पञ्चम सुमन · प्रकरण 21

ब्राह्ममुहूर्त में उठनेका विज्ञ

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317आचरणों के लिए धार्मिक विभीषिका रखना कुछ अनुचित नहीं था । तथापि आज के समय की जिज्ञासाके अनुसार धार्मिक नियमोंके लाभ भी दिखलाए जाते हैं; नहीं तो आजकलके कई व्यक्ति उन नियमोंको ' ढकोसला ' बतानेकेलिए भी तैयार हो जाते हैं । उनकी सार्थकता के प्रदर्शनार्थं कई नियमोंके स्थूल लाभ दिखलाए जाते हैं । तथापि यहाँ लाभोंकी इयत्ता नहीं समझ लेनी चाहिए कि इतने ही लाभ हैं; अन्य नहीं । किन्तु जो लाभ हम बताने जा रहे हैं - वे दिङ्मात्र ही हैं - इससे अधिक भी लाभ हैं । हम इन प्रष्टव्य प्रश्नोंको अपने क्रमसे रखकर उन पर वैज्ञानिक रहस्य विवृत करेंगे; आशा है- ' आलोक ' के दर्शक - पाठक इधर अवहित होकर हमारे परिश्रमको सफल करेंगे ।

( १ ) ब्राह्ममुहूर्त में उठनेका विज्ञान

' ब्राह्म मुहूर्ते बुध्येत धर्मार्थौ चानुचिन्तयेत् ।

कायक्लेशांश्च तन्मूलान् वेदतत्त्वार्थमेव च ॥ ( मनु ० ४।६२ )

हिन्दुधर्ममें ब्राह्ममुहूर्तमें ( प्रात: ४ बजे ) उठनेकी आज्ञा है । इस समयका वातावरण सात्त्विक, शान्त, जीवनप्रद और स्वास्थ्य- प्रदायक होता है । इसी समय वृक्ष अशुद्ध वायुको आत्मसात् कर लेते हैं और शुद्ध वायु ( आक्सिजन गैस ) हमें देते हैं । कमल आदि इसी समय खिलते हैं । नदी आदिका जल सम्पूर्ण रात्रि के, तारामण्डलके, एवं चन्द्रमाके अमृतसने प्रभावको आत्मसात् करके इसी समय उसे व्यक्त करता है । इसके संसर्गसे ही सुरभित, और उदय होनेवाले दिनकरके निर्मल किरणोंके प्रभाव से पवित्र हुई हुई 318वायु हमारा आत्मिक एवं मानसिक कल्याण करती है । सूर्य ही समस्त क्रियाओं तथा विद्युत्शक्ति, प्राणशक्ति आदि समस्त शक्तियों का आकर होता है । सभी धातुएँ, सभी जीव, सब मनुष्य इसीकी शक्तिका अवलम्बन लेते हैं । ब्राह्ममुहूर्त में जागने पर हमारी साधारण शक्ति सूर्यकी शक्तिके अवलम्वसे वहुत सवल हो उठती है । उसके प्रभाव से हमारे मन और बुद्धि आलोकित हो उठते हैं । रात्रिमूलक - तमोगुण और तमोमूलक जड़ता हट जाती है । यदि इस सुन्दर समय में भी हम निद्रादेवी वा दूसरी देवी में आसक्त रहे; तब हम अपनी आयुको स्वयं घटानेवाले सिद्ध हो सकते हैं; क्योंकि निद्रा में तन्मूलक दौर्बल्यवश वह वायु हमें लाभके बदले हानि भी पहुँचा सकती है, ' देवो दुर्बल घातकः ' । वैसा करने पर हमारा आलस्य बढ़ जाता है, स्फूर्ति नष्ट हो जाती है । उस समय उठ बैठनेसे निद्रामूलक दुर्बलता नष्ट होकर हममें वल उत्पन्न होता है । तब वही वायु हमें लाभदायक सिद्ध होता है - ' सभी सहायक संबलके ' । ब्राह्ममुहूर्तमें उठानेकी प्रकृतिकी ' टाइमपीस घड़ी ' मुर्गा हुआ करता है ।

इस समय सम्पूर्ण दिनकी थकावट और चिन्ता आदि रात्रिके सोनेसे दूर होकर हमारा मस्तिष्क शुद्ध तथा शान्त एवं नवशक्ति- युक्त हो जाता है, और मुखको कान्ति एवं रक्तिमा चमक जाती है । मन प्रफुल्ल हो उठता है, शरीर नीरोग रहता है । यही समय शुद्ध मेधाका होता है । इसी समय मनः प्रसत्ति होनेसे प्रतिभाका उद्य होता है । उत्तम ग्रन्थकार इसी समय ग्रन्थ लिख रहे होते हैं । 319चित्त सात्त्विक होनेसे पुण्य कार्य में प्रवृत्त होता है । सुन्दर एवं प्रभावोत्पादक ग्रन्थोंका निर्माण भी इसी समय सम्भव होता है । शरीरमें भी इसी समय सब आलस्यादि हटकर स्फूर्ति उत्पन्न होती है । इस कालको उत्कृष्ट कार्यों में प्रयुक्त करना अपनी आयुर्वृद्धि, आत्मिक बल तथा मनोबल एवं शारीरिक और चारित्रिक - बलको निमन्त्रण देना है ।

जैसे कल्पका श्रारम्भ ब्रह्माके दिनका आरम्भ होता है, उसी समय ब्रह्माका दीर्घनिद्रामें विश्रान्त हुई हुई सृष्टिके निर्माण एवं उत्थानका काल होता है; ज्ञानरूप वेदका प्राकट्यकाल भी वही होता है, उत्तम ज्ञानवाली एवं शुद्ध - मेधावती ऋषि - सृष्टि भी तभी होती है, सत्त्वयुग वा सत्ययुग भी तभी होता है; धार्मिक प्रजा भी उसी आरम्भिक कालमें होती है, यह काल भी वैसा ही होता है । उसी ब्राह्मदिनका संक्षिप्त संस्करण यह ' ब्राह्ममुहूर्त ' होता है । यह भी सत्सृष्टि - निर्माणका प्रतिनिधि होनेसे सृष्टिका सचमुच निर्माण ही करता है । अपने निर्माण कार्य में इस ब्राह्ममुहूर्तका उपयोग लेना हमारा एक आवश्यक कर्तव्य हो जाता है । इसके उपयोग से हमें ऐहलौकिक - अभ्युदय एवं पारलौकिक - निःश्रेयस प्राप्त होकर सर्वाङ्गीण धर्मलाभ सम्भव हो जाता है ।

ढाई घड़ी का एक घंटा होता है । रातकी अन्तिम चार घड़ियों में पहलेकी दो घड़ियां ब्राह्ममुहूर्त नामसे और अन्तिम दो घड़ियाँ रौद्रमुहूर्त नामसे कही जाती हैं । इनमें ब्राह्ममुहूर्तमें ही शय्या- त्याग कहा गया है । उसमें रहस्य यही है कि उस समय हमारी 320बुद्धिका प्रेरक सूर्य भगवान् अपनी सात्त्विक ज्योतिः और शक्तिका भूलोक में संचार एवं प्रसार करता है । चन्द्र और नक्षत्रोंकी किरणोंके सहचारी अमृतको इसी समय ही लेकर शीतल, मन्द और सुगन्धित समीर चला करती है; जो सर्वाङ्गीण - लाभप्रद होती है । रात्रिमें तमोवृद्धि होनेसे उस अमृतका प्रभाव नहीं पड़ सकता । उषःकालमें सात्त्विक ज्योतिःपुञ्ज निकट होनेसे उसीको वह प्रातःकालकी वायु ग्रहण कर लेती है । इसी बातको जानकर आजकलके लोग प्रातः नगरसे बाहर भ्रमणार्थ जाते हैं । पर यदि धार्मिक रीति से वे कर्तव्य करते चलें; तो नास्तिकता की समाप्ति होकर आस्तिकता बढ़ जाय ।

( २ ) प्रातःस्मरण पद्य

' प्रातरग्निं प्रातरिन्द्रं हवामहे, प्रातर्मित्रावरुणा प्रातरश्विना । प्रातर्भगं पूषणं ब्रह्मणस्पतिं प्रातः सोममुत रुद्रं हुवेम ' ( ऋ ० ७ । ४१।१ ) ' मद्भक्ता यत्र गायन्ति तत्र तिष्ठामि नारद! ' इस समय में किया हुआ गान भी अपने तथा दूसरोंके आकर्षणका साधन होता है; जब उसमें भी भगवद्भक्ति ओत - प्रोत हो; तो फिर तो क्या कहना? यह ' सोना और सुगन्ध ' हो जाया करता है । इसलिए प्रातः भगवान्‌को आकृष्ट करनेके लिए, तथा स्वयं भी तन्मयीभावार्थ कई राग वा भजन गाये जाते हैं, जिससे हमारा भावी दैनिक कार्यक्रम भी सुन्दर और निष्पाप बने । पर हमारी लौकिक भाषा अपभ्रंश भाषा होनेसे भगवान् के उतने निकट नहीं पहुँच पाती । देवभाषा देवोंसे प्राप्त हुई एक भाषा है, इससे हम देवों तथा देवाधिपति

In English

The Science of Waking Up During Brahma Muhurta

This chapter explains the spiritual and physical benefits of waking up during the Brahma Muhurta, around 4:00 AM. It argues that this time offers pure air and mental clarity, which helps in personal development and successful work.

This chapter answers

  • What is brahma muhurta?
  • Benefits of waking up at 4 am?
  • Why is brahma muhurta considered sattvic?
  • How does morning air affect health?

Also written: Brahmamuhurta, Men, Uthaneka, Vigya, Brahmamuhurta Men Uthaneka Vigya, ब्राह्ममुहूर्त में उठनेका विज्ञ

मूल ग्रन्थ

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