श्रीगणेशाय नमः।
सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 271–280
सनातन धर्मालोक ५ · पृष्ठ 271–280
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नामकरण - रहस्य २४१ द्विनामा ' इति ( काठक २६।१ ) ( कुछ लोगोंका कहना है कि दूसरा नाम रक्खा जाता है । त्राह्मण के दो नाम रखने चाहियें । इनमें ' पुत्रे जाते नाम धोयते ' के अनुसार जातकर्मके समय जो नाम रक्खा गया है, वह गोपनीय है । उसे गोपनीय रखनेका प्रयोजन यह है कि शत्रुओं द्वारा मारण - मोहन आदिका प्रयोग किये जानेपर वह नाम अप्रकट होने से कोई हानि न होगी; क्योंकि उसका कोई उच्चारण नहीं करता । प्रकट नाम तो वही है जो ग्यारहवें आदि दिनोंमें व्यवहारकेलिए रखा गया है । इसीलिए श्रुति कहती है, ब्राह्मण दो नामवाला होता है । ) इससे सूचित किया गया है कि जातकर्मके समयमें जो ज्योतिष आदिके अनुसार नाम आता है, उसे प्रसिद्ध नहीं करना चाहिये, इसलिए कि उस नामपर अभिचार- क्रिया कोई न कर सके, जिस का जन्म - नाम से ही विशेष सम्बन्ध हो सकता है । यह आचार ( जन्मनामको प्रसिद्ध न करना ) इतिहासमें मिलता भी है । पाणिनि, कात्यायन, वार्ष्यायणि, यास्क, औदुम्बरायण, गार्ग्य, शाकटायन आदि व्यावहारिक नाम हैं - यह पिताके नामसे रक्खे गये हैं; यह अपने नाम नहीं हैं; नहीं तो जब कि - ' कृतं कुर्यान्न तद्धितम् ' ' अवृद्धम् ' इस प्रकार आदि वृद्धिरहित तथा कृदन्तीय नाम रखना कहा है, तद्धितीयका निषेध किया है; तब ये तद्धितीय एवं आदि-वृद्धिसहित नाम क्यों रक्खे गये? स्पष्ट है कि - आत्मनाम ' न गृह्णीयात् ' इस स्मृति - वचनका हो अनुसरण किया गया है । इसीके अनुकरणमें अंग्रेजोंके तथा तदनुसारी हिन्दुस्थानियोंके नाम भी १६ स ० ध ०
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२४२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) एम. के. गान्धी, के. एल. मुंशी इत्यादि गुप्त नाम रखे जाते हैं । इंसी नामकरणके दिन नामके साथ ' शर्मा, वर्मा, गुप्त, दास ' आदि पितृवर्णिक चिह्न रखकर उसकी जातिका निर्धार जन्म से कर दिया जाता है । नामकरण कर देनेसे उस नामके साथ आत्मीयता, ममता तथा आकर्षण आदि उत्पन्न हो जाते हैं । शत्रुवाला नाम अपने लड़केका नहीं करना चाहिये । ( ६ ) निष्क्रमणसंस्कार - रहस्य ' ' अर्कस्येक्षा मासि चतुर्थके ' - ( व्यास ० १।१७ ) ( चौथे मासमें सूर्यका दर्शन करावे । ) यह संस्कार बालक - जन्मके चतुर्थ मासमें किया जाता है । इस में शिशुको सूर्य - दर्शन कराया जाता है । इसका यह तात्पर्य है कि-तीन मासतक बच्चेको घरके अन्दर रखना चाहिये; उसे तबतक सूर्यप्रकाशदर्शन न कराना चाहिये । इसमें कारण यह है कि-पहले तीन मासतक बच्चेकी आंखें कोमलतावश कच्ची होती हैं । यदि शिशुको शीघ्र ही सूर्यप्रकाश में लाया जायगा तो उसकी आंखों पर उसका दुष्प्रभाव पड़ेगा; भविष्य में उसकी आँखोंकी शक्ति या तो मन्द रहेगी या उसका शीघ्र ही ह्रास होगा । इस कारण हमारे यहाँकी नारियाँ छोटे बच्चेको शीशा भी नहीं देखने देतीं । इसका " कारण भी यही प्रतीत होता है कि शीशेकी चमक भी की आँखों को चौंधिया देती है जिससे उनकी हानिको सम्भावना रहतीहै । तीन मासतक शिशुका शक्ति - सचय हो जानेपर क्रम - क्रमसे घरके दीपककी ज्योति देखनेमें अभ्यस्त होकर तब उसकी आंखें बाह्य
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निष्क्रमण - रहस्य २४३ प्रकाशमें गमनके योग्य होती हैं, तब वैधसंस्कार हो जानेपर सूर्य की जीवनीशक्तिका तथा घरसे बाहरी शुद्ध वायुका भी बच्चे के अन्दर सञ्चार होता है, जिससे उसकी आयु और लक्ष्मीकी वृद्धि होती है । धीरे - धीरे बाहरी शीतोष्णके सहनयोग्य भी बनता है । घरमें रहनेकी कोमलता धीरे - धीरे हटकर हृष्ट - पुष्टताकी दिशा में प्रवृत्त होती है, सृष्टिके अवलोकनका शिक्षण भी प्राप्त होता है । बिना संस्कारके इस लाभप्राप्तिके सम्भव होनेपर भी वेदमन्त्र-पाठादि - क्रियासे वैध - संस्कार होनेपर - ' यदि तर्हि लोक एषु प्रमारणम्, किं शास्त्रेण क्रियते ' ( यदि इन कर्मों में लोक ही प्रमाण है तो शास्त्रसे क्या किया जाता है? ) इस प्रश्नमें- ' लोकतो ऽर्थप्रयुक्ते प्रयोगे शास्त्रेण धर्मनियमः क्रियते । अन्तरेणापि मन्त्रमग्निर्द-हनकर्मा कपालानि संतापयति; तत्र [ वेदमन्त्रप्रयोगसंस्कारे ] धर्मनियमः क्रियते । एवं क्रियमाणमभ्युदयकारि भवति । ' ( लोकसे प्रयोजनवश कार्यका आरम्भ होनेपर शास्त्र के द्वारा धर्मका नियम किया जाता है । यद्यपि बिना मन्त्रके भी दाहक अग्नि कपालोंको संतप्त कर ही देगी तथापि वहाँ वेदमन्त्र - प्रयोग-पूर्वक संस्कार करनेपर धर्मका नियम किया जाता है । इस प्रकार किया जानेवाला कर्म अभ्युदयकारक होता है । ) पस्पशाह्निकके महाभाष्यके इस उत्तरके अनुसार शिशुका अभ्युदय प्रवृत्त होता है । इस प्रकार रात्रिमें शिशुको चन्द्रदर्शन कराया जाता है, जिससे वह चन्द्रमासे भी प्रकाश तथा आह्लाद प्राप्त करे । आश्वलायन-गृह्यसूत्रमें इसका वर्णन नहीं है ।
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२४४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) बच्चोंके गलेमें रक्षापरिधान । आजकल दान्त निकलने के समय कष्ट न हो इसलिए बिजली के बने यन्त्र पहराये जाते हैं; जहांपर व्यर्थ व्यय अधिक होता है । यह कोई भिन्न वस्तु नहीं है; किन्तु प्राचीन रक्षा आदिका रूपान्तर ही है । यहांकी स्त्रियाँ कौड़ियाँ, शेर- रीछ आदिके नाखूनों को सोना चांदी - आदिमें मढ़वाकर बच्चोंको पहिनाती हैं । ' वर्च ' नामक औषधि और पीली सरसों बच्चे के गलेमें पहराये जाते थे । गोरी सरसों आदिसे दान्त शीघ्र निकल आते थे ' वचके धारण करनेसे बालक बुद्धिमान् होता था । परन्तु आश्चर्य है कि— नवीन सभ्यताको आश्रित करके हमने घरके विज्ञानको भुला दिया! ( ७ ) अन्नप्राशनसंस्कारका महत्त्व ' षष्ठे मास्यन्नमश्नीयात् ' ( व्यासस्मृति १।१८ ) छठे महीने में बालकको अन्न खिलाना चाहिये । यह संस्कार छठे मासमें किया जाता है । इससे माताके गर्भ में मलिनता - भक्षणका दोष नष्ट हो जाता है । अबतक शिशु माताके दुग्धरूप भोजन में ही अपना भाग लेता था । माता जो कुछ खाती थी, उससे अपने शरीरको भी पालती थी, शिशुके शरीरका भी पोषण करती थी; पर उसे सदा परतन्त्र रखना उचित नहीं होता । धीरे - धीरे उसे अपने पैरोंपर भी तो उठाना है, स्वावलम्बी भी तो बनाना है, उसे शारीरिक स्वतन्त्रताका भी तो ग्रहण करना है । माताके स्तन्यका अपेक्षी होनेपर माताके अस्वस्थ रहनेपर वह भी अस्वस्थ बना रहता है । एतदर्थ प्रकृति उसके दाँत उत्पन्न करती
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अन्नप्राशन- रहस्य २४५ है । इससे वह प्रेरणा करती है कि अब इसकेलिए शनैःशनैः स्वतन्त्रतासे अन्नका अभ्यास अपेक्षित है । इस प्रकार उस शिशुकी क्रम - क्रमसे शारीरिक - स्वतन्त्रतार्थ ' अन्नप्राशन ' संस्कार किया जाता है कि — यह केवल परावलम्बी न बना रहे । धीरे - धीरे स्वाबलम्बी बन जाय । यही माताका भोजन लेनेवाला शिशु समयपर ऐसा स्वतन्त्र हो जाय कि स्वयं भी अपना भोजन जुटावे और समर्थ होकर फिर माता - पिताको भी स्वार्जित भोजन खिलावे – यह उदात्त भावना भी इस संस्कारमें निहित होती है । इस संस्कार से धीरे-धीरे अन्न अभ्यस्त होकर शिशु क्रमशः स्तन्य ( माताके दूध ) को छोड़ देता है, जिससे माताकी निर्बलता तथा पीने से होनेवाली माता की पीड़ा हट जाती है । शास्त्रीय अन्न खानेसे अन्नसंकरता ह जाती है । इसमें बालकके भविष्य स्वभावकी परीक्षा भी हो जाती है । उसके आगे पुस्तक, शस्त्र, वस्त्र, खिलौना आदि रक्खे जाते हैं । वह जिस वस्तुको पहले उठावे, उसमें उसकी भविष्यकी वृत्ति अनुमित हो जाती है । अन्नप्राशनसे शिशुके मुखसे स्तन्यपानजन्य गन्ध भी क्रमशः दूर हो जाता है, आगे अन्न खानेका उसका अभ्यास बढ़ता है । तेजकी वृद्धिकेलिए उसे दधि - मधुसे मिला भोजन कराया जाता है । सूचना – पृष्ठ २११ पं ० १७ में ' बालकोंका भी अग्निसंस्कार ' इसके आगे ' नहीं किया जाता । इस वचन में अन्त्येष्टिको भी अग्नि-संस्कार ' यह छूटी हुई पंक्ति पढ़ें ।
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२०६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) ( ८ ) चूडाकरण - रहस्य ' चूडाकर्म कुलोचितम् ' ( व्यास ० ११८ ) यह संस्कार पहले वा तीसरे वर्ष अथवा कुलधर्मानुसार करना पड़ता है । माताके गर्भ से आये हुए बाल अशुद्ध होते हैं, इधर वे झड़ते रहते हैं, उनसे शिशुके तेजकी वृद्धि नहीं हो पाती । उन केशोंको मुडवाकर शिशुकी शिखा रक्खी जाती है, जिससे वह कर्मके योग्य हो सके । शिखासे आयु एवं तेजकी वृद्धि होती है । इन्द्रशक्ति प्राप्त होती है । कम - से - कम एक वर्ष देरी इस कारण की जाती है कि उसके सिरकी कोमल त्वचा कुछ कठोर हो जाय, चुरके प्रयोगको सह सके । दाँत निकलनेके समय बालकको अनेक प्रकारके सिरके रोग होते हैं । छठे मास से बच्चा दाँत निकालने लगता है, तीन वर्ष में जाकर दाँत प्रायः बन जाते हैं । तन्मूलक शिरोरोग वृद्धि न पावें, अतः उसका सावधानतासे मुण्डन करना पड़ता है । फिर सिरपर माखन - दही आदि लगानेसे वे शिरोरोग दूर हो जाते हैं । किसीका सिर पक गया हो, फोड़े - फुंसियाँ निकल आई हों तो सिरके बाल कटानेसे ही आराम आता है; क्योंकि —- तब सुविधापूर्वक दवाईका लेप लग सकता है और लाभ पहुँचाता है । उस समय सिरमें उष्णता बढ़ जाती है । इधर बाल रहनेसे वह गरमी न निकल पानेसे ही वे शिरोरोग हो जाते हैं, साथ ही दस्त भी लग जाते हैं, जुएँ भी पड़ जाती हैं, आंखें भी आ जाती हैं । मुण्डन हो जानेसे, बाह्य वायुके लगनेसे तथा माखन लगा देनेसे, सिरके अन्दर ठंडक
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चूडाकरण - रहस्य ३४७ पहुँच जाने से उन रोगोंकी शङ्का नहीं रह जाती वा कम पड़ जाती है । सिर हल्का हो जाता है, बालकके चर्मसम्बन्धी तथा भीतरी सिरकी गरमी से होनेवाले अन्य रोग हट जाते हैं । इसके अतिरिक्त माताके गर्भ से आये हुए बाल बहुत कोमल होने से गिरते रहते हैं । मुण्डनके पश्चात् उगनेवाले बाल पुष्ट वाढ होते हैं, पहले की तरह टूटते नहीं । खोपड़ी भी दृढ़ होजाती है । शिरोमुण्डन हो जानेसे खून भी सिरकी ओर ठीक गति करने लगता है, तथा सिरके सब स्थानोंमें बराबर पहुँचता है । ' सुश्रुतसंहिता ' चिकित्सा-1 . स्थान ( २४/७ १ ) में कहा है- ' पापोपशमनं केशनखरोमापमार्जनम् । हर्षलाघवसौभाग्यकरमुत्साहवर्धनम् ' ॥ ( केश, नख और रोमका कटा देना पापकी शान्ति करनेवाला, हर्ष, हल्कापन और शोभाका देनेवाला तथा उत्साह बढ़ानेवाला है । ) ' चरकसंहिता ' के सूत्रस्थान ( ५६ ) में भी केशकर्तन पौष्टिक तथा आयुष्यवर्धक एवं मलरूप- पाप निवारक माना गया है । इससे बच्चोंके सिरमें ठंडक पहुँचकर रोगोत्पादक गरमी नष्ट होती है । इस कारण उसे चतूरोग भी नहीं होता । शिशुके प्रथम वर्षमें पहली दाढ़े ' आती हैं, अन्तिम तीसरे वर्ष में अन्य दाढ़े उगती हैं । इसी प्रथम वा तृतीय वर्ष में शिरोरोगोंकी, आँखें आनेकी विशेष आशङ्का रहती है । अतः वपन भी इन्हीं वर्षों में किया जाता है । साथ ही चूडा ( शिखा ) भी रक्खी जाती है । समन्त्रक चूडाकरणसे आयुवृद्धि, जठराग्निसंदीपन, बलवृद्धि तथा सौभाग्यबल होता है । यह हिन्दुत्वको बाह्यमें प्रकट करनेवाला विशेष संस्कार है,
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२४८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) क्योंकि इसीमें जातीय - चिह्न शिखा रक्खी जाती है । जैसे रानाका चिह्न ध्वजा होता है, वैसा यह भी हिन्दुत्वका ध्वज है । इस शिखाका महत्त्व पहले वर्णित किया जा चुका है । ( E ) कर्णवेध - रहस्य ' कृतचूडस्य बालस्य कर्णवेधो विधीयते । ' ( व्यासस्मृति १ । १८ ) जिसका चूडाकरण हो गया हो, उस वालकका कर्णवेध करना चाहिये । शिखायुक्त पाँचवें वर्षके बालकका यह संस्कार किया जाता है । इसमें दोनों कानोंमें वेध करके उसकी नसको ठीक रखने के लिए उसमें सुवर्णका कुण्डल धारण किया जाता है । इससे शारीरिक रक्षा होती है । ' सुश्रुतसंहिता ' सूत्रस्थान में कहा है-' रक्षाभूषणनिमित्तं वालस्य कर्णौ विध्येते । तौ षष्ठे मासि सप्तमे वा शुक्लपक्षे, प्रशस्तेषु तिथिकरणमुहूर्तनक्षत्रेषु कृतमङ्गल-स्वस्तिवाचनं धात्र्यङ्के कुमारमुपवेश्य... विध्येत् । पूर्वं दक्षिणं कुमारस्य, वामं कुमार्याः । ' ( १६।३ ) ( रक्षा और आभूषणकेलिए बालकके दोनों कान छेदे जाते हैं । छठे या सातवें महीने में शुक्लपक्षके अन्तर्गत उत्तम तिथि, करण, मुहूर्त और नक्षत्रमें माङ्गलिक कृत्य एवं स्वस्तिवाचन करके कुमारको माताके अङ्कमें बिठाकर उसके दोनों कान छेदने चाहियें । • यदि पुत्र हो तो पहले दाहिना कान छेदे और कन्याका पहले बायाँ कान छेदना चाहिये । ) सुवर्ण शिशुके शरीर से स्पृष्ट रहे - इस कारण यह संस्कार
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कर्णवेध - रहस्य किया जाता है । सुवर्णस्पृष्ट शरीर कीटाणुओं के संक्रमण न होनेसे स्वस्थ तथा शतायु रहता है । जैसा कि वेद में कहा है- ' नैनं रक्षांसि न पिशाचाः सहन्ते ' ' यो विभर्ति दाक्षायणं हिरण्यम् । ’ ( शौ ० अथर्व सं ० ११३५२ ) ' जरामृत्युर्यो विभति । ' ( अथ ०१६।२६।१ ) ( जो दाहिने कानमें सुवर्ण धारण करता है, उसके तेजको राक्षस और पिशाच नहीं दवा सकते | ) यह संस्कार मनुस्मृति तथा गृह्यसूत्रों में नहीं आया; परन्तु ' सुश्रुतसंहिता ' ( सूत्रस्थान १६ । ३ ) तथा व्यासस्मृति ( १1१८ ) में सूचित है । कात्यायनगृह्यसूत्रमें भी इसकी सत्ता सुनी जाती है । मनुजीको भी यह संस्कार - ' यज्ञोपवीतं वेदं च शुभे रौक्मे च कुण्डले । ' ( ४।३६ ) इस वचनमें कहे हुए सुवर्ण कुण्डल - - धारणसे इष्ट अवश्य प्रतीत होता है । कर्णवेध विशेष- रोगोंको निवृत्तिके लिए भी है । सात प्रकार के अण्डवृद्धिके रोग हुआ करते हैं । उनमें सातवाँ भेद अन्त्र अण्डवृद्धि ( हर्निया ) भी है । उसके उपशमनार्थ कर्णवेध संस्कार भी उपाय है; क्योंकि कानकी नसका अण्डकोषकी नसके साथ सम्बन्ध हुआ करता है । ' सुश्रुतसंहिता ' के चिकित्सितस्थानमें — ‘ शङ्खोपरि च कर्णान्ते त्यक्त्वा यत्नेन सेवनीम् । व्यत्यासाद् वा शिरां विध्येद्न्त्रवृद्धिनिवृत्तये ' । ( १६।२१ ) ( गलेसे ऊपर, कानके निचले भाग में, सेवनी ( सीवनके स्थान ) को यत्नपूर्वक छोड़कर अथवा व्यत्यासपूर्वक ( दाहिने ओरकी आँत बढ़ी हो तो बायें कान और बायें ओरकी बढ़ी हो तो दाहिने कानकी ) नसको छेदे । इससे आँतकी वृद्धि दूर होती है । )
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श्रीसनातनधर्मालोक ( २ ) इस प्रकार कही हुई अन्त्रवृद्धिसे भावी रोगकी आशङ्काको हटानेकेलिए कर्णवेध हुआ करता है । इसलिए लघुशङ्का आदिके समय यज्ञोपवीत - सूत्रको कानपर लपेटा जाता है, वहाँ भी यही कारण है । उस समय मूत्र अण्डवृद्धिको आशङ्का के दूरीकरणार्थ वैसा किया जाता है । इस समय कानोंकी त्वचा कोमल होनेसे तथा बच्चे के कुछ बलवाला होनेसे यह संस्कार करना ठीक भी है । आगे क्रम - क्रमसे लड़केकी कर्ण - त्वचा कड़ी होती जाती है; उस समय बालक कर्ण-वेधनमें बाधा उपस्थित करता है । इस कर्णवेध तथा उस स्थान में सुवर्ण - धारण करनेसे बढ़ने की आशङ्कावाला अण्डकोष वा नल प्रकृतिस्थ रहता है । अण्डकोष स्थित जल भी क्षीण हो जाता है । तन्मूलक पुरुषकी नपुंसकता तथा स्त्रीका वन्ध्यात्व भी दूर हो जाता है । कर्णेन्द्रियकी नसोंका सम्बन्ध वीर्यवाहिनी नसोंसे हुआ करता है;, तब यह संस्कार अण्डवृद्धिसे अतिरिक्त पुस्त्वनाशकं रोगोंसे संरक्षण करनेवाला भी सिद्ध हुआ । ( १० ) उपनयन रहस्य -( क ) विप्रो गर्भाष्टमे वर्षे क्षत्र एकादशे तथा । द्वादशे वैश्यजातिस्तु व्रतोपनयमर्हति ॥ ( व्यासस्मृति १।१६ ) ब्राह्मण - बालक गर्भसे आठवें वर्ष में, क्षत्रिय बालक ग्यारहवें वर्ष में और वैश्य जातिका बालक बारहवें वर्ष में ब्रह्मचर्यव्रत की दीक्षा एवं उपनयन संस्कारका अधिकारी होता है । ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्योंका यह संस्कार आठ, ग्यारह, बारह