पञ्चम सुमन · प्रकरण 22
प्रातः स्मरणपद्य
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321भगवान् के निकट उन शब्दोंको शीघ्र पहुँचा सकते हैं । यद्यपि वैदिक शब्द तो उससे भी बहुत निकटताकारक हैं; पर उस समय हम अस्नात होनेसे उनमें अधिकृत नहीं । उनका तो स्नानोत्तर सन्ध्या आदिमें उपयोग करना पड़ता है । अतः शयनसे उठते ही संस्कृत पद्योंकी आवश्यकता पड़ती है । पद्यकी रचना लययुक्त होने से तन्मयता में विशेष साधन बन जाती है । इनमें कई इस प्रकारके भी पद्य होते हैं, जो भगवान् के ध्यानके साथ ही हमें धर्म तथा अपने देशके आन्तरिक परिचय करानेवाले भी होते हैं । इससे हम उस अपने देश तथा अपने धर्मको छोड़ने वा उससे द्रोह करनेका कभी स्वप्न भी नहीं देख पाते । अपने जीवनदाता एवं त्रारणकर्ता उस प्रभुको तथा पूर्वोल्लिखित वेदमन्त्रों में कहे हुए देवोंको उस सात्त्विक समय में स्मरण करना हमें भविष्यत् में भी असन्मार्ग में जाने नहीं देता । प्रातः स्मरणके कुछ पद्य हम लिख
' वामाङ्गीकृतवामाङ्गि कुण्डलीकृत कुण्डलि । आविरस्तु देते हैं-
पुरोवस्तु भूतिभूत्यम्बराम्बरम् ॥१ ॥ श्रगजाननपद्मार्कं गजानन- महर्निशम् । अनेकदन्तं भक्तानामेकदन्तमुपास्महे ॥२ ॥ वेदानुद्धरते जगन्निवहते भूगोलमुद्बिभ्रते, दैत्यं दारयते बलिं छलयते क्षत्रक्षयं कुर्वते । पौलस्त्यं जयते हलं कलयते कारुण्यमातन्वते, म्लेच्छान्मूर्च्छयते दशाकृतिकृते कृष्णाय तुभ्यं नमः || ३ || सूर्यः शौर्यमथेन्दुरुच्चपदवीं सन्मङ्गलं मङ्गलः, सद्बुद्धिं च बुधो गुरुश्च गुरुतां शुक्रः श्रियं शं शनिः । राहुर्वाहुबलं करोतु विपुलं केतुः कुलस्योन्नतिं, नित्यं प्रीति- 322करा भवन्तु किल नः सर्वे प्रसन्ना ग्रहाः || ४ || शारदा शारदाम्भोज- वदना वदनाम्बुजे । सर्वदा सर्वदास्माकं सन्निधिं सन्निधिं क्रियात् ॥५ ॥
प्रसन्नतां या न गताभिपेकतस्तथा न सम्लौ वनवासदुःखतः ।
मुखाम्बुजश्री रघुनन्दनस्य मे सदास्तु सा मंजुलमङ्गलप्रदा ॥६ ॥
कृष्ण! त्वदीयपदपङ्कजपञ्जरान्ते श्रद्यैव मे विशतु मानसराजहंसः ।
प्राणप्रयाणसमये कफवातपित्तैः कण्ठावरोधनविधौ स्मरणं कुतस्ते ॥७ ॥
भृगुर्वसिष्ठः क्रतुरङ्गिराश्च, मनुः पुलस्त्यः पुलहश्च गौतमः । रैभ्यो मरीचिश्च्यवनश्च दक्षः कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम् ॥८ ॥ प्रह्लाद- नारदपराशरपुण्डरीक - व्यासाम्वरीपशुकशौनक भीष्मदाल्भ्यान् । रुक्माङ्गदाजु नवसिष्ठविभीषणादीन् पुण्यानिमान् परमभागवतान्
नमामि ॥ ॥ अयोध्या मथुरा माया काशी की अवन्तिका ।
पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिकाः ॥१० ॥
( ३ ) प्रातः हस्तदर्शनका विज्ञान ।
प्रातः हाथका दर्शन शुभ हुआ करता है । कहा भी है- ' कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती । करपृष्ठे च गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम् ' । इस पद्य में हाथके अग्रभागमें लक्ष्मीका, मध्यभागमें सरस्वतीका और पृष्ठभाग में गोविन्द का निवास कहा है । यह केवल ‘ कथनमात्र ' नहीं; किन्तु ठीक भी है । हाथका महत्त्व किससे छिपा है? इसी हाथसे हम लक्ष्मी कमाते हैं; तब ' कराये वसते लक्ष्मीः ' ठीक ही हुआ । इसी हाथसे लिखना - पढ़ना सीखकर हम सरस्वतीदेवीको प्राप्त करते हैं; तब ' करमध्ये सरस्वती ' भी कहना ठीक हुआ । इसी हाथसे हम मालाकी मणियां घुमाकर
In English
Morning Remembrance and Hand Observation
This chapter explains the importance of reciting rhythmic Sanskrit verses immediately after waking to connect with the divine. It provides specific prayers for deities, planets, and sages, while also explaining the spiritual significance of looking at one's hands in the morning.
This chapter answers
- What are morning remembrance verses in hinduism?
- Why do hindus look at their hands in the morning?
- What is the meaning of karagre vasate lakshmi?
- Which seven cities are considered moksha dayika?
Also written: Pratah, Smaranapadya, Pratah Smaranapadya, प्रातः स्मरणपद्य