पञ्चम सुमन · प्रकरण 13
वैवाहिक - विधियोंका रहस्य
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257अतः विधिपूर्वक स्त्रीपरिग्रह भी आवश्यक ही है । विवाह विधि- पूर्वक स्त्रीको ग्रहण कर लेना - यह धर्मोद्द श्यसे होता है । ऐसे ही किसी स्त्रीको रख लेने से वह ' धर्मपत्नी ' नहीं वन सकती; वह ' रखेली ' कही जाती है; अतः विधिपूर्वक विवाह करनेसे ही ' धर्मपत्नीत्व ' होता है और धर्मानुष्ठान भी पुरुषका पूर्ण होता है ।
स्त्री स्वतन्त्र - वृत्ति न करती हुई भी जैसे पुरुषकी वृत्तिकी फल- भागिनी होती है, वैसे ही यज्ञादि - कर्म स्वतन्त्रतासे न करती हुई भी उस कार्य में सहायता देने और साथ बैठनेसे उसके फलको प्राप्त कर लेती है । तभी तो कहा जाता है - ' वसिष्ठस्य पत्नी - वसिष्ठकर्तृ कयज्ञस्य फलभोक्त्री ' । ( वसिष्ठकी पत्नी अर्थात् वसिष्ठके किये हुए यज्ञके - फलको भोगनेवाली ) इसीलिए वह विद्या प्राप्त नहीं करती; क्योंकि उसका काम सेवा करना है; सेवासे विद्यावाला मेवा उसे मिल ही जाया करता है । उसका पति ही विद्या पढ़ा होनेसे उसके विद्याकार्यका निर्वाहक हो जाता है । दाहिना हाथ लिखता है, बाँया नहीं । पर बाँया हाथ दाहिनेका सहायकमात्र होता है । न तो बलशाली होता है, न दाहिने हाथवाले सब विशिष्ट अनुष्ठानों तथा कर्मों में वह अधिकृत ही होता है । यदि स्त्री भी पुरुष - इतनी विद्या पढ़े, तो वह पुरुषकी सेवा ही न कर सके । साम्यवादमें सेवा नहीं हुआ करती । यदि उससे दोनों काम लिये जायँ, अपनी सेवा भी उससे पूरी करायें, विद्याकार्य भी उससे लें, तो यह उसपर अत्याचार होगा । देखिये, पुरुष ही विद्याकार्य करके फिर सेवा करने योग्य नहीं रहता, किन्तु अपनी सेवा कराने ही लगता है । उसे यज्ञकार्य 258करना है, ग्रन्थ - प्रणयन करना है, उसे वृत्तिकेलिए जाना है, उसे सब वस्तुएँ प्रस्तुत चाहियें I । पठिता स्त्री स्वाभाविकतावश अपने उसी विद्याकार्यमें संलग्न रहनेसे उस सेवामें सक्षम नहीं हो. सकती ।
' ममेयमस्तु पोष्या ' ( अथर्व ० १४ । ११५२ ) । ( यह मेरी पोष्या हो ) इस वैवाहिक मन्त्रने उसे ' पोष्या ' बताकर सिद्ध कर दिया है कि उसे स्वतन्त्र विद्याकार्य वा स्वतन्त्र वृत्तिकार्यकी कोई आवश्यकता नहीं । हाँ, आचार - विचारकी शिक्षा उसकेलिए माता - पिता द्वारा आवश्यक है । पुरुष ही उसके योगक्षेमका निर्वाहक होता है । अस्तु ।
विवाहसंस्कारका प्रयोजन — विवाह एक सांसारिक अव्यवस्था को दूर करनेवाला संस्कार है, इसीसे पुरुष सुसंस्कृत तथा सभ्यं एवं धर्मात्मा बनता है । यदि विवाह - संस्कार न हो तो पुरुष पशुसे भी गया - बीता हो जाय । विवाह के अभाव में न तो पुरुषकी कोई पत्नी ही होती, न मां न बहन और न उसकी कोई लड़की - लड़का आदि सन्तान होती । विवाह बन्धन के अभाव में पुरुष अपनी काम- वासनाको पूर्ण करनेकेलिए कुत्ते आदि पशुओंकी तरह स्त्रीमात्र के पीछे लगा रहता, बलात्कार करता, छीना - झपटी करता, लड़ता- झगड़ता, खून कर डालता, अपनी बुद्धिको दूसरेके विनाशमें लगाता और क्रोधके साम्राज्यको व्यापक बनाता । उससे उत्पन्न इन अवैध सन्तानोंकी कोई रक्षा न करता । उनको पशु - पक्षी खा जाते, जीवित रहते तो गली - गली ठोकरें खाते फिरते । न 259उनका घर होता, न कोई उनका स्कूल - कॉलेज होता | विवाह - रहित राष्ट्र, धर्म, शिक्षा, सभ्यता, संस्कृति, कला, विज्ञानसे सर्वथा शून्य एक पशुराष्ट्र ही होता, परन्तु इसी विवाह - संस्कारने मनुष्यको व्यवस्थित किया, परिवार दिया, घर वसानेकी, शिक्षा पानेकी प्रेरणा दी । विवाहसे ही हमारा यह सुनहला संसार बस पाया ।
मनुष्य एक स्वार्थी प्राणी है; ८४ लाख पशु - पक्षी आदियोंकी ' योनि भोगकर फिर मनुष्य योनिमें आता है; वह पशुत्व - संस्कार भी इसमें वना रहता है । जब कभी उसे अवसर मिलता है, वह अपनी पशु - प्रकृतिको पूर्ण करनेमें नहीं चूकता । अपहरण, बलात्कार, घर्षण आदि उसी पशुभावके साक्षात् उदाहरण हैं । तब उसकी कामभावनाको एक स्त्री - पुरुषमें बांध देना और शास्त्रीय नियमों द्वारा उसे धीरे - धीरे निवृत्ति की ओर ले जाना भी विवाह का प्रयोजन होता है ।
इसके अतिरिक्त अपने शरीरमें उसकी जितनी मोह- ममता हो सकती है, उतनी अन्य किसी वस्तुमें नहीं । विवाहद्वारा उसका स्वार्थ या अपने शरीरका ममत्व अपने शरीरसे आगे निकलकर पत्नी, पुत्र, कन्या, सगे - सम्बन्धी आदि परिवार में बंट जाता है । उस मनुष्यका स्वार्थपरक प्रेम पहले घरकी चहार- दीवारीसे प्रारम्भ होकर मोहल्ला, गली, ग्राम, नगर, प्रान्त, देश और फिर क्रमशः समस्त विश्व में व्याप्त हो जाता है । गृहस्थ में रहते हुए पति - पत्नीको एक दूसरेके हितकेलिए अपने स्वार्थका बलिदान, मनके प्रतिकूल व्यवहारमें सहिष्णुता और क्षमा, अत्यन्त 260कष्टमें भी धैर्य आदि गुणोंका प्रयोग अनिवार्य होता है, उनका जीवन स्वतः ही सुनियन्त्रित हो जाता है । ये सब गुण क्रमशः विकसित होकर मनुष्यको सामाजिक क्षेत्र में विशिष्ट व्यक्तित्व प्रदान करते हैं । गृहस्थके इस महाविद्यालय में त्याग - प्रेम आदिका पूर्ण अभ्यास कर जब पति - पत्नी उसी प्रेमभाव, त्यागभावका प्रयोग ईश्वरकी दिशा की ओर प्रवृत्त कर देते हैं, तब वे ईश्वरके अत्यन्त निकट पहुंच जाते हैं । यही उनके शास्त्रानुसार जीवनका परम एवं चरम लक्ष्य हुआ करता है । इस प्रकार यह विवाह - संस्कार संसार को सुव्यवस्थित करनेका एक अचूक उपाय है ।
कन्या का विवाह कब?
शास्त्रकारोंने कन्याका विवाह ऋतुकालसे पूर्व कहा है । गुणवान् वरकी प्राप्तिमें इससे देरी हो जाने पर भी दोष नहीं माना है; पर आजकलका युग २४ वर्षकी अवस्थामें कन्याका विवाह बताता है कि युवति कन्या ही अपने अनुकूल पतिको स्वयं जान • सकेगी, पर ऐसा कथन अंग्रेजी राज्यका प्रसाद एवं सन्निपातका प्रलापमात्र है । दूसरेके स्वभाव और चरित्रका परीक्षण कोई सुगम कार्य नहीं । इसमें दूरदर्शी भी भटक जाते हैं । ' विष रस भरा - कनक घट जैसे ' कैसे तत्क्षण परीक्षित हो सकता है? २४ वर्षकी लड़कीकी तो बात ही नहीं कही जा सकती । उस अवस्था में इन्द्रिय- वृत्ति प्रबल होती है; और अनुराग एकदम उन्मुख होता है । दूसरेकी प्रकृतिकी परीक्षा में जिस धैर्य, विवेक एवं अनुभवकी प्रयोजनीयता होती है, वे तब अकर्मण्य होते हैं । एक सुतीक्ष्ण
In English
The Purpose and Importance of Marriage
This text argues that marriage is a necessary rite to transform human impulses into social order and family life. It describes the traditional roles of husband and wife, stating that a woman's primary role is service rather than independent study or profession. The chapter also explains how marriage helps a man move from selfishness toward social responsibility.
This chapter answers
- Why is marriage necessary in hinduism?
- What are the traditional roles of husband and wife?
- How does marriage prevent animalistic behavior?
- At what age should a girl be married according to shastra?
Also written: Vaivahika, Vidhiyonka, Rahasya, Vaivahika Vidhiyonka Rahasya, वैवाहिक - विधियोंका रहस्य