पञ्चम सुमन · प्रकरण 48

यज्ञका वैज्ञानिक महत्त्व

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433प्रकारके क्षेत्र में, अमुक - नक्षत्र में, अमुक मन्त्रोंसे बोई जाती थीं; उन्हें अमुकप्रकारके जलसे सींचा जाता था; और उनमें अमुक खाद दिये जाते थे । अमुक मुहूर्त में उन्हें तोड़ा जाता था,

जिन गौओंका घृत उपयोगमें लेना होता था, उन्हें अमुक प्रकारकी कर घृत निकाला जाता था । उसी प्रकार समिधाएँ, चरु, आज्य आदिको संस्कारित किया जाता था कि - अमुक कामनामें कौनसी समिधा हो, कैसी सामग्री हो १? यज्ञके आचार्य आदिको तथा यजमानको अमुक - प्रकारके रहन - सहन, एवं नियमोंका पालन करना होता था । इस प्रकार संस्कार होने से उन सबमें सूक्ष्म - चेतना उत्पन्न होती थी, और उस चेतनामय वातावरणको यज्ञ - द्वारा उद्दीप्त करके आकाशको अभीष्ट तत्त्वों से परिपूर्ण कर दिया जाता था, जिससे यज्ञकर्ताकी मनः - कामनाएँ पूर्ण हो जाती थीं । इतना सूक्ष्म विश्लेषण किया था हमारे पूर्वजोंने ।

आधुनिक वैज्ञानिकोंने यह स्वीकार कर लिया है कि — स्थूलसे सूक्ष्म और व्यक्तसे अव्यक्त बलवान् होता है । हमारे वैज्ञानिक- मूर्धन्य मुनियोंने तत्तन्मनोरथोपयुक्त स्थूल यज्ञ -

सामग्रीको सूक्ष्म करनेवाली अग्निको ही जा ढूंढा था; जिससे कार्य शीघ्र सिद्ध हो जावे । उनका कहना था कि - सूर्यकी किरणें, अग्नि और विशेष शब्द ( मन्त्र ) यह पृथक् - पृथक् तथा समुदायरूप से परमाणुओं 434को विभक्त करते हैं । परमाणुओं से विजातीय द्रव्योंको पृथक् करके उन्हें अपने अनुकूल बनानेसें उक्त तीनों पदार्थोंको वे लोग काम में लाते थे, उसका कारण बनता था यज्ञ । यज्ञमें वे इन तीन तत्त्वोंका उपयोग लेते थे । अर्वाचीन जड़ - विज्ञान जिन बांधायको हटाने में सर्वथा असमर्थ है, प्राच्य विज्ञान उन बाधाओंको यज्ञ द्वारा तथा उसके अङ्गभूत जप - पाठ आदि से हटा देता है । वेदों में यज्ञ- विद्या भरी हुई है: कल्पसूत्र उनके विनियोजक हैं; अब चाहियें उसके प्रयोगकर्ता ।

फलतः जब तक हमें व्यवस्था में रहना है, तब तक हमें अग्नि- चयन करना ही पड़ेगा । अग्नि ही यज्ञका देव एवम् आधार है । जैसा कि - वेद में कहा है- ' यज्ञस्य देवम् ' ( ऋ ० सं ० १११११ ) अग्निका त्याग और व्यवहारका त्याग समान वस्तु है । सम्भवतः इसी व्यवहार - त्यागके कारण संन्यासियोंका अग्नि - परित्याग शास्त्र- कारोंको इष्ट है ।

वेदोंका विषय यज्ञ है — यह संकेत दिया ही जा चुका है । वेदोंका आविर्भाव यज्ञ करने करानेकेलिए हुआ है । इसलिए वेदके अधिकारकी प्राप्त्यर्थ यज्ञोपवीत धारण करना पड़ता है, वह यज्ञोपवीत यज्ञके वस्त्र ( बर्दी ) होनेसे ही उस नामको धारण करता है । वेद तथा यज्ञ दोनोंमें उपास्य देवता हुआ करते हैं- जो हमसे उच्चयोनिवाले हैं - जिनमें हमारी विविध - कामनाओंको पूर्ण करनेकी क्षमता होती है, जिसका संकेत ऋग्वेदसंहिताका ' न मर्डिता विद्यते अन्य एभ्यो देवेषु मे अधिकामा अयंसत ' ( १०।६४।२ ) 435( ' देवताओंसे अन्य कोई सुख प्रदाता नहीं; अतः मेरी कामनाएँ भी देवताओंमें नियन्त्रित - नियमित हैं ) यह मन्त्र दे रहा है ।

‘ यज्ञ ' शब्द ‘ यजयाचयतविच्छप्रच्छरक्षो नङ् ' ( ३ | ३ | १० ) इस पाणिनि -सूत्र से यज धातुसे नङ् प्रत्यय करनेपर बनता है, और यज धातुका अर्थ ' यज देवपूजा - संगतिकरण - दानेषु इस पाणिनिके धातुपाठके अनुसार देवताओंकी अर्चना तथा देवताओंको दान, और देवताओंका यज्ञमें संगतिकरण होता है । देवता परमात्माके ही अङ्ग होते हैं, जैसेकि - अथर्ववेदसंहितामें कहा है- ' यस्य त्रय- स्त्रिंशद् देवा अंगे गात्रा विभेजिरे ' ( १०/७/२७ ) अङ्गों - बिना अङ्गीकी पूजा नहीं हो सकती । अंशके बिना भला अंशीकी पूजा किस प्रकार हो? इस कारण देवपूजन यज्ञरूप - भगवान्का आराधन ही है, जैसा कि ब्राह्मणभागात्मक वेद में कहा है- ' तद् यद् इदमाहुः- अमु ं यज, अमु ं यज -

— इति एकैकं देवम्, एतस्यैव सा विसृष्टिः, एष उ ह्येव सर्वे देवाः ' ( शतपथ ० १४ | ४ | २ | १२ ) अर्थात् देवता परमात्माकी ही विसृष्टि ( विकास ) है, वह परमात्मा सर्वदेवमय है । मनुस्मृतिमें भी आया है - ' आत्मैव देवताः सर्वाः सर्वमात्मन्यवस्थितम् ' ( १२।१११ ) यहाँ श्रीकुल्लूकभट्टने ऐसी ही व्याख्या की है— ' इन्द्राद्याः सर्वदेवताः परमात्मैव, सर्वात्मत्वात् परमात्मनः ' ।

अब यह प्रश्न है कि — देवपूजनात्मक यज्ञ किस माध्यम द्वारा हो? इसका उत्तर वेदादि शास्त्रों में आया है कि अग्निके बिना यज्ञ देवताओंको पहुँचता है, यह ऋग्वेदशाकल्यसंहिता ( १ | १ | ४, 436७ । ११ । ५ ) में तथा अथर्ववेदसंहिता ( ५/१२/२ ) में कहा गया है । तब यज्ञका माध्यम भी अग्नि सिद्ध हुआ; क्योंकि अग्निको देवताओंका मुख माना गया है, देखिये इसमें शतपथ ( ३ । ७ । ४ । १० ) । यही बात शाङ्खायनत्राह्मण ( ३।६ ) तथा महाभारत ( १७१७ -१०-११ ) में अग्निके वचनसे सूचित की गई है । तब देवताओंकी हविका भी अग्निमें डालना समूल सिद्ध हुआ । मुखमें डाला हुआ अन्न जैसे श्रङ्गको प्राप्त हो जाता है, वैसे ही देवताओंके मुख- अग्निमें डाला हुआ हव्य भी सब देवोंको प्राप्त हो जाता है ।

इस बातको हम लौकिक शैलीसे यों कह सकते हैं कि जैसे इस जगत्में प्रत्येक राष्ट्रको सुव्यवस्थित करनेवाली राजशक्ति विविधरूप में हुआ करती है, उससे प्रजापर आई वा आनेवाली आपत्तिको दूर किया जाता है, वैसे सम्पूर्ण भूमण्डलको आवश्यक वृष्टि आदि द्वारा सुव्यवस्थित करनेवाली परमात्माकी विविध शक्तियोंका नाम ही देवता हुआ करता है । उनसे प्रजापर आनेवाली आपत्तिको दूर किया जाता है । जैसे राजशक्तिको अनिवार्य कर ( टैक्स ) ठीक - ठीक न मिलनेपर राजशक्तिका ठीक - ठीक प्रयोग न होनेसे चोरी - डाके आदि घटनाओंसे प्रजा यदा तदा संत्रस्त रहती है, वैसे ही देवशक्तिके समुपबृंहक यज्ञ - याग आदि न होने से ' यज्ञे नष्टे देवनाशः, ततः सर्वं प्रणश्यति ' ( ६०।६ ) इस वायुपुराणके कथनानुसार जल - वायु आदि भूतों पर देवशक्तिके ठीक - ठीक नियन्त्रण न रहने से अतिवृष्टि, अनावृष्टि, जलप्लावन ( बाढें ) अग्नि- उपद्रव आदि प्रजाको संत्रस्त करनेवाली भीषण ईतियां हुआ 437करती हैं ।

निरुक्तमें ' यज्ञः कस्मात्? प्रख्यातं यजतिकर्म इति नैरुक्ताः ' ( ३ | १६ | ६ ) यह कहकर यजन- देवपूजन हवनादिका नाम ' यज्ञ ' बताया है । इसमें देवोंका संतर्पण होता है, देवशक्तिकी बलवत्ता हो जाती है; जिससे वे जलशक्ति, वायुशक्ति, अग्निशक्ति आदिको नियन्त्रणमें रखते हैं तथा शुद्ध रखते हैं, जिससे इनके कारण प्रजामें संत्रास नहीं हो पाता । पर आजकल धर्मनिरपेक्षता बढ़ जानेसे उसमें वेदों तथा यज्ञोंका वह महत्त्व नहीं रहा, जिससे हमें आये दिन उक्त दैवी विपत्तियों का सामना करना पड़ रहा होता है; पर यज्ञ - यागादि होनेसे आधिदैविक विपत्तियाँ न आने से जगत् सुखका श्वास ले सकता है ।

यज्ञसे देवशक्तिके आप्यायनके कारण पृथिवी भी सुरक्षित रहती है; जलशक्ति भी सुव्यवस्थित तथा शुद्ध हो जाती है, अग्नि- शक्ति भी यथायोग्य रहती है, वायुमण्डल भी शुद्ध रहता है । यथायोग्य वृष्टि हो जानेसे सूक्ष्म - वायुमण्डल में, अग्निहोत्रमें हुत . किये हुए और कई सहस्रगुणा हुए - हुए घृतकी सूक्ष्म स्निग्धता आ जानेसे उसके दोष दूर हो जाते हैं । जब इस प्रकार देवशक्ति व्यवस्थित होगई; तो पृथिवीस्थित जल - जो सूर्यसे खींचा गया हुआ गगनमण्डल के समुद्रमें अवस्थित है - देवता लोग उसका यथायोग्य वितरण करते हैं - इससे वृष्टि भी यथायोग्य होती है । तब न अना- वृष्टि होती हैं, न अतिवृष्टि । न सूखा पड़ता है, न बाढें आती हैं; पर शास्त्रोक्त यज्ञविधिमें त्रुटि नहीं आनी चाहिये । यज्ञ मन्त्रोंसे 438होते हैं । उसमें कर्म, कर्ता, साधन इन तीनोंकी विगुणता इष्ट- मनोरथकी पूर्ति में प्रतिबन्धक बन जाती है । इष्टि - सम्बन्धी कर्म यथावत् होवे; उसमें दक्षिणा आदिको त्रुटि भी न होवे । कर्ता पवित्र आचरण वाला हो, वेदमन्त्रोंके स्वर वर्ण आदिका यथावत् ज्ञाता हो । शास्त्रनिषिद्ध अधिकारियोंमें न हो । इष्टिका साधन भी त्रुटिंयुक्त न हो, सामग्री पूर्ण हो और पवित्र हो । इससे जहाँ शुद्ध वातावरण बनेगा; वहाँ जलकी वृष्टि तथा मनोरथोंकी दृष्टि भी यथायोग्य होगी ।

तब इस दैवी - कर्म यज्ञमें लगा हुआ पुरुष ' स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्याद् दैवे चैवेह कर्मणि । दैवे कर्मणि युक्तो हि बिभर्तीं चराचरम् ' ( ३७५ ) मनुजीके इन शब्दोंसे सारे संसारका पालन कर रहा होता है । यह कथन केवल अर्थवाद नहीं, किन्तु युक्तियुक्त भी सिद्ध है । पहले हम कह चुके हैं कि - यज्ञाग्निमें डाले हुए घृत, श्रोषधि आदि पौष्टिक तथा रोगनाशक पदार्थ नष्ट नहीं होते, किन्तु अग्नि उन्हें भिन्न - भिन्न करके सूक्ष्म बना देती है । वे सूक्ष्म - पदार्थ वायुद्वारा ' आकाशमण्डलमें व्याप्त होकर सब प्राणियोंके नासिका तथा रोम- कूपोंद्वारा पहुँचकर उनके रोगों तथा निर्बलताओं को दूर करके उन्हें स्वस्थ, बलवान् तथा नीरोग बना देते हैं ।

इसका उदाहरण देखिये- हमारे पास सौ मनुष्य बैठे हैं, हम चाहते हैं कि सभी उठ जाएं । यदि हम उन्हें उठानेके उद्द ेश्यसे एक- एक लालमिर्च खिला दें; तो वे उन्हें खा लेंगे; पर उठेंगे नहीं; पर यदि ' उनकी संख्या से चौथाई से भी कम मिर्चीको बारीक पीसकर उनका 439अग्निमें होम कर दें; तो उसके प्रभावसे प्रभावित होकर वे सभी तो वहां से उठ जावेंगे, अन्य पुरुषोंपर भी उनका प्रभाव पड़ेगा । यह क्यों? यह इसलिए कि — अग्निने अपने गुणोंसे उसको सूक्ष्म कर दिया; और उसकी शक्तिको कई गुना बढ़ा दिया । अग्निद्वारा स्थूल जल सूक्ष्म वाष्प बनकर इतना शक्तिशाली होता है कि हजारों मनुष्योंसे भरी हुई गाड़ीको ६०-७० मील घण्टेकी तीव्र गतिसे खींचकर ले जाता है; किन्तु स्थूल जल इससे कई गुना अधिक भी गाड़ीको अपने स्थान से हिला तक नहीं सकता । एक तोला सुवर्ण में उतना बल और शक्ति देनेकी सामर्थ्य नहीं, जितनी अग्निद्वारा भस्म बने हुए सुवर्णकी एक रत्ती मात्रामें है । बीज जब तक स्थूलावस्था में है; तब तक कोई उपकार नहीं करता । जब उसे भूमिमें बोया जाता है; उसमें जल डाला जाता है; तब भूमिकी अग्नि उसे सूक्ष्म कर देती है, जितना सूक्ष्म होता जाता है, उतनी उसकी वृद्धि होती जाती है ।

इस प्रकार जब अग्नि अपनेमें डाले हुए छोटेसे पदार्थको सूक्ष्म करके बड़ी शक्तिवाला बना देता है, तब उसमें अभिमन्त्रित करके डाली हुई सेरों वा मनों सामग्री कितने असंख्य प्राणियोंकी • कल्याणकारक होगी । इससे अग्निमें घृत चावल आदिका डालना उनका नष्ट करना नहीं; किन्तु एक बीज बोकर सैकड़ों बीज वाली खेती पा लेना है । तब मनुजीका यह कहना कि - ' दैवे कर्मणि युक्तो हि बिभर्तीदें चराचरम् ' ( ३।७५ ) कि यज्ञकर्ता सम्पूर्ण जगत्को पालता है - यह ठीक ही है ।

440इसी वैज्ञानिक बातको अव शास्त्रीय सरणीसे जाँचना चाहिए । हमारी कामनाओं को पूर्ण करनेमें समर्थ देवताओं को हमने हव्य देना है । कैसे दें? हम हैं स्थूल, पर देवता हैं सूक्ष्म । हम उन्हें स्थूल हव्य देंगे, तो उन्हें कैसे प्राप्त होगा? उन्हें तो सूक्ष्म हव्य चाहिए; तभी वे प्रसन्न होंगे । इसका उपाय सोचा गया था ' यज्ञ ' । . इसका दृष्टान्त भी समझ लेना चाहिए । हमने अपने आत्माको भोजन देना है । हम भी स्थूल हैं, हमसे दिया हुआ भोजन भी : स्थूल है, पर आत्मा हमारा सूक्ष्म है । उसे वह स्थूल भोजन कैसे मिल सकता है? उसे चाहिए सूक्ष्म - भोजन । उसका उपाय यह सोचा गया था कि - हम उस स्थूल - भोजनका मुखके द्वारा दाँतोंसे छोटा करके अपनी प्रदीप्त जठराग्निमें होम करें । ऐसा करनेसे • वह जठराग्नि उस स्थूल - भोजनको सूक्ष्म कर देती है । वही सूक्ष्म अन्न हमारे आत्मा एवं मन आदिको प्राप्त हो जानेसे वह हमारे शरीरको स्वस्थ रखता है । यदि आत्माको वह स्थूल अन्न सूक्ष्म करके न पहुँचाया जायगा; तो हमारा शरीर, मन, इन्द्रियाँ आदि सभी अस्वस्थ हो जाएँगे ॥ फिर हम न अपना कोई लाभ कर सकेंगे, न दूसरोंका उपकार । न कुछ बुद्धि द्वारा दूसरोंका, न अपना कुछ हित सोच सकेंगे । वह स्थूल अन्न सूक्ष्म हो जाने से . हमारे शरीर के अवयव अवयव में व्याप्त हो जाता है ।

यह हुआ मनुष्यके आत्माके तर्पणका प्रकार । मनुष्यसे ऊँचे हैं पितर । वे पितर भूलोकमें न रहकर पितृलोक - चन्द्रलोकमें रहते हैं । उन्हें भी तृप्त करना हमारे कर्तव्यों में आता है । वे हमसे भी 441सूक्ष्म होते हैं । हम स्थूल उन्हें सूक्ष्म अन्न कैसे पहुँचावें? ऋषि- मुनियोंने उसका उपाय भी सोच लिया था । वह यह था कि- वेद - शास्त्र - विद्वान् ब्राह्मण द्वारा उन्हें कव्य दिया जाय । ब्राह्मणको शास्त्रों में वैश्वानर - अग्निरूप माना गया है । ' ब्राह्मणोस्य मुखमासीत् ' ( यजुः ३१।११ ) ' मुखादग्निरजायत ' ( ३१।१२ ) ब्राह्मण और अग्नि दोनोंकी उत्पत्ति परमात्मा के मुख से बताई गई है; अतः यहाँ दोनों की सहोदरता सिद्ध है । इसलिए मीमांसादर्शन के १ । ४ । २४ सूत्रके - शावर भाष्य में ' आग्नेयो वै ब्राह्मण: ' पर प्रकाश डालते ' हुए ब्राह्मण तथा अग्निको प्रश्नोत्तररूपसे एकजातीय वताया गया है । ( प्र ० ) अनाग्नेयेषु ( ब्राह्मणेषु ) आग्नेयादिशब्दाः केन प्रकारेण? ( उ ० ) गुणवादेन । ( प्र ० ) को गुणवादः? ( उ ० ) अग्निसम्बन्धः । ( प्र ० ) कथम्? ( उ ० ) एकजातीयत्वात् तयोः ( अग्निब्राह्मणयोः ) । ( प्र ० ) किमेकजातीयकत्वं [ तयोः ]? ' ( उ ० ) ' प्रजापतिरकामयत प्रजाः सृजेयमिति स मुखतस्त्रिवृतं निरमिमीत । तमग्निर्देवता अन्वसृज्यत, ब्राह्मणो मनुष्याणाम् ' । यहाँपर अग्नि और ब्राह्मणकी एकजातीयता स्पष्ट शब्दों में कही है ।

अन्यत्र भी ब्राह्मणका अग्नि - सम्बन्ध यया है- ' ब्राह्मणो ह वा इममग्निं वैश्वानरं बभार ' ( गोपथब्रा ० १ २ ।१० ) । ' अथर्ववेद- संहितामें भी कहा है- ' अग्निर्ब्राह्मणानाविवेश ' ( १६५६/२ ) । कठोपनिषत् में भी यही कहा है- ' वैश्वानरः प्रविशति अतिथिर्ब्राह्मणो गृहान् । ' ( १ । १७ ) यहां श्रीशङ्कराचार्यस्वामीने स्पष्टता की है— ' वैश्वानरोऽग्निरेव साक्षात् प्रविशति अतिथिः सन् ब्राह्मणो गृहान् ' । 442भविष्यपुराण में भी कहा है- ' ब्राह्मणा ह्यग्निदेवास्तु ' । ( ब्राह्मपर्व १३।३६ ) । इतना अवश्य है कि वह ब्राह्मण वेदशास्त्र आदि का विद्वान् हो; अविद्वान् ब्राह्मणको वैश्वानर अग्नि न कहकर तृणाग्नि- की तरह शीघ्र शान्त होनेवाला एवं भस्मीभूत कहा गया है; उसके मुखमें कव्यका हवन करना योग्य नहीं माना गया है । जैसे कि श्रीमनुजीने कहा है- ' ब्राह्मणस्त्वनधीयानस्तृणाग्निरिव शाम्यति । तस्मै हव्यं ( कव्यमपि ) न दातव्यं नहि भस्मनि हूयते । ' ( ३।१६८ ) ' नश्यन्ति हव्यकव्यानि नराणामविजानताम् । भस्मीभूतेषु विप्रेषु मोहाद् दत्तानि दातृभिः । ( ३६७ ) ' वेदतत्त्वार्थविदुषे ब्राह्मणायोप- पादयेत् । ' ( ३ । ६ ) ' विद्यातपः समृद्धेषु हुतं विप्रमुखाग्निषु । निस्तारयति दुर्गाच्च महतश्चैव किल्विषात् ' ( ३६८ ) । अस्तु । तब ब्राह्मणस्थ तीव्र वैश्वानर- अग्नि उस कव्यको सूक्ष्म करके, सूक्ष्म महाग्निके साथ मिलकर पितरोंको पहुँचाता है 1

। वे सूक्ष्म कव्यसे. तृप्त हो जाते हैं ।

मनुष्यकी अपनी जठराग्निद्वारा सूक्ष्मीकृत अन्नसे मनुष्यके आत्माके तृप्त होनेसे मनुष्यका वैयक्तिक लाभ होता है । मनुष्यसे उच्च योनिके पितरोंके, पहली सामान्याग्निसे उच्च ब्राह्मणकी वैश्वा- नराग्निद्वारा सूक्ष्मीकृत अन्नसे तृप्त होनेसे उनके वंशवाले पुत्र पौत्रादि सबका लाभ हुआ करता है । अब मनुष्य और पितरोंसे उच्च हैं देवता । देवता भी सूक्ष्म हुआ करते हैं । उन्हें भी हमें सूक्ष्म हवि देनी है । उन्हें भी सूक्ष्म- हवि कैसे भेजी जावे; वे तो चन्द्रलोकसे भी ऊपरके द्युलोकमें रहते हैं? । उसकेलिए भी 443ऋषिमुनियोंने उपाय सोच लिया था । वह यह था कि - साक्षात् अग्निदेवता तथा ब्राह्मणस्थ वैश्वानर- अग्नि इन दोनोंके द्वारा उन्हें हव्य दिया जाय । वह भी यही पूर्व जैसा उपाय है ।

जब हम अग्निमें हव्य डालते हैं; तब स्थूल अग्नि उस स्थूल हविको जलाकर सूक्ष्म कर देती है, और शान्त होकर स्वयं भी सूक्ष्म हो जाती है । तब वह सूक्ष्म अग्नि, सूक्ष्म महाग्निके साथ मिलकर मन्त्रशक्ति से उस सूक्ष्म - हविको लेकर अपने मित्र सूक्ष्म वायुकी सहायतासे आकाशाभिमुख जाती हुई द्युलोकमें पहुँचकर देवोंको समर्पित करती है । वे देवता उस सूक्ष्म हविसे तृप्त होकर उच्च शक्तिवाले होनेसे प्रजाके हितकेलिए और धान्य आदिकी

उत्पत्तिकेलिए यथोचित वृष्टि कर देते हैं । जैसे कि मनुस्मृति में कहा है - ' अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यग् आदित्यमुपतिष्ठते । आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृ'ष्टेरन्नं ततः प्रजा ' ( ३ । ७६ ) ।

इसीका बीज वेद में भी मिलता है - ' हविष्पान्तमजरं स्वर्विदि दिविस्पृशि हुतं जुष्टमग्नौ ' ( ऋ ० सं ० २०१८८१ ) यहाँ श्रीदुर्गाचार्य ने स्पष्टता की है- ' हविः पान्तं - देवानां च पुरोडाशादि निर्दग्धस्थूल- भावमग्निना क्रियते । स्वः - आदित्यः तं वेत्ति, यथासौ वेदितव्यः इति स्वर्विद् अग्निः । दिविस्पृशि - द्यामसौ स्पृशति हविरुपनयन् आदित्यम् ' ( निरुक्त ७१२५ १ ) इससे स्पष्ट सिद्ध हुआ कि -जब हम देवताओंको प्रसन्न कर लेंगे; तो यह सम्पूर्ण चराचर — स्थावर- · जङ्गम पालित रहेगा; क्योंकि सभीका निर्वाह वृष्टि एवम् अन्नपर है ।

उन देवताओंको प्रसन्न करनेका उपाय है - यज्ञ । इस प्रकार 444यज्ञसे देवपूजा सिद्ध हुई । अतः यज्ञका महत्त्व सिद्ध हुआ, जिसके लिए हमें भगवद्गीता आदेश देती है- ' देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः । परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ, ( ३ । ११ ) ' तुम देवताओं को प्रसन्न करो; देवता तुम्हें प्रसन्न करेंगे । परस्परकी प्रसन्नतासे तुम्हें कल्याण मिलेगा ' | ' इष्टान् भोगान् हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः । ' ( ३।१२ ) इससे यज्ञ करनेपर देवताओं द्वारा इष्ट - भोगोंकी दृष्टि करना भी बताया है । ' तैर्दत्तान् अप्रदायैभ्यो यो भुक्ते स्तेन एव सः ' ( ३ | १२ ) यहां पर बिना यज्ञ किये अन्न आदि पदार्थोंका उपभोग करना चोरी मानी गई है । ' तस्मात् सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् । ( ३ । १५ ) यहां पर यज्ञकी स्थिति ब्रह्ममें बताई गई है । ' अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् । मन्त्रो- ऽहमहमेवाज्यम् अहमग्निरहं हुतम् ' ( ६।१६ ) यहां पर यज्ञ तथा यज्ञके साधन अग्नि, घृत, विविध औषधियां, मन्त्रोच्चारण, आदिको भगवान्का रूप कहा है ।

' यज्ञदानतपः - कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ' ( १८५ ) यहांपर यज्ञ - कर्मका त्याग निषिद्ध किया है । ' यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ' ( १८५ ) यहांपर यज्ञको पवित्र करनेवाला बताया गया है । ' यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ' ( ४ | ३१ ) यहांपर यज्ञशेषको अमृत तथा उसका उपयोग करनेवालेको सद्गतिकी प्राप्ति कही गई है । ' नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोन्यः कुरुसत्तम! ' ( ४।३१ ) यहां यज्ञहीनकी इस लोक तथा परलोकसे भ्रष्टता कही गई है । ' एष वोस्त्विष्टकाम- 445' धुकू ' ( ३ | १० ) वहां यज्ञको प्रजाके मनोरथोंकी तृप्ति करनेवाला कहा है । ' यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यन्त्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः ( ३।६ ) यहां तथा ' यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ' ( ३ | १३ ) यहांपर याज्ञिक कर्मको बन्धनसे दूर रखनेवाला माना है । कर्मकी कर्मता होने पर यहां यज्ञको प्राप्त है — यह सूचित किया गया है । यह है यज्ञका महत्त्व, जिसके प्रचारका श्रेय सनातनधर्मी संसारको प्राप्त है ।

यज्ञका प्रयोजन केवल वायुशुद्धि नहीं । केवल वायुशुद्धि ही फल होता; तो बहुत मंहगे घृतका उपयोग उसमें व्यर्थ था । उससे भी सस्ते उपायों से वायुशुद्धि हो सकती थी । तब तो यज्ञ म्युनिसिपलिटीके कूड़ेके पीपोंमें, पाखानोंमें, वा नालियोंके पास हो जाती । वस्तुतः यज्ञ देवपूजन वा देवतर्पणार्थ हुआ करता है- यह पहले बताया ही जा चुका है । देवताओंका भक्ष्य घृत होता है । जैसे कि स्वर्गलोकसे इस मनुष्य - लोकमें आई हुई उर्वशी अप्सराको ( शतपथ ११।५।१।१० ) यहां भी उर्वशी ही कहनेवाली है कि मेरा M 446अह्न आश्नाम् ' ( ऋ ० सं ० २०६५/१६ ) इस मन्त्रमें उर्वशी और पुरूरवा ऋषि - देवता हैं । उर्वशी देव अप्सरा थी— इसलिए घृत उसका भक्ष्य कहा गया ।

इसी कारण देवपूजनात्मक यज्ञमें भी घृत अपेक्षित होता है । तभी शतपथब्राह्मणसें कहा है- ' एतद् वै देवानां त्रियं धाम यद् आज्यम् ( घृतम् ) ' ( १३ | ३ | ६ | ३ ) ' आज्येन जुहोति ' ( शत ० १३।३।६।२ ) इस कारण यज्ञके अङ्ग हवनमें-- जिसका उद्देश्य देवताओंका पूजन वा तर्पण है- ' वैश्वदेवी ' ( गोपथ ० २२३ | ११ ) गायके शुद्ध - घृतका उपयोग लिया जाता है । यहां मुख्य उद्देश्य देवताओंकी प्रसन्नता है, केवल वायुशुद्धि नहीं ।

इसके अतिरिक्त यज्ञमें वेदमन्त्र भी इसीलिए उच्चारित किये जाते हैं; क्योंकि - यज्ञ वेदका विषय है, यह हम ' ब्राह्मणभाग भी वेद है ' इस निबन्धमें अग्रिम पुष्प में कहेंगे; और यज्ञ होता है देवपूजार्थ; इस कारण उसमें वेदमन्त्रोंकी आवश्यकता भी पड़ती है, क्योंकि- वेदमन्त्रोंके उपास्य वा विषय भी देवता ही होते हैं । इस कारण यज्ञके समयकेलिए निरुक्तमें कहा है कि उस समय तत्तद् - देवताका मनसे भी ध्यान करे –'यस्यै देवतायै हविगृहीतं स्यात्; तां मनसा ध्यायेत् ' ( ८ | २२ | ११ ) इस कारण वेदमन्त्रोंका उच्चारण यज्ञमें सफल है । उनकी ध्वनियोंका भी प्रभाव पड़ता है - जिससे हमारे मनोरथकी पूर्ति में सहायता मिलती है । ' अहं वृष्टिं ( वर्षणं, मनोरथवर्षणं च ) [ हविः ] दाशुषे मर्त्याय [ अददाम् ] ' ( ऋ ० ४।२६।२ ) यज्ञाग्निमें डाला हुआ घृत आदि व्यर्थ नहीं होता; किन्तु भूमिमें 447बोये हुए वीजकी तरह सूक्ष्म होकर अधिक शक्ति - सम्पन्न होकर देवताओंके पास जाता है, और अधिक फलप्रद होता है । शतपथ- ब्राह्मण में लिखा है - ' सर्वा ह वै देवता अध्वर्यु हवि हीष्यन्तम् उपतिष्ठन्ते - मम नाम ग्रहीष्यति, मम नाम ग्रहीष्यतीति ' ( १ | १ | २ | १८ ) यहां देवताओंका नाम लेना देवताओं के प्रसन्नतार्थ माना है, इससे प्रसन्न होकर देवता आहुतिदाताके मनोरथोंकी पूर्ति करते हैं । इस कारण यज्ञोंका हिन्दुधर्ममें बहुत महत्त्व माना गया है ।

नारायणोपनिषत् में कहा गया है- ' यज्ञेन द्विषन्तो मित्रा भवन्ति, यज्ञे सर्वं प्रतिष्ठितम् y तस्माद् यज्ञं परमं वदन्ति ' ( ७१ ) यहां पर यज्ञसे शत्रुओंका भी मित्र बनना कहा है । श्रीमद्भागवतमें तो यहां तक कहा है कि जिस देशमें यज्ञपुरुष भगवान्की पूजा होती है; वहांपर भगवान् प्रसन्न होते हैं । भगवान् प्रसन्न हुए; तो कोई वस्तु अप्राप्य नहीं रहती —- ' यस्य राष्ट्र पुरे चैव भगवान् यज्ञ - पूरुषः । इज्यते स्वेन धर्मेण जनैर्वर्णाश्रमान्वितैः ॥ तस्य राज्ञो महाभाग्ये भगवान् भूतभावनः । परितुष्यति विश्वात्मा तिष्ठतो निजशासने ॥ तस्मिँस्तुष्टे किमप्राप्यं जगतामीश्वरेश्वरे ' ( ४ । १४ । १८- १६-२० ) । पद्मपुराण सृष्टि - खण्ड में भी कहा है- ' यज्ञेनाप्यायिता देवा वृष्ट्य त्सर्गेण मानवाः । आप्यायनं वै कुर्वन्ति यज्ञाः कल्याण- हेतवः ' ( ३ । १२४ ). यहां यज्ञोंको कल्याणका हेतु कहा है । इसी कारण अथर्ववेदसंहितामें यज्ञको सारे भुवनका केन्द्र कहा है- ' यज्ञो विश्वस्य भुवनस्य नाभिः ( ६।१०।१४ ) ।

यज्ञोंके न होनेसे देवताओंका प्रकोप होता है; उसीसे देश में 448अकाल, युद्ध - महायुद्ध तथा उनके कारण महर्घता -पिशाचीका अकाण्ड - ताण्डव हुआ करता है । देवताओंके कोपसे अतिवृष्टि वा अनावृष्टि, अतिवायु, अतिग्रीप्स, अतिशीत, वाढें आदि हुआ करती हैं; जिनसे अकालकी विकराल ज्वालाएँ फैलती हैं । देवताओंके कोपका दूसरा चिह्न होता है - हमारी बुद्धिका नाश । महाभारतमें आया है— ' देवता डण्डा उठाकर पुरुषोंकी रक्षा नहीं करते । जिसकी रक्षा करना चाहते हैं, उसकी बुद्धि बढ़ा देते हैं । जिसे गिराना चाहते हैं; उसकी बुद्धि छीन लिया करते हैं ( उद्योग- पर्व ० ३४ / ८०-८१ ) । कौन नहीं जानता कि -युद्ध - महायुद्ध आदि उसी बुद्धिभ्र ंशके परिणाम हैं, जिससे मंहगाई फैलती है ।

इन्हीं देवताओंके प्रसादनार्थ यज्ञ तथा उसके अङ्गभूत जपपाठ, देवमूर्तिपूजा आदि कर्म आवश्यक सिद्ध होते हैं । उसमें गायत्रीके जप वा यज्ञसे ग्रहोंकी प्रतिकूलता भी दूर हो जाती है । जैसे कि महाभारतमें कहा है — ' ये चास्य दारुणाः केचिद् ग्रहाः सूर्यादयो दिवि । ते चास्य सौम्या जायन्ते शिवाः शिवतराः सदा ' ( वनपर्व २००१८५ ) । देवगणकी सहायता से ही सकल अनर्थकारी अधर्म हटता है, और विश्वकल्याणकारी धर्मकी स्थापना होती है - ' यज्ञ - शिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्विषैः ' ( गीता ३।१३ ) अधर्मके कारण ही जनपदोंका ध्वंस होता है; जैसा कि सुश्रुतसंहिताके सूत्रस्थान ( ६।२० ) और चरकसंहिता ( विमानस्थान ३।२१-२२ ) में गो - ब्राह्मण - गुरु - वृद्ध - सिद्धाचार्यांन् अर्चयेत्; अग्निमुपचरेत् ' भी बड़े स्पष्ट शब्दों में कहा है । उसीको दूर करनेकेलिए ' देव- 449( चरक - सूत्रस्थान ५ ( १८ ) ' जप- होमोपहार - इज्याऽञ्जलि - नमस्कार- तपोनियम - दयादान, दीक्षाभ्युपगम - देवता ब्राह्मरण- गुरुपरैर्भवितव्यम् ' ( सुश्रुत ० सूत्र ० ६ २१ ) देवपूजनादि कहा है ।

यज्ञों में वेदज्ञ - ब्राह्मण सम्मिलित होते हैं, तो यज्ञमें जहाँ देवपूजन होता है, उसके साथ ही साथ भूदेवोंका सत्कार भी हो जाता है । जो विविध - वृत्तियोंको छोड़कर, भोगविलासको दूर करके, वेदोंकी रक्षार्थं कठोर - ब्रह्मचर्य कर चुके हैं; उन विद्वान- ब्राह्मणोंका दर्शन भी हो जाता है । उनकी पूजासे भी देवता प्रसन्न होते हैं । जैसा कि कृष्णयजुर्वेद - तैत्तिरीयारण्यकमें भी कहा है-- ' यावतीर्वै देवताः, ताः सर्वा वेदविदि ब्राह्मणे वसन्ति । • तस्माद्. ब्राह्मणेभ्यो वेदविदुद्भ्यो दिवे - दिवे नमस्कुर्याद्, नाश्लीलं कीर्तयेद्, एता एव देवताः प्रीणाति ' ( २।१५ ) ।

इसी यज्ञसे निम्न वर्गको भी अच्छा धन प्राप्त हो जाता है । निम्न वर्गको वृत्ति प्राप्त होती रहे, तो अच्छा है; नहीं तो वे चोरी- लुट आदि शुरू कर देते हैं । सर्वप्रथम यज्ञों में भूमिके समीकरणार्थ श्रमिक - मजदूरोंकी, फिर यज्ञमण्डपके निर्माणार्थ ईंटें बनानेवालों, उसे ढोनेवालों, मिट्टी खोदनेवालों, वेदी - कुण्ड आदि के निर्माण में बढई, लोहार आदिकी, मण्डपको चटाईसे आच्छादित करने केलिए चटाई बुननेवालोंकी, यज्ञ - सामग्री निर्माणार्थ जुलाहे, कसेरे, सुनार, दर्जी, बनिये आदिकी, यज्ञमें आनेवाले अतिथि - अभ्यागतोंकी व्यवस्थाके लिए नाई, पनभरे, रसोई बनानेवाले ब्राह्मण, संरक्षक क्षत्रिय आदि, भोजनादि सामान देनेवाले बनिया आदि, यज्ञ 450करनेवाले ऋत्विक् विद्वान् त्राह्मण इन सबकी यज्ञमें आवश्यकता पड़ती है । होता, अध्वर्यु, उद्गाता, ब्रह्मा आदि मुख्य यज्ञनेता तथा उनसे नीचे कर्म करनेवाले बहुतों की आवश्यकता होती है । सबको यथायोग्य अर्थका वितरण किया जाता है, आर्थिक विषमता ह जाती है । दूसरा यहाँ देश - विदेशों के विद्वानों- आदिका परिचय प्राप्त होने से ' वसुधैव कुटुम्बकम् ' यह कथन चरितार्थ हो जाता है ।

फलतः यज्ञ चाहे धार्मिक रूपसे हों, चाहे लौकिक - रूपसे, चाहे वैज्ञानिकरूपसे, सभी दृष्टिकोण से बहुत लाभप्रद हैं । यज्ञके प्रयोजन भी बहुत से होते हैं, उनमें स्वर्गकी प्राप्ति एक पारलौकिक - प्रयोजन • है, जैसे कि वेदमें कहा है- ' येरीजानाः स्वर्गं यन्ति लोकम् ' ( अथर्व ० १८ । ४ । २ ) । इसी प्रकार - ऐतरेय ब्राह्मण ( १ । २ । १० ), शतपथ- ब्राह्मण ( १२ | ४ | ३ | ७ ), न्यायदर्शन ( १ | १ | ३ ), तथा महाभाष्य ( ६ ॥ ८४ ) में भी कहा है । यज्ञमें प्रत्येक देवताके नामसे आहुति दी जाती है; यह देवताओंकी पूजा होती है । तब उनकी प्रसन्नतासे स्वर्गकी प्राप्ति स्वाभाविक है । तभी भगवद्गीतामें कहा है- ' देवान् देवयजो यान्ति ' ( ७ | २३ ) ' देवयज्ञ करनेवाले देवताओंको प्राप्त होते हैं ' । देवताओंका निवास होता है स्वर्ग में । जैसे कि वेदमें कहा है- ' दिवि देवाः ' ( अथर्व ० ११/७/२३, १८।४।३ ) ।

. यज्ञका प्रयोजन केवल पारलौकिक स्वर्ग - प्राप्ति ही नहीं, अपितु ऐहिक. विविध - कामनाओं की पूर्ति भी यज्ञका प्रयोजन हुआ करता है । उसमें भी कारण देवपूजा ही हुआ करती है; क्योंकि देवताओं में विविध कामनाओं को पूर्ण करनेकी क्षमता है, जैसे कि - ऋग्वेद- 451संहिता ( १०।६४।२ ) में कहा है । तभी तो वेद कहता है- ' यत्कामास्ते जुहुमः, तन्नो अस्तु ' ( ऋ ० सं ० १० १२१।१० ) इस मन्त्रमें भी यज्ञ- हवनसे विविध - कामनाओंकी पूर्ति सूचित की गई है । ' वयं स्याम पतयो रयीणाम् ' इस उक्त मन्त्रके अन्तिम अंशसे यज्ञसे विविध- ऐश्वकी प्राप्ति बताई गई है । इस मन्त्र में प्रजापति - देवताका वर्णन है, तभी हवनमें ' प्रजापतये स्वाहा ' यह सबसे पूर्व हविर्दानपूर्वक बोला जाता है ।

• यज्ञोंके विविध - कामनाओंको पूर्ण करनेवाला होनेसे ही महा- भाष्य ( १ | १ | ६३ ) में ' चक्षुष्कामं याजयाञ्चकार ' इस उदाहरणमें यज्ञ- द्वारा नेत्रशक्तिदान - रूप फल भी सूचित किया गया हैं । न्यायदर्शन ( २१६८ सूत्रके भाष्य ) में ' ग्रामकामो यजेत् ' यह वैदिक - प्रमाण देकर यज्ञविशेषका फल ग्रामाधिपति हो जाना भी कहा है । इस प्रकार उसी दर्शनके भाष्य में ' पुत्रकामः पुत्रेष्ट्या यजेत ' ( २ | | १ ५७ ) इस वैदिक प्रमाणसे यज्ञविशेषका फल पुत्रप्राप्ति भी सूचित किया गया है । इसप्रकार वृष्टिकी कामनासे कारीरी इष्टि ( यज्ञ ) का करना भी सुप्रसिद्ध है । इसी तरह शतपथ ( १३ | २ | ६ | ३ ) में अश्वमेधयज्ञका फल तेज, इन्द्रिय, पशु, ब्रह्महत्या दूर होना, तथा लक्ष्मीका प्राप्त होना कहा गया है । राजसूययज्ञका फल - अकालमृत्यु- निवारण तथा राज्यकी दृढता कहा गया है । यदि यह कामनाएं स्वार्थपूर्ति केलिए न की जाएं, तब वह यज्ञ समष्टिगत हो जाने से अतिशयित महत्त्वशाली हो जाता है ।

उक्त फलोंकी प्राप्ति में कोई अतिशयोक्ति वा अर्थवाद भी नहीं है । 452एक तो इसमें अलौकिक - सामर्थ्यशाली परमात्माकी अङ्गभूत देव- शक्तिकी प्रसन्नताका भी फल होता है; और फिर वैदिक मन्त्रशक्ति तो सद्यः - फलदायिनी प्रसिद्ध भी है । दूसरा विद्वान् - भूदेवोंकी आशीष तथा उपस्थिति भी फल देने में सहायक होती है । सभी वर्णं वा आश्रमवाले तथा अन्य सभी जातियां भी उन महायज्ञों में उपस्थित होती है; उनका सत्कार होजानेसे भी यज्ञकर्ता के लिए सद्भावनाकी शुभाशंसा हृदयसे निकलती है । अन्य बात यह है कि विशेष विशेष यज्ञोंमें विशेष विशेष सामग्रियां भी रखी जाती है; उनको मन्त्रपाठ -पूर्वक अग्निमें डालने से उनकी सूक्ष्मता होजाने- के कारण उनके परमाणुओं के हमारे शरीर के भीतर प्राप्त होनेसे बड़ा भारी लाभ होता है । क्योंकि —यह बात अनुभवसिद्ध है कि — स्थूल की अपेक्षा सूक्ष्म हुई वस्तु अधिक शक्तिशाली होती है, और सूक्ष्म वस्तु स्थूल में प्रवेश भी शीघ्र कर जाती है । इसपर कुछ तर्क देखिये—

परमात्मा सभीसे सूक्ष्म है, तभी तो उसे सर्वशक्तिमान कहा जाता है । परमाणु कितने सूक्ष्म होते हैं; उनकी शक्तिका हाल जानना हो; तो परमाणुबमसे विध्वस्त हुए जापानके दो नगरोंसे पूछिये । सोनेका एक छोटा टुकड़ा मनुष्य खा ले; उसपर कोई प्रभाव नहीं होता; उसी टुकड़ेको सूक्ष्म करके वर्क बनाकर खावें; तो हमें पुष्टि प्राप्त होगी । यदि उसे और भी सूक्ष्म बनाकर अर्थात् उसकी भस्म खावें; तो हमारा शरीर बहुत बलवान् हो जायगा । आतसी- शीशेसे सूर्यकी किरण जब हम स्थूल लेते हैं;

453यज्ञका वैज्ञानिक महत्त्व

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तो उसका प्रभाव नहीं होता । जब सूक्ष्म बिन्दु करते हैं; तो उससे हमारा हाथ जल जाता है । डाक्टर उससे पानी गर्म कर लेता है ।

इस प्रकार ओषधि जितनी सूक्ष्म होती जाती है; उसकी उतनी शक्ति बढ़ती जाती है । क्षयके कीटाणु बहुत सूक्ष्म होते हैं । उनपर स्थूल ओषधि काम नहीं देती; उसे जब इन्जैक्शनसे सूक्ष्म करके शरीरमें पहुँचाते हैं; तो उसका प्रभाव हमारे शरीर में तत्क्षण. पड़ता है । सूक्ष्म करनेके भी कई प्रकार होते हैं । स्थूल लाल- मिर्चको सभी सुगमतासे खा लेते हैं; वा हाथमें उठा लेते हैं । जब हम उसे घोटें; तो वह सूक्ष्मरूप से वायुमें फैलकर बहुत प्रभाव डालती है । कई दवाइयोंको आटेमें डालकर उसका लेप तबलेपर किया जाता है; तबलेको वजानेपर वही ओषधि वायुमें फैलकर रोगीके शरीरमें प्रविष्ट होकर उसके रोगको दूर कर देती है । पर अग्निसे अधिक पदार्थोंको सूक्ष्म और कोई ढङ्ग नहीं कर सकता । उसी लाल - मिर्चको अग्निमें हवन कर देने से उसका प्रभाव दूर - दूर तक बैठे मनुष्योंपर भी पड़ेगा । इसी प्रकार हमने किसी रोगीके रोग- निवारणार्थ यज्ञ करना है; तब उसमें विशेष - ओषधियां भी जो उस रोगके उपयुक्त हैं, डाली जाती हैं । अग्निमें मन्त्रद्वारा हुत होनेसे वे सूक्ष्म होकर रोगीके श्वासद्वारा वा परमाणुरूप होनेसे रोमकूपोंके द्वारा अन्दर जाकर रक्तमें प्रवेश करके रक्तको शुद्ध कर देती हैं, रोग - कृमियोंके अन्दर प्रवेश करके उन्हें अपने वैज्ञानिक गुणके कारण नष्ट कर देती हैं ।

विज्ञानसे यह सिद्ध होचुका है कि किसी पदार्थका नाश

454श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ )

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नहीं होता, केवल रूप बदल जाता है । अतः अग्निमें हवि डालने से वही वस्तु परमाणुरूपमें सूक्ष्म हो जाती है, नष्ट नहीं होती । गूगल, घृत, कर्पूर, खांड आदि अग्नि में जलनेपर सूक्ष्म होकर फेफड़ों में प्रवेश करके उनको शुद्ध तथा पुष्टकर डालते हैं । इससे यज्ञसे रोग- निवारण में वैज्ञानिकता भी सिद्ध हुई । इनमें अग्नि, वायु, और सूर्य तीनों देवता मिलकर सहायक हुए - यह बात कभी नहीं भूलनी चाहिए; इसलिए वेदमन्त्रमें - ' अग्निर्देवता, वातो देवता, सूर्यो देवता, ( यजुः १४।२० ) यह तीन देवता इकट्ठे तथा सबसे पूर्व आये हैं; इनका पदार्थोंको सूक्ष्म करके अपने पास रखना प्रत्यक्ष है । ' इसी- लिए वेदोंका भी अग्नि, वायु, रविसे दोहना हमारे धर्मशास्त्रों में आया है; क्योंकि — वेदों को भी यही तीनों देवता सूक्ष्म करके अपने में रखते हैं । उनका उनसे दोहन ब्रह्मा - जैसा देवता कर सकता है । इस बातका ज्ञान न होनेसे आर्यसमाजने अग्नि, वायु, सूर्य मनुष्य ऋषि बना डाले हैं । वस्तुतः यही देवता यज्ञके तथा यज्ञ - विषय वाले वेदोंके प्राण हैं । निरुक्तकार श्री यास्कमुनिने भी इन्हीं तीन देवताओंको मुख्य मानकर शेषोंको इन्हीं में अन्तर्भूत

है ।

फलतः यज्ञके प्रसारमें यही तीनों देवता मूलकारण होते हैं । पृथिवीलोकका देवता अग्नि है; इसलिए पृथिवीस्थित हम लोगोंको भी इसी कारण अग्निका सहारा लेना पड़ता है । जबसे अग्निं प्रकट हुई, तबसे यज्ञ भी जारी हुए । वही अग्नि उस यज्ञहुत पदार्थको सूक्ष्म करके उसे अपने मित्र वायुको देती है । सूर्य न हो; तो वायु 455. कैसे चले; अग्नि कैसे जले, इनका प्रसार कैसे हो? पर हमारे अधिकार में अग्नि देवता है; अतः हम उसे मन्त्रशक्तिसे अभि- मन्त्रित करके उसमें अपनी लाभप्रद - सामग्री मन्त्र से डालकर फिर उसे प्रभावितरूपसे वल वाली करवाकर उसे स्वयं प्राप्त करते हैं । मन्त्रशक्तिका महत्त्व हम पहले बता ही चुके हैं । मन्त्रोंके अक्षरोंके उच्चारण शरीरके कुछ विशेष भागोंपर प्रभाव डालते हैं । वेदके अक्षरोंमें जो आनुपूर्वी होती है, वह विशेष क्रम रखे हुए होती है; छातः उनका प्रभाव हमारे शरीरपर पड़ता ही है । न केवल हम पर, प्रत्युत देवताओं पर भी पड़ता है ।

सृष्टि- सञ्चालन करनेवाली ईश्वरकी शक्तियोंका नाम देवतां होता है । इन शक्तियोंका समस्त संसारकी विभिन्न समस्याओंसे तथा मनुष्यके व्यक्तिगत जीवनकी सुखसमृद्धि, उन्नति - अवनति, लाभ - हानि, रोग - शोक आदि से अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्ध है । इन . देव- शक्तियों की अनुकूलता प्राप्त करके मनुष्य बड़ी सरलतासे अपने अभ्युदयका मार्ग खोल सकता है । यदि ये देव प्रतिकूल हो जावें; तो मनुष्यका कठोर परिश्रम भी निष्फल हो जाता है । देवशक्तियों को अनुकूल बनानेकेलिए जितने भी साधन गिनाये जाते हैं; उनमें यज्ञ सर्वश्रेष्ठ है; यज्ञ देवताओंकी पूजा होती है - यह हम पूर्व बता चुके हैं । यज्ञसे देवताओंकी प्रसन्नता एवं अनुकूलता होती है - इससे वे अभीष्ट - परिणाम प्रदान करते हैं ।

यज्ञसे सुख - शान्तिकी प्राप्ति भी कही जाती है । यज्ञमें वेद- मन्त्रोंका उच्चारण, विशेष प्रकारकी समिधाएँ, विशिष्ट हवि, चर, 456पुरोडाश आदि, तथा भावनाओंका प्रवाह आदि अनेकों सूक्ष्म प्रक्रियाओंसे एक अदृश्य सुन्दर वातावरण बनता है; उसकी शक्तिसे यज्ञकर्ताओंको ही केवल नहीं; अपितु समस्त - संसारको भी अनेक प्रकारके भौतिक एवं आध्यात्मिक लाभ होते हैं । अन्तःकरणकी पवित्रता से मल, विक्षेप, आवरण आदि दोषों एवं कुसंस्कारोंका निवारण होनेसे आत्म - वलकी वृद्धि होती है । इससे यज्ञसे अनन्त सुख - शान्तिकी प्राप्ति भी सोपपत्तिक ही है । पड़ोस के शत्रुओं पर भी यज्ञके ऐसे परमाणु प्राप्त हो जाते हैं, जिससे उनका मनोमालिन्य - रूप रोग हट जाता है; इस प्रकार शत्रुका मित्रत्व भी यज्ञसे ही सिद्ध हुआ ।

यज्ञसे सुसन्तानकी भी प्राप्ति कही जाती है । यज्ञका आश्चर्य- जनक प्रभाव जहाँ मनुष्य की आत्मा, बुद्धि एवं नीरोगता पर पड़ता है; वहाँ उससे प्रजनन - प्रणालीकी भी शुद्धि हो जाती है । रज - वीर्यमें जो दोष होते हैं; उनका निवारण होता है । ओषधियोंका सेवन केवल शरीरके ऊपरी भागों तक ही प्रभाव दिखाता है; पर यज्ञ द्वारा सूक्ष्म की हुई ओषधियाँ यजमान तथा उसकी स्त्रीके श्वासों तथा रोमकूपों द्वारा शरीरके सूक्ष्मतम भागों तक पहुँच जाती हैं; और उन्हें शुद्ध कर डालती हैं । गर्भाशय एवं वीर्यकोषोंकी शुद्धिमें यज्ञ विशेष - रूपसे सहायक होता है । यज्ञ - सामग्रियों में अग्नि - तत्त्व- प्रधान तथा सोमतत्त्व - प्रधान दोनों प्रकारकी ओषधियाँ यथायोग्य डालते थे । तब दम्पतिमें जिसमें जिस शक्तिकी न्यूनता होती थी; वह यज्ञरूप - इन्जैक्शनसे उन्हें प्राप्त होती थी; स्थालीपाक एवं 457खीर आदि जो यज्ञमें हुत होते थे, उनका शेष भाग दम्पतिको खिलाया जाता था— इससे बाहरी - भीतरी भाग में लाभ प्राप्त होकर सुसन्ततिकी प्राप्ति हो जाती थी, तब पुत्रेष्टि यज्ञसे सन्तति - प्राप्ति भी सोपपत्तिक सिद्ध हुई । तभी वेदमें कहा है- ' अग्निः पुत्रं ददाति दाशुषे ' ( ऋ ० ५२५५ )

यज्ञसे वृष्टिका होना भी कहा जाता है । उस यज्ञकी सामग्रीमें ऐसे तत्त्वोंका संमिश्रण करके अग्निमें हुत करते थे, जो सूक्ष्मरूप- में शक्ति - सम्पन्न होकर अन्तरिक्ष में जाकर हाइड्रोजन और आक्सीजन नामक दो गैसोंके मिलानेका काम करते थे- इससे जल बनकर पृथिवीपर बरसता था; मानसून वायुओंको यज्ञका पोषण प्राप्त हो जाने से वृष्टि होना अस्वाभाविक नहीं - इस प्रकार कारीरी - इष्टिसे वर्षांका होना भी सोपपत्तिक ही सिद्ध हुआ । वेद में भी इसीलिए कहा है- ' स ( अग्निः ) नो वृष्टिं दिवस्परि ' । ( ऋ ० २२६५ ) ।

यज्ञमें अग्नितत्त्व - प्रधान हविको अग्निमें डालने से सूक्ष्म हुई विद्युत् - शक्ति हमारे शरीर में प्रविष्ट होकर हमारी प्राण - शक्तिकी अभिवृद्धि करके हमारी जीवन - शक्तिको बढ़ाती थी- इससे यज्ञसे आयु की प्राप्ति भी सोपपत्तिक है । वेदमें अग्निदेवतावाले जितने मन्त्र हैं, आर्यसमाजी इसमें अग्निदेवताकी पूजा सिद्ध हो जानेसे मूर्ति - पूजाकी सिद्धि मानकर डरके मारे वहां ' परमात्मा ' अर्थ कर दिया करते हैं; वस्तुतः वेदका विषय यज्ञ होनेसे - जैसा कि हम पहले संकेत दे चुके हैं - वहां अग्निसे याज्ञिक अग्नि इष्ट होती है ।

458श्री सनातनधर्मालोक ( १ )

उसी याज्ञिक अग्निसे वे वे वेदोक्त लाभ अवश्य प्राप्त होते हैं । तभी तो वेद अग्निकेलिए गाया है -- ' त्वमग्ने! बृहद क्यो दधासि देव! दाशुषे ' ( ऋ ० ८ १०२ १ ) श्रीसायणाचार्यने इसका अर्थ लिखा है - ' हे द्योतमान अग्ने! कान्तकर्मा, गृहपालकः त्वं हविषां दात्रे यजमानाय महदन्नं दधासि । ' वयः का अर्थ ' अन्न ' भी होता है, आयु. भी; क्योंकि अन्नसे ही आयुः प्राप्त होती है- ' अन्नं वै प्राणिनां प्राणाः ' ।

यज्ञसे यश तथा श्रद्धा और मेधाकी प्राप्ति भी मानी जाती है । -जैसे कि - ' जातवेदो! यशो अस्मासु घेहि ' ( क ० २४ | १० ) यज्ञ करने से यश हो जाता है, यह तो प्रत्यक्ष है ही । ' अग्नये समिधमा- हार्ष बृहते जातवेदसे । स मे श्रद्धां च मेधां च जातवेदाः प्रयच्छतु ' ( अथर्व ० १६६४ । १ ) ' यां मेधां देवगणाः पितरश्चोपासते । तया मामद्य मेधयाऽग्ने! मेधाविनं कुरु स्वाहा ' ( यजु ० ३२।१४ ) यहां अग्निसे श्रद्धा तथा मेधाकी प्राप्ति आई है । यह भी प्रत्यक्ष है । यज्ञ करने से यजमानके हृदय - पटलपर श्रद्धाका भाव अधिक बढ़ जाता है । शारीरिक तथा मानसिक एवं आत्मिक स्वच्छता से मेघाकी प्राप्ति भी स्पष्ट है ।

: मनुष्य सुन्दर और सुस्वादु भोजन करके अपान वायु, पसीना, अशुद्धश्वास, मल - मूत्र आदि निकालकर वायुमंडल को दूषित करता रहता है; और फिर अपनी आवश्यकताओंकी पूर्त्यर्थ कई प्रकारके इञ्जन- कारखाने आदियोंकी चिमनियों के तथा सिगरेट - हुक्कोंके धुएँ निकाल करके भी जल - वायुमें विकृति उत्पन्न करता रहता है, उससे 459अनेक रोगोंकी वृद्धि होती रहती है । इस दूषित वायुमण्डलकी शुद्ध्यर्थ भी होंम - यज्ञको व्यवस्था की गई है । अग्निमें भेदक - शक्ति • होने के कारण उसमें डाला हुआ घृत, मधुर पदार्थ तथा शेष हव्य · पृथक् - पृथक् रूपमें, सूक्ष्मरूपमें होकर वायुमण्डलमें मिल जाते हैं । वह वायु हलकी होकर ऊपर उठती है, उससे उसकी गति में तीव्रता आ जाती है । इससे पहली 2 अशुद्ध वायु बाहर निकल जाती है; उसके स्थानपर बाहरकी शुद्ध वायु प्रवेश करती है । मनुष्यने अपने शारीरिक गैसोंसे जल - वायुको दूषित किया; अतः उस पापका प्रायश्चित्त भी तो उसे करना चाहिए । वही यज्ञ है । यज्ञ करनेसे अपने कर्त्तव्यका पालन करते हुए प्राणिमात्रका जो अप्रत्याशित उपकार होता है, उससे उसे जन्मान्तर में स्वर्ग मिले — यह सोप- पंत्तिक ही है । पर उसमें देवताओं तथा वेदमन्त्रोंका - आश्रय लेना अनिवार्य है । इसमें आस्तिकता भी है, वास्तविकता भी है क्योंकि — देवताओं के अनुग्रहके बिना उक्त लाभ नहीं होते । " देवताओं के अनुग्राहक वेदमन्त्र हुआ करते हैं । यज्ञका उत्तरदायित्व * द्विजोंपर डाला गया है । शूद्रादि कृच्छ्रकर्म में लगे होने तथा शारीरिक - बाह्याभ्यन्तरिक अपवित्रता होने से उन्हें छूट है ।

यज्ञोंमें अग्निशक्ति, शब्द - शक्ति और कालविशेषकी शक्ति- इन तीन शक्तियोंका अभूतपूर्व सम्मिश्रण होता है । वर्तमान वैज्ञानिक- संसार शब्दशक्ति और कालपरिवर्तनकी गति के ज्ञानसे सर्वथा शून्य है । मन्त्रों, विशेष करके वेद मन्त्रों में शब्दशक्तिका रहस्य अन्तर्निहित होता है । ग्रहगतियोंके परिवर्तनानुसार नाना - नक्षत्रोंसे 460यज्ञोंका जो सम्वन्ध होता है, वर्तमान वैज्ञानिक उस मुहूर्त - विशेषके विज्ञानकी ओर एक क्षण के लिए भी विचार करनेका कष्ट नहीं उठाते ।

हविके धूमके प्रभावका भी विश्लेषण करना चाहिये । ऐटम- बमके धुएंके विषैले प्रभावने यह सिद्ध कर दिया है कि धूम कितनी दूर तक फैलता है । तब यज्ञकी अभिमन्त्रित अग्निका धूम भी अपनी सुगन्धसे व्यापक वातावरणपर अपने व्यापक प्रभावको क्यों न करेगा?

वर्तमान विश्वका समस्त वायुमण्डल लाखों कारखानोंकी चिमनियोंके विषाक्त धूमसे परिपूर्ण हो रहा है । अपनी भौतिक आवश्यकताओंको लोलुपता में आजका कोई भी व्यक्ति इस बातका परीक्षण नहीं करता कि — इस धूमका हमारी वर्षा, हमारे अन्न, हमारे जल और हमारे मस्तिष्कपर कैसा प्रभाव हो रहा है? इन धूमके प्रभावके नाशक यज्ञ - धूम यदि नहीं फैलाये जायेंगे; तो हमारी मस्तिष्क- शक्ति विकसित होनेके स्थान विष व्याप्त होती जावेगी और विवादों, युद्धों एवं महायुद्धोंके करनेवाली निष्पन्न होती जावेगी । यज्ञ - धूमसे ही सम्पन्न हुई वर्षा पृथ्वीके प्रत्येक पदार्थ में एक विशेष गुणकी आधायक सिद्ध हो सकती है ।

' उदिते जुहोति, अनुदिते जुहोति ' इन विकल्पोंमें तारतम्य, उन धूमादिकी गतिके अन्तरका ज्ञान यन्त्रोंकी सहायतासे हो सकता है । यज्ञ - विषयवाले वेदमें वेदाङ्ग ज्यौतिषकी उपयोगिता यही है कि - जिससे ऋतु - परीक्षणके अनुसार भिन्न - भिन्न प्रकारकी 461कालगतियोंका परीक्षण हो कि किस कालमें कौनसा यज्ञ और कौनसी सामग्री विशेष फलदायक हो सकती है? इस प्रकार ग्रहगतिके अनुसार होनेवाले अनेकों परिवर्तन भी परीक्षणीय होते हैं ।

यज्ञ- द्वारा ' अपूर्व की उत्पत्ति शास्त्रकार बताते हैं, परन्तु श्रद्धा एवं विश्वाससे शून्य वर्तमान युग उस सिद्धान्तका ज्ञान नहीं कर सकता । उन लोगोंको कालकी त्रिकालाबाध्य - परिस्थिति. केवल भौतिक दृष्टिसे समझमें नहीं आ सकती । मन्त्रोंके अशुद्ध उच्चारणमें तथा कुण्ड - मण्डपादिके निर्माण में प्रमाद होनेसे भी फलकी विपरीतता वा निष्फलता हो सकती है । एक - एक अक्षरके उच्चारण से पृथक् - पृथक् भौतिक परिवर्तन वा परिणाम होते हैं । वैज्ञानिक जिस प्रकार संगीत - लहरीके भिन्न - भिन्न प्रभावोंका परिणाम पाते हैं;. वैसे ही याज्ञिक मन्त्रोंके उदात्तादि - स्वरोंकी विशेषताएँ भी होती हैं; जिनका विश्लेषण हमारे ऋषि - मुनियोंने किया था । उन्होंने यह निरीक्षण करके ही तो कहा था कि - स्वर आदिकी थोड़ी त्रुटि रह जाने से वृत्रासुरवधकाण्ड हो जाया करते हैं; अतः यज्ञके मन्त्रो- चारण में विशेष शुद्धता अपेक्षित होती है ।

नानाप्रकारके पदार्थोंके द्वारा जो आहुति दी जाती है; उन पदार्थोंके सम्मिश्रणसे विशेषताएँ भी अवश्य होती हैं । इस प्रकार विविध पशुओंकी आहुति द्वारा भी विविध परिणाम प्रतीत हो सकते हैं; परन्तु कलियुग में कुछ हानि समझकर ऐसे विधानोंको रोका गया है ।

462इस प्रकार यदि हम यज्ञसे वर्षा विज्ञान पूरी तरह समझ लें; तो हमारी अन्नादिकी समस्याएँ सहज में ही सुलझ सकती हैं । यज्ञोंकी प्रगतिकेलिए यज्ञसे सम्बन्ध रखनेवाले समस्त कालज्ञान, मन्त्रज्ञान, स्वरज्ञान, हवनसामग्री - विज्ञान, तत्तद्यज्ञोपयुक्त देव भूर्ति- उपासना आदि ज्ञानों और साधनों को भी सुसज्जित रखना चाहिये ।

.. फलतः यज्ञकी जो महिमा सनातनधर्मी शास्त्रों में थाई है, वह निरुपपत्तिक नहीं है । यज्ञसे वेदका सम्बन्ध है, अतः यज्ञमें वेदमन्त्र भी पढ़े जाते हैं । इसलिए वेदमें अग्निदेवतावाले: मन्त्र भी बहुत हैं । वेदका विषय यज्ञ है - इस विषय में हम ' ब्राहाण- भाग भी वेद है? इस निबन्ध में बहुत से प्रमाण अग्रिम पुष्प में उपस्थित करेंगे । पर कई आर्यसमाजी इसका विरोध करते हैं; इसलिए कि अग्निकी पूजा मूर्तिपूजा सिद्ध हो जाती है; और यज्ञ वेदका विषय होनेसे सनातनधर्मप्रोक्त याज्ञिक - कर्मकाण्ड फिर वैदिक सिद्ध हो जाता है, पर वैदिकम्मन्योंको यह विरोध शोभित नहीं होता, क्योंकि - वेद स्वयं अपना विषय यज्ञ बताता है, उसीमें उसका अभिनिवेश है । इसका प्रमाण यह है कि वेदों में यज्ञ - वर्णनपरक जितने मन्त्र हैं, उतने अन्य किसी विषयपर नहीं । निघण्टुमें यज्ञके यज्ञ १, वेन २, अध्वर ३, मेघ ४, विदथ ५, नार्य ६, सवन ७; होत्रा ८, इष्टि ६, देवताता १०, मखं ११, विष्णु- १२, इन्दु. १३, प्रजापति १४, धर्म १५ यह पन्द्रह नाम आये हैं । इनमें केवल ' यज्ञ ' शब्द और यज - धातु भी ले ली जाय; तो उससे भी वेदका अधिकांश भरा पड़ा है । आर्यसमाजके स्वा ० विश्वेश्वरानन्द- 463जीसे प्रणीत वेदोंकी पदानुक्रमणिकाओंको देख लीजिये; उसमें ' यज ' धातुका प्रयोग ऋग्वेद - पदानुक्रमणिकाके ३२२ पृष्ठके तीसरे कालमसे शुरू होकर ३२३ पृष्ठके तीनों कालमोंमें, ३२४ पृष्ठके तीनों कालमोंमें और ३२५ पृष्ठके २ कालमों तक आया है । यजुर्वेदकी पदानुक्रमणिकाके ७८ पृष्ठके पहले कालमके अन्तिम भाग़ से लेकर दूसरे, तथा तीसरे कालम में, तथा ७६ पृष्ठके पहले कालम के आधे भाग तक आया है । ' सामवेदकी पदानुक्रमणिका के ७४ पृष्ठके दूसरे कालमसे तीसरे कालम तक आया है । अथर्ववेद पदानुक्रमणिकाके १८७ पृष्ठके पहले कालम, दूसरे तथा तीसरे कालम, और १८८ पृष्ठके पहले, तथा दूसरे कालमके आरम्भिक भाग तक आया है ।

दूसरा अध्वर शब्द ऋ ० पदानु ० के २० पृष्ठके २॥ कालमोंमें, इस प्रकार ' वेन ' आदि यज्ञवाचक शब्द बहुत बार आये हैं । ' अग्नि ' देवतावाले तो सभी मन्त्र इस यज्ञमें ही शामिल हैं । सोमका वेदमें जहां - जहां भी वर्णन आया है, वह भी यज्ञ - विषयक ही है; क्योंकि सोमका यज्ञमें प्रयोग होता था । इसी पवमान- सोमकेलिए ऋग्वेदसंहिताका नवम - मण्डल तथा सामवेदका पवमानपर्व स्वतन्त्ररूपसे रखा गया है । अतः वेदका विषय यज्ञ और यज्ञका विषय वेद सिद्ध हो ही गया । यदि यह कहा जाय कि - यज्ञ वैदिक - सनातनधर्मका प्रारण है, तो इसमें कोई अत्युक्ति नहीं । ऋषिकालमें यज्ञ सदा हुआ करते थे, उसी समय यह भारतवर्ष खूब उन्नत भी था । यज्ञसे ही हमारी हिन्दुजाति जीवित है- 464और जीवित रहेगी - इसमें भी कोई अत्युक्ति नहीं । यज्ञमें " प्रयुक्त किये जाते हुए ' सोम ' के पर्यायवाचक तथा निघण्टुके अनुसार यज्ञके पर्यायवाचक ' इन्दु ' शब्दसे ही हमारी याज्ञिक जातिका नाम ' हिन्दु ' हुआ है । अतः यज्ञका हिन्दुजातिके लिए सब दृष्टियों से महत्त्व है । इसी वैदिक यज्ञका दूसरा तथा सस्ता संस्करण देवमूर्ति - पूजा है; उससे भी यज्ञवाले परिणाम प्राप्त हो जाते हैं । उसके लिए बहुत व्यय भी नहीं होता, और वहुत. विद्वत्ता भी अपेक्षित नहीं होती; अतः वह भी वैदिकधर्मका ही एक अङ्ग है

( ३६ ) देवमन्दिरगमन - विज्ञान ।

हम पूर्व कह चुके हैं कि — देवमूर्तिपूजा भी एक यज्ञ है; यज्ञवाले लाभ देवमूर्त्तिपूजामें भी प्रायः होते हैं; क्योंकि - यह भी देव - पूजा है । देवपूजा दो प्रकारकी होती है, एक हवन, दूसरी मूर्ति- पूजा । संस्कृत - अग्निमूर्तिद्वारा ' इन्द्राय स्वाहा, वरुणाय स्वाहा ' इत्यादि रूपसे उस - उस देवताको हवि देना - यह हवन - द्वारा देव- पूजा होती है, प्रस्तर - आदिकी संस्कृत - मूर्तिद्वारा उस - उस देवताको बलि देना मूर्तिद्वारा देवपूजा होती है । हवन तथा मूर्तिपूजा दोनों ही ' यज्ञ ' कहे जाते हैं; क्योंकि — देवपूजार्थक यजधातुका अर्थ दोनों स्थानोंमें देखा गया है । ' शाङ्खायनब्राह्मण ' में कहा है- ' स एवास्मै यज्ञ ' ददाति तद् यद् एता देवता यजति ' ( ४२ ) अर्थात्

* इसे जाननेकेलिए ' श्रीसनातनधर्मालोक'का चतुर्थ पुष्प हमसे शीघ्र मंगाइये । मूल्य ४1 )

In English

The Importance of Yajña and Agni

This text explains the ritual of yajña (sacrifice) as a method to refine physical offerings into subtle energies through fire. It argues that performing these rituals maintains the cosmic balance of natural forces like rain and wind, preventing natural disasters.

This chapter answers

  • How does agni refine sacrificial offerings?
  • Why is yajña important for controlling natural elements?
  • What is the relationship between deities and natural forces?
  • How do sacrifices affect the atmosphere and health?

Also written: Yagyaka, Vaigyanika, Mahattva, Yagyaka Vaigyanika Mahattva, यज्ञका वैज्ञानिक महत्त्व

मूल ग्रन्थ

यह पाठ सनातन धर्मालोक ५के मुद्रित पृष्ठ 433–464 से ज्यों-का-त्यों लिया गया है — न कुछ जोड़ा गया है, न घटाया। स्कैन किया हुआ मूल पृष्ठ देखनेके लिये —

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