको ग्रहण करे वह कन्या किसी दूसरेको न तो ढ़ी गयी हो और न किसीकी पत्नी ही रह चुकी हो । अवस्था में अपने से छोटी हो और उसकी ऊपरकी दस पीढ़ियों में सभी लोग अपने शुद्ध आचार - विचार के लिए विख्यात रहे हों |

यह संस्कार विद्यासमाप्तिके बाद पितृऋणशोधनार्थ किया जाता है । इसमें विधिपूर्वक दारवहन — स्त्रीग्रहण किया जाता है । विवाह करके फिर विद्याग्रहण हो भी नहीं सकता । अतः विद्यार्थीको सदा विद्यास्नान समाप्त करके ही विवाह कराना चाहिये । इससे कामका केन्द्र उसकी पत्नी रहती है; अन्यत्र उसका दृकूपात वा गमन नहीं होता । काम एक स्वाभाविक वस्तु है, परमात्माकी सृष्टि बढ़ाने का एक साधन है । जो जितेन्द्रिय होकर रह सकते हैं, वे भले ही नैष्ठिक ब्रह्मचारी रहें, पठन - पाठन प्रचारण आदिके द्वारा लोकोपकारका कार्य करते रहें; पर अकेला पुरुष प्रसन्न नहीं रहता । ' तस्माद् एकाकी न रमते ' ( शत ० १४ | ४ | २ | ४ )

संसारमें एक दूसरे साथीकी भी अवश्य आवश्यकता पड़ती है, जो कि हमारा शेष - पूरक हो । पुरुषका बाहर आने - जानेका रहता है; क्योंकि उसे वृत्ति भी तो करनी होती है और घर में धर्म- कर्म भी करना होता है, अतः उसे गृहपत्नी भी तो चाहिये, जो उसका सर्वकर्मका निर्वाह कर सके, उसकी सेवा कर सके, जिससे वह अपने धर्म - कर्म में निश्चिन्ततासे लगा रहे; और वृत्ति भी कर सके; और घरकी रक्षा भी हो सके, घरमें ताला बन्द न करना पड़े ।

In English

Head Shaving and Ear Piercing

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Also written: Chudakarana, Rahasya, Chudakarana Rahasya, चूडाकरण - रहस्य

मूल ग्रन्थ

यह पाठ सनातन धर्मालोक ५के मुद्रित पृष्ठ 247–254 से ज्यों-का-त्यों लिया गया है — न कुछ जोड़ा गया है, न घटाया। स्कैन किया हुआ मूल पृष्ठ देखनेके लिये —

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