सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 761–770
सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 761–770
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युद्धमें गीताका सुनाना सम्भव ७३३ नहीं थे । इससे पूर्व सेनाओं के व्यूह रचे गये । वे बीर अपने-अपने नियत स्थानों में थे । कर्ण तो सारी सेनाके पीछे ही था । लक्षशः सेनाओं के पीछे ठहरे हुए कर्णके पास पहुँचने में कमसे-कम एक मील जाना तो अनिवार्य ही था । यह गमनागमन पैदल ही हुआ । प्रत्येक से संवाद, तथा दूसरेके पास पहुँचने में और पृथक् - पृथक् आशीर्वाद ग्रहण करने में प्रति १५ मिनट भी माने जाएँ; तो डेढ घण्टा तो इसीमें लगा । जब इस प्रकार इतने समयके बाद ही युद्ध शुरू हुआ; क्योंकि — पहले दिन सब कामोंमें सबको देरी लग जाना स्वाभाविक ही होता है; तो गीता सुनानेका समय निकालना असम्भव कैसे हो सकता है? तब स्पष्ट है कि भगवद्गीता महाभारतके समयकी ही है, पीछेसे प्रक्षिप्त नहीं की गई है । इसीके पद्य महाभारत में बहुत बार अनूदित किये गये हैं । इसके अतिरिक्त गीता में अपाणिनीय प्रयोग भी दीखते हैं । जैसे कि - ' निवसिष्यसि ( निवत्स्यसि ) ( १८ ), ' प्रसविष्यध्वम् ' ( प्रसूध्वम् ) ( ३।१० ), ' एतन्मे ( एतं मे ) संशयं ( ६: ३६ ) संयमतां ( संयच्छतां १०।२ ९ ), हे सखेति— ( हे सख इति ११।४१ ) महिमानं तवेदं ( इमं ) ( ११।४१ ) प्रियः प्रियायार्हसि ( प्रियाया असि ११।४४ ) ' शक्य अहं ( शक्योऽहम् ११।४८, ५४ ) । ' सेनानीनाम् ' ( सेनान्याम् १०।२४ ), ' जिज्ञासुरपि योगस्य ' ( योगं ६।४४ ) ' वक्तुमर्हसि आत्मविभूतयः ( विभूती: १०।१६ ), ' अपनुद्यात् ' ( नुदेत् २८ ) इत्यादि । इससे गीता पाणिनिसे पूर्वकालीन सिद्ध होनेसे महाभारतकालिक सिद्ध हो जाती है । महाभारतकाल श्रीपाणिनिसे प्राक्कालिक है; क्योंकि—
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७३४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) अष्टाध्यायी में महाभारतीय पात्रोंके नामोंकी सिद्धि आती है; और पापिनि महाभारत से कुछ पीछे हुए हैं - यह सर्वसम्मत है । इसके अतिरिक्त गीताका उपक्रम तथा उपसंहार भी महाभारतीय युद्ध ही सम्बद्ध है । इससे स्पष्ट है कि गीता महाभारतका ही है । ( १४ ) भगवद्गीताकी सर्वप्रियताका कारण । ' भगवद्गीता ' में कर्म है अथवा ज्ञान- इस विषय में बहुत समयसे विचार चल रहा है । एक पक्ष यह है कि - ' भगवद्गीता में केवल कर्म है, क्योंकि भगवद्गीता के उपक्रम- उपसंहारसे यही प्रतीत होता है 1 । उपक्रम में अर्जुन युद्धकेलिए उद्यत होकर भी उसमें गुरुओंको देखकर युद्ध - कर्म से हट गया । तब भगवान् ने उसे ' गीता ' सुनाई और अर्जुन युद्धार्थ उद्यत होगया । युद्ध क्षत्रियकां कर्म है; अतः गीताका विषय भी ' कर्म ' है । ' पर यह बात भी बुद्धिमें नहीं बैठती । यदि ' गीता'को केवल कर्म ही इष्ट हो, ज्ञान सर्वथा नहीं, तो ' दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय! बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः ( कर्म ) फलहेतवः ' ( २४६ ) । ( कर्म ज्ञानसे निम्न श्रेणीका है, ) ' सर्व कर्माखिलं पार्थ! ज्ञाने परिसमाप्यते ' ( ४ | ३३ ) ( ज्ञान होनेपर सब कर्मोकी समाप्ति हो जाती है । ) ' न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ' ( ४ । ३८ ) । ' ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ' ( ४ । ३१ ) ' सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ' ( ४।३६ ) ' ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन! ' ( ४३७ ) ' सर्वकर्माणि मनसा
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गीताकी सर्वप्रियताका कारण ७३५ = संन्यस्यास्ते सुखं वशी ' ( ५/१३ ) ' सर्वधर्मान् ( कर्माणि परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ' ( १८६६ ) इन पद्योंकी संगति कठिनता से बैठती है । यदि गीतामें केवल कर्म विवक्षित हो; उपासना नहीं; तो ' नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया । शक्य एवं विधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ' ( ११।५३ ) यहाँपर कही हुई कर्मकी निन्दा तथा ' भक्तया त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन । ज्ञातु द्रष्टु ं च तत्त्वेन प्रवेष्टु ं च परन्तप । ' ( ११।५४ ) यहाँपर की हुई उपासनाकी प्रशंसा अन्वित नहीं हो सकती । यदि गीता के ' योग ' शब्द से ' कर्मयोग ' इष्ट हो तो ' कर्मिभ्य-श्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन! ' ( ६४६ ) इस पद्यकी भी संगति नहीं लगती । ' योगस्थः कुरु कर्माणि ' ( २।४८ ) यहाँ भी पुनरुक्ति होती है । ' यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः । आत्मन्येवात्मना तुष्टस्तस्य कार्यं ( कमैं ) न विद्यते ' ( ३।१७ ) यहाँ पर आत्मतृप्त - पुरुषके लिए कर्म करने की आवश्यकता ही नहीं स्वीकृत की गयी । अर्जुन इस प्रकारका नहीं था, इसलिए उसके लिए कहा है- ' तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ' ( ३ । १ ९ ) । इन सब बातोंको देखकर सिद्ध होता है कि - गीताको कर्म, उपासना, ज्ञान सभी इष्ट हैं, केवल एक - एक नहीं । कर्मयोग आदिम सोपान, उपासना मध्यम तथा ज्ञानयोग अन्तिम सोपान इष्ट है । यही बात ' आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ' ( ६।३ ) यह पद्य बता रहा है । ' योगमारो दुमिच्छतो
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७३६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) मुनेः- कर्मफलसंन्यासिनः कर्म कारणं साधनम् उच्यते । योगारूढस्य पुनस्तस्यैव शमः - उपशमः, सर्वकर्मभ्यो निवृत्तिः कारणं - योगारूढत्वस्य साधनमुच्यते ' । अर्जुन दृष्टान्तसे गीताकी कर्मयोगपरता भी हृदयंगम नहीं . मालूम होती । अर्जुन तो गीता में निमित्तमात्र है । भगवान् ने गीता अर्जुनको नई नहीं सुनाई; किन्तु इससे पूर्व भी विवस्वानको सुनाई थी — ' इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवान् अहमव्ययम् । विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ' ( ४।१-२-३-४-५-६ ) । तब अर्जुनका उदाहरण देकर गीता में केवल कर्म बताना ऐकदेशिकता है । ' सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः । पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत् ' इस प्रसिद्ध - पद्य में अर्जुनको ' वत्स ' कहा है, गीतामृतको दुग्ध कहा है । बछड़ा सारा दूध नहीं पीता; तब अर्जुन तो बछड़े की तरह दूधको क्षरण करानेका निमित्त है; तभी यहाँपर सुधीगणोंको ' भोक्ता ' कहा है; अर्जुनको नहीं । तब अर्जुन ' निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्! ' ( ११।३३ ) इस प्रकार भीष्मादिके-मारणकी तरह गीताज्ञानके अधिकार में भी निमित्तमात्र है, उसका एकमात्र आधार नहीं । तभी श्रीशंकराचार्य - स्वामीने भी कहा है-‘ सर्वलोकसंग्रहार्थम् अर्जुनं निमित्तीकृत्य आह भगवान् ' ( २।११ ) । ' गीताके सुनने के बाद अर्जुनका युद्ध में उद्यम देखकर उससे गीताको कर्म इष्ट है'- इसपर भी जानना चाहिये कि भगवान् युद्धका फल स्वर्ग ( २२३७ ) बताते हैं; परन्तु सिद्धान्तपक्ष में वे स्वर्गको अवर ( ६।२१ ) बताकर मुक्तिको श्रेष्ठ ( १५/६ ) बताते हैं । इससे स्पष्ट है.
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गीताकी सर्वप्रियताका कारण ७३७ कि वे निष्काम कर्म कराकर ज्ञानकी ही पुष्टि चाहते हैं; क्योंकि, कर्म सदा सकाम ही होता है निष्काम नहीं - ' प्रयोजनमनुद्दिश्य न मन्दोऽपि प्रवर्तते ' । हाँ, पहली अज्ञानावस्था में वे सकाम कर्मका निषेध भी नहीं करते, बल्कि वैसे अज्ञानीको कर्मसे रोकना वे ज्ञानीकेलिए भी उचित नहीं मानते, ' न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसंगिनाम् । जोषयेत् सर्वकर्माणि विद्वान् ( ज्ञानी ) युक्तः समाचरन् ' ( ३।२६ ) । तब कर्मकी निष्कामता गीताके मत में अकर्मतामें परिणत हो जाती है । वह अकर्मता ज्ञानमें पर्यवसित हो जाती है । अर्जुनको युद्धमें ही प्रवृत्त करना सम्पूर्ण गीताका उद्देश्य नहीं । दस अध्याय तक गीता सुनानेपर भी अर्जुनका अन्तःकरण समाधानको प्राप्त नहीं हुआ । विराट् रूप दिखलाकर जब भगवान् अर्जुनको निमित्तमात्र सिद्ध कर दिया; तभी उसके हृदयका समाधान हुआ । तब केवल अर्जुनको युद्धमें प्रवृत्त करने के लिए इतनी विशाल - गीता सुनानेका प्रयोजन नहीं रहता । अर्जुन तो गायसे दूध निकलवाने में बछड़ेकी तरह निमित्तमात्र था | भगवान् यहाँ पर सोचा कि मेरे पृथिवी - लोकसे तिरोभाव होनेपर कलियुगके भीषण आक्रमणवश लोग कर्म - उपासना - ज्ञानसे भ्रष्ट होकर बड़ी हानि उठायेंगे; इस कारण उनके कल्याणार्थ कर्म-उपासना - ज्ञानके सामञ्जस्यसे पूर्ण उपदेश किया । गीताका कर्म-संन्यासपूर्वक केवल ज्ञानपरता भी विषय नहीं; अन्यथा गाण्डीवको छोड़ चुके अर्जुनके लिए यह कर्म त्यागकी प्रोत्साहना हो जाती । ४७ स ० ध ०
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७३८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) ' कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः ' ( ३३२० ) इत्यादि पद्योंसे कर्मसे भगवान्को मुक्ति इष्ट है - ज्ञानसे नहीं; यह भी नहीं कहा जा सकता । यदि गीताके मत में कर्मसे मुक्ति इष्ट होती, तो वह ‘ यामिमां पुष्पितां वाचं ' ( २।४२-४३-४४ ) इस प्रकार कर्मनिन्दा न करती 1 । इससे स्पष्ट है कि - ' कर्मणैव हि संसिद्धिम् ' इत्यादि - पद्योंका ' कर्म ' शब्द ' फलेच्छाविरहितकर्म ' -परक होने से पारिभाषिक है । ' आपाततः वह ' कर्म ' है, पर गीता के मत में वह अकर्म है ( ४/१८ ) । वेदान्तदर्शन में भी कहा है- ' तुल्यं तु दर्शनम् ' ( ३ | ४ | १ ) अर्थात् जो ३ | ४ | ३ सूत्रके पूर्वपक्षमें कहा है कि - जनक आदि आत्मज्ञानी कर्म करते थे, उसका उत्तर यह है कि इस प्रकार के आत्मज्ञानियों का कर्म करना न करना तुल्य ही है । उसमें तो ' लोकसंग्रहमात्र ' है, वास्तव में वह ' कर्म ' नहीं । तब गीता में कर्म से मुक्ति आदिकी प्राप्ति नहीं समझनी चाहिये; किन्तु ' कर्म ' से ही । वानप्रस्थ आश्रम तक कर्मनिरत पुरुष कभी भी वासना - त्याग नहीं कर सकता । ७५ वर्षके बाद जब सब वासनाओंके क्षयकी अवस्था आती है; तभी संन्यासकी आज्ञा है; तब वासना - क्षयवश कर्मफलकी आकांक्षा नष्ट होने से कर्मत्व हो जाने पर, ज्ञानोदयसे क्योंकि - ' तत् ( ज्ञानं ) स्वयं योग - ( कर्मयोग ) संसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ' ( गी ० ४।३८ ) यथैधांसि समिद्धोग्नि-र्भस्मसात्कुरुतेर्जु ' न! ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा ' ( ४ । ३७ ) पूर्व - कर्मोंके क्षय होनेपर वही ' ज्ञान ' से मुक्ति हो जाती है । फलतः गीता - प्रोक्त सिद्धि भी अन्तमें संन्यासित्वमें कर्म वा
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गीताको सर्वप्रियताका कारण ७३६ न 1 गे नों न ' नी है; 7 ) न. II चा कर्मफल - त्याग होनेपर ज्ञानावस्था में फलित होती है; जैसे वेदमें भी कहा है – ' अविद्यया ( कर्मणा ) मृत्यु तीर्त्वा विद्यया ( ज्ञानेन ) अमृतमश्नुते ' ( यजुः सं ० ४० १४ ) । ' संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेय-सकरावुभौ । तयोस्तु कर्मसंन्यासात् कर्मयोगो विशिष्यते ' ( ५२ ) यहाँ पर भगवान्ने कर्मसंन्याससे भी मुक्ति मानी है । जो कि – ' यस्तु कर्मफल- त्यागी स त्यागी ( संन्यासी ) त्यभिधीयते ' ( १८ | ११ ), यहाँ भगवान् कर्मफल - त्यागीको ही यौगिक - संन्यासी मानते हैं । ' भवत्य-• त्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां कचित् ' ( १८ | १२ ), यहाँ भगवान्ने अत्यागीसे विपरीत त्यागीको ' संन्यासी ' कहा है । तब कर्म करनेकी अवस्था - वानप्रस्थाश्रम तक वासनाक्षयके असम्भव होनेसे अन्त में वही ज्ञानावस्था पर्यवसित हो जाती है । उसी चतुर्थ अवस्था में ' समलोष्टाश्मकाञ्चनः ' ( ६८ ), ' साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धि: ( ८६ ), ' गवि - शुनि, ब्राह्मणे- श्वपाके समदृष्टिः ' ( ५१८ ) ये बातें हो सकती हैं । प्रथम अवस्थाओं में यह साम्यवाद नहीं हो सकता । इस कारण कर्म - द्वारा सिद्धिमें कर्मत्याग ही फलीभूत हुआ । इससे स्पष्ट है कि गीता प्राणिमात्र केलिए है, केवल अर्जुन वा केवल कर्मीकेलिए नहीं । प्राणिमात्र केलिए कर्मकाण्ड व्यावहारिक है और ज्ञानकाण्ड पारमार्थिक । इस कारण गीता में भी कर्मयोग और ज्ञानयोग दोनों ही हैं । ज्ञानाग्निमें ही सब कर्मोंका भस्मीभाव ( ४/३७ ) कहा है । अतः गीतामें केवल कर्म इष्ट नहीं । जिस प्रकार पूर्णपुरुष - भगवान्की वाणी वेदमें कर्म, उपासना, ज्ञान -तीनों सम्बद्ध हैं । वेदके ब्राह्मण - भाग में कर्म, मन्त्र - भाग में
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७४० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) उपासना, उपनिषद्भागमें ज्ञान है, वैसे ही पूर्णपुरुष- भगवान्की गीता में भी तीनों सम्बद्ध हैं । अतः गीताका उपदेश भी पूर्ण ही है, अपूर्ण नहीं । ' कर्मण्येवाधिकारस्ते ' ( २।४७ ) इत्यादि स्थलों में कर्म, ' सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ' ( १८६६ ) ' पत्रं पुष्पं ' ( ६।२६ ) इत्यादिमें उपासना, ' सर्वं कर्माखिलं पार्थ! ज्ञाने परिसमा-प्यते ' ( ४ | ३३ ) इत्यादि में ज्ञान ' मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ' ( ११।५५ ) इत्यादिमें कर्म, उपासना, ज्ञान तीनोंका समुच्चय है । संसारमें कर्मियोंकी संख्या अधिक होनेसे गीता में कर्म भी अधिक रखा गया है इसलिए कर्मकाण्डकी अवधि भी ७५ वर्ष तक रखी गई है । उपासनाको मध्यम और ज्ञानको अल्पमात्रा में कहा गया है । इसी कारण वेदमें भी कर्मकाण्डके मन्त्रोंकी संख्या ८० प्रतिशत है, उपासना - काण्डकी १६ और ज्ञानकाण्डकी ४ प्रतिशत है । लोकमें भी ज्ञानस्वरूप - नेता थोड़ी संख्या में होते हैं, उनके पीछे चलनेवाली कर्मठ जनता - अधिक होती है; अधिक होनी भी चाहिये । जनता प्रायः वासनावश सकाम कर्म करती है; जहाँ उसे वासना की तृप्तिका अवसर नहीं मिलता; उस कर्मको सर्वथा छोड़ देती है । निष्काम - कर्म करने पर तो कर्म - अकर्मका सामञ्जस्य हो जाता है; क्योंकि उसमें कर्मका त्याग भी सर्वथा नहीं होता और फिर फलमें अस्पृहतावश वह कर्म भी कर्म - त्याग के तुल्य हो जाता है । इस प्रकार पूर्णपुरुष - प्रोक्त गीता भी पूर्ण ही है । प्रवृत्ति - निवृत्ति दोनोंसे युक्त है, केवल कर्मपरक नहीं । जैसे वेदमें केवल ज्ञानकाण्ड माननेवाले त्रुटि करते हैं, वैसे
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गीताकी सर्वप्रियताका कारण ७४१ 3 ही गीतामें केवल कर्म मानना भी त्रुटिपूर्ण है । वेदकी तरह गीता में भी कर्मप्रवृत्ति और ज्ञान दोनों हैं । उपासनाका कर्म - ज्ञान दोनोंसे संबंध है; अतः गीता में कर्म - ज्ञान दोनों ही हैं । यदि उसमें कर्म होता; ज्ञान न होता; ज्ञान होता, कर्म न होता; प्रवृत्ति उसमें होती, निवृत्ति न होती; केवल निवृत्ति होती, प्रवृत्ति न होती; तो ' भगवद्गीता ' एकदेशीय पुस्तक हो जाती, अपूर्ण रहती; अतः सर्वप्रिय भी न बन सकती । त्रिविधता होनेसे ही सब प्रकारके अधिकारियोंके लिए... उपयोगी हो जानेसे यह सर्व प्रिय है । सब एक प्रकारके अधिकारी नहीं हो सकते । इसी कारण ' श्रीमद्भागवत ' में भगवान्ने उद्धवको कहा था - ' योगायो मया प्रोक्ता नृणां श्रेयोविधित्सया । ज्ञानं कर्म च भक्तिश्च नोपायोऽन्योस्ति कुत्रचित् ' ( ११।२०१६ ) इस प्रकार कर्म, उपासना, ज्ञानके सामञ्जस्य - द्वारा सारे संसारका कल्याणं - साधन, साथ ही साथ युद्ध कराकर धर्मकी विजय करना ही गीताका उद्देश्य है । इसके अतिरिक्त गीता में प्रायः उपनिषदोंको आधार बनाया गया है; इसीलिए भगवद्गीताकी पुष्पिकाओं में ' श्रीमद्भगवद्गीतासूप-निषत्सु ' ऐसा पाठ मिलता है । ' सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः ' यह पद्य भी प्रसिद्ध है । उपनिषदों में यद्यपि कर्म है, तथापि ज्ञान भी है । उपनिषदों में प्रसिद्ध जनक, अजातशत्रु आदि राजर्षि कर्मपरक भी ब्रह्मज्ञानी थे । उनके आधारसे बनी हुई गीता में भी कर्मयोगके साथ ज्ञानयोग भी स्वतः सिद्ध है । हाँ, कर्मकी प्रधानता तथा ज्ञानकी अल्पता तो सम्भव है, जैसे कि वेदमें
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श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) भी है । वस्तुतः कर्मको निष्कामता से करनेका उपदेश उसमें ज्ञान-योगकी प्रधानता बता रहा है । ' कर्मण्यकर्म यः पश्येत् ' ( ४ | १८ ) इसमें अपने इष्टकर्मको वस्तुतः अकर्म बताकर उसके आचरण ` करनेवालोंको ' बुद्धिमान् ' बताकर, वस्तुतः उसी अकर्मको कर्म कहने वालोंको, ढंगसे बुद्धि - रहित बताया गया है । इसीलिए अर्जुनने भी ' ज्यायसी चेत् कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन! ' ( ३ | १ ) भगवान् के मतमें कर्मकी अपेक्षा ज्ञानको श्रेष्ठ समझनेका भगवान्का अभिप्राय समझा है । इससे स्पष्ट है कि - कर्म श्रादिम - सोपान होनेसे व्यावहारिक है, क्योंकि वही मल - आवरण - विक्षेप आदि दोषोंके हटाने में सहायता कर चित्त - शुद्धि करता है, अथवा कर्मके द्वारा मलनाश, उपासनासे विक्षेपका नाश होता है । फिर परमार्थ - कोटि में ज्ञान-योगका अवसर होनेसे, उससे आवरणके नष्ट होनेपर जीव ब्रह्मत्वको प्राप्त करता है । इसी कारण द्वैतवाद व्यावहारिक होता है और अद्वैतवाद पारमार्थिक । फलतः भगवद्गीता में केवल कर्म नहीं है । कर्म भी है, उपासना भी है, ज्ञान भी है । बल्कि ज्ञानको विशिष्ट पद दिया गया है-' तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते । प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थ -महं स च मम प्रियः ॥ उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् । आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ' ( ७ । १७-१८ ) । ‘ अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् । एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तम् ' ( १३ । ११ ) । तब जिस काण्डका प्रेमी भगवद्गीता को उठाता है, उससे