पञ्चम सुमन · प्रकरण 84
युद्धमें गीताका सुनाना सम्भव
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729उनके जो नाम हैं, वे ही सर्वोपरि मन्त्र हैं और उन परमदेवकी सेवा ही एकमात्र सर्वोपरि कर्म है । '
: गीता गङ्गासे भी बढ़कर है । गङ्गामें स्नान करनेका फल तो अधिक - से - अधिक स्नान करनेवालेकी मुक्ति बताया गया है I
। यों गङ्गामें स्नान करनेवाला तो स्वयं ही मुक्त हो सकता है, वह दूसरों को मुक्त नहीं कर सकता; किन्तु गीतारूपी गङ्गामें स्नान करनेवाला तो स्वयं मुक्त होता है और दूसरोंको भी मुक्त कर सकता है ।
गीताकी भाषा भी मधुर, सरल, अर्थ और भाव - युक्त है । अतएव सभी को प्रतिदिन कम - से - कम एक अध्यायका पाठ तो
और भाव समझते हुए अवश्य करना ही चाहिये ।
( १३ ) युद्धमें गीताका सुनाना सम्भव ।
कई लोग ' अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान् कपिध्वजः । प्रवृत्ते शस्त्र - सम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः ' ( महाभारत भीष्मपर्व २५/२० ) इस पद्यको देखकर युद्धभूमिमें युद्ध के प्रारम्भके समय भगवद्गीता- सदृश ग्रन्थका सुनाना असम्भव मानते हैं । उनका भाव यह है कि यहाँ कहा है- ' प्रवृत्ते शस्त्र - सम्पाते ' शस्त्र प्रहार शुरू होगया था- अर्जुनने भी धनुष उठा लिया था । ' प्रवृत्ते ' शब्द में भूतकाल में ' क्त ' प्रत्यय है; तब उस समय ७०० श्लोकोंकी गीताका सुनाना संम्भव नहीं । अतः ‘ भगवद्गीता ' पीछेकी रचना है, महाभारत में पीछेसे प्रक्षिप्त की गई ' ।
इस पर यह जानना चाहिये कि ' प्रवृत्ते शस्त्र - सम्पाते ' में ' क्त ' प्रत्यय आदिकर्म - अर्थ में है, भूतकालमें नहीं । ' आदिकर्म का भाव 730यह है कि उस कर्मसे पूर्व, शस्त्र चलने की तैयारी से पूर्व 1 संस्कृतमें इसे ' प्रवर्तितुमिष्टे ' कह सकते हैं; अर्थात् शस्त्र चलना अभी भविष्यत् था; वर्तमान नहीं हो पाया था । इसके उदाहरण भी देख लीजिये ' भवत् - कृतां भूतिमपेक्षमाणाः ' ( ३ | ४६ ) इस किरातार्जुनीयके पद्य में ' कृतां ' इस ' क्त ' प्रत्ययका भूतकाल अर्थ न होकर ' भवस्करिष्य- माणां भूतिम् ' यह भविष्यत्का अर्थ है, वैसा ही टीकाकारों ने कार्य किया है | इसीलिए ' आशंसायां भूतवच्च ' ( ३ | ३ | १३२ ) इस पाणिनि- सूत्रसे ' आशंसा ' अर्थ इष्ट होनेपर भूतवत् प्रत्यय कहा गया है । प्राशंसा भविष्यत्काल - विषयक होती है । तभी तो ' योत्स्यमानान् प्रवेदये- ऽहं य एतेऽत्र समागताः ' ( गीता ० ११२३ ) इस अर्जुनके वाक्य में कौरवोंकेलिए ' योत्स्यमानं ' यह ' लृटः सद् वा ' ( पा ० ३ | ३ | १४ ) भविष्यत् - लकार लृट् कहा गया है । यदि ' प्रवृत्त ' में भूतकाल में ' क्त ' होता, तो यहाँ भविष्यत् - लकार न हो सकता | भविष्यत् - लकार होनेसे ' प्रवृत्त ' में भी भविष्यत् काल इष्ट है ।
' षट् शतानि सविंशानि श्लोकानां प्राह केशवः । अर्जुनः सप्त- पञ्चाशत् सप्तषष्टिं तु सञ्जयः । धृतराष्ट्रः श्लोकमेकं गीताया मानमुच्यते ' ( भीष्मपर्व ० ४३।४-५ ) इस महाभारत के पद्यमें भगवद्गीताका परिभारण कहा है । इसमें श्रीकृष्णके ६२० पद्य, अर्जुनके ५७, संजयके ६७, धृतराष्ट्रका १ पद्य माना गया है । मिलकर सारी संख्या ७४५ बनती है, आजकल ७०० मिलती है । धृतराष्ट्र और संजयके श्लोक तो श्रीकृष्णने कहे नहीं; तो ७४५ से ६८ लोकोंको निकाल देने पर शेष ६७७
श्लोक बचते हैं । इनके विचारपूर्वक पाठ में डेढ घण्टा लगता है ।
731यही संवाद एक घण्टे में हो सकता है । इतने समयकी प्राप्ति इस धर्म - युद्ध में असम्भव भी नहीं, क्योंकि — महाभारतीय युद्ध कई नियमों से होता था; उन नियमोंका दिग्दर्शन मनुस्मृति ( ७/६०, ६३ ) में है कि — उसमें रथी - रथीसे, सवार सवारसे, हाथी पर चढ़ा हाथी - चढ़े से, पैदल - पैदलसे युद्ध करता था । प्रातः सन्ध्या - पूजा- पाठादिके बाद युद्ध शुरू होता था । जब तक दोनों ओर से वीर युद्धकेलिए तैयार न हों, तब तक युद्ध शुरू नहीं होता था । एक पक्षका वीर किसीसे बात - चीत के लिए गया हुआ हो; तब तक युद्ध शुरू नहीं होता था ।
इसके अतिरिक्त यहाँ तो सेनाकी व्यवस्थितिके समयमें भी युद्ध शुरू नहीं हुआ था । उस समय गीता शुरू हुई थी । तब उसके भी बाद जब अर्जुन गाण्डीव धनुषको तैयार कर ठहरा; तब ' ततो युधिष्ठिरो दृष्ट्वा युद्धाय समवस्थिते । ते सेने सागरप्रख्ये मुहुः प्रचलिते नृप! ' ( भीष्मपर्व ४२।११ ) विमुच्य कवचं वीरो निक्षिप्य च वरायुधम् । अवरुह्य रथात् क्षिप्रं पद्भ्यामेव कृताञ्जलिः ' ( १२ ) पितामहमभिप्रेक्ष्य धर्मराजो युधिष्ठिरः । वाग्यतः प्रययौ येन प्राङ्मुखो रिपुवाहिनीम् । ' ( १३ ) यहाँ युधिष्ठिर कवच खोलकर अपने अस्त्र - शस्त्र छोड़कर शत्रु - सेना में भोष्मकी ओर चल पड़े; तो शत्रुयोद्धाओं ने उन्हें युद्धसे डरा देखकर उनकी निन्दा की । अर्जुन - भीम आदि तथा श्रीकृष्ण भी युधिष्ठिरको युद्धसे विरत जानकर उन्हें समझानेकेलिए उनके पीछे गये । परन्तु युधिष्ठिरने कहा कि- मैं युद्धकी आज्ञा तथा आशीर्वाद ग्रहणार्थं भीष्मद्रोणादि 732गुरुओं के पास जाता हूँ ।
तब भीष्मके पास जाकर युधिष्ठिरने कहा कि - ' आमन्त्रये त्वां दुर्धर्ष! त्वया योत्स्यामहे सह । अनुजानीहि मां तात! आशि- षश्च प्रयोजय ' ( भीष्म ४३ ४७ ) अर्थात् मुझे युद्ध की आज्ञा तथा आशीर्वाद दीजिये । तब भीष्सने इससे अपनी प्रसन्नता प्रकट की, कहा — ' यद्येवं नाभिगच्छेथा युधि मां पृथिवीपते! शपेयं त्वां महाराज! पराभावाय भारत! ' ( ३८ ) प्रीतोऽहं पुत्र! युध्यस्व जयमाप्नुहि पाण्डव! ( ३६ ) कि - यदि तुम न आते; तो मैं तुम्हारी हार मनाता ।
फिर युधिष्ठिर, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, शल्य आदिके पास भी युद्धार्थ आज्ञा लेने गये । उनसे आज्ञा लेकर तब अपने रथ में बैठे । इसी बीच में श्रीकृष्ण भी कर्णके पास पाण्डवोंकी ओर से युद्ध करनेकी प्रार्थना करने गये; पर उसने स्वीकार न किया । तब वे लौट आये । पीछे युधिष्ठिरने ( भीष्मपर्व ४३।६४-६६ ) जोरसे घोषणा की कि — जो कौरवोंकी सेनासे हमारे आश्रय में आना चाहे; वह आ सकता है । तब कौरवोंकी सेनासे धृतराष्ट्रका लड़का युयुत्सु पाण्डव - सेनामें आया । पटह बजाकर उसकी घोषणा कर दी गई । उसके बाद युधिष्ठिरने कवच धारण किया और शस्त्रास्त्रोंको उठाया । इसके पीछे ही युद्ध शुरू हुआ ।
तब भीष्म, द्रोण, शल्य, कर्ण आदिके पास जाने, उन्हें नमस्कार करने, प्रार्थना करने, और उनसे आशीर्वाद लेनेमें थोड़ा समय नहीं बीता होगा; क्योंकि - यह वीर एक - दूसरे के निकट 733नहीं थे । इससे पूर्व सेनाओं के व्यूह रचे गये । वे बीर अपने- अपने नियत स्थानों में थे । कर्ण तो सारी सेनाके पीछे ही था । लक्षशः सेनाओं के पीछे ठहरे हुए कर्णके पास पहुँचने में कमसे- कम एक मील जाना तो अनिवार्य ही था । यह गमनागमन पैदल ही हुआ । प्रत्येक से संवाद, तथा दूसरेके पास पहुँचने में और
पृथक् - पृथक् आशीर्वाद ग्रहण करने में प्रति १५ मिनट भी माने जाएँ; तो डेढ घण्टा तो इसीमें लगा । जब इस प्रकार इतने समयके बाद ही युद्ध शुरू हुआ; क्योंकि — पहले दिन सब कामोंमें सबको देरी लग जाना स्वाभाविक ही होता है; तो गीता सुनानेका समय निकालना असम्भव कैसे हो सकता है? तब स्पष्ट है कि भगवद्गीता महाभारतके समयकी ही है, पीछेसे प्रक्षिप्त नहीं की गई है । इसीके पद्य महाभारत में बहुत बार अनूदित किये गये हैं ।
इसके अतिरिक्त गीता में अपाणिनीय प्रयोग भी दीखते हैं । जैसे कि - ' निवसिष्यसि ( निवत्स्यसि ) ( १८ ), ' प्रसविष्यध्वम् ' ( प्रसूध्वम् ) ( ३।१० ), ' एतन्मे ( एतं मे ) संशयं ( ६: ३६ ) संयमतां ( संयच्छतां १०।२ ९ ), हे सखेति— ( हे सख इति ११।४१ ) महिमानं तवेदं ( इमं ) ( ११।४१ ) प्रियः प्रियायार्हसि ( प्रियाया असि ११।४४ ) ' शक्य अहं ( शक्योऽहम् ११।४८, ५४ ) । ' सेनानीनाम् ' ( सेनान्याम् १०।२४ ), ' जिज्ञासुरपि योगस्य ' ( योगं ६।४४ ) ' वक्तुमर्हसि आत्मविभूतयः ( विभूती: १०।१६ ), ' अपनुद्यात् ' ( नुदेत् २८ ) इत्यादि । इससे गीता पाणिनिसे पूर्वकालीन सिद्ध होनेसे महाभारतकालिक सिद्ध हो जाती है । महाभारतकाल श्रीपाणिनिसे प्राक्कालिक है; क्योंकि— 734अष्टाध्यायी में महाभारतीय पात्रोंके नामोंकी सिद्धि आती है; और पापिनि महाभारत से कुछ पीछे हुए हैं - यह सर्वसम्मत है ।
इसके अतिरिक्त गीताका उपक्रम तथा उपसंहार भी महाभारतीय युद्ध ही सम्बद्ध है । इससे स्पष्ट है कि गीता महाभारतका ही
है ।
( १४ ) भगवद्गीताकी सर्वप्रियताका कारण ।
' भगवद्गीता ' में कर्म है अथवा ज्ञान- इस विषय में बहुत समयसे विचार चल रहा है । एक पक्ष यह है कि - ' भगवद्गीता में केवल कर्म है, क्योंकि भगवद्गीता के उपक्रम- उपसंहारसे यही प्रतीत होता है 1 । उपक्रम में अर्जुन युद्धकेलिए उद्यत होकर भी उसमें गुरुओंको देखकर युद्ध - कर्म से हट गया । तब भगवान् ने उसे ' गीता ' सुनाई और अर्जुन युद्धार्थ उद्यत होगया । युद्ध क्षत्रियकां कर्म है; अतः गीताका विषय भी ' कर्म ' है । ' पर यह बात भी बुद्धिमें नहीं बैठती ।
यदि ' गीता'को केवल कर्म ही इष्ट हो, ज्ञान सर्वथा नहीं, तो ' दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय! बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः ( कर्म ) फलहेतवः ' ( २४६ ) । ( कर्म ज्ञानसे निम्न श्रेणीका है, ) ' सर्व कर्माखिलं पार्थ! ज्ञाने परिसमाप्यते ' ( ४ | ३३ ) ( ज्ञान होनेपर सब कर्मोकी समाप्ति हो जाती है । ) ' न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ' ( ४ । ३८ ) । ' ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ' ( ४ । ३१ ) ' सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ' ( ४।३६ ) ' ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन! ' ( ४३७ ) ' सर्वकर्माणि मनसा
In English
The Superiority of the Gita and its Timing in Battle
This text argues that reading the Bhagavad Gita provides spiritual liberation for both the reader and others, surpassing the merit of bathing in the Ganges. It also uses linguistic analysis and historical context to prove that the dialogue could have taken place during the Mahabharata war before combat began.
This chapter answers
- Is reading the bhagavad gita better than bathing in the ganga?
- Was it possible to recite the bhagavad gita during the mahabharata war?
- How many verses are in the bhagavad gita according to the mahabharata?
- Did yudhisthira visit elders for permission before fighting?
Also written: Yuddhamen, Gitaka, Sunana, Sambhava, Yuddhamen Gitaka Sunana Sambhava, युद्धमें गीताका सुनाना सम्भव