पञ्चम सुमन · प्रकरण 58
चाहार - शुद्धिका धर्मसे सम्बन्धं
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517होंगे । जैसे आचरण होंगे; वैसा ही दूसरोंसे व्यवहार होगा । व्यवहार - शुद्धि रहनेपर कोई अशान्ति वा अव्यवस्था नहीं हो लोग कहते हैं कि - सनातनधर्मियोंने भोजनका भी धर्मसे सम्बन्ध कर दिया है — यह आक्षेप अबहुश्रुतताका फल है । ' अन्नदोषाच्च मृत्युर्विप्रान् जिघांसति ' ( ५४ ) मनुजीने यहाँ पर अन्न - दोषसे ही मृत्युकी प्राप्ति कही है ।
श्रुतिमें आता है — ' यद्वै मनसा ध्यायति, तद् वाचा वदति, यद् वाचा वदति, तत् कर्मणा करोति ' जैसा मनमें विचार उत्पन्न होता है, वैसा ही वाणी से बोला जाता है । हमारी वाणी जैसा बोलेगी; कर्म भी वैसा ही किया जायगा । तब सारा विचार एवं कर्म मनपर छान्दोग्योपनिषद् में अन्नकी शुद्धिपर बल देते हुए कहा है- = सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः ' ( ७१२६ २ ) ' अन्नमयं हि सोम्य! मनः, श्रापोमयः प्राणः, तेजोमयी वाकू ' ( ६ | ५ | ४ ) यहाँ पर मनका अन्नसे बनना कहा है; जब कि हमारे सब कार्य मनके श्राश्रयसे होते हैं; तब मनके निष्पादक अन्नकी शुद्धिपर हमें विशेष ध्यान देना चाहिये | अन्नकी शुद्धि होनेसे अन्तःकरणकी शुद्धि कही है; उससे ' निश्चल स्मृतिका प्राप्त होना और निश्चल - स्मृति से सब बन्धनोंका 518निवृत्त्या तु विशुद्धं हृदयं भवेत् । आहारशुद्धौ चित्तस्य विशुद्धिर्भवति स्वतः ( ३६ ) चित्तशुद्धौ क्रमाज्ज्ञानं त्रुट्यन्ति ग्रन्थयः स्फुटम् । अभक्ष्यं ब्रह्मविज्ञान - विहीनस्यैव देहिनः ' ( ३७ ) । हम संसार में जो भी कार्य करते हैं; वह अपने मन, वाक् तथा प्राणों के सहयोग से करते हैं । यदि यह हमारे मन आदि शुद्ध हैं, तो हमारे कार्य भी शुद्ध होंगे । यदि यह अशुद्ध रहेंगे; तो हमारे कार्य भी । इस कारण हमें अपने मन, वाणी और प्राणोंके उत्पादक अशन, पान, घृत आदिकी शुद्धिमें भी ध्यान देना चाहिये । यह केवल कथनमात्र ही नहीं; किन्तु इसमें भी विज्ञान है । जैसा कि छान्दोग्योपनिषद् में आरुणि उद्दालकने श्वेतकेतुको कहा है- ' अन्नमशितं त्रेधा विधीयते । तस्य यः स्थविष्ठो धातुः, तत् पुरीपं भवति । यो मध्यमः, तद् मांसम् । योऽणिष्ठः, तद् मनः ' ( ६।५।१ ) यहाँ खाये हुए अन्नके स्थूल - भाग से मल, मध्यम से माँस, अत्यन्त सूक्ष्म - भागसे मन बनना कहा है । इसलिए प्रसिद्ध है, ' जैसा खावे अन्न, वैसा होवे मन ' ।
अन्नके साथ जलपान भी तो होता है; अब उसके तीन भाग वताते हैं - ' आपः पीताः त्रेधा विधीयन्ते । तासां यः स्थविष्ठो धातुः, तद् मूत्रं भवति । यो मध्यमः, तद् लोहितम् । योऽणिष्ठः स प्राणः ’ ( ६२ ) यहाँ जलका स्थूलभाग मूत्र, मध्यम रक्त, सूक्ष्म - भाग प्रारण बनता है - यह कहा है- यह प्रत्यक्ष तथा अनुभव सिद्ध बात है । जब हमारा शरीर रक्त और प्रारणके सहारेसे है; तो पान - शुद्धि में भी हमें बहुत ध्यान देना चाहिये । ' आपोमयः प्राणः ' ( ६।५।४ ) ।
अन्नके साथ घृत आदि तैजस - पदार्थ भी खाया जाता है; 519उसके परिणाममें उद्दालक तीन भेद बताते हैं - ' तेजोऽशितं त्रेधा विधीयते । तस्य यः स्थविष्ठो धातुः, तद् अस्थि भवति । यो मध्यमः, स मज्जा । योऽणिष्ठः, स वाक् ' ( ६।५।३ ) ' तेजोमयी वाकू ' ( । ६ ५ । ४ ) यहाँ घृत आदि स्निग्ध - वस्तुका स्थूल - भाग अस्थि, मध्यम - भाग मज्जा, और सूक्ष्म - भाग वाणी हो जाता है - यह कहा है । हमारा सांसारिक कार्य मन, प्राण एवं वाणी से चलता है; तब उसमें मुख्य कारण अन्न ही हुआ । यदि अन्न सात्त्विक होगा; तब मन भी सात्त्विक होगा । जब मन सात्त्विक होगा, तब विचार भी सात्त्विक होंगे । विचार सात्त्विक होंगे तो आचार भी, और आचारसे व्यवहार भी सात्त्विक होंगे — यह सिद्ध होगया । अतः अन्न - शुद्धि विशेष अपेक्षित है ।
सात्त्विक भोजनसे शरीर स्वस्थ एवं हलका रहता है, चित्त प्रसन्न रहता है । साधारणतः देखा जाता है कि — अन्न न खानेसे मन दुर्बल हो जाता है, चिन्तन - शक्ति नष्ट होती हुई दीखती है । अन्न खानेसे मन सबल और चिन्तन - शक्ति बढ़ती हुई दीखती है । यह अन्न यदि सात्त्विक होता है; तो मन, बुद्धि, प्राण और शरीर सात्त्विक होते हैं । यदि अन्न तामस होता है, तो मन, बुद्धि, शरीर आदि तामस होते हैं । केवल अन्न हो तामस हो - यह भी नहीं; यदि अन्नका स्वामी भी तामस है; तब भी उसका प्रभाव होता है । भीष्मपितामहने दुर्योधनका पापान्न खाया, इससे उनका ज्ञान लुप्त हो गया । द्रौपदीके वस्त्राकर्षणके समय वे इसीलिए द्रौपदीकी रक्षा न कर सके । इससे स्पष्ट है कि -भोजन सत्पात्रका स्वीकार करना 520चाहिए; असत्का नहीं ।
सत् - पुरुष भगवान् से प्रोक्त दैवी - सम्पत्ति वाले होते हैं ( गीता १६।१-३ ) आसुरी - सम्पत्ति वालोंमें शुद्धता आदि नहीं होती - ' न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ' ( गीता १६७ ) उसमें शौच- के विषय में योगदर्शनके व्यासभाष्य में कहा गया है- ' तत्र शौचं मृज्जलादिजनितं मेध्याऽभ्यवहरणादि च बाह्यम् ' ( २।३२ ) यहां शुद्ध भोजनका खाना भी शौच ( शुद्धता ) में शामिल किया गया है । तामस- भोजनके खाने से ब्रह्मचर्य, धारणा, साधन आदि कठिन हो जाते हैं । राजसिक - अन्न खाने से मन एवं बुद्धि चञ्चल हो जाते हैं । अतः पवित्र और सात्त्विक अन्न खाना चाहिए ।
रसयुक्त, घृताक्त, स्थिर और हृद्य, आयुः, सत्त्व, वल, आरोग्य, सुख, और प्रीति बढ़ानेवाले पदार्थ सात्त्विक होते हैं ( गीता १७१८ ) कड़वे, खट्टे, बहुत गर्म, तीक्ष्ण, रूखे, दाह उत्पन्न करनेवाले पदार्थ राजस होते हैं, उनका परिणाम दुःख, शोक एवं रोग है । ( १७१६ ) बासी, रसहीन, दुर्गन्धित, चार - पांच घण्टोंका पड़ा हुआ, जूठा और अपवित्र आहार · तामस होता है ( १७११० ) । मनुजीने कई पदार्थ अभक्ष्य कहे हैं; उनका भी प्रयोग उचित नहीं, जैसे कि—- ' लशुनं गृञ्जनं चैव पलाण्डु ' कवकानि च । श्रभक्ष्याणि द्विजातीनाम- : मेध्यप्रभवाणि च ' ( ५।५ ) लहसन, प्याज, कुकुरमुत्ता आदि पदार्थ • वर्जित हैं । गृञ्जन एक कन्द होता है, जिसके पत्तेकी नसवार • बनती है । कई इससे गाजर लेते हैं, कई शलगम । पर इनमें : तामसपन मालूम नहीं होता । गाजर पौष्टिक है, पर शायद काम-
In English
The Importance of Food Purity
This text explains how the purity of food, water, and fats directly affects the mind, speech, and life force. It argues that consuming sattvic (pure) food leads to a calm mind and righteous behavior, while tamasic (impure) food harms mental clarity and spiritual practice.
This chapter answers
- How does food affect the mind?
- Difference between sattvic and tamasic food?
- Why is food purity important in hinduism?
- What foods are considered tamasic?
- Connection between food and speech?
Also written: Chahara, Shuddhika, Dharmase, Sambandhan, Chahara Shuddhika Dharmase Sambandhan, चाहार - शुद्धिका धर्मसे सम्बन्धं