पञ्चम सुमन · प्रकरण 61

भोजन- नियम

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527समय उतार देने चाहियें । यदि वह सम्भव न हो तो रेशमी वा ऊनी वस्त्र होना चाहिए; वह भीतरी शक्तिको सुरक्षित रखता है, और बाहरी शक्तिके परिणामको दूर करता है । क्योंकि भोजन करते समय शरीर के प्रत्येक यन्त्रोंकी क्रिया होने लगती है; इसलिए वाहरी वायुकी बाधा रोकनेकेलिए और अन्दरकी शक्ति सुरक्षित रूपसे कार्य करती रहे ' नान्नमद्यादेकवासाः ' ( मनु ० ४।४५ ) एक केवल धोती पहनकर भोजन नहीं करना चाहिये, एक रेशमी दुपट्टा ऊपर से ओढ़ ले, वा उपवस्त्र रखे ले इससे कमीजकी भांति रोमकूप सर्वथा आवृत भी नहीं रहेंगे; और बाहरी ' बाधाओं का प्रभाव भी शीघ्र नहीं पड़ता ।

( ५५ ) भोजन - नियम

भोजनके कई नियम शास्त्रों में बताये गये हैं- ' न भुञ्जीतो- धृतस्नेहं नातिसौहित्यमाचरेत् । नातिप्रगे, नातिसायं न सायं- प्रातराशित: ( मनु ४।६२ ) ' न भिन्नभाण्डे भुजीत न भावप्रति- दूषिते ' ( ४।६५ ) ' शयनस्थो न भुजीत; न पाणिस्थं न चासने ' ( ४/७४ ) ' सर्वं च तिल - सम्बद्ध नाद्यादस्तमिते रवौ ' ( ४/७७ ) आर्द्रपादस्तु भुजीत नार्द्रपादस्तु संविशेत्, ( ४७६ ) ' नान्नमद्याद् एकवासाः ' ( ४।४५ ) अर्थात् — ( क ) भोजनका स्नेह ( चिकनाहट ) निकालकर न खावे; क्योंकि सार - भाग निकल जानेसे शेष भोजन निस्सार हो जाता है । माखन मिली हुई लस्सी पीने से जो लाभ है; वह अलग कियेसे नहीं । ( ख ) बहुत तृप्त होकर भोजन भी न करे - इससे बहुत बड़ी हानि होती है, भीतर वायुके भी प्रवेश 528न हो सकनेसे कभी मृत्यु भी सम्भव हो जाती है । पेटका कुछ

खाली होना ही चाहिये । ( ग ) न बहुत प्रातः न बहुत सायं में भोजन करे । इस समय प्रकाश और तमः के मिश्रण से कीटाणु बहुत फैल जाते हैं — उस समयका भोजन कीटाणुवरा हानिजनक हो जाता है । ( घ ) खाटपर भोजन न खावे । एक तो वह बच्चोंके मलमूत्रके अंशसे भी युक्त हो सकता है । दूसरा दाल वा भोजनादि- का टुकड़ा गिरनेसे उसमें च्यूटियां वा अन्य कीटाणु, खटमल आदि खाटमें घुस सकते हैं, इससे उसपर सोनेवालेकी हानि स्पष्ट है । ( ङ ) तिलसे सम्बद्ध वस्तु रातको न खावे । तिल बहुत गर्म प्रभाव रखते हैं; रातको निद्रामूलक दुर्वलतावश तिलकी गर्मी बढ़ जाने से स्वप्नदोषादि वा अन्य कोई व्याधि हो सकती है । ( च ) आसनपर भोजन रखकर भी खाना ठीक नहीं; क्योंकि- उच्छिष्टके गिरनेसे उसमें कीटाणु प्रवेश कर हानि पहुँचा सकते हैं । ( छ ) हाथपर भी भोजन न खावे । यह संन्यासीको शोभित हो सकता है— गृहस्थको नहीं । हाथ पर भोजन ठीक आ भी नहीं सकता । ( ज ) टूटे बर्तनमें भोजन न करे - बर्तन भोजना- भिमानी देवताका स्थान है, वह टूटा हुआ होना अच्छा नहीं; इससे देवताका अपमान है, वह हाथको चुभ भी सकता है । ( झ ) स्नानके बिना भोजन नहीं होना चाहिये - ' अस्नायी समलं ' भुङ्क्ते ' । भोजन करने में ऊष्मा निकलती है; स्नान न करने में भी ऊष्मा भीतर रहती है, और शरीरसे निकले हुए पसीनेके द्रवभागके वायुमें उड़ जानेसे शेष मलके रह जानेसे उससे रोमकूप

In English

Rules of Eating

This chapter outlines specific guidelines for eating to maintain health and ritual purity. It covers appropriate clothing during meals, the timing of meals, proper posture, and hygiene practices.

This chapter answers

  • What should i wear while eating?
  • Why shouldn't i eat too much?
  • Is it bad to eat at dawn or dusk?
  • Why should i not eat on a bed?
  • Should i bathe before eating?

Also written: Bhojana, Niyama, Bhojana Niyama, भोजन- नियम

मूल ग्रन्थ

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