पञ्चम सुमन · प्रकरण 4

गायत्रीमन्त्रकी महत्ताका रहस्य

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163समुद्दिष्टा ' इस प्रकार देवीरूपसे वर्णन आया है । इसी गायत्रीका उपस्थान ' गायत्र्यस्येकपदी... असावदो मा प्रापत् ' ( १४/८/१५/१० ) शतपथ - प्रोक्त इस मन्त्रमें आया है, जो सन्ध्यामें पढ़ा जाता है । उपनयन होजाने पर वेदारम्भ में आचार्य पदवी को धारण करने वाला गुरु इसी मन्त्रका उपदेश करता है । इस कारण यह ' गुरु- मन्त्र ' नामसे प्रसिद्ध भी है । यद्यपि वेदारम्भ- संस्कारमें वेदका ही आरम्भ अपेक्षित है; तथापि उस समय विद्यार्थी वेदाङ्ग पढ़े हुए न होनेसे वेदमें चल नहीं सकता; तव वेदका सारभूत यही मन्त्र गुरुद्वारा उपदिष्ट किया जाता है । ' उक्त मन्त्र वेदका साररूप है'- यह आगे बताया जायगा ।

इस मन्त्रमें ' सविता ' देवतासे प्रार्थना है । ' सविता ' सूर्यको कहते हैं । इससे ' अभिमानिव्यपदेशात् ( २२११५ ) इस ' वेदान्त- दर्शन ' के सूत्रके आधारसे सूर्यमण्डलान्तर्गत सूर्याभिमानी देवविशेष लिया जाता है, जो चेतन है । जैसे जड़ जलोंका चेतन देव वरुण, वेदमें ' यासां ( अपां ) राजा वरुरणो याति मध्ये सत्यानृते अवपश्यन् जनानाम् ' ( ऋ ० ७ । ४६।३ ) [ यहां पर ' आपो देवता: ' है, अप् - शब्द नित्यस्त्रीलिङ्ग है ] इस मन्त्र से संकेतित किया गया है; वैसे ही जड़ सूर्यमण्डलका भी चेतन- देव ' योऽसावादित्ये पुरुषः सोसावहम् ' ( ४०।१७ ) इस यजुर्वेद ( वा. सं. ) के मन्त्रमें संकेतित किया गया है ।

सूर्यादिका अभिमानी देवता भी उसी - उसी नामसे प्रसिद्ध होता है । जो कि वेद हमें सूर्य आदिकी उपासना सिखलाता है, उसे वहाँ उनकी चेतनता इष्ट है । चाहे सूर्य आदि पदार्थ लौकिक- 164व्यवहारमें जड़ प्रसिद्ध हों; पर वास्तव में ये चेतन हैं; क्योंकि— इनके अन्दर इनका अभिमानी ( अधिष्ठाता देवता विराजमान है । इसी कारण ' अभिमानिव्यपदेशस्तु ' ( २।१५ ) इस ' ब्रह्मसूत्र ' के शाङ्कर- भाष्य में कहा है- ' मृदाद्यभिमानिन्यो वागाद्यभिमानिन्यश्च चेतना देवता वदनसंवदनादिषु चेतनोचितेषु व्यवहारेषु व्यपदिश्यन्ते, न भूतेन्द्रियमात्रम् ।... अनुगताश्च सर्वत्र अभिमानिन्यः चेतना देवता मन्त्रार्थवादेतिहास - पुराणादिभ्योऽवगम्यन्ते - " इति । यहां पर आचार्यने भूत तथा इन्द्रियोंके अधिष्ठाता के चेतन होनेमें वेदके मन्त्रभाग तथा ब्राह्मणभागकी भी साक्षी बताई है । तभी वेदमें- ' वरुणोऽपामधिपतिः ' ( अथर्व ० ५।२४।४ ) ' आपश्च, वरुणश्च राजा ' ( अथर्व ० १५।२६ ) ' इन्द्रो वै यज्ञस्य देवता ' ( शतपथ ० ३।५।२।६ ) जल, यज्ञ आदिके अधिष्ठाता देवता वरुण, इन्द्र आदि माने गये हैं ।

इसीको स्वा ० श्रीशंकराचार्यने ' वेदान्त दर्शन ' के १।३।३३ सूत्रके भाष्यमें भी स्पष्ट किया है । जैसे कि - ' ज्योतिरादिविषया अपि आदित्यादयो देवतावचनाः शब्दाः, चेतनावन्तम् ऐश्वर्याद्युपेतं तं तं देवतात्मानं समर्पयन्ति, मन्त्रार्थवादादिषु तथा व्यवहारात् । अस्ति हि ऐश्वर्ययोगाद् देवतानां ज्योतिराद्यात्मभिश्च अवस्थातुम्, यथेष्टं च तं तं विग्रहं ग्रहीतु ं सामर्थ्यम् । तथाहि श्रूयते - ' मेधातिथिं ह काण्वा- यनमिन्द्रो मेषो भूत्वा जहार ' ( षड्विंशब्राह्मण १।१ ) स्मर्यते च- ' आदित्यः पुरुषो भूत्वा कुन्तीमुपजगाम ह ' इति । मृदादिष्वपि चेतना अधिष्ठातारोऽभ्युपगम्यन्ते - ' मृदब्रवीद्, आपोऽब्र वन - इत्यादि - दर्शनात् । ज्योतिरादेस्तु भूतधातोरादित्यादिषु श्रचेतनत्वमभ्युप- 165गम्यते । चेतनास्तु अधिष्ठातारो देवतात्मानो मन्त्रार्थवादादि- व्यवहाराद् — इत्युक्तम् ' । ( देवताधिकरणेऽष्टमे ) ।

इस सिद्धान्तका विशदीकरण आर्यसमाजी विद्वान् श्रीराजाराम - जी शास्त्रीने अपने ‘ अथर्ववेदभाष्य ' की भूमिका में इस प्रकार किया है - ' परमेश्वरकी सृष्टिमें देहधारी जीवोंकी सृष्टि नाना- प्रकार की है । इस भूलोक में ही शैवाल, तृण, घास आदि नाना - प्रकारके स्थावर और पशु - पक्षी आदि नानाप्रकारके जङ्गम हैं, ये सारे जीव- विशेष हैं । मनुष्य इन सबसे ऊंची श्रेणिका जीव है, पर परमात्मा की सृष्टि यहीं तक समाप्त नहीं है । मनुष्यसे कई दर्जोंमें ऊंचा पद रखनेवाले जीव भी उसकी सृष्टिमें विद्यमान हैं; जो मनुष्योंकी नाई चेतन हैं । वे अपनी शक्ति और ज्ञानमें इतने ऊंचे पहुँचे हुए हैं कि — मनुष्यकी शक्ति और ज्ञान उनके सामने तुच्छ हैं । इस अनेक प्रकारकी ऊंची सृष्टिमें सबसे ऊंचा स्थान देवताओंका है । देवता चेतन हैं । मनुष्योंसे ऊपर और परमेश्वरसे नीचे हैं । परमेश्वरकी ओर से उनको भिन्न - भिन्न अधिकार मिले हुए हैं जिनका कि वे पालन करते हैं । देवता अजर और अमर हैं, पर उनका अजर - अमर होना मनुष्योंकी अपेक्षासे है, वस्तुतः उनकी भी अपनी अपनी

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आयु नियत है । ब्रह्माण्डकी दिव्य शक्तियों में से एक - एक शक्ति पर एक - एक देवताका अधिकार है । जिस शक्तिपर जिसका अधिकार है, वही उसका देह है जो उसके वशमें है ।

जैसे हमारे देहमें एक जीवात्मा है, जो इस देहका अधिपति है, इसी प्रकार उस शक्तिके अन्दर भी एक जीवात्मा है, जो उसका 166अधिपति है | जैसे हमारे अधीन यह देह है, वैसे ही एक देवताके अधीन सूर्यरूपी देह है । हम एक थोड़ीसी शक्तिवाले देह के स्वामी हैं, वह एक बड़ी शक्तिवाले देहका स्वामी है, वह अध्यात्म शक्तियों में इतना बढ़ा हुआ है कि अपनी इच्छा के अनुसार जैसा चाहे, बैसा रूप धारकर, जहां चाहे वहां जा सकता है | वही देव सूर्यका अधिष्टाता कहलाता है और सूर्यके नामसे ही बुलाया जाता है । इसी प्रकार अग्नि और वायु आदिके अधिष्ठाता देवता हैं । देवताओंका ऐश्वर्य वहुत बड़ा है; पर वह सारा परमेश्वर के अधीन है । एक - एक देवता एक - एक दिव्यशक्तिका नियन्ता है । पर उन सबके ऊपर उन सव का नियन्ता परमेश्वर है । इसलिए भी सभी देवता मिलकर जगत्. का प्रवन्ध इस प्रकार कर रहे हैं - जिस प्रकार राजाके अधीन उसके भृत्य उसके राज्यका प्रबन्ध करते हैं ।

देवताओंकी उपासनाथोंसे उन कामनाओंकी सिद्धि होती है, जिसके कि वे मालिक होते हैं ।... वे तब तक दिव्य शरीरको धारण किये रहते हैं, जबतक उनका वह अधिकार समाप्त नहीं हो लेता, जिस अधिकार पर उनको परमेश्वरने लगाया है । अधिकारकी समाप्ति पर वे मुक्त हो जाते हैं और उनकी जगह दूसरे ग्रहण करते हैं; जो मनुष्यों में से ही उपासना द्वारा उस पदके योग्य बन गये हैं । देवताओंके ऐश्वर्यके दर्जे हैं, सबसे ऊँचा दर्जा ब्रह्माका है, ( अथर्ववेदभाष्यभूमिका पृ ० ११ )

इससे स्पष्ट है कि सूर्य आदि देवता चेतन हैं । बल्कि शास्त्रों में तो यहां तक कहा है कि सभी वस्तुएँ चेतन हैं । इसी अभिप्रायसे 167महाभाष्यकार श्रीपतञ्जलिने भी ३ | १ | ७ सूत्र में ' सर्वस्य वा चेतनावत्त्वात् ' इस वार्तिकके विवरण में कहा है- ' अथवा सर्वं चेतनावत् । एवं हि आह — ' कंसकाः सर्पन्ति, शिरीषोऽयं स्वपिति, सुर्वचला श्रादित्यमनु पर्येति । ‘ आस्कन्द कपिलक ' इत्युक्ते तृणमास्कन्दति । अयस्कान्तमयः संक्रामति ॥ ऋषिः [ वेदः ] पठति ' शृणोत प्रावारणः ' यहां पर ' शृणोत प्रावारणः ' यह वेदमन्त्र देकर सिद्ध किया गया है कि सभी जड़ दीख रही वस्तुएँ भी चेतन हैं ।

उक्त वेदमन्त्र यह है— ' शृणोत्वग्निः समिधा हवं मे, शृण्वन्तु. आपो धिषणाश्च देवीः । शृणोत प्रावाणो विदुषोऽनु यज्ञ भुं शृणोतु देवः सविता हवं मे ' ( कृष्णयजुर्वेद - तैत्तिरीयसं ० १ | ३ | १३ | १ ) जब यहां जड़ पत्थरको भी वेदने सुननेकेलिए कहा है; तब पत्थर आदि वाह्य व्यवहारमें अचेतन कहे जाते हुए भी, वेदकी दृष्टिमें चेतन हैं, यह वैदिक सिद्धान्त है । यह महाभाष्यकारका आशय है । इसीको ' प्रदीप ' में कैट ने स्पष्ट किया है- ' सर्वस्य वेति ' आत्मा- द्वैतदर्शनेनेति भावः । ऋषिरिति - वेदः सर्वभावानां चैतन्यं प्रतिपाद- यतीत्यर्थः । वैचित्र्येण च पदार्थानामुपलम्भात् सर्वचेतनधर्मः सर्वत्र नोद्भावनीयः ' । इसमें इस प्रश्नका कि यदि पत्थर आदि चेतन हैं तो वे भी हम चेतनोंकी तरह चलते - बोलते क्यों नहीं — इसका उत्तर दे दिया गया है कि पदार्थों में परस्पर विचित्रता भी हुआ ही करती है, तब सभी चेतनोंके धर्म उसी रूपमें सभी चेतनोंमें नहीं मिल सकते, क्योंकि किसी में चेतनता अभिव्यक्त होती है; किसीमें अनभिव्यक्त । श्रीनागेशभट्टने भी अपने ' उद्योत ' में इसीका इस 168प्रकार समर्थन किया है— ' वैचित्रयेणेति ' चेतनेषु मनुष्येष्वपि नानाजातीय - व्यवहारदर्शनाद् इति भावः । सर्वत्र परिणामदर्शनेन चेतनाधिष्ठानं विना च तदसम्भवात् सर्वस्य तदधिष्ठितत्वं ज्ञायते इति तात्पर्यम् ' । अर्थात् जब चेतन मनुष्यों में भी नाना प्रकारके व्यवहार दिखलाई पड़ते हैं, तब चेतन पत्थर आदियों में भी सभी चेतनोंवाले व्यवहार नहीं हो जाते । चेतन मनुष्यों में भी लकवा आदिके कारण चलना - बोलना आदि चेष्टा नहीं रहती । जव सर्वत्र परिणाम - परिवर्तन आदि विकार दीखता है, तब वह चेतनके अधिष्ठान के बिना नहीं हो सकता । जब ऐसा है तब सभी पदार्थ चेतन हैं - यह स्पष्ट है ।

वार्तमानिक विज्ञान भी इस सिद्धान्तकी पुष्टि करता है । वैज्ञानिकोंने रेडियम धातुकी विद्युत्कणिकाका परीक्षण करके यह ज्ञान प्राप्त किया है कि ' रेडियम ' धातुके एक परमाणुसे हजारों विद्युत् - करिणका प्रतिक्षण में प्रकट होती हैं । परिमाणमें वे करण इतने छोटे होते हैं कि एक हज़ार भी मिले हुए उनका संयुक्त - परिमाण वा गुरुत्व ' हाईड्रोजन ' के एक परमाणुके तुल्य भी नहीं होता । इनके निकलनेका वेग प्रकाशके वेगका लगभग दो - तिहाई होता है । प्रकाशका वेग एक सेकंडमें १,८६,००० मीलके लगभग सिद्ध किया गया है । सूर्य से लगभग साढ़े नौ करोड़ मीलकी दूरी पर स्थित पृथ्वी पर उसका प्रकाश आठ मिनटमें पहुँचता है ।

इन अपूर्व बातोंको देखकर वैज्ञानिकोंकी यह धारणा हो गई है कि समस्त चराचर जगत् में सारभूत वस्तु कोई भी नहीं है और 169संसारमें कोई भी पदार्थ जड़ नहीं है । जड़ कहे जानेवाले पदार्थोंके छोटे - से -

छोटे करण अर्थात् परमाणुको देखनेसे तथा उसे तोड़कर उसके सहस्रों भाग करने पर विद्युत्कणियों के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं मिलता । फिर भी उनकी सत्ता दिखाई पड़ती है और नियमसे प्रतिक्षण उनकी चलन - प्रवृत्ति मिलती है; इससे वर्तमान वैज्ञानिकोंके विचारमें जड़ वस्तुओं में भी दैवी शक्तिका आभास दीखने से जड़ों में भी चेतन - सत्ता सिद्ध हुई ।

वस्तुतः यह सिद्धान्त है भी ठीक ही । शास्त्रका भी यही सिद्धान्त है । शास्त्र परमात्माको अणु - अणु में व्याप्त मानता है । अद्वैत - सिद्धान्तमें तो अणु - ऋणु भी परमात्मा का ही रूप है, वा परमात्मा ही है । उस ( परमात्मा ) से भिन्न किसी भी वस्तुकी पारमार्थिक सत्ता नहीं है । ईश्वर ' सच्चिदानन्द ' इस शब्दसे चेतन ही है; तो समस्त सांसारिक वस्तुएँ जड़ दीख रही हुई भी वस्तुतः चेतन ही हैं । जो कि उनमें स्थूलतासे चैतन्यकी अभिव्यक्ति नहीं दीखती; उसमें कारण है उनमें स्थूलतासे इन्द्रियों तथा मनकी अनभिव्यक्ति । आत्माको ही देख लीजिये, वह चेतन है । जब उसमें मरणके समय इन्द्रियाँ और मन अभिव्यक्त नहीं होते; तब वह आत्मा भी चेष्टाशाली नहीं मालूम होता । प्रत्युत आत्माके शरीर में विद्यमान होने पर भी, उसमें होती हुई भी इन्द्रियाँ कारणवश कार्य करनेवाली नहीं होतीं, वा निर्बल हो जाती हैं; तब आत्म - युक्त शरीरवाले होने पर भी पुरुषकी चेष्टा नहीं दीखती । इस विषय में मूर्च्छित ( बेहोश ) पुरुषोंका उदाहरण 170देख लीजिये । अथवा न मूच्छित भी निर्बल इन्द्रियशक्ति वाले, वा लकवा बीमारीसे घिरे पुरुषोंका उदाहरण देख लीजिये । परमात्मा चेतन माना जाता है, पर उसमें ' हरकत ' क्यों नहीं दीखती? । उसमें भी कारण है उसका स्थूल इन्द्रिय - मन आदि से संयोग । इसीलिए उसके शब्द आदि व्यवहार भी स्थूल नहीं हुआ करते ।

इससे सिद्ध हुआ कि — जड़ वस्तु भी वास्तव में चेतन हुआ करती है । भैंसकी पुरीषके जड़ परमाणुओं में जब स्थूलतासे विशिष्ट शक्तिका संयोग व्यक्त होता है; तब उसके पुरीषमें कीड़े होजाते हैं । यदि जड़ोंमें चेतन - शक्ति सर्वथा न होती; तो अभावसे भावकी उत्पत्ति कैसे होगई? जो चैतन्य - शक्ति कीड़ोंमें है, वह भैंसकी पुरीषके जड़ कहे जानेवाले परमाणुओं में भी थी । परन्तु इन्द्रियादिकी अभिव्यक्ति न होनेसे वह चैतन्य- शक्ति अपना उपयोग न कर सकी । वल्ब न होने पर विजली नहीं जला करती । इसी सिद्धान्तको मानकर स्वर्गीय जगदीशचन्द्रवसुने वृक्षोंमें चेतनता मानी थी; इसी प्रकार पत्थरों में भी मानी । इसी अभिप्राय से वर्तमान वैज्ञानिक लोग सूर्यमें भी प्रसन्नता अप्रसन्नताके परमाणु मानने लगे हैं ।

इसका विवरण इस प्रकार है । कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी लण्डनमें सूर्यके विषयमें एक लैक्चर हुआ था; जो समाचार - पन्नोंमें प्रकाशित हो चुका है । उसको तो हम फिर अन्य पुष्पों में पाठकोंको उपहृत करेंगे । उसमें प्रकृतं अंश यह है । उस व्याख्याताने कहा - ' उत्तरी अमेरिकाके ग्रेनलैण्ड प्रदेशमें एक दफीनेका खोदना शुरू हुआ । 171खोदने पर दफीना ( माणिक्य ) तो मिला नहीं, किन्तु एक देवमन्दिर मिला । उसमें सूर्यकी एक मूर्ति है, जो चमकदार पत्थरोंसे बनाई हुई है । सूर्यके सामने एक हिन्दु डण्डे की तरह झुककर प्रणाम कर रहा है । सामने ही अग्निमें धुवाँ उठ रहा है, जिससे मालूम होता है कि- अग्निमें कुछ सुगन्धित द्रव्य डाला गया है । इधर- उधर फूल पड़े हैं । यह सव दृश्य पत्थरों से बनाया गया है ।

इस विचित्र सूर्य - मन्दिर मिलने से मालूम हुआ कि- किसी युग में हिन्दुओंका चक्रवर्ती राज्य अमेरिका तक फैला था । इसके अति- रिक्त यह भी मालूम हुआ कि हिन्दुओं का विश्वास था कि - सूर्य प्रसन्न तथा क्रुद्ध भी होसकता है । यदि ऐसा विचार न होता; तो एक हिन्दु उस ( सूर्य ) की पूजा क्यों करता? क्यों उसे नमस्कार करता? इस विषयको लेकर वैज्ञानिक संसारमें क्रान्ति उत्पन्न होगई । मिस्टर जार्जनामक किसी विज्ञानके प्रोफेसरने यह परीक्षा की कि- " सूर्यमें कृपाशक्ति है या नहीं? हम सूर्यमें समस्त तत्त्वों की सत्ता तो मानते रहे; पर यह कल्पना भी नहीं कर सके कि सूर्य में प्रसन्नता- अप्रसन्नताका तत्त्व भी विद्यमान है! हिन्दुओं की सूर्य - पूजाका वृत्त भारतीय प्राचीन इतिहाससे हमें पहले ही पता था । अमेरिकामें मिले सूर्य - मन्दिरसे हमें हिन्दुओं की सूर्य - पूजा में अन्य भी निश्चय होगया । मि ० जार्जने सोचा कि - हिन्दुओं की सूर्योपासना क्या मूर्खतापूर्ण थी वा वास्तविकतापूर्ण?

इसकी रोचक परीक्षा हुई । मईका महीना था । पूरे दोपहर के समय केवल पाजामा पहनकर मि ० जार्ज नंगे शरीर धूपमें ठहरे । 172पाँच मिनट सूर्यके सामने ठहरकर वे कमरे में गये । थर्मामीटरसे उन्होंने अपना तापमान देखा । तीन डिग्री तक बुखार चढ़ा था । दूसरे दिन उक्त महाशयने फूल - फलोंका उपहार तैयार किया । अग्निमें धूप जलाया । तब वह पूरे दोपहर में नंगे शरीर धूपमें गया । उसने सूर्यके सामने श्रद्धासे फूल चढ़ाये, फल भी । हाथ जोड़कर प्रणाम किया । जब वह अपने कमरे में गया; तो घड़ी में उसने देखा कि आज वह ग्यारह मिनट तक सूर्य के सामने रहा । थर्मामीटरसे मालूम हुआ कि आज उसका तापमान नार्मल रहा । उसका पारा ठण्डककी ओर रहा ।

इससे उसने यह परिणाम निकाला कि वैज्ञानिकोंका “ सूर्य केवल अग्निका गोला और जड़ है " यह सिद्धान्त गलत है, वस्तुतः उसमें अप्रसन्नता और प्रसन्नताका तत्त्व भी विद्यमान है । "

' आलोक ' के पाठकोंने वैज्ञानिकोंकी यह गवेषणा सुन ली । उन लोगोंको अभी ये बातें धीरे - धीरे मालूम होरही हैं; परन्तु अपने यहाँ तो यह सिद्धान्त वैदिककालसे चला रहा है कि सूर्यमें बुद्धि- शक्ति है । इसीलिए वेदमें सूर्यकेलिए कहा है- ' इनो विश्वस्य, भुवनस्य गोपाः, स मा धीरः ' ( ऋ ० १।१६४।२१ ) यहाँ पर सूर्यको धीर - बुद्धियुक्त ' निरुक्त ' के शब्दों में ' धीरः धीमान् ' ( ३ | १२ | १ ) कहा है । तभी बुद्धियुक्त सूर्य ( सविता ) से ' तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ' ( यजुः वा ० सं ० ३।३५ ) इस प्रकार बुद्धिकी प्रार्थना धार्मिकगरण किया करते हैं ।

173गायत्री मन्त्रकी महत्ता

सविता पर विवेचन

' सविता ' सूर्यको कहते हैं - यह कहा जा चुका है । ' सुतिन्प्रेरयति कर्मणि लोकम् इति सविता ' यह सविताकी व्युत्पत्ति है । इससे सूर्यका बोध होता है क्योंकि वही हमें कर्मोंमें प्रेरित करता है । सूर्योदय हो रहे होने पर वा होजाने पर हम आलस्यको छोड़कर अपने आवश्यक कर्मोंमें जुट जाते हैं । कई महाशय ' सविता ' शब्दको ‘ षुञ् प्रसवैश्वर्ययोः ' इस धातुसे निष्पादित करते हैं । कई विद्वान् ‘ यः चराचरं जगत् सुनोति, सूते वा उत्पादयति, स सविता ' ( स ० प्र ० ) इस प्रकार व्युत्पादित करके ' अभिषवः- प्राणिगर्भविमो- चनं च उत्पादनम् ' यह कहकर ' पुत्र अभिषवे, षूङ् प्राणिगर्भ- विमोचने ' ( स ० प्र ० १ समु ० ) इन धातुओं से निष्पादित करते हैं; पर यह वेद तथा वेदाङ्ग व्याकरणसे विरुद्ध है ।

इस विषयमें ‘ षुञ् प्रसवैश्वर्ययो: ' इस धातुका उपन्यास तो ठीक नहीं, क्योंकि पुत्र धातु ' अभिषव ' अर्थ में आता है; प्रसव आदिमें नहीं । ' सविता ' में अभिषव अर्थ नहीं । अभिषव स्नपन, पीडन तथा सुरासन्धान ( सोमवल्लीका रस निकालना ) अर्थ में आता है । वेदाङ्गप्रकाश ' आख्यातिक ' में स्वा ० दयानन्दजीने भी ' पुत्र ' धातुका ' यन्त्रसे रस खींचना, वा राज्याधिकार देना ' यह अर्थ माना है, उत्पादन अर्थ नहीं माना ।

इसके अतिरिक्त ' षुञ. ' धातु अनिट् होती है; पर ' सविता ' में तो इट् प्रत्यक्ष ही है । जो ' प्रसवैश्वर्य ' में धातु होती है; वह ' षु ' धातु होती है ' पुष्प ' नहीं । वह भी सेटू नहीं होती, किन्तु अनि 174होती है । वहाँ पर ' प्रसव का अभ्यनुज्ञान अर्थ विवक्षित है, गर्भ- मोचन अर्थ नहीं | प्रसव अर्थ में तो ' पूङ् प्राणिगर्भविमोचने ' ( अ ० वे ० आ ० ) यह अढ़ादिकी, अथवा ' पूङ् प्राणिप्रसवे ' ( दि ० वे ० आ ० ) यह दिवादिकी धातु प्रयुक्त करनी चाहिये । परन्तु यह पक्ष भी ठीक नहीं; क्योंकि ये धातुएँ भी बेटू होती हैं; पर सविता देवतावाले मन्त्रों में सर्वत्र ' सविता ' इस प्रकार नित्य इट् ही देखा गया है; कहीं ' सोता ' इस प्रकार हटू - रहित प्रयोग ' सूतवे ' ( अथर्व ० ५ । २५ । १० ) की तरह नहीं देखा गया । अन्यथा वेट् ( वैकल्पिक इट् ) होने का लाभ ही क्या है और सविता देवतावाले मन्त्रोंमें प्राणिप्रसव आदि अर्थ देखा भी नहीं गया है । ' अनुसू सवितवे ' ( अथर्व ० ६।१७११ ) इत्यादि मन्त्रों में उक्त धातुओंकी वेट्कता देखी भी गई है, अर्थ भी वही देखा गया है । पर सावित्र ( सविता देवतावाले ) मन्त्रों में कहीं भी ' सविता, सोता, इस प्रकार वेट्कता नहीं देखी गई है I

। व्यत्ययसे भी उक्त सिद्धि नहीं हो सकती; क्योंकि - सावित्र मन्त्रोंसे विरोध आता है ।

कई महाशय ‘ सविता में उक्त दो धातुओं को सिद्ध करने के लिए उनके वैकल्पिक रूपके प्रदर्शनार्थ ' वि हि सोतोर सृक्षत ' ( ऋ. १० / ८६।१ ) इस मन्त्रको उपस्थित करते हैं; पर यह भी ठीक नहीं; क्योंकि यहां पर भी ' सोतो: ' का ' सविता ' पढ़के समान अर्थ इष्ट नहीं, किन्तु ' सोमाभिषवं कर्तुम् ' यही अर्थ इष्ट है । तब यह वैकल्पिक इट्वाली ' षूङ् ' धातुका वैकल्पिक प्रयोग नहीं है, किन्तु अनिट् पु

( सुनोति ) धातुका ही रूप है, जिसका ' सविता ' से कोई सम्बन्ध 175नहीं । इसके अतिरिक्त ' सोतो; ' यहां पर ' सविता ' की तरह ' तृच् ' नहीं किन्तु ' तोसुन् ' प्रत्यय है ।

इस प्रकार पूर्वपक्ष तथा उत्तरपक्ष दोनों ही वेदको इष्ट नहीं दीख पड़ते । अर्थात् ‘ सबिता ' में न तो ' पु प्रसवैश्वर्ययोः ' ( भ्वा.प.अ. ) यह ‘ सवति'का प्रयोग है, और न ही ' षु प्रसवैश्वर्ययोः ' ( अदा. प. अनि. ) इस ' सौति ' धातुका प्रयोग है और न ही ' पूङ् प्राणिगर्भ- विमोचने ' ( अदा ० आ ० वे ० ) इस ' सूयति ' का प्रयोग है, और न ही ' पुत्र अभिषवे ' ( स्वा ० उ ० अनि ० ) इस ' सुनोति ' का ही रूप इष्ट है । उत्पादनार्थक धातु तथा परमात्मा अर्थ ' सविता ' में मानने पर कुछ विरोध भी आता है; क्योंकि –जगत्का उत्पादक उनके मतमें परमात्मा नहीं, किन्तु प्रकृति मानी जाती है; तब वह धातु भी परमात्मार्थमें कैसे हो सकती है, यदि ' सविता ' का अर्थ ' परमात्मा ' माना जाय । और एक प्रवल युक्ति यह है कि सविता में उक्त धातुएँ नहीं हैं 1

। जहाँ भी ' सविता ' शब्द आता है, उस मन्त्रमें कहीं भी सवति, सूति, सौति, सूयति, सुनोति धातुओंकी क्रिया भी नहीं दीखती; तब ' सविता ' शब्दमें उन धातुओं के अर्थ भी कैसे इष्ट हो सकते हैं?

वस्तुतः ‘ सविता ' पदमें वेदको ' षू प्रेरणे ' ( तु ० प ० से ० ) यह तौदादिक धातु ही इष्ट है; वह ' अनिट् ' भी नहीं है, ' वेट् ' भी नहीं है, किन्तु ' सेट ' है । ' सुवति - प्रेरयति कर्मणि लोकम् ' यह ' सविता ' की व्युत्पत्ति है । यही धातु तथा यही अर्थ ' सविता ' में वेदको इष्ट है, उत्पादन आदि अर्थ नहीं । इसमें वेदमन्त्रों की साक्षी भी द्रष्टव्य 176है । ' देव! सवितः प्रसुव ' ( यजुः वा ० सं ० ६१ ) इस मन्त्रमें ' सविता ' को सम्बोधित किया गया है । यहां पर तुदादिगणकी ' षू प्रेरणे ' धातु ही क्रिया में प्रयुक्त की गई है । तुदादिसें ' श ' विकरण होनेसे अपित् - सार्वधातुकता के कारण ङित्संज्ञा मानी जाती है । तव गुणनिषेध होनेसे उवङ् हो जाता है ।

इसी प्रकार ' सविता नः सुवतु सर्वतातिम् ' ( ऋ ० १०/३६/१४ ) यहां भी ' सुवति'का प्रयोग किया गया है, सवति, सौति, सूति, सूति तथा सुनोति धातुका प्रयोग नहीं किया गया । इसी तरह ' सुधाति सविता ' ( ऋ ० ५८२२३-६ ) ' सवितर्वरेण्यं भागमा सुव ' ( ऋ ० १०।३५।७ ) सविता तु वो देवः... सुवतु ' ( ऋ ० १०।१७५।४ ) ' देवेषु च सवितर्मानुषेषु च त्वं नो अत्र सुवताद, अनागसः, ( ऋ ० ४ । ५४।३ ) ' सविता धर्मं साविपत् ' ( यजुः ६५ ) [ यहां अपने अष्टाध्यायी भाष्य में स्वा ० दयानन्दजीने लिखा है- ' अत्र साविषत् ' इति ' षू प्रेरणे ' इत्यस्य प्रयोगः ( ३ | १ | ३४ ) ] इन मन्त्रों में भी पाठक स्वयं देखें । इस प्रकार ऋ ० ३।५६ ६, ४ | ५४१२, ५८२ | ४-५, ६।७१।६, ३।५४ | ११, ७१३८/२ इत्यादि मन्त्रों में भी देखा जा सकता है ।

सविताका प्रसिद्ध एक मन्त्र भी देखना चाहिये । ' विश्वानि देव! सवितर्! दुरितानि परासुव । यद् भद्रं तन्न आसुव ' ( यजुः ३०।३ ) यहां पर भी विधि - निषेधमें सविताके लिये तुदादिगणी ' षू प्रेरणे ' धातुका ही प्रयोग किया गया है । केवल वही धातु क्यों; अपितु वेद में ' सविता ' में अर्थ भी ' पू प्रेरणे ' धातुका ही इष्ट है । इस विषय 177में प्रकृत सावित्र मन्त्रमें ही दृष्टि डालनी चाहिये । ' तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ' यहां पर क्रियामें यद्यपि ' सुवति ' धातुका तो प्रयोग नहीं किया गया; तथापि उसका प्रेरणा अर्थं ' प्रचोदयात् ' इस ' चुद संचोदने ' धातुसे ही प्रकाशित किया गया है । इस प्रकार ' सविता ' की ' सूते, सौति, सवति, सूयते, सुनोति, ये व्युत्पत्तियाँ वेद से विरुद्ध सिद्ध हुई ' ।

तब ' सुवति कर्मणि लोकम् ' इस व्युत्पत्तिके ही बचनेसे और वेदसम्मत होने से युक्तता सिद्ध हुई । तब इस व्युत्पत्तिसे सूर्यदेव का ग्रहण स्वतः सिद्ध हुआ; क्योंकि वह उदय होता हुआ ही लोगोंको कर्ममें प्रेरित करता है । इसी कारण यजुर्वेद ( शतपथ- ब्राह्मण ) में कहा है- ' असौ वै यादित्यो देवः सविता ' ( ६।३।१।२० ) । अतः ' सविता ' के पर्यायवाचक ' सूर्य ' शब्द में भी यह धातु मानी गई है । जैसे कि - ' राजसूयसूर्य ' ( पा ० ३।१।११४ ) इस सूत्र में ' सूर्य ' शब्दके व्युत्पादनके अवसर में ' सिद्धान्तकौमुदी ' के कृत्यप्रकरण में कहा है- ' सरति आकाशे सूर्यः । यद्वा - पू प्रेरणे तुदादिः, क्यपो रुट् । सुवति कर्मणि लोकं प्रेरयतीति सूर्यः ' ।

वादिप्रतिवादिमान्य निरुक्तकार श्रीयास्कने भी ' सूर्य'की यही निरुक्ति की है- ' सूर्य: सर्तेर्वा सुवतेर्वा । ' ( १२।१४।२ ) । इसीलिए वेदमें भी ' सूर्य! अप सुव ' ( ऋ ० १०३७१४ ) इस मन्त्रमें सूर्यके सम्बोधनमें ' सुवति ' धातुका प्रयोग किया गया है । इसी प्रकार स्वा ० दयानन्दजीने भी ‘ आख्यातिक ' कृत्यप्रक्रियामें ६८४ सूत्रकी व्याख्यामें कहा है- ' सरति आकाशमार्गेण गच्छति, वा ' सुवति लोकं 178कर्मणि प्रेरयतीति सूर्यः ' यहां ' सृ गतौ वा पू प्रेरणे धातुसे क्यप प्रत्यय रुडागम निपातन है ' ( पृ ० २६६ ) । इस प्रकार सविता तथा सूर्य पर्यायवाचक होनेसे सविता सूर्यार्थक हुआ ।

इसमें मन्त्रभागकी साक्षी भी द्रष्टव्य है । ' सूर्यां यत् पत्ये शं- सन्तीं मनसा सविताऽददात् ' ( ऋ ० १०१८ ९ ) इस मन्त्र में ' सूर्या ' को सविताकी लड़की बताया गया है । ' युवो ( अश्विनोः ) रथं दुहिता सूर्यस्य ' ( ऋ ० १।११७ । १३ ) यहाँ ' सूर्यकी लड़की ' ( सूर्या ) का अश्विनों के रथमें चढ़ना कहा है । यहां ' सूर्यकी लड़की ' शब्द कहा गया है; अन्य इसी अर्थको बतानेवाले मन्त्र में ' सूर्या ' का नाम स्पष्ट है । जैसे कि - ' ता वां ( अश्विनोः ) रथं वयमद्या हुवेम अश्विनौ! ' ' यः सूर्यां वहति ' ( अथर्व ० २०।१४३ । १ ) यहां पर सूर्याको अश्विनों के रथ पर चढ़ा हुआ बताया गया है । पूर्वं कहें मन्त्र में सूर्याका अपने पिता सविता द्वारा पतिको देना कहा गया है । इससे सविता और सूर्यकी पर्यायवाचकता सिद्ध हो जानेसे ' सविता ' का ' सूर्य ' अर्थ हुआ । इसलिए उपनयन - समय में ' देव! सवितः । एष ते ब्रह्मचारी ' ऐ सविता! यह तेरा ब्रह्मचारी है, यह कहकर उसे सूर्यके सामने ठहराया जाता है । इस पर स्वामी दयानन्दजीकी ' संस्कार - विधि ' का ८४ वाँ पृष्ठ भी देखा जा सकता है । इससे ' सविता ' सूर्यवाची है - यह अत्यन्त स्फुट हो गया ।

सूर्यके ही ब्रह्मचारी होने से उसे सावित्र ( सविताके, सूर्यके ' तत्सवितुर्वरेण्यं ) मन्त्रकी दीक्षा देना ठीक भी है । तब सविता सूर्य - वाचक ही सिद्ध हो गया । इसीलिए उपनयन तथा सन्ध्यामें 179भी ' तच्चतुर्देवहितं ' इत्यादि सूर्य देवतावाले चार मन्त्रोंसे जहां सूर्यका उपस्थान होता है, वहां जपन भी ' तत्सवितु: ' इसी सूर्यके मन्त्रका ही होता है । इस प्रकार सावित्र मन्त्र में ' योऽसौ आदित्ये पुरुषः सोऽसावहम् ' ( यजु ० वा ० सं ० ४८।१७ ) एतन्मन्त्रोक्त सूर्य- मण्डलाभिमानी देवता ही उपासनाका विषय सिद्ध हुआ । उक्त सावित्र - मन्त्रमें अपनी बुद्धिकी प्रेरणा प्रार्थित की गई है । सविताका परमात्मा अर्थ मानने पर तो आत्माका कर्ममें परतन्त्रता पक्ष भी मानना पड़ जायगा ।

सूर्यकी उपासनाके विषयमें १।१।२० ' ब्रह्मसूत्र ' के सूत्रके शाङ्कर- भाष्य में भी कहा है- ' य एषोन्तरादित्ये '. इति श्रूयमाणः पुरुषः परमेश्वर एव, न संसारी । यदपि आधारश्रवरणान्न परमेश्वर इति? अत्रोच्यते - स्वमहिमप्रतिष्ठस्यापि आधारविशेषोपदेश उपासनार्थो भविष्यति । सर्वगतत्वाद् ब्रह्मणो व्योमवत् सर्वान्त- रत्वोपपत्तेः ' । इसलिए सूर्यमण्डलाभिमानी देव ही सन्ध्यामें उपास्य सिद्ध हुआ । तभी प्रातः सन्ध्या में मुखको पूर्वाभिमुख करना पड़ता है और सायंकालमें पश्चिमाभिमुख; क्योंकि सूर्य उस अवसर में उस - उस दिशामें होता है । इसीलिए ' सत्यार्थप्रकाश के चतुर्थ समुल्लास ५६ पृष्ठमें उद्धृत हुए सामवेदके ' षड्विंश - ब्राह्मण ' के वचनमें कहा है — ' तस्माद् अहोरात्रस्य संयोगे ब्राह्मणः सन्ध्या- मुपासीत उद्यन्तमस्तं यान्तमादित्यमभिध्यायन् ' ( ४ | ५ ) यहां पर उदय और अस्त होते हुए सूर्यके ध्यानको ही ' सन्ध्या ' कहा गया है । .

इसीलिए मन्त्रभागमें भी कहा है- ' उद्यते नमः, उदायते नमः, 180उदिताय नमः ' ( अथर्व ० शौ ० १७११।२२ ) ' अस्तं यते नमोऽस्तमेष्यते नमोऽस्तमिताय नमः ' ( ० १७११।२३ ) यहां पर उदय हो रहे हुए, उदय होनेवाले, और उदय हो चुके हुए तथा अस्त हो रहे हुए, अस्त होनेवाले, और अस्त हो चुके सूर्यको नमस्कार करना कहा है ।

इसी मूलको लेकर पुराण आदि - ' उत्तमा तारकोपेता, मध्यमा लुप्ततारका । अधमा सूर्यसहिता प्रातः सन्ध्या न्निधा मता ' ' उत्तमा सूर्यसहिता, मध्यमा लुप्तभास्करा । श्रधमा तारकोपेता सायं- सन्ध्या त्रिधा मता ' यहां दोनों सन्ध्याओंके तीन भेद कहे हैं । अथवा उक्त मन्त्रों में दोनों सन्ध्याओं की अवधि हो । तभी मनुजीने कहा है -

– ' पूर्वी सन्ध्यां जपँस्तिष्ठेत् सावित्रीमार्कदर्शनात् । पश्चिमां तु समासीनः सम्यग् ऋक्षविभावनात् ' ( २।१०१ ) । ‘ प्रातः - सन्ध्या सूर्यदर्शन तक करे, सायं सन्ध्या तारोंके दीखने तक करे ' । यह प्रसक्तानुप्रसक्त कहा गया है; अब प्रकरण पर आना चाहिये ।

सावित्र - मन्त्रकी मुख्यताका कारण अदृष्टमें तो जो भी हो; क्योंकि यह वेदका सार रूप है; पर दृष्टमें भी यह मुख्य है । इसकी मुख्यता वा इसकी महत्ताका कारण यह है कि इस मन्त्रमें बुद्धिकी प्रार्थना है । सूर्य से बुद्धिकी प्रार्थना इस कारण है कि वह बुद्धिका अधिष्ठाता देव है । इसी बुद्धिके दाता होने से ही सूर्योदयके समय चोरोंकी चौर्य - प्रवृत्ति तथा जारोंकी जास्ता प्रवृत्ति हट जाती है । सूर्यसे ही वैज्ञानिकोंने ऐसी सूई तैयार की है जिसके इन्जैक्शनसे कुलटा स्त्रियोंमें सद्बुद्धि उदय हो आती है । सूर्योदयसे

181गायत्री मन्त्रकी महत्ता १८१,

साधारण पुरुषोंका भय हट जाता है, उसके उदयसे बुद्धिकी शुद्धि और कर्मों की प्रेरणा से बुद्धिकी वृद्धि प्रत्यक्ष है ।

बुद्धिकी प्रार्थना से ही ' वृद्धकुमारी - वर ' तथा ' वृद्धान्धब्राह्मणवर ’ इन न्यायोंसे सब कुछ माँग लिया जाता है; इस कारण गायत्री - मन्त्र बुद्धिदाता होने से सभी कुछ देनेवाला है; अतः उसकी महत्ता स्पष्ट है । एक वृद्धा कुमारीने पति, पुत्र, धान्य, गाय आदि चाहते हुए भारी तपस्या की । देवने साक्षात् होकर उसे एक वर माँगनेको कहा; तो उसने वर माँगा - ' मैं अपने पुत्रको बहुत घी - दूध मिला भात सोनेके पात्रों में खाता हुआ देखना चाहती हूँ ' । इस प्रकार उसने एक ही वरसे ' यौवन, पति, पुत्र, सोना, धान्य, गाय ' आदि माँग लिये । इसी प्रकार एक जन्मान्ध, निर्धन, अविवाहित ब्राह्मण की भी कथा है । देवताके मुखसे एक वरकी प्राप्ति जानकर उसने उससे वर माँगा - ' मैं अपने पोतेको राजसिंहासन पर बैठा देखना चाहता हूँ ' । इस प्रकार उसने एक वरसे अपनी आंखें, धन, यौवन, विवाह, स्त्री, पुत्र - पौत्र आदि सन्तान माँग ली ।

यही बात है बुद्धिकी प्रार्थनाकी । हमारे जो काम सिद्ध नहीं होते, वा उल्टे पड़ जाते हैं; उसका मुख्य कारण है बुद्धिको विपरीतता । इस कारण प्रसिद्ध है कि- ' विनाशकाले विपरीत- बुद्धि: ' । ' महाभारत ' में भी देवताओंकेलिए कहा है- न ' देवा दण्डमादाय रक्षन्ति पशुपालवत् । यं तु रक्षितुमिच्छन्ति बुद्ध्या संविभजन्ति तम् । यस्मै देवाः प्रयच्छन्ति पुरुषाय पराभवम् । बुद्धिं तस्यापकर्षन्ति सोऽवाचीनानि पश्यति ' ( उद्योगपर्व ३४ / ८०-८१ ) ।

182' देवता पशुपालकी तरह डण्डा लेकर पुरुषकी रक्षा नहीं करते । वे जिसकी रक्षा करना चाहते हैं उसे बुद्धि दे देते हैं । जिसको गिराना चाहते हैं; उसकी बुद्धि वे छीन लेते हैं । बुद्धिकी विपरीतता होने पर ही तो पाप होते हैं । इससे बुद्धिकी महत्ता सिद्ध हुई । इसलिए ' साङ्ख्यदर्शन ' में २।१३ सूत्रके विज्ञानभिक्षुभाष्य में कहा है— ' अस्याश्च वुद्धेर्महत्त्वं स्वेतर -सकलकार्यव्यापकत्वाद् महैश्वर्याच्च मन्तव्यम् ' | ' यह बुद्धि अपने से भिन्न सभी कार्यों में रहती है; और इसमें बहुत सामर्थ्य है ' । इस कारण इसका बहुत महत्त्व है । तभी न्यायकी पुस्तक तर्कसंग्रह में कहा है - ' सर्वव्यवहारहेतुर्गुणो बुद्धि- र्ज्ञानम् ' अर्थात् बुद्धि सब व्यवहारोंका कारण है । इसीलिए ' महाभारत'के उद्योगपर्वमें कहा है- ' येन त्वेतानि सर्वाणि संग्रही- तानि भारत! यद् बलानां वलं श्रेष्ठं तत् प्रज्ञाबलमुच्यते ' ( ३७१५५ ) अर्थात् बुद्धिवल सव बलोंसे श्रेष्ठ है । एक हाथीपर एक बालक चढ़ा हुआ अंकुशके द्वारा उसे अपनी इच्छा के अनुसार जहाँ - तहाँ चला रहा था । हाथीके गलेमें बंधा हुआ घण्टा बज रहा था । उस पर एक कविने यह उत्प्रेक्षा की कि यह घण्टानाद नहीं है किन्तु हाथीके मुख से यह शब्द निकल रहे हैं कि- ' मतिरेव बलाद् · गरीयसी, यद्ऽभावे करिणामियं दशा ' | ' इयं दशा ' का यह अर्थ है कि — एक बुद्धिमान् बालक भी बलवान्को अपनी इच्छानुसार जहाँ - तहाँ चलाता है ।

इस प्रकार जब सब व्यवहारोंके मूल होनेसे बुद्धिकी महत्ता सिद्ध हुई, और बुद्धिका सम्बन्ध सविताके साथ है; तब बुद्धि- 183प्रार्थक सावित्र - मन्त्रकी महत्ता तो स्वतः सिद्ध हुई । इसीलिए ही इस गायत्री मन्त्रका फल वेद - मन्त्र में भी स्वयं कहा है- ' स्तुता मया वरदा वेदमाता ( गायत्री ) प्रचोदयन्तां पावमानी द्विजानाम् । आयुः, प्राणं, प्रजां, पशुं, कीर्ति, द्रविणं, ब्रह्मवर्चसं मह्य ं

दत्त्वा व्रजत ब्रह्म- लोकम् ' ( अथर्व ० १६।७१।१ ) यहाँ पर वेदमाता गायत्रीका ही आयु, सन्तान, यश, धन, ब्रह्मतेज आदि फल कहा है । इसी गायत्री की महत्ता होनेसे ही उसे आदरार्थ ' प्रचोदयन्ताम्, व्रजत ' यहाँ बहुवचन दिया गया है । ' न तिष्ठति तु यः पूर्वं नोपास्ते यच पश्चिमाम् । स शूद्रवद् ' ( मनु ० २।१०३ ) यहाँ पर सन्ध्या न करने वालेको शुद्रवत् कहा गया है । यहाँ पर भी यही रहस्य है । सन्ध्याका सर्वस्व है सावित्री ( गायत्री ), और सावित्रीमें है बुद्धि- प्रार्थना । जो द्विज सन्ध्योपासन न करेगा, वह गायत्री - रहित होने से बुद्धिके अभाववश शूद्रसदृश ही रहेगा । इस वादिप्रतिवादिमान्य मनु - वचनसे शूद्रोंका द्विजकर्म - वेदात्मक सन्ध्या में अनधिकार भी सिद्ध होगया ।

इसी प्रकार ' मनुस्मृति ' के ' अकारं चाप्युकारं च मकारं च प्रजापतिः । वेदत्रयाद् निरदुहृद् भूर्भुवः स्वरितीति च ' ( २२७६ ) त्रिभ्य एव तु वेदेभ्यः पादं पादमदूदुहत् ' ( २२७७ ) एतदक्षरमेतां च जपन् व्याइतिपूर्विकाम् । सन्ध्ययोर्वेदविद् विप्रो वेदपुण्येन युज्यते ' ( २७८ ) इस पद्यके अनुसार वेदका भी सर्वस्व गायत्री है; तभी उपनयन होजाने पर वेदारम्भ संस्कार में वेदकी सारस्वरूपा गायत्री को ही उपनयनके दिन पढ़ाकर आचार्य ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्योंको 184एकजसे उसी दिन द्विज करता है । तभी वेदाध्ययन न होनेसे गायत्री से रहित होनेके ही कारण श्रीमनुजीने ' योऽनधीत्य द्विजो वेदमन्यन्न कुरुते श्रमम् । स जीवन्नेव शूद्रत्वमाशु गच्छति सान्वयः ' ( २।१६८ ) इस प्रकार वेदके अनध्ययन में द्विजको भी शूद्र - सदृश कहा है । इस वादिप्रतिवादिमान्य मनु - वचनसे भी शूद्रको वेदाध्ययनका अनधिकार सिद्ध होरहा है । इसी कारण उसी वेदका अधिकारपट्ट यज्ञोपवीतसूत्र भी शूद्रोंका नहीं होता । बुद्धिका कार्य भी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्योंका होता है, शूद्रोंका नहीं । तभी स्वा ० दयानन्दजीने भी उपनयनमें आद्य तीन वर्णोंको ही अपनी ‘ संस्कारविधि'में अधिकृत किया है । फलतः वुद्धिप्रकाशक होनेसे ही सूर्य ' सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ' ( यजुः वा ० सं ० ७१४२ ) इस प्रकार जगत्का आत्मा माना गया है । बुद्धिका उदय होता है कर्मों में प्रेरणा से । तव ' सूर्य ' के पर्यायवाचक ' सविता ' में भी ' षू प्रेरणे ' इस प्रकार ' सुवति ' धातु ही है । यही वेदवाणीका अभिप्राय है ।

यद्यपि बुद्धि की प्रार्थना लौकिक लोकों से भी हो सकती है; तथापि वेदके नियत आनुपूर्वी वाले तथा नियतपद्मयोगपरिपाटी वाले होनेसे उसमें अनन्यसदृश अपूर्वता हुआ करती है, जिससे उसके द्वारा फलातिशय हुआ करता है, जैसे कि ' निरुक्त ' में श्रीयास्कमुनिने कहा है — ‘ पुरुषविद्याऽनित्यत्वात् कर्म -सम्पत्तिर्मन्त्रो वेदें ' ( १।२।७ ) । इसी कारण मन्त्रके पदोंको अन्यथा करने पर वह मन्त्र न रह जाने से उसमें वह शक्ति भी नहीं रहती । तब शक्ति न होने पर वह 185फल ही कैसे हो? '

इस प्रकार गायत्री मन्त्रकी महत्ता सिद्ध हुई । इसी कारण ' बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि ' ( गीता ७११० ) ' गायत्री छन्दसामहम् ' ( १८।३५ ) भगवद्गीता में वैष्णव आदि सबके मान्य भगवान् श्रीकृष्णने गायत्रीको अपनी विभूति कहा है । ' छान्दोग्योपनिषद् ' ( ३।१२ ) में गायत्रीको परब्रह्मस्वरूपा कहा है । ' गायत्री छन्दसां माता ' ( नारा- यणोपनिषद् ३४ ) यहाँ पर उसे वेदकी माता कहा है । तब गायत्री मन्त्रको गौण कहते हुए कई साम्प्रदायिक निरस्त होगये । तभी तो यदि मृतक कर्ममें जप कराया जाता है; तव भी गायत्री का । यदि शुभ कर्ममें जप कराया जाता है, तब भी गायत्रीका । चिरायुष्मत्ताकेलिए भी गायत्री मन्त्रका जपन कराया जाता है । इससे वहां पर उस रोगीकी, उसके स्वजनोंकी, उसके वैद्यकी बुद्धि- वृद्धि होनेसे स्वयं ही चिरायुष्य जनक कार्योंकी प्रेरणा होगी और रोगीको स्वास्थ्य - लाभ एवं शुभ प्राप्त होगा । इसी कारण कहा है- ' गायत्री वा इदं सर्वम् ' ( छान्दोग्योपनिषद् ३।१२ ( १ ) श्रीमनुजीने भी कहा है । ' सावित्र्यास्तु परं नास्ति ' ( २२८३ ) । इस प्रकार बुद्धि- प्रार्थक होनेसे गायत्री - मन्त्रकी महत्ता सिद्ध हुई । इसके जपसे

* यद्यपि जप

' जल्प व्यक्तायां वाचि ' इस प्रकार व्यक्त वाणीका नाम जप कहना चाहिये; तथापि ' जप मानसे च ' मानसिक भी जपन हुआ करता है । मानसका फल भी अधिक होता है । जैसे कि - ' विधियज्ञाज्जप- यज्ञो विशिष्टो दशभिर्गुणैः । उपांशु स्यात् शतगुणः साहस्रो मानसः स्मृतः ' ( २२८५ ) ।

186ग्रह - बाधा भी दूर हो जाती है । जैसेकि - महाभारत में कहा है— ' प्रजपन् पावनीं देवीं गायत्रीं वेदमातरम् । ये चास्य दारुणाः केचिद् ग्रहाः सूर्यादयो दिवि । ते चास्य सौम्या जायन्ते शिवाः शिवतराः सदा ' ( ३।२००१८३-८५ ) ।

इसलिए द्विजोंको सदा ही इस मन्त्रका जपन करना चाहिये, जैसे कि मनुजीने कहा है – ' साविन्नीं च जपेन्नित्यम् ' ( ११।२२५ ) इसी से उनके सब मनोरथ पूर्ण होंगे । ' स्तुता मया वरदा वेदमाता ( गायत्री ) प्रचोदयन्तां पावमानी द्विजानाम् ' ( अथर्व ० १६ | ७११ ) इस वेद- वाणीसे गायत्रीमें द्विजोंका ही अधिकार है । द्विजके यहाँ दो अर्थ हैं, एक तो ' ब्राह्मण ' दूसरा ' ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य ' । अर्थात् गायत्री में ब्राह्मणका अधिकार है - यह एकपक्ष है । गायत्री में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तीनोंका अधिकार है - यह दूसरा पक्ष है । केवल ब्राह्मण इसका अधिकारी है - इसमें प्रमाण है गायत्रीका विसर्जन मन्त्र — ' उत्तमे शिखरे देवि! भूम्यां पर्वतमूर्धनि । ब्राह्मणे- भ्योभ्यनुज्ञाता गच्छ देवि! यथासुखम् ' ( कृष्णयजुर्वेद - तैत्तिरीयारण्यक १०।३० ) यहाँ पर गायत्रीको ब्राह्मणों के लिए अनुज्ञात किया गया है । ' ब्राह्मणेभ्यः ' यह चतुर्थी है । इसीलिए पारस्कर आदि गृह्यसूत्रोंमें उपनयनसंस्कारमें ' गायत्रीं ब्राह्मणाय अनुब्रूयात्, त्रिष्टुभं राजन्यस्य, जगतीं वैश्यस्य ' ( पारस्करगृ ० २।३।७ ८-६ मानवगृ ० १ २ ३ ऐतरेय- ब्रा ० ११५२८ ) इस प्रकार ब्राह्मणको गायत्रीका उपदेश देना कहा है, क्षत्रियको त्रिष्टुप् तथा वैश्यको जगती छन्दके उपदेशार्थ कहा है । यह ठीक भी है । गायत्रीके आठ अक्षरोंवाली होने से ही 187गायत्रीका उपदेश लेनेवाले ब्राह्मरणका उपनयन भी आठवें वर्ष में अभ्यनुज्ञात किया गया है; अन्तिम उपनयनकी अवधि पूर्व से द्विगुण सोलह वर्षकी रखी गई है । क्षत्रिय के उपनयन के समय त्रिष्टुपूका उपदेश होने से और त्रिष्टुप्के ग्यारह अक्षर वाला होने से क्षत्रिय का उपनयन भी ग्यारहवें वर्ष में आदिष्ट किया है, अन्तिम अवधि पूर्वसे द्विगुण बाइस वर्षकी रखी गई है । जगतीके बारह अक्षर वाली होनेसे उपनयन - समय में उस ( जगती ) के ग्रहण करनेवाले वैश्यका उपनयन भी वारह वर्ष में माना है, अन्तिम अवधि पूर्व से दुगुने चौबीस वर्ष में मानी गई है । इसमें मेधातिथिने भी श्रुति उद्धृत की है - सावित्र्या ब्राह्मणमुपनयीत, त्रिष्टुभा राजन्यम्, जगत्या वैश्यम् ' ।

इसी प्रकार गायत्रीके ' आयातु वरदा देवी अक्षरं ब्रह्मसंम्मतम् । गायत्री छन्दसां मातः! ' ( बोधायन गृह्यशेषसूत्र ३२६ | १ ) इस गायत्री के आह्वान- मन्त्रमें भी उसे ' ब्रह्म - सम्मत ' माना है । ब्रह्म ब्राह्मणको कहते हैं । जैसे कि - ' ब्रह्म हि ब्राह्मण: ' ( शत ० ५ । १ । १ । ११ ) ब्राह्मण- भोजनमें ' ब्रह्म - भोज ' शब्द प्रसिद्ध है । अथर्व के ' स्तुता मया वरदा वेदमाता ' ं ‘ द्विजानाम् । ’ · ‘ ब्रह्मवर्चसं मह्यं दत्त्वा व्रजत ब्रह्मलोकम् ' ( १६७१।१ ) इस गायत्री - विसर्जन के मन्त्र में जहां ' द्विज ' शब्द आया है, वहां अन्तमें ' ब्रह्मवर्चस ' की प्रार्थना भी आई है । ब्रह्मवर्चसकी प्रार्थना वेदमें ब्राह्मणके लिए आई है - ' ब्रह्मन्! ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम् ' ( यजु ० वा ० सं ० २२/२२ )

इस प्रकार गायत्री में ब्राह्मणका मुख्य अधिकार सिद्ध हुआ । 188इसी प्रकार ' सहस्रकृत्वस्त्वभ्यस्य बहिरेतत् त्रिकं द्विज: ' ( २७ ९ ) इस मनुपद्य में भी ' द्विज ' से ब्राह्मण ही इष्ट है । ' वेदमाता ( गायत्री ) द्विजानाम् ' ( अ ० ११।७१।१ ) यहां पर दूसरा पक्ष ' द्विज'का ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य यह अर्थ स्वीकार करने पर तो ' ब्राह्मणेभ्योभ्यनुज्ञाता ' इस गायत्रीविसर्जनात्मक मन्त्र में ' ब्राह्मण ' यह शब्द ' प्रधानेन हि व्यपदेशा भवन्ति ' इस न्याय से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्योंका उपलक्षक है । तभी पारस्कर आदि गृह्यसूत्रों में ' सर्वेषां वा गायत्रीमनुब्रूयात् ' ( २ । ३ । १० ) यह पक्ष भी आया है । पूर्वोक्त वेदमाता के मन्त्रमें ' ब्रह्मवर्चस ' शब्द क्षत्रियादिके ' हस्तिवर्चस ' आदिका भी उपलक्षक है, इस पक्षमें ' ब्रह्मसम्मतम् ' में ' वेदसम्मतम् ' अथवा ' ब्रह्मदेवस्य सम्मतम् ' यह अर्थ है । इस प्रकार ' ब्रह्म गायत्री ' शब्द में भी जान लेना चाहिये । अस्तु ।

बुद्धिमन्त्र गायत्रीमें उपास्यदेव सूर्य है । उसकी वेदने ' सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ' ( यजुः वा ० सं ० ७१४२ ) इस प्रकार स्तुति की है । सूर्य - व्यायाम से सर्वविध स्वास्थ्य भी प्रत्यक्ष है । शारीरिक स्वास्थ्य होनेपर मानसिक स्वास्थ्य प्रत्यात्म - वेदनीय है । तब ' स्वस्थे चित्ते बुद्धयः संस्फुरन्ति ' चित्तस्वास्थ्य में बुद्धिविकास सुस्पष्ट है । इस प्रकार सूर्यसेवन आध्यात्मिक दृष्टिसे तथा आधिभौतिक एवम् आधि- दैविक दृष्टिसे भी लाभप्रद सिद्ध है । तभी हमारे पूर्वजोंने सन्ध्यावन्दन भी सूर्यके समक्ष ही करना नियमित किया था । यही बात शास्त्रोंसे जानकर पाश्चात्य - विपश्चिद्गरणने सूर्य द्वारा बहुत रोगों की चिकित्सा में साफल्य प्राप्त कर लिया । रोगका कारण 189होता है बुद्धिकी न्यूनता हो जाने पर मस्तिष्क तथा मनमें निर्बलता हो जानेसे बाह्य आहार - विहार - वैषम्यमूलक अपरिपाकः और उससे भीतरी अन्तड़ियों में त्रुटि हो जानेसे रोग हो जाया करते हैं । इस प्रकार सभी दृष्टियोंसे सविता तथा सावित्रीकी महत्ता सिद्ध हुई । आजकलके वैज्ञानिक जो कार्य यन्त्र आदिसे कर लेते हैं; उसे हमारे पूर्वज तपः - शक्ति से पूर्ण कर लिया करते थे । उसी तपस्यामें गायत्रीका जप भी अन्तर्भूत हो जाता है । उसके लिये श्रीमनुने ठीक कहा है-

' सहस्रकृत्वस्त्वभ्यस्य बहिरेतत् त्रिकं द्विजः । महतोयेनसो मासात् त्वचेवाहिर्विमुच्यते ' ( २२७ ९ ) ' त्र्यक्षर ' ओम् ' ( अ, उ, म् ) तीन व्याहृति, त्रिपदा गायत्री इसके सहस्रवार ग्रामसे बाहर नदी तट वा वनमें हजार - चार एक मास जपनेसे द्विज महापापसे भी छूट जाता है । ' उसका कायाकल्प हो जाता है, वह नये क्रिया- शील जीवन में प्रवेश करता है । इसलिए इसे ' तारक- मन्त्र ' कहते हैं । ' इससे बढ़कर इसकी अन्य क्या महत्ता हो? अधिक कहना व्यर्थ विस्तार है । अतः हम यहीं समाप्त करते हैं । तथापि उसके माहात्म्यको देखनेके इच्छुक निम्नाङ्कित प्रमाणों. को देखें- मनुस्मृति ( २२७७-७८-७९ - ८०-८१-८२-८३ ) । बृहद्- विष्णुस्मृति ) ( ५५।१५ ) हारीतस्मृति ( ४।४०, ४७-४८ ) याज्ञवल्क्य- स्मृति ( ४ / २ / २२-२३ ) शङ्खस्मृति ( ११।१-२, १२।१, ३, ८, १४-१५- १६-१७-१८-२०-२३-२४-२५-२६-२६-३०-३१ ) । महाभारत ( भीष्मपर्व ( ४ | १८, अनुशासनपर्व १५०।१-४ ) देवीभागवत ( ११ / ३६।१५, 190१२ / ८ / २ ९ ) इत्यादि ।

यद्यपि बुद्धिके मन्त्र लौकिक भी हो सकते हैं; तथापि वेदमें नियत आनुपूर्वी होनेसे, नियतपदप्रयोग - परिपाटीकत्व होनेसे उसके मन्त्रकी विशिष्टता भी स्वतः- सिद्ध है । वेदमें भी जब गायत्रीको सर्वस्व माना गया है; तथा उसे वेदमाता कहा गया है- — तब उसकी अन्य भी महत्ता तथा विशिष्टता सिद्ध होगई, यह ' श्रीसनातनधर्मालोक ' के विद्वान् पाठकोंने भली भांति समझ लिया होगा ।

प्रासङ्गिक होनेसे यहां क्षत्रिय वैश्य की सावित्रीके मन्त्र भी उधृत कर दिये जाते हैं-

वाराहगृह्यसूत्रके उपनयन - प्रकरण पंचम खण्ड में यह मन्त्र लिखे हैं - ' तत्सवितुर्वरेण्यम् इति गायत्रीं ब्राह्मणाय, या देवो याति सविता सुरत्नः ' ( ऋ ० सं ० ७१४५ १ ) इति त्रिष्टुभं क्षत्रियाय, ' युञ्जते मन उत युञ्जते धियो ' ( ऋ ० सं ० १११ ) इति जगतीं वैश्याय ' वसिष्ठ धर्मसूत्र ( ४३ ) में भी इसी प्रकार कहा है । अन्यत्र यह मन्त्र आये हैं— ' तार्थसवितुर्वरेण्यस्य चित्रामाहं वृणे सुमतिम् ' ( यजु ० १७१७४ ) यह त्रिष्टुप् -सावित्री क्षत्रियके लिए, तथा ' विश्वा- रूपाणि प्रतिमुञ्चते कविः प्रासावीद् भद्रं... सविता वरेण्यः ' ( यजु ० १२।३ ) यह जगती - सावित्री वैश्यकेलिए है । इन मन्त्रोंका देवता भी सविता है; इनमें भी बुद्धिका सम्बन्ध है । अतः क्षत्रिय वैश्य इनको, इन अपने मन्त्रोंका उपयोग भी शास्त्रानुसार करना चाहिये । इनमें उन्हें अपने लिए अधिकृत होनेसे विशेष ही फल 191होगा । अस्तु । ब्राह्मणके लिए तो गायत्री - सावित्री ही आई है । उसकेलिए तो इतना कहा है कि अन्य यदि वह कुछ न कर सके तो सुयन्त्रित होकर सावित्रीको ही अपना ले ' सावित्रीमात्र- सारोपि वरं विप्रः सुयन्त्रितः । नायन्त्रितस्त्रिवेदोपि ( मनु ० २।११८ ) इससे उसका ब्राह्मणत्व अक्षुण्ण रहता है । सो इस प्रकारके गायत्री- मन्त्रकी यह महत्ता केवल शाब्दिक नहीं है; किन्तु सोपपत्तिक भी है - यह रहस्य ' आलोक ' पाठकोंने समझ लिया होगा ।

प्रेरणा — ' श्रीसनातनधर्मालोक ' दश सहस्र पृष्ठोंका है । इसके न्यूनसे न्यून पञ्चम पुष्प- इतने बीस पुष्प प्रकाशित हो सकते हैं । यदि संरक्षक तथा सहायक आदि निरन्तर तथा शीघ्र सहायता करते चलें; तो यह ग्रन्थमाला शीघ्र ही पूर्ण हो सकती है । धार्मिकों का इसके संरक्षक तथा सहायकों का जुटाना कर्त्तव्यमें आा पड़ता है । इस ग्रन्थमालाके पूर्ण हो जाने पर सनातनधर्म पर होनेवाली शङ्काएँ प्रायः समाप्त हो जायँगी । सहायकका १०० ) है, और संरक्षकका १००० ) । संरक्षकका चित्र भी छपता है और प्रत्येक प्रकाशनमें नाम भी । प्रेरकोंका नाम भी छपता है । प्राशा है - हिन्दु जनता अपनी शुद्ध कमाईका सदुपयोग इस ग्रन्थमाला में करेगी । जो यह न कर - करा सकें; वे इस ग्रन्थमालाके पुष्पोंको अन्योंकि द्वारा खरीदवाकर भी इसकी सहायता कर सकते हैं । गत चार पुष्पोंका मूल्य ७1 ), डाकञ्यय १ = ) ।

192( ६ ) कच्छबन्ध - रहस्य

शास्त्रोंमें ' शिरः प्रावृत्य कर्णं वा मुक्तकच्छशिखोपि वा । अकृत्वा पादयोः शौचम् आचान्तोऽप्यशुचिर्भवेत् ' इसमें श्राचमनसे शुद्धि बताई गई है पर सन्ध्यादि कर्मके आरम्भमें शिर वा कानको ढकना, कच्छ ( लांग ) वा शिखा खोले रखना, और पांवकी शुद्धि न करना, इनसे, आचमन किये हुए भी पुरुषकी अशुचिता वताई गई है । इनमें लांग खोले रखना भी अशुद्धियों में परिगणित किया गया है ।

सन्ध्या आदिमें सिरके ढकनेके निषेधका रहस्य यह है कि सन्ध्या - समय में परमात्माकी जो कृपा हमें प्राप्त होती है वह शिखाके द्वारा ही आती है । आशीर्वाद देनेवाला सिरमें शिखावाले स्थान पर हाथ रखके चरण छूनेवालेको आशीर्वाद देता है । शिखाके ढकने पर पुरुष उस कृपाके अंशसे वश्चित हो जाता है । इसके अतिरिक्त सन्ध्यामें पहले स्नान करना पड़ता है । स्नान कर लेने पर फिर सद्यः सन्ध्या करनी पड़ जाती है । स्नानके समय पोंछने पर भी शिरकी क्लिन्नता नहीं जाती । उसको सुखानेके लिए सिरका नंगा रखना आवश्यक हो जाता है; नहीं तो यदि उस समय शिरको पटके आदिसे वेष्टित कर दिया जावेगा; तो सिरकी गर्मी, इधर सिरका गीलापन, इधर सिर बन्द होनेसे मल बढ़ेगा, जिससे सिरमें विकार और जूँ आदि सिरमें हो जाएँगी । उस भयके दूरीकरणार्थ भी सन्ध्या आदिमें नंगा सिर रखना ठीक है ।

In English

The Gayatri Mantra and the Consciousness of All Things

This text explains the significance of the Gayatri mantra as the essence of the Vedas taught by a guru. It argues that all objects, including the sun and even inanimate matter like stones, possess consciousness because they are governed by divine entities. This Vedic view of universal consciousness is supported by discussions on the nature of deities and modern scientific observations of atomic particles.

This chapter answers

  • What is the meaning of the guru mantra?
  • Are natural objects like the sun conscious?
  • Why does the vedanta say all things are alive?
  • How does science relate to the concept of consciousness in matter?

Also written: Gayatrimantraki, Mahattaka, Rahasya, Gayatrimantraki Mahattaka Rahasya, गायत्रीमन्त्रकी महत्ताका रहस्य

मूल ग्रन्थ

यह पाठ सनातन धर्मालोक ५के मुद्रित पृष्ठ 163–192 से ज्यों-का-त्यों लिया गया है — न कुछ जोड़ा गया है, न घटाया। स्कैन किया हुआ मूल पृष्ठ देखनेके लिये —

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