पञ्चम सुमन · प्रकरण 38

मूर्तिपूजा - विज्ञान

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371लोकदृष्टिमें जड़ है, पर क्या उसकी सेवाके बिना कोई भी प्राणी जी सकता है? जड़ - अग्निकी सेवाके बिना क्या आप कोई कार्य कर सकते हैं? क्या अपना पेट भी पाल सकते हैं? जड़ - जलके सेवनके बिना क्या कोई रह सकता है? धन भी जड़ है, उसकी उपासनाके विना भी कोई पुरुष सांसारिक निर्वाह कर सकता है क्या? जड़ - प्रकाशकी उपासना करके आप कितने लाभ उठाते हैं ।

इस प्रकार जब आप सर्वत्र जड़ोपासना ही कर रहे हैं; तब आप मूर्तिपूजा से क्यों घबड़ाते हैं? उसमें तो आप जड़के द्वारा अणु - अणुमें व्यापक चेतन ( सच्चिदानन्द ) की पूजाको कर रहे होते हैं । आपका शरीर जड़ है; क्या उसके बिना भी आप कोई उपासना कर सकते हैं?? शब्द भी जड़ है; उसकी उपासनासे तो सारा संसार लाभ प्राप्त कर रहा है, निश्चित वृत्त जान रहा है ।

आप जिस बुद्धि वा जिस मनको आधारभूत करके परमात्मा का ध्यान कर रहे होते हैं; क्या वे भी जड़ नहीं हैं? आप ( आप्ता ) भी तो मानते हैं कि- परमात्मा भी जड - प्रकृतिके बिना कुछ भी नहीं कर सकता, सृष्टि भी नहीं कर सकता । तब सिद्ध हुआ कि - जड और चेतनका परस्पर सम्बन्ध है । तब परमात्मा भी किसी मूर्तिके बिना उपास्य कैसे हो सकता है?

बिजुली तबतक प्रकट नहीं हो सकती, जबतक उसके साथ प्रकट करनेवाला केन्द्र - काचका लट्ट

न लगाया जावे, वा बिजलीका पंखा उसका आधार न हो । इस प्रकार ईश्वर भी केन्द्र से प्रकट होता है, जैसे गायका दूध गायके स्तनको द्वारीकृत करके प्रकट 372होता है, यद्यपि वह दूध उसके सारे अङ्गों में व्याप्त होता है | दूध वा माखन गायसे चाहे अभिन्न हैं; लेकिन गायकी पुष्टचर्थ उन्हें गायसे भिन्न किसी पानमें दुहकर वा मथकर उसे गाय को खिलाने पर ही गायकी पुष्टि हुआ करती है, वैसे ही परमात्मा हममें सर्व- व्यापक होनेपर भी उसे किसी मूर्ति में प्रतिष्ठित करके उसकी उपासना ही हमें लाभप्रद हो सकती है । मूर्तिपूजाके पूर्ण - रहस्य- ज्ञानार्थ पाठकोंको ' श्रीसनातनधर्मालोक ' ग्रन्थमालाका चतुर्थ पुष्प हमसे मंगाना चाहिये ।

( २५ ) चरणामृतका विज्ञान ।

मूर्तिपूजा में चरणामृत भी हुआ करता है । शालग्राम- मूर्ति में सुवर्णका अंश रहता है । कसौटीके पत्थर में भी सुवर्णत्व होने से सुवर्णकी चमकीली रेखा खिंचती है । सुवर्णसे वेद १०० वर्षकी श्रायु मानता है । उस शालग्रामके साथ गङ्गाजल भी होता है, तुलसीपत्र भी । इस प्रकारका चरणामृत ' अकालमृत्युहरण ' हो यह स्वाभाविक है । इसकी स्पष्टता आगे होगी ।

( २६ ) मार्जन - विज्ञान ।

अब सन्ध्याके अङ्गोंपर विचार किया जाता है । उसमें पहले मन्त्रद्वारा मार्जन करना पड़ता है । मार्जनमें शोधनकी अद्भुत क्षमता है । जब कारण - विशेषसे या रोगादिसे स्नान नहीं किया जा सकता; वहाँ स्नानका प्रतिनिधिभूत मार्जन प्रयुक्त किया जाता है । मार्जनसे शरीर- गत सूक्ष्मदोष हट जाते हैं । प्रायः दोष तेज, रक्त तथा शुक्रमें रहा करते हैं । इन तीन प्रकारके दोषोंकी निवृत्त्यर्थ

In English

The Logic of Idol Worship and the Science of Rituals

This text argues that because humans rely on material elements like fire, water, and the body to function, worshipping a physical form is a way to connect with the divine. It explains that just as milk requires a cow to be expressed, the omnipresent God can be accessed through a specific physical center or idol. The chapter also introduces the spiritual functions of charanamrita and marjan rituals.

This chapter answers

  • Why do hindus worship idols?
  • Is there a connection between matter and consciousness in hinduism?
  • What is the purpose of charanamrita?
  • How does marjan help the body?
  • Can god be worshipped through a physical form?

Also written: Murtipuja, Vigyana, Murtipuja Vigyana, मूर्तिपूजा - विज्ञान

मूल ग्रन्थ

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