पञ्चम सुमन · प्रकरण 57
हस्तपादादि - शुद्धिका विज्ञान
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515पूर्वमें । अतः ‘ आयुष्यं प्राङ्मुखो मुङ्क्ते ' ( २५२ ) यह मनुस्मृतिका वचन ठीक सिद्ध हुआ ।
( ४६ ) हस्तपादादि - शुद्धिका विज्ञान ।
भोजन करने से पूर्व हाथ - पांव आदिको सदा जलसे धो लेना चाहिए । उसमें कारण स्पष्ट है । हाथमें कभी मक्खी आदि बैठ " गई; वा हमने कहीं हाथ अशुद्ध स्थानपर रखा; तो हाथमें विष वा अन्य अशुद्धि रह सकती है । वैसे भी किसी पवित्र वस्तुको छूना हो; हस्तप्रक्षालन अवश्य कर लेना चाहिये । इससे हाथमें भीतरी ऊष्मा प्राप्त होजानेसे उसपर के अशुद्ध - परमाणु दग्ध हो जाते हैं । पवित्र करने में जलसे बढ़कर और कोई नहीं । भोजनका पात्र खानेके लिए जहाँ रखना है; वहाँ भी जलसे लेप कर डालना चाहिए— इससे पृथिवीकी भीतरी ऊष्माके उद्वमनसे पृथिवीपर के संक्रामक - कीटाणु दूर हो जाते हैं । इससे भोजनमें अशुद्ध - परमाणु नहीं पहुँच पाते । प्रातः पाकशालाकी भूमि में जलसे लीपनेका रहस्य भी यही है ।
भोजनकेलिए कहा है- ' आर्द्रपादस्तु भुञ्जीत नार्द्रपादस्तु संविशेत् । आर्द्रपादस्तु भुञ्जानो दीर्घमायुरवाप्नुयात् ( मनु. ४ । ७६ ) यहाँपर पैर गीले करके भोजन करनेसे दीर्घायुकी प्राप्ति कही है । इसमें वैज्ञानिक रहस्य यह है कि — उससे भीतर कुछ उष्णता उत्पन्न होती है, वह ऊपर उठकर पेटमें संचित हो जाती है, उससे भोजनकी पाकक्रियामें सहायता मिलती है । भोजन ठीक पच जावे; तो कोई रोग नहीं होता । रोग न होने से दीर्घ आयु होगी ही । भोजन 516करते हुए श्वास - प्रश्वासकी गति बढ़ जाती है । श्वासादिका बढ़ना आयुकेलिए हानिकारक है । हाथ - पांव धोनेसे वह गति कम हो जाती है, और विद्युत - शक्ति उत्पन्न होनेसे भोजनकी पाकक्रिया में सहायता प्राप्त होती है ।
( ५० ) भोजन में मौनका विज्ञान ।
भोजनमें चुप रहनेका रहस्य यह है कि -भोजन करते हुए लार हमारे मुखमें उत्पन्न होती है, उससे भोजनकी परिपचनक्रिया सम्पन्न होती है । उस समय यदि वातचीत की जावे; तो वह लार भोजनके लिए पर्याप्त मात्रा में न बन सकेगी; क्योंकि उसका कुछ उपयोग बोलने में भी होगा । इससे मुखके सूखनेपर बीच - बीचमें पानी पीना पड़ेगा, जिससे वातदोषकी उत्पत्ति हो सकती है । और खाते हुए बोलने से मुहसे बाहर थूक गिरती है; दूसरे पर वा अपने भोजनपर पड़ सकती है । उस समय बातचीत करते हुए · जीभके कटने का डर भी रहता है, क्योंकि मन सदा एक इन्द्रियके साथ रहता है । दूसरी इन्द्रियके साथ उसे बलात् जोड़ने में कई M हानियाँ तथा भोजनकी अनपच हो सकती है ।
( ५१ ) आहार - शुद्धिका धर्मसे सम्वन्ध ।
हमारा धर्म आचार - विचार, आहार तथा व्यवहार इन चार वस्तुओं पर निर्भर है । इनमें आहारकी तो मुख्यता है ही; क्योंकि प्रसिद्ध है - ' जैसा खावे अन्न, वैसा होवे तन और मन ' तो जैसा आहार होगा; वैसे मन और बुद्धि होंगे । जैसे मन और बुद्धि होंगे; वैसे विचार होंगे । जैसे विचार होंगे, वैसे ही आचरण
In English
Science of Purification and Eating
This text explains the practical reasons for washing hands and feet before eating and why one should remain silent during meals. It argues that these actions aid digestion, prevent germs from entering food, and maintain bodily health.
This chapter answers
- Why should hindus wash hands and feet before eating?
- Benefits of eating with wet feet?
- Why is silence important while eating?
- How does food affect the mind and body?
Also written: Hastapadadi, Shuddhika, Vigyana, Hastapadadi Shuddhika Vigyana, हस्तपादादि - शुद्धिका विज्ञान