पञ्चम सुमन · प्रकरण 37

भस्म तिलक - विज्ञान

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367नुलेपन उस आशंका को दूर करता है, इसके कारण अकालमृत्युकी सम्भावना नहीं रहती । अविश्वासियोंको इस विषय में अविश्वास दूर करके इस वैदिक आदेशका अनुसरण करना चाहिए- ' ओषधयः शान्तिः ( यजु ० ३६।१७ ) ।

( २३ ) भस्मतिलक - विज्ञान ।

हिन्दुधर्म में बहुत से व्यक्ति माथेपर भस्म धारण भी करते हैं, यह भी महत्त्वपूर्ण नियम है । परन्तु आज के नवशिक्षित इससे भी घृणा करते हैं; पर यह ठीक नहीं । नवशिक्षितोंके दादागुरु स्वामी दयानन्दजी भी चन्दन लगाया करते थे; यथासमय भस्म भी - यह उनके जीवनचरित्रमें स्पष्ट है । तब दूसरों पर आक्षेप कैसा? वस्तुतः भस्मधारण भी महत्त्वपूर्ण है । हिन्दुओंके आराध्यदेव महादेव भी भस्म लगाया करते हैं; साधु एवं योगी भी भस्म लगाते हैं । भस्मधारणसे तेजकी रक्षा रहती है । उससे शीत नहीं लगता, तभी तो साधु सब अङ्गों में भस्म लगाकर शीतकालकी रात्रियोंको बिता दिया करते हैं, सन्धुक्षित की हुई अग्नि भस्म में जितना अपना तेज स्थापित कर सकती है; उतना बाहर नहीं । बाहर जल्दी समाप्त हो जाती है ।

कोंकी शङ्का होती है कि- ' भस्म लगानेसे रोमकूप बन्द हो जाएंगे; उस दशामें ' कार्बोनिक गैस ( विषाक्त वायु ) भीतर से बाहर न जा सकेगा; और ऑक्सिजन गैस ( प्राणप्रद वायु ) बाहर से भीतर न जा सकेगी । तब भस्म लगानेवाला बीमार पड़ जाएगा ' । पर यह आशङ्का व्यर्थ है । भस्म स्वयं ऑक्सिजन वायुको खींचकर 368भीतर प्राप्त कराती है; और भीतरी दूषित विकारोंको बाहर कर देती है ।

बाहर संधुक्षित हो रही हुई ईन्धन लोगोंकी आँखोंको दुखाती है, परन्तु राख में गाड़ी हुई वह आँखोंको नहीं दुखाती । जव उसके ऊपर घाम पड़ती है; तव जल- तरङ्गकी भांति ज्योति नीचे - ऊपर यातायात करती है; इस प्रकार भस्म लगानेवाले के भी विकारी द्रव्य बाहर निकल जाते हैं; परन्तु प्राणरक्षक तेज नष्ट नहीं होता ।

भस्ममें पोटास, सोडा, चूना, मैगनेशिया, लोहभस्म, एल्यूमिना, सिलकनभस्म आदि अनेक गुणकारी पदार्थ मिले हुए होते हैं । इसलिए भस्म तेजकी रक्षा करती है, रोम कूपोंको खोलती है, दुर्गन्ध वा मलको नष्ट करती है, खराब वायुको बाहिर निकालती है, शुद्ध वायुको अन्दर लाती है, जठराग्नि ( भूख ) को बढ़ाती है, त्वचाको स्वच्छ करती है, ब्ररण वा ज़रूमको शुद्ध करती है, विष हटाती है, कृमियोंको दूर करती है; ज्वर, सर्दी, वातपित्त, शूल, रक्तविकार, बीमारी, प्लेगरोग, त्वचारोग और उदर रोगोंको दूर करती है ।

जठराग्निको पोषण करनेका प्रमाण यह है कि - जैसे भस्ममें गाड़ी हुई अग्नि परिपुष्ट होती है; बाहर वाली अग्नि वैसे नहीं; वैसे ही जठराग्नि भी भस्मयोजन से बढ़ती है । दुर्गन्ध दूर करना यह भस्मका स्वाभाविक गुण है । विकृत जलमें भस्मके डालनेसे उसका दुर्गन्ध दूर होता है । भस्मसे बिच्छूका विष भी दूर होता है । भस्मसे आयु भी बढ़ती है; उसका कारण यह है कि - हमारी 369आयु हमारे तेज पर आश्रित है । जब तक तेज सुरक्षित है; तब तक तेज बढ़ता है । भस्म तेजको स्थिर करती है; अतः उससे आयु बढ़ती है; इसीलिए ' त्र्यायुषं जमदग्नेः ' ( यजुः ३।६२ ) इस मन्त्र से जो यज्ञकी भस्म माथा, ग्रीवा, और हृदयमें लगाते हैं; उसमें बड़ी आयु दिखलाई गई है ।

फलतः संसारमें कोई भी ऐसा रोग नहीं है, जिसे भस्म, भस्म न करती हो । इसीलिए आयुर्वेद में भस्मकी महिमा अधिकता से मिलती है । वैद्य सुवर्णादि धातुओंका संशोधन कर उसकी भस्म बनाकर रख लेते हैं; जिनसे वे भयङ्कर रोगोंको दूर करते हैं । सुवर्ण, पारदादिकी भस्ममें जैसे वे वे गुण होते हैं; वैसे ही गोबरकी भस्ममें भी गोबरके गुण रहा करते हैं । गोबरके गुण आगे कहे जायेंगे ।

इस प्रकार होलीकी भस्ममें उसकी विशेषतावश विशेष गुण होते हैं । बच्चोंकी आँखों पर उसे बाँधनेसे गर्मीके समय आई हुई आँखोंकी लालिमा शान्त हो जाती है । बच्चोंके गलेमें भी उसे यन्त्र ( ताबीज ) की भांति बाँधा जाता है; जिससे उसकी भूत- प्रेतादिसे रक्षा होती है । भूत - प्रेत आदि योनियाँ भी हैं; इसका निरूपण ‘ श्रीसनातनधर्मांलोक के किसी अन्य पुष्पमें होगा; वेद और उपवेदसे उनकी सिद्धि की जाएगी । यज्ञकी भस्म तो अभि- मन्त्रित होनेसे और चरुका परिणाम होनेसे अधिक लाभ - प्रद होती है । इसीलिए ' त्र्यायुषं जमदग्नेः ' इस मन्त्रके द्वारा उसे ललाट, ग्रीवा, स्कन्ध तथा हृदयादिमें जोड़ना गृह्यसूत्रों में कहा है । जिस प्रकार सोने, चाँदी, हीरा, मोती आदिकी भस्म अनेक रोगों 370३७०. श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ )

को दूर करने में समर्थ होती है; वैसे ही यज्ञ भस्म भी किसी बढ़िया से बढ़िया ओषधिकी अपेक्षा कम महत्वपूर्ण नहीं | इसके उपयोग से जहाँ अनेक शारीरिक रोग दूर होते हैं; वहाँ उन्माद, बुद्धिमन्दता, उत्तेजना, आवेश आदि मानसिक रोगोंका भी निवारण होता है । मस्तक पर यज्ञभस्सका तिलक लगाने से आज्ञाचक्र, सहस्र- दल - कमल, ब्रह्मरन्ध्र आदि अनेकों सूक्ष्म आध्यात्मिक केन्द्रोंका विकाश होता है । हृदय पर लगाने से सूर्य - चक्र जागरित होता है । अन्तःकरण - चतुष्टयमें तामस तत्त्व घटकर सात्त्विक तत्त्व बढ़ जाते हैं । यज्ञकी अग्नि घी पीकर बलवान् हो जाती है, उसकी भस्म में भी वही गुण होता है । तब उसकी भस्मका तिलक लगाना कोई उपहासकी बात नहीं । कई योगियोंका चिताभस्म लगाना - इस बातके. स्मरणार्थ है कि - कभी हम भी इसी प्रकार जलेंगे; अतएव इस संसार के लिए किसी दूसरेकी हानि न करें; असत्कर्म न करें- इत्यादि । इस प्रकार भस्मका धारण भी महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ ।

( २४ ) मूर्तिपूजा - विज्ञान

सन्ध्योपासनाके समय देवमूर्ति - द्वारा देवकी पूजा भी की जाती है; पर अर्वाचीन लोग मूर्तिको जड़ मानकर उसकी पूजा

'

करते हैं; पर उन्हें जानना चाहिये कि -जड़ ही जड़ ( मूल ) -सबका आधार हुआ करती है । जड़ - सेवाके बिना किसीका भी कार्य नहीं चलता । दूसरेके आत्माकी प्रसन्नतार्थ उसके आधारभूत जड़ - शरीर वा उसके अङ्गोंकी सेवा करनी पड़ती है । परमात्माकी उपासनार्थ भी उसके आश्रय - स्वरूप जड़ प्रकृतिकी पूजा करनी पड़ती है । वायु

In English

The Science of Wearing Sacred Ash

This chapter explains the physical and spiritual benefits of applying ash (bhasma) to the body. It argues that ash protects vital energy, aids digestion, heals various diseases, and stimulates spiritual centers in the body.

This chapter answers

  • Benefits of wearing bhasma?
  • Does ash block pores?
  • How does ash affect health?
  • Spiritual benefits of applying ash to forehead?
  • Why do yogis wear ash?

Also written: Bhasma, Tilaka, Vigyana, Bhasma Tilaka Vigyana, भस्म तिलक - विज्ञान

मूल ग्रन्थ

यह पाठ सनातन धर्मालोक ५के मुद्रित पृष्ठ 367–370 से ज्यों-का-त्यों लिया गया है — न कुछ जोड़ा गया है, न घटाया। स्कैन किया हुआ मूल पृष्ठ देखनेके लिये —

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