पञ्चम सुमन · प्रकरण 59

भोजन - विधि विज्ञान

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521वर्धक होनेसे इसे तामसों में गिना गया हो । कन्नौजमें गाजर तो नहीं खाते, पर लहसन खा लेते हैं, यह अनुचित है | लहसुन और प्याज़ यद्यपि कई वातादि दोपोंके दूर करने वाले हैं, पर अत्यन्त उत्तेजक तथा दुर्गन्धित होनेसे भक्ष्य नहीं । मन, बुद्धि, . शरीर, प्राण, श्रात्मा इनको कुविचारपूर्ण करते हैं । बुद्धि आदिकी मलिनता से कामसंचार, ब्रह्मचर्यनाश, पशुभावकी वृद्धि, चित्तकी चंचलता उनसे होती है, जिससे आध्यात्मिक उन्नतिका मार्ग रुक जाता है । इस कारण धर्म - शास्त्रमें कदन्नके भक्षणका निषेध किया गया है ।

परस्पर जूठा खाना भी ठीक नहीं, इस प्रकार एकके संक्रामक कीटाणु तथा रोग दूसरेमें बहुत शीघ्र संक्रान्त हो जाते हैं । ग्लानि तथा अपवित्रता तो होती ही है । इसीलिए ' नोच्छिष्टं कस्यचिद् दद्यात् नाद्याच्चैव तथान्तरा ' ( २।५६ ) इस वाक्य में मनुजी ने निषिद्ध किया है, आहारपर हमारे शास्त्रकारोंने वहुत कन्ट्रोल लगाये हैं; क्योंकि — आहारका धर्मसे निकट सम्बन्ध है ।

( ५२ ) भोजनसे पूर्व ग्रास रखना; अग्नि में डालना,

काकबलि आदि विज्ञान ।

हम जब भोजन करते हैं, तब अपने देवको भी त्वदीयं वस्तु गोविन्द! तुभ्यमेव समर्पये ' इस न्यायसे पहले निवेदन करना उचित है क्योंकि - हम देवोंका दिया ही तो खा रहे हैं । वेदमें कहा है- ' नार्यमणं पुष्यति नो सखायं " केवलाघो भवति केवलादी ' 522( ऋ. १०।११७१६ ) अर्थात् अकेला भोजन करे; न तो अर्यमा ( यह अपने इष्टदेवताका उपलक्षण है वा देवाधिदेवका ) देवको पहले खिलाता है; न सखाको; केवल अपना पेट भरनेवाला पापी माना जाता है | यही बात भगवद्गीता में कही गई है— ' अधं स केवलं भुङ्क्ते यः पचत्यात्मकारणात् ' ( ३ । १३ ) । मनुजी ने भी कहा है- ‘ देवान् ऋषीन् मनुष्याँश्च पितॄन् गृह्याश्च देवताः । पूजयित्वा ततः पश्चाद् गृहस्थः शेषभुग् भवेत् । अधं स केवलं भुङ्क्ते यः पचत्यात्मकारणात् । ( ३।११७-११८ )

अन्य बात यह है कि हमारे घरों में चक्की, चूहा, झाड़

, जल का घड़ा, ऊखल - मूसल आदिसे जीवोंकी हत्या अनिवार्यतासे हुआ करती है । मनुजीने इन्हें ' पञ्च सूना ' ( पांच कसाईखाने – ३२६८ ) कहा है; उनके प्रायश्चित्तार्थ ब्रह्मयज्ञ, पितृयज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ, नृयज्ञ इन पञ्च - महायज्ञोंका विधान ( ३२६६-७१ ) किया है । इनमें पितृयज्ञमें बलि - वैश्वदेवमें कीट - पतङ्ग सबको भोजन देना कहा है । और यह सब वर्णोंको करना कहा है । वेद - पुराणादिका पठन - पाठन ब्रह्मयज्ञ है । इनमें पुराणका पठन शूद्रकेलिए चरितार्थ है । पितरोंका तर्पण पितृयज्ञ है । हवन देवयज्ञ है, बलिवैश्वदेव भूतयज्ञ है, अतिथिको भोजन खिलाना अतिथियज्ञ है । आजकल के देशकालानुसार इन पञ्चमहायज्ञोंको कोई नहीं करता । इसमें दो - तीन सुगम प्रकार ‘ पुराणमित्येव न साधु सर्वं, न चापि सर्वं नवमित्यवद्यम् ' इस न्याय से किये जाते हैं । वह यह कि - अङ्गी भगवान्के आगे भोग घर दो; तो उसके सब अंग तृप्त हो जाएंगे, 523द्रौपदीने एक शाकका पत्ता ही तो भगवान् कृष्णको खिलाया था । विश्वम्भरकी तृप्ति होने से विश्व - भरकी तृप्ति हो गई थी । आनेवाले अतिथि दुर्वासा आदि के पेट भी फूल गये थे, वे खाने ही नहीं आये · कि कहीं अम्बरीष - भक्तकी भांति युधिष्ठिर भी हमें तंग न करें । वैसे तो दुर्योधनने उन्हें द्रौपदीके खा चुकनेपर भिजवाया था कि उस समय पांडव इन्हें खिला न सकेंगे; तब दुर्वासा शाप देकर उन्हें भस्म कर डालेंगे । पर द्रौपदी - द्वारा श्रीकृष्ण भगवान्को सूर्य से दी हुई वटलोईमें लगे शाकके एक पत्ते को खिलानेसे ही सारा संसार तृप्त होगया था । अतः भगवन्मूर्तिको भोग लगानेसे ही पञ्चमहायज्ञ

ते हैं ।

अन्य ‘ लघूपायोस्ति भूतले ' यह है कि पञ्चमहायज्ञोंके प्रति- निधिस्वरूप पाँच ग्रास रखे जावें; वे ग्रास तथा घी आदि सबके प्रति - निधि अग्निमें समर्पण कर दिया जाय; वा गौ को खिला दिया जावे । पितृकार्य में तो काकबलि भी देनी पड़ती है । इन बातोंसे जहाँ हमें शास्त्राज्ञाके ' स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ' ( गीता २।४० ) ' कुछ ' पालनसे धर्म प्राप्त होगा; वहाँ लौकिक लाभ भी बहुत होगा । वह यह कि हमने जो भोजन करना है; कई कारणोंसे वह भोजन विषमय भी हो सकता है । यदि वह हमारे अन्दर गया; तो हमें हानि पहुँचावेगा । · राजाको तो सदा विषका डर ही बना रहता है; तब यह ग्रास - स्थापना तथा प्रासोंका अग्नि में डालना, वा कौवेको खिलाना उस विषकी परीक्षाका साधन भी बन जावेगा; अन्य भी बहुतसे लाभ प्राप्त करावेगा ।

5241. इस बातको इस प्रकार समझिये - यदि भोजन में विष होगा; तो जो ग्रास हम रखेंगे, तो उसपर बैठने वाली मक्खियाँ मर डालेंगे; उससे जहाँ देवताओंके मुख अग्निमें

- डालने से देवपूजा जाएँगी; वा निर्जीव - सी हो जाएँगी । फिर जो कि ग्रासोंको पूर्व अग्निमें होगी; वहाँ यदि भोजन विषमय है; तो उसकी नीली- लपट होगी; और बहुत बुरी दुर्गन्ध फैल जाएगी । काक - बालिका यह लाभ है कि— कौवा विषमय ग्रास नहीं खाता; इससे भोजनकर्ता सावधान हो जाएगा । अन्य भी परीक्षाएँ हैं । बन्दरको भी वह ग्रास यदि विषमय है - तो ग्रास देनेसे

वह मुँह और ढंगका बना लेता है- मचलता है । बड़ा चंचल

हो जाता है । चकोरको डालने से उसकी आँखें लाल हो जाती हैं -

आयुर्वेद - ग्रन्थोंमें इन बातोंका निरूपण आया है ।

यदि विष भोजनमें

न भी हो, तब आगे ग्रास - स्थापनका लौकिक लाभ यह होगा

कि यदि उस स्थलमें च्यूँ टियाँ इधर से

उनका भोजनकी थाली में आना सम्भव उधर घूम रही होंगी; तो

है । यदि वे पाँच - ग्रास थालीके आगे रखे होंगे, तब वे च्यूँ टियाँ वहाँ इकट्ठी हो जावेंगी, भोजनकी थाली में नहीं आवेंगी । इस प्रकार अन्य भी लौकिक लाभ बहुत सम्भव हो सकते हैं । गो - प्रास भी नियमतः रखना चाहिये, इससे गायका पालन होता है । ग्रास रखकर फिर आचमन करके भोजन प्रारम्भ करना चाहिये- ' अश्नीयाद् आचम्य प्राङ्मुखः शुचिः ' ( मनु ० २।५१ ) आचमनसे भीतर आर्द्रता हो जाती है; इससे चबाये हुए ग्रासको भीतर प्राप्त

In English

Dietary Rules and the Five Great Sacrifices

This text explains how specific foods like garlic and onions are avoided because they stimulate the senses and hinder spiritual progress. It details the practice of offering food to deities and ancestors through the five great sacrifices to atone for accidental killings in the household. It also describes using food offerings as a way to test whether a meal is poisoned.

This chapter answers

  • Why are garlic and onions avoided in sattvic diets?
  • What are the pancha mahayajna or five great sacrifices?
  • How to perform rituals to atone for killing small creatures in the home?
  • How can food offerings be used to test for poison?
  • Why should one offer food to deities before eating?

Also written: Bhojana, Vidhi, Vigyana, Bhojana Vidhi Vigyana, भोजन - विधि विज्ञान

मूल ग्रन्थ

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