पञ्चम सुमन · प्रकरण 35

देवकार्य पूर्वाभिमुख

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363सम्भव है यह रोगके विरुद्ध ही युद्धकी विजय - दुन्दुभि हो, अस्तु ।

यद्यपि प्राचीन ऋषि - मुनियोंने एतदादि विज्ञान अपने मुखसे नहीं कहे; तथापि उन्होंने इस विषय में एतदादिक ही विज्ञान अपने हृदय में निहित किया था— यह उनके उक्त पदार्थोंके लिए बहुत बल देनेसे स्फुट हो रहा है । यह हमने बहुत बार कहा है, और यह ठीक भी है कि — उनकी एकदादिक विधियोंका साक्षात् उद्देश्य तो मुष्मिक फल ही था; परन्तु वे ही विधियाँ ऐहिक फलको भी रखती हैं, जिससे हमारा शरीर शुद्ध और स्वस्थ रहे । ' शरीर- माद्यं खलु धर्मसाधनम् ' । इसी शरीरके द्वारा ही तो कर्म करनेसे पारलौकिक फल मिल सकता है; तब पारलौकिक भी विधियां ऐहलौकिक भी स्वतः सिद्ध हुई । तब जो यज्ञोपवीतकाल से ही मृगचर्मका धारण ब्रह्मचारीको आदिष्ट किया है; सो ब्रह्मचर्यकाल से ही उसका उपक्रम मृगवाली सात्त्विकता लाने एवं हमें जर्जर कर डालनेवाली भावी व्याधियोंके निवारणार्थ ही था, जिससे ' न रहे बांस न बजे बांसुरी ' रोगोंकी आशङ्काका बीज ही नष्ट हो जावे । यह यहाँ स्पष्ट हो रहा है ।

( २१ ) देवकार्य पूर्वाभिमुख ।

स्नानादि करके फिर सन्ध्योपासनादिका क्रम होता है; यह आवश्यक है । जिस परमात्माने हमें संसार में भेजा, जिसकी शक्ति रूप देवताओंने हमारी सत्ताको स्थिर किया, हमारा संरक्षण किया; यदि हम उन देवताओं तथा देवदेवके लिए पन्द्रह - बीस मिनट समय निकालकर उनकी उपासना करके दूसरे रूपमें उनकी 364कृतज्ञता स्वीकार नहीं करते; तो हमसे बढ़कर दूसरा कृतघ्न कौन हो सकता है; आगे भी हमें उन्हींसे अपने मनोरथों को प्राप्त करना है, उन्हींके आश्रयसे सांसारिक कार्य निर्वाह करना है; अतः सन्ध्योपासन हमारा आवश्यक कर्म वा नित्यकर्म ठहरता है - इस को छोड़नेसे हम कृतव्न एवं शूद्रवत् हो जाते हैं । अतः इसे कभी नहीं छोड़ना चाहिए । यह देवकार्य है ।

देवकार्य पूर्व दिशा वा उत्तर दिशा की ओर मुख करके किये जाते हैं । ' प्राची हि देवानां दिकू ' ( शतपथ ० ११७११।१२ ) यहां देवताओंकी दिशा पूर्व कही गई है । देवताओंके राजा इन्द्रकी • दिशा भी पूर्व मानी गई है । जैसे कि अथर्ववेद संहितामें कहा है — ' प्राच्या दिशस्त्वमिन्द्रासि राजा ' ( ६६८३ ) । ' इन्द्रः प्राङ् तिष्ठन् ’ ( अथर्व ० ६।१२।२२ ) । देवताओंकी दिशा पूर्व है — यह प्रत्यक्ष भी है, देवतारूप जितने ग्रह - नक्षत्र हैं; वह पश्चिम से पूर्व की ओर जा रहे हैं; इससे स्पष्ट है कि - वही उनकी दिशा है । स्थावर - जङ्गमके आत्मा सूर्य आदिका उदय भी तो पूर्व दिशामें ही दीखता है । पश्चिम अस्तकी दिशा है । सूर्यके साथ सन्ध्याका सम्बन्ध होनेसे सायं - सन्ध्या पश्चिमाभिमुख भी होती है; शेष सब देवकर्म पूर्वाभिमुख ही होते हैं । इससे भारतीयोंको यह भी संकेत हो रहा है कि- तुम भी पूर्वके भक्त बनो; तुम्हारा भी उदय होगा । यदि पश्चिमके भक्त बने; तो तुम्हारी भारतीयता का भी अस्त होगा । पूर्व दिशासे ही प्राणशक्तिका अभ्युदय होता है । पूर्व दिशा तेजस्विनी दिशा होनेसे हमारी भी तेजस्विता का कारण बनती है । उत्तर दिशा

In English

Devakarya: Facing the East for Divine Service

This chapter explains that ancient rituals serve both spiritual goals and physical health by preventing disease. It describes Devakarya as a daily duty of gratitude toward the deities and instructs that these prayers should be performed facing east or north.

This chapter answers

  • Why do hindus face east during prayer?
  • What is the purpose of devakarya?
  • Why is the east considered the direction of the gods?
  • How do ancient rituals help physical health?

Also written: Devakarya, Purvabhimukha, Devakarya Purvabhimukha, देवकार्य पूर्वाभिमुख

मूल ग्रन्थ

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