पञ्चम सुमन · प्रकरण 3

यज्ञोपवीत - रहस्य

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119अपने कार्य में पटुता भी प्राप्त करता है । फिर उसे अग्निकी उपासना करनी पड़ती है, जिसके द्वारा वह शारीरिक शक्तिको पाता है । फिर गायत्री मन्त्रकी उपासना ( जप ) करनी पड़ती है, जिसके द्वारा वह बुद्धि - पवित्रतारूप आत्मिक बलको प्राप्त करता है ।

इसीका नाम यज्ञोपवीत - संस्कार वा आचार्यकरण अथवा व्रत- बन्ध वा उपनयन है । उपनयनसे पूर्व ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, ' एकज ' होते हैं; उपनयनसे वे ' द्विज ' होते हैं । अर्थात् उनका एक जन्म माताके गर्भ से होता है, दूसरा जन्म आचार्यके गर्भ से होता है । यही दूसरा जन्म महत्त्वपूर्ण होता है । तभी श्रीमनुजीने कहा है- ' आचार्यस्त्वस्य यां जातिं विधिवद् वेदपारगः । उत्पादयति सावित्र्या सा सत्या, साऽजराऽमरा ' ( २।१४८ ) अर्थात – आचार्य उपनयनके समय गायत्री - मन्त्रके उपदेशसे जिस जन्मका सम्पादन करता है; वह दृढ होता है ।

आचार्य - द्वारा गायत्री प्रदानसे पूर्व ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एकज ' थे । फिर ' द्विर्बद्धं सुबद्धं भवति ' इस न्यायसे उपनयनके समय आचार्य उन्हीं तीन एकज ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्योंको तीन दिन अपने गर्भमें रखता है । तब तीन दिनोंके बाद फिर उन ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्योंका दूसरी बार जन्म होता है । पहले वे एकज ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य थे; अब द्विज ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, होगये । ' द्विर्बद्धं सुबद्धं भवति ' इस न्यायसे सुदृढ होगये । इसी लिए वेदमें भी कहा है- ' आचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणं कृणुते गर्भमन्तः । तं रात्रीस्तिस्र उदरे बिभर्ति, तं जातं द्रष्टुमभि- 120संयन्ति देवाः ' ( अथर्व ० सं ० ११ ॥ ३ ) । यहां तीन रात आचार्यके गर्भमें रहकर उसके बाद उत्पन्न हुए ब्रह्मचारीके दर्शनकेलिए देवता भी आते हैं - यह कहा है । तब आचार्य उपनयनसूत्र, यज्ञसूत्र या ब्रह्मसूत्र या उपवीतको विधिपूर्वक ब्रह्मचारीके गलेमें पहिनाता है । यज्ञोपवीत पहनानेका मन्त्र यह है - ' यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत् सहजं पुरस्तात् । आयुष्यमग्रथ ' प्रतिमुञ्च शुभ्र यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः ' ( पारस्करगृ ० २/२/११ )

यज्ञोपवीतका लक्षण

‘ गोभिलीयगृह्यकर्मप्रकाशिका ' में उपनयनसूत्रका लक्षण दिया गया है, कात्यायन - परिशिष्ट में भी । ' पारस्करगृह्यसूत्र ' के हरिहर - भाष्य में तथा ' कात्यायनस्मृति के आरम्भ में भी यज्ञोपवीतकी विधि बताई गई है । हम उसे हिन्दी में स्पष्ट कर देंगे ।

यज्ञोपवीत के विषयमें पहले यह जानना चाहिए कि यज्ञोपवीत- का सम्बन्ध यज्ञसे है, यज्ञका सम्बन्ध वेदसे है । जैसे कि ' न्यायदर्शन ' में कहा है- ' यज्ञो मन्त्रब्राह्मणस्य विषयः ' ( वात्स्या ० भा ० ४ | १ | ६२ ) वेदका सम्बन्ध वेदाधिकारियों से है, जिन्हें ब्रह्मसूत्र पहनना पड़ता है । बिना यज्ञोपवीत पहने द्विजातिवंशोत्पन्न भी वेदाध्ययनाधिकारी नहीं हो सकता, तो यज्ञोपवीताधिकार से विरहित पुरुष भला वेदाध्ययनमें कैसे अधिकृत हो सकते हैं?

यज्ञोपवीत किस प्रकार पुरुषपर वेदका भार रखता है, यज्ञोपवीतियोंको कितना वेद आवश्यक है, यज्ञोपवीत त्रैवर्णिक पुरुषोंका क्यों होता है; इत्यादि बातोंका उत्तर यज्ञोपवीतसूत्र स्वयं 121ही देता है, यज्ञोपवीतकी रचना - विधि से एतदादिक प्रश्नोंका उत्तर स्वयं होजाता है । अब हम यज्ञोपवीत - निर्माणकी विधिका रहस्य बताते हैं । यहाँ हमने विविध विद्वानोंके विचार यथास्थान सन्निवेशित कर दिये हैं- जिससे यह निबन्ध जनताके योग्य होगया है ।

यह यज्ञोपवीत हाथकी चार अंगुलियों ( चप्पा ) पर छियानवें बार लपेटा जाता है । इसमें कई लोग कारण बताते हैं-

( क ) ' चतुर्वेदेषु गायत्री चतुर्विंशतिकाक्षरा । तस्माच्चतुर्गुणं कृत्वा ब्रह्मसूत्रमुदीरयेत् ' अर्थात् चारों वेदोंमें गायत्री २४ अक्षरकी है । इसलिए ब्रह्मसूत्र भी २४४४ = ६६ बार चप्पे पर लपेटा जाता है ।

( ख ) अथवा - छान्दोग्यसूत्र परिशिष्ट में कहा है - ' तिथिर्वारं च नक्षत्रं तत्त्ववेदगुणान्वितम् । कालत्रयं च मासाश्च ब्रह्मसूत्रं हि षण्णव ' । अर्थात् १५ तिथि, ७ वार, २७ नक्षत्र, २५ तत्त्व, ४ वेद, ३ गुण, ३ काल, १२ महीने इनकी संयुक्त संख्या ६६ होती है; यज्ञोपवीत में भी ये सब निहित हैं; अतः उसे भी ६६ बार लपेटा जाता है ।

( ग ) परमेष्ठी ( ब्रह्मा ) के शरीर में सूत्रात्मक प्रारणका ६६ वस्तु- रूप राशिचक्र कन्धे से लेकर कमर तक यज्ञोपवीतकी तरह होता है, यही उसका स्वाभाविक यज्ञोपवीत है ( प्रजापतेर्यत् सहजं ); तब ब्रह्मसूत्रमें भी वैसी शैली रखनी पड़ती है ।

( घ ) अन्य रहस्य यह है कि सामुद्रिक शास्त्रमें पुरुषका परिमारण अपनी अंगुलियोंके नापसे ८४ से लेकर १०८ अंगुलियों तक माना 122गया है । ८४ और १०८ का मध्यमान ( औसत ) ६६ होता है; इस कारण पुरुषका उपनयन - सूत्र भी ६६ चप्पेका होता है ।

( ङ ) वस्तुतः बात यह है - ११३१ संहितात्मक वेद में कर्मकाण्ड, उपासनाकाण्ड, ज्ञानकाण्ड- ये तीन भाग होते हैं । इनके सब मन्त्र एक लाख हैं । जैसे कि ' वायुपुराण ' में कहा है- ' आद्यो वेदश्चतुष्पादः शतसाहस्त्र - सम्मितः ' ( ६०।७ ) । यही विष्णुपुराण ( ३ । ४ । १ ) में कहा है । अन्यत्र भी कहा है- ' लक्षं तु वेदाश्चत्वारो लक्षं भारतमेव च ' ( चरणव्यूह ५ ( १ ) । इनमें स्थूल गणना से कर्मकाण्डके मन्त्र ८० सहस्र हैं । उपासनाकाण्ड के १६ हजार मन्त्र हैं; शेष चार सहस्र ज्ञानकाण्डके हैं । इस प्रकार एक लाखकी पूर्ति होती है । यही बात निरुक्तकार भी सूचित करते हैं । ' तास्त्रिविधा ऋचः, परोक्षकृताः प्रत्यक्ष कृताः, आध्यात्मिक्यश्च । परोक्षकृताः प्रत्यक्षकृताश्च भूयिष्ठाः, अल्पश आध्यात्मिक्यः ' ( ७ | ३ | १ ) ' परोक्ष ' शब्दसे ' कर्म- काण्ड ' इष्ट है, क्योंकि कर्मकाण्ड परोक्ष कर्म - फलका प्रतिपादक होता है । ' प्रत्यक्ष ' शब्द से ' उपासनाकाण्ड ' इष्ट है, क्योंकि वह प्रत्यक्ष - फलका निदर्शक है । ' आध्यात्मिक ' शब्द से ' ज्ञानकाण्ड ' इष्ट है. क्योंकि आत्म - साक्षात्कार ही ज्ञान होता है ।

इस प्रकार ज्ञानकाण्डके मन्त्रोंकी अल्पता सिद्ध हुई । ज्ञान- काण्डके मन्त्रोंकी अल्पतासे ज्ञानकाण्डको कर्मकाण्डसे अवर ( हीन ) न समझ लेना चाहिये; क्योंकि वरता वा अवरता संख्या पर निर्भर नहीं होती । एक भी सूर्य लाखों तारोंसे ' वर ' हो तो होता है । ज्ञानकाण्ड कर्मकाण्डकी अपेक्षा होना भी अल्प ही चाहिये । युद्धमें 123सेनापति ' ज्ञान ' होता है । सेना ' कर्मकाण्ड ' होती है । जितनी संख्या सैनिकोंकी होती है, उतनी सेनापतियोंकी नहीं । यदि सभी सैनिक सेनानायक बन जाएँ; तो विजय कभी होगी ही नहीं । लोकमें भी ज्ञानी बहुत होजाएँ; तो सबकी भिन्न - भिन्न बुद्धि हो जाने से वे जनताको कर्म में प्रवृत्त कर ही न सकें! इसीलिए लोकमें जैसे ज्ञानी वा नेता थोड़े होते हैं, परन्तु उनकी आज्ञामें चलनेवाले कर्मिष्ठ बहुत अपेक्षित होते हैं; जो उनकी आज्ञा, बिना विशेष विचार किये ही मान लें, वैसे ही वेद में भी ज्ञानकाण्ड थोड़ा होता है, कर्मकाण्डकी उसकी अपेक्षा संख्या बहुत अधिक होती है । 1

इसके अतिरिक्त कर्मकाण्ड ज्ञानकाण्डकी अपेक्षा अवर होता हुआ भी सर्वथा अवर नहीं जाता । यदि कर्मकाण्ड सर्वथा न हो तो ज्ञान निराधार हो जाय । ' ज्ञानं भारः क्रियां विना । ' नेता व्यर्थ हो जाता है यदि कर्मिष्ठ जनता न हो, यद्यपि जनता नेताकी अपेक्षा

वर होती है । फलतः वेदके तीनों काण्डों के मन्त्र एक लाख हैं ।

यह यज्ञोपवीत चप्पेपर ६ वार लपेटा जाता है, इसीलिए ११३१ संहितात्मक चार वेदोंमें स्थित कर्मकाण्ड एवम् उपासना- काण्डके ८० + १६ = १६ सहस्र मन्त्रोंका अधिकार पट्ट ' चपरास की तरह द्विजको अर्पण किया जाता है । शास्त्राने केवल कर्मकाण्ड- उपासनाकाण्डके अधिकार तक ही यज्ञोपवीत नियमित किया है ।. वे ६६ सहस्र मन्त्र चारों वेदों के हैं — इस कारण चार अङ्ग ुलियों ( चप्पे पर उतनी संख्यासे सूत्र लपेटा जाता है । फिर जो पहले उसे तिगुना करके ऊपर बांई ओर लपेटा जाता है, इससे इसमें 124ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य इन तीन वर्णोंका अधिकार सिद्ध होता है ।

इस तीन डोरी वाले सूत्रको जो फिर तिगुना करके नीचेसे दाहिनी ओर लपेटा जाता है इससे ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वान- प्रस्थ इन तीन आश्रमोंको इसमें अधिकृत बताया जाता है । पूर्व तथा यहांपर यह भी अभिप्राय व्यक्त हो रहा है कि ऋग, यजुः, साम ये तीन प्रकारके वेद ( मन्त्रविशेष ) इसके विषय हैं, और श्रौत - यज्ञोंमें ब्रह्मा, विष्णु, महेशरूप गार्हपत्य, दाक्षिणात्य, एवम् आहवनीय इन तीन अग्नियोंका उपयोग होता है । जैसे कि ' ब्रह्मा वै गार्हपत्ये स्याद् ईश्वरो दक्षिणे तथा । विष्णुराहवनीये तु अग्निहोत्रे त्रयोग्नयः । ( गृह्या संग्रह १७ ) । अथवा धर्म, अर्थ, काम यह त्रिवर्ग उसका विषय होता है । इन सबसे मनके मल, आवरण विक्षेप तीन दोष दूर किये जाते हैं ।

इस प्रकार यह नव - तन्तुका सूत्र हो जाता है । प्रत्येक तन्तुका एक देवता हुआ करता है । जैसे कि ' गृह्यासंग्रह ' में कहा है- ' यज्ञोपवीतं कुर्वीत सूत्रेण नवतान्तवम् । देवतास्तत्र वक्ष्यामि आनुपूर्व्येण याः स्मृताः । ( २४८ ) ओङ्कारः प्रथमस्तन्तुर्द्वितीयश्चाग्नि- दैवतः । तृतीयो नागदैवत्यश्चतुर्थः सोमदैवतः । पञ्चमः पितृदैवत्यः षष्ठश्चैव प्रजापतिः । सप्तमो वायुदैवत्यश्चाष्टमो यम ( सूर्य ) दैवतः । नवमः सर्वदैवत्य इत्येते नव तन्तवः । ' ( २।४६-५० -५१ ) इन नौ देवताओंके पृथक् - पृथक् गुणोंके साथ यज्ञोपवीतधारण द्वारा द्विज बालकको भूषित होना चाहिये । ओंकारका गुण ब्रह्मज्ञान, दूसरे अग्निदेवताका तेजस्वी होना, तीसरे देवता अनन्तनागका गुण 125धैर्य धारण करना, भार उठाना, चतुर्थ देवता चन्द्रका गुण सर्वजन- मनः - प्रह्लादक बनना, पञ्चम देवता पितृगणका गुण स्नेहशीलता तथा अपनोंका संरक्षण करना, छठे देवता प्रजापतिका गुण प्रजा- पालन, सातवें देवता वायुका गुण बलशाली होना, अष्टम देवता यमका गुरण दुष्टोंको दण्ड देना, अथवा सूर्यका गुण प्रकाश धारण करना, नवम देवता विश्वेदेवोंका गुण सब दिव्य गुण तथा सात्त्विकता धारण करना इन नवतन्तुयुक्त यज्ञोपवीतधारण - द्वारा · इन देवताओंका नित्य स्मरण तथा उनके गुणोंका अवलम्बन करना अपना कर्तव्य सूचित होता है ।

फिर इस नव - तन्तु सूत्रको इस प्रकार तिगुना किया जाता है कि जिससे तीन सूत्रोंकी योजना सिरमें एक हो जावे । इस समयकी त्रिगुणता ऋषिऋरण, देवऋण, पितृऋणको सूचित करती है । इसीलिए देवतर्पण, पितृतर्पण एवम् ऋषितर्पण में यज्ञोपवीतको क्रमसे सव्य, अपसव्य, तथा निवीती करना पड़ता है । ' मैं इस अधिकृत कर्मको अवश्य करूंगा, अवश्य करूंगा, करू'गा ' इस प्रकार तीन वार प्रतिज्ञाको भी सूचित करता है ।

यदि इस यज्ञोपवीत - सूत्रको सनातनधर्मका संक्षिप्त चित्र कह दें; तो अत्युक्ति न होगी, यह बताया ही जा चुका है इससे सनातनधर्मका परमार्थवाद अद्वैतवाद भी सिद्ध हो रहा है । सनातनधर्मका सिद्धान्त है कि - ब्रह्मसे सम्पूर्ण जगत् प्रकट होता है, उसीके आश्रयसे अवस्थित रहता है, अन्तमें भी फिर उसीमें लीन हो जाता है । एक ही ब्रह्म से त्रिगुणात्मक जगत्का प्रपंच 126. होता है, अन्त में एक ब्रह्म ही हो जाता है । इस सिद्धान्त के अनुसार एक ब्रह्मका सूत्र ही सारे संसार में प्रसृत है; अन्त में सारे संसारका उसी ब्रह्ममें लय हो जाता है । अव ब्रह्मसूत्र यज्ञोपवीतकी रचना पर भी ध्यान दीजिये । एक ही सूत्रसे उसकी रचना प्रारम्भ होती है । एक ही सूत्र से तीन सूत्र वन जाते हैं । अन्तमें एक ही ब्रह्मग्रन्थिमें उसकी समाप्ति हो जाती है ।

- सनातनधर्म के सिद्धान्तमें एक ही ब्रह्मसे सत्त्व, रज, तम यह त्रिगुणात्मक सृष्टि होती है, अन्तमें एक ब्रह्म ही अवशिष्ट रह जाता है । इस प्रकार यज्ञोपवीत भी एक सूत्र से त्रिगुण होकर अन्तमें ब्रह्मग्रन्थिमें ही समाप्त हो जाता है । जगत्‌की उत्पत्ति से पूर्व भी एक ही अद्वितीय ब्रह्म होता है, प्रलयमें भी वही । संसार - दशा अथवा व्यवहार - दशा में त्रिगुणात्मक प्रकृतिका चक्र है.

अवस्था ब्रह्मसूत्र ( उपवीत ) की भी है । आरम्भ में भी एक सूत्र, अन्तमें भी सब मिलकर एक ब्रह्मग्रन्थि में समाप्त होता है, मध्य में ही केवल त्रिगुणचक्र होता है ।

अब आगे चलिये - ऊपरकी तीन या पांच ग्रन्थियाँ प्रवर- संख्याको सूचित करती हैं, ग्रन्थिका नाम ब्रह्मपाश हुआ करता है । शूद्रोंका वेदमें अधिकार न होने तथा गोत्रप्रवरादि न होनेसे तन्मूलक उपनयन भी उनका नहीं होता । स्त्रियोंके भी स्वतन्त्र गोत्र - प्रवर नहीं होते, इस कारण उनका भी स्वतन्त्र ( पृथकू ) यज्ञोपवीत नहीं होता ।

इस यज्ञोपवीतके कर्म - उपासनाकाण्ड़ार्थ होनेसे, ऋरणन्नयकी 127पूर्तिका मूल होनेसे, तथा धर्म, अर्थ, काममूलक होनेसे ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ आश्रम तक उसका अधिकार होता है, फिर ' ऋणानि त्रीण्यपाकृत्य मनो मोक्षे निवेशयेत् ' ( मनु ० ६ । ३५ ) अधीत्य विधिवद् वेदान् पुत्राश्चोत्पाद्य धर्मतः । इष्टा च शक्तितो यज्ञैर्मनो मोक्षे निवेशयेत् ' ( मनु ० ६।३६ ) ' ब्राह्मणः प्रव्रजेद् गृहात् ' ( मनु ० ६३८ ) इस प्रकार मोक्षप्राप्त्यर्थं संन्यासाश्रममें केवल ज्ञान- काण्डका उपयोग करना पड़ता है । इस कारण उसमें यह यज्ञो- पवीत छोड़ना पड़ता है; क्योंकि - यह वेदके ६६ सहस्र कर्म- उपासना काण्डके धर्म, अर्थ, कामप्रतिपादक मन्त्रोंका ही अधिकार देता है । इस पूर्ति हो जाने पर मोक्षप्राप्त्यर्थ अवशिष्ट वेदके ज्ञानकाण्डके चार सहस्र मन्त्रोंके मननका क्रम प्राप्त हो जाने से इस यज्ञोपवीत - सूत्रको छोड़ना पड़ता है । इष्ट स्थानकी प्राप्ति हो जाने पर यात्री अपना ‘ टिकट ' देकर ' स्टेशन ' पार हो जाता है । इस प्रकार संन्यासाश्रमसे पूर्व द्विजको इसे छोड़ना न चाहिये - यह भी - इससे सूचित हो जाता है ।

संन्यासीके शिखा - सूत्र नहीं होते; इस विषय में ' शङ्करदिग्विजय ' में स्वा ० शङ्कराचार्य तथा श्रीमण्डन मिश्रका संवाद भी प्रमाण है । जब आचार्य शङ्कर माहिष्मती नगरीमें मण्डनमिश्रके यहाँ शास्त्रार्थ करने पहुँचे; तो संन्यासी होनेसे इनके शिखा सूत्र नहीं थे; पर कन्धे पर भारी कन्था ( भोली ) रखी हुई थी । इस पर मण्डनमिश्रने स्वा ० शं को कहा- ' कन्थां वहसि दुर्बुद्धे! गर्दभेनापि दुर्वहाम् । शिखा यज्ञोपवीताभ्यां कस्ते भारो भविष्यति ' ( ८।२० ) ( इतनी भारी 128झोलीको तो उठा रहे हो, शिखा वा जनेऊका कोई बड़ा भार था कि उसे नहीं पहना? ) । श्रीशंकरने भी उसी शैलीसे उत्तर दिया कि- ' कन्थां वहामि दुर्बुद्धे! त्वत् - पित्रापि सुदुर्ब्रहाम् । शिखा - यज्ञोपवी- ताभ्यां श्रुतेर्भारो भविष्यति ' ( २१ ) कन्था तो इतनी भारी है कि उसे तुम्हारे पिता भी नहीं उठा सके; पर संन्यासी के लिए शिखासूत्र श्रुतिके प्रतिकूल होनेसे उसे रखने से श्रुति पर ही भार चढ़ेगा । इसलिए नहीं पहरे ) । यही नारद - परिव्राजकोपनिषद्के तृतीयोपदेश में लिखा है-

' सशिखं वपनं कृत्वा बहिः सूत्रं त्यजेद् बुधः । यदक्षरं परं ब्रह्म तत् सूत्रमिति धारयेत् ' ( ७७ ) ' यज्ञोपवीतं छित्त्वा ' ओं भूः स्वाहा ' इति अप्सु वस्त्रं कटिसूत्रं च विसृज्य ' संन्यस्तं मया ' इति त्रिवारम- भिमन्त्रयेत् ' ( संन्यासोपनिषद् २।६ ) इससे संन्यासीको यज्ञोपवीत हटा देना पड़ता है |

जो लोग वेदको ११३१ संहितात्मक नहीं मानते, वर्तमान चार संहिताकी पोथियोंको ही वेद मानते हैं; तब उनके मन्त्र तो अधिक- से - अधिक बीस सहस्रके लगभग हैं; उन्हीं में कर्म, उपासना, ज्ञान- काण्ड अन्तर्भूत हो जाते हैं । उनमें ज्ञानकाण्डके चार सहस्र मन्त्रोंको छोड़कर कर्म एवम् उपासनाकाण्डके सोलह सहस्रके लगभग मन्त्र अवशिष्ट रह जाते हैं । ऐसा होनेपर उनके दाहिने हाथकी चार अंगुलियोंसे ६६ बार लपेटने में कोई भी उपपत्ति नहीं रहती । इस कारण उनका पक्ष भी निर्मूल है । तब वे दाहिने हाथके चप्पेसे १६ वार लपेटे हुए यज्ञोपवीत सूत्रके अत्यन्त छोटे 129होनेसे उसे पहिन ही कैसे सकेंगे? ६६ संख्यासे अन्य संख्या यज्ञोपवीत - निर्माण में कहीं कही भी नहीं गई है ।

उपनयन - संस्कारसे हम द्विज होते हैं, यह पूर्व कहा ही जा चुका है । यहीं इसका महत्त्व है । जैसा कि स्मृतियोंमें कहा है- ' मातुरग्रेऽधिजननं द्वितीयं मौञ्जिबन्धने ' ( मनु ० २।१६६ ) ' जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेयः संस्काराद् द्विज उच्यते ' ( अत्रिस्मृति १३८ ) ' द्वे जन्मनी द्विजातीनां मातुः स्यात् प्रथमं तयोः । द्वितीयं छन्दसां मातुर्ब्रहरणाद् विधिवद् गुरोः । एवं द्विजातिमापन्नो विमुक्तो वाऽन्यदोषतः । श्रुतिस्मृति - पुराणानां भवेद् अध्ययनक्षमः ' ( व्यासस्मृति १।२२-२३ ) इसी प्रकार ' वसिष्ठस्मृति ' ( २।२ - ३ ) तथा ' शङ्खस्मृति ' ( १६ ) में भी कहा है । इस संस्कारसे पूर्व ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एकजत्व - धर्मसे शूद्र - सदृश होते हैं । तब वे वेदपठनमें अधिकृत नहीं होते, क्योंकि वेदारम्भ - संस्कार उपनयन संस्कारके सम्पन्न होने पर ही हुआ करता है । इसी कारण श्रीमनुजीने कहा है- ' नाभिव्याहारयेद् ब्रह्म स्वधानिनयनाद् ऋते । शूद्रेण हि समस्तावद् यावद् वेदे न जायते ' ( २।१७२ )

करते हैं- जन्मना

' जायते शूद्रः संस्काराद् द्विज उच्यते ' यद्यपि

इसी प्रकार कई आजकलके सुधारक भी एक वचन कहा यह वचन किसी स्मृतिके मूलमें नहीं पढ़ा गया; तथापि इसमेंके ' शूद्र ' शब्दका ' शूद्र'- सदृश अर्थ में पर्यवसान होता है; यहां पर उपमावाचक - शब्द लुप्त है । नहीं तो यदि सभी जन्मसे शूद्र हो जायँ; तब उपनयनसे सभी केवल ब्राह्मण होते, क्योंकि वहां कर्म- 130भेद नहीं होता । परन्तु ऐसा नहीं है, किन्तु जन्म से ही वह वह वर्ण माना जाता है ।

यदि यह बात स्वीकृत न हो तो —'अष्टवर्षं ब्राह्मणमुपनयेत गर्भाष्टमं वा, एकादशवर्षं राजन्यं, द्वादशवर्षं वैश्यम् ' ( पारस्करगृ ० २।२।१-२-३, आपस्तम्बगृ ० ४।१०।१-२-३, ब्राह्यायणगृ ० ३।४।१- ३-५, जैमिनिगृ ० १।१२, गोभिलगृ ० २।१०।१-२-३, वसिष्ठध ० ११।४४, मनु ० २२३६-३७, व्यासस्मृ ० १११६, शङ्खस्मृ ० २ श्र ०, याज्ञवल्क्यस्मृ ० आचाराध्याय १४ ) इत्यादि वचनों में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य शब्द असम्भव होते । इस कारण जन्मना

' जायते शूद्रः ' यहां पर ' ताद्धर्म्यात् ताच्छव्यम ' इस न्याय से ' शूद्रसधर्मता ' ही अर्थ है, वास्तविक शूद्र हो जाना नहीं । अन्यथा जन्म- शूद्रको भी उपनयनाधिकार तथा द्विजत्वकी प्राप्ति हो जाती; परन्तु उसको जीवन तक ' एकज ' माना जाता है ' द्विज ' नहीं । इससे शूद्रको यज्ञोपवीतका भी अधिकार नहीं ।

यज्ञोपवीतकी रचना भी यही सूचित करती है । उसके लिए कहा है — ' स्तनादूर्ध्वमधो नाभेर्न कर्तव्यं कदाचन । स्तनाद् ऊर्ध्वं श्रियं हन्ति नाभ्यधस्तात् तपः क्षयः ' ( गोभिलगृह्यासंग्रह २।५४ ) ' पृष्ठवंशे च नाभ्यां च धृतं यद् विन्दते कटिम् । तद् धार्यमुपवीतं स्याद् नातो लम्बं न चोच्छ्रितम् ' इस ' कर्मप्रदीप ' के वचन से यज्ञोपवीतको अधिकसे अधिक कमर तक धारण करना कहा है । कमर तकका भाग वैश्यकी सीमा है- ' मध्यं तदस्य यद् वैश्यः ( अथर्व ० शौ ० सं ० १ ९ । ६ । ६ ) । शरीर में मुखकी सीमा ब्राह्मणकी, 131बाहुकी सीमा क्षत्रियकी, कमरकी वा ऊरुकी सीमा वैश्यकी है । उससे निचली पांव तककी सीमा शूद्रकी है । वहां जब यज्ञोपवीत धारणका निषेध है, तब शूद्रका यज्ञोपवीत भी शास्त्रीय नहीं । इसके अतिरिक्त यज्ञोपवीतकी तीन तन्तुएँ भी तीन वर्णों में सीमित हैं । जो लोग सब वर्णोंको यज्ञोपवीत पहनाने में उत्सुक हैं, उन्हें उचित है कि वे चार तन्तुओं वाला यज्ञोपवीत बनावें तथा पैरों तक लम्बा बनावें । उक्त परिमाण ( कमर - तकका ) तब ठीक उतरता है जबकि ६६ चप्पा सूत हो ।

तब कई लोगों से उद्धृत ' जन्मना जायते शूद्र: ' इस वचनमें ' शूद्र ' शब्दका — ' अन्तरेणापि वतिमतिदेशो गम्यते । तद् यथा - एष ब्रह्मदत्तः, अब्रह्मदत्तं ब्रह्मदत्त इत्याह, तेन मन्यामहे ब्रह्मदत्तवद् अयं भवतीति ' ( महाभाष्य १ | १ || २२ ) ' शूद्रवत् ' यह अर्थ है; इसमें मनु ऋदिकी साक्षी दिखलाई जा चुकी है कि -'शूद्रेण हि समस्तावद् '

शूद्रके एकजत्व प्रमाण यह है - ' ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः, त्रयो वर्णां द्विजातयः । चतुर्थ एकजातिस्तु शूद्रः ' ( मनु ० १०।४ ) द्विजत्वके अधिकार न होनेसे ही उसका उपनयनमें अधिकार नहीं । उपनयनमें अधिकार न होनेसे उसका वेदमें भी अधिकार नहीं; क्योंकि उपनयन ही वेदाधिकार देनेका पट्ट है । इसलिए कहा है - ' तस्माद् यज्ञोपवीती एव अधीयीत, याजयेद् यजेत वा, यज्ञस्य प्रसृत्यै ' ( तैत्तिरीयारण्यक २ ( १ ) । इसके अतिरिक्त यजन स्मृतियोंमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्योंका आया है, यह ' मनुस्मृति में द्रष्टव्य है । शुद्रका यजन - यज्ञ न होनेसे यज्ञोपवीत भी कैसे होसके? 132' वसिंष्टधर्मसूत्र ' में कहा है – ' गायत्र्या छन्दसा ब्राह्मणमसृजत् । त्रिष्टुभा राजन्यं, जगत्या वैश्यम्, न केनचित् छन्दसा शूद्रम् - इति

संस्कार्यो विज्ञायते ' ( ४३ ) यहाँ पर वर्णोंकी उत्पत्ति छन्दोंसे कही है ।

गायत्री से ब्राह्मणका द्वितीय जन्म कहा है, क्योंकि पहला जन्म तो माता से कहा है । गायत्री छन्द आठ अक्षरोंका होता है । अतः द्वितीय जन्मरूप यज्ञोपवीत एवं गायत्री छन्दका ग्रहण भी ब्राह्मणका अवसर पर ' उत्तमे शिखरे देवि! ब्राह्मणेभ्योभ्यनुज्ञाता ' आठवें वर्ष में कहा है । इसी कारण सन्ध्या में गायत्रीके विसर्जन के ( तैत्तिरीयारण्यक १० | ३० ) गायत्रीकी ब्राह्मणोंके लिए अभ्यनुज्ञा स्वीकृत की गई है । इसी प्रकार ' स्तुता मया वरदा वेदमाता ' ' ' पाव- मानी द्विजानाम् । ' ' ब्रह्मवर्चसं दत्त्वा व्रजत ब्रह्मलोकम् ' ( अथर्व ० सं ० १६।७१।१ ) इस मन्त्र में भी वेदमाता गायत्रीको द्विजों ( ब्राह्मणों ) की पवित्र करनेवाली कहा है । गायत्रीको माता इसलिए कहा है- यह द्वितीय जन्म कराती है । गायत्रीके आठ अक्षर हैं, इसका द्विगुण सोलह होते हैं । तो सोलह वर्ष गायत्री - सावित्री ( यजुः वा ० सं ० ३।३५ ) प्राप्ति अर्थात् उपनयनकी ब्राह्मणकी अन्तिम अवधि है ।

त्रिष्टुप् से क्षत्रियकी उत्पत्ति कही है । त्रिष्टुप् छन्दके ११ अक्षर होते हैं । अतः द्वितीय- जन्मात्मक यज्ञोपवीत तथा त्रिष्टुप्- मन्त्रग्रहण भी क्षत्रियका ११ वें वर्ष में कहा है । ग्यारहका दुगना बाईस होता ' है, अतः २२ वर्ष त्रिष्टुप् -सावित्री ( यजुः वा ० सं ० १२।३ ) -ग्रहण अर्थात् उपनयनकी क्षत्रियकी अन्तिम अवधि है । 133वैश्यका द्वितीय जन्म जगती छन्दसे कहा है । जगतीके १२ अक्षर होते हैं; तब वैश्यका द्वितीय जन्मरूप जगतीसावित्री ( यजुः वा ० सं ० १७१७४ ) -ग्रहण भी १ खें वर्ष में नियत है । १२ का द्विगुण २४ होता है; अतः वैश्यकी जगतीमन्त्र - ग्रहणकी अर्थात् उपनयनकी अन्तिम अवधि भी २४ वर्षकी है । इसीलिए ही ' पारस्करगृह्यसूत्र ' में ' गायत्रीं ब्राह्मणेभ्योनुब्रूयात्, त्रिष्टुभथं राजन्यस्य, जगतीं वैश्यस्य ' ( २।३।७- ८ - ९ ) इस प्रकार तीन वर्णोंको गायत्री, त्रिष्टुपू, जगती इन भिन्न - भिन्न छन्दों के सावित्री ( सवितृदेवताक ) मन्त्रोंका अधिकार कहा है । यही बात ' मानवगृह्यसूत्र ' ( १/२/३ ) में, ' ऐतरेय ब्राह्मण ' ( १ ॥ २८ ) तथा अन्य गृह्यसूत्रों में कही है । इन सावित्रियोंका ग्रहण ' अष्टवर्षं ब्राह्मणमुपनयेत, एकादशवर्ष १ ९ राजन्यम्, द्वादशवर्षं वैश्यम् ' ( पार ० गृ ० ३।२।१-२-३ ) अपने - अपने छन्दोंके एकपादके अक्षरोंके अनुसार इन वर्षोंमें आया है; और अन्तिम अवधि ' आ षोडशाद् ब्राह्मणस्य अनतीतः कालः, श्रा द्वाविंशाद् राजन्यस्य, आ चतुर्वि- १ ९शाद् वैश्यस्य, अत ऊर्ध्वं पतित - सावित्रीका भवन्ति ' ( पार ० २।५ । ३६-३७-३८-३९ ) इन अपने - अपने छन्दोंके दो पादके अक्षरोंके अनुसारी वर्षों में कही है ।

ब्राह्मणका यज्ञोपवीत वसन्त ऋतुमें होता है, क्षत्रियका ग्रीष्म में वैश्यका शरद्में । वर्ण - विभाग में यह ऋतुएँ भी शतपथके अनुसार क्रमसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य हैं । वसन्तमें न भीषण सर्दी होती है, न घोर गर्मी । ब्राह्मणको भी ऐसी सात्त्विकता अपेक्षित होती है । ग्रीष्म तेजस्वी. है, क्षत्रियको भी तेजस्वी बनना पड़ता है । शरद 134ऋतु में व्यापार - कार्य शुरू होता है, तृण आदिका संग्रह भी किया जाता है; वैश्यको भी वैसा संग्रही बनना पड़ता है । इन कारणों से यह ऋतुविभाग रखा गया है ।

परन्तु शूद्रका द्वितीय जन्म न तो किसी छन्दसे कहा है; न ही कोई छन्दोमन्त्र ( सावित्री ) उसके लिए कहा गया है । न उसके सावित्री - ग्रहणार्थ कोई आरम्भिक वर्ष कहा है, न अन्तिम वर्ष । न ही त्रैवर्णिकोंकी तरह अन्तिम वर्षका अतिक्रमण करने पर उन्हें कहीं ' व्रात्य ' कहा है; अतः शूद्रका यज्ञोपवीत भी किसी वर्षमें नहीं होता । जब शूद्रको ही उपनयनमें अधिकार नहीं; तब अवर्ण तथा अन्त्यजादि सङ्कर - जातियोंका तो उपनयनाधिकार हो ही कैसे सकता है?

स्वा ० दयानन्दजीने अपने सत्यार्थप्रकाशमें लिखा है- ' जो कुलीन, शुभलक्षणयुक्त शूद्र हो तो उसको मन्त्रसंहिता छोड़के सब शास्त्र पढ़ावे । शूद्र पढ़े, परन्तु उसका उपनयन न करे । यह मत अनेक आचार्योंका है ' ( ३ समु ० पृ ० २५ ) । ' ६ वें वर्षके आरम्भ में द्विज अपने सन्तानोंका उपनयन करके आचार्यकुल में.... भेज दें । और शूद्रादिवर्ण उपनयन किये बिना विद्याभ्यासकेलिए गुरुकुलमें भेज दें ' ( स ० प्र ० २ पृ ० १८ ) यहां पर स्वामीजीने शूद्रोंका उपनयन नहीं माना; तब उन्हें वेदाधिकार भी नहीं हो सकता है । इस कारण उन्होंने अपनी संस्कारविधि में भी उपनयनसंस्कारके बाद ही ' वेदारम्भ - संस्कार ' माना है । ' मनुस्मृति ' में भी कहा है- कृतो-

'

पनयनस्यास्य व्रतादेशनमिष्यते । ब्रह्मणो ( वेदस्य ) प्रहरणं चैव 135क्रमेण विधिपूर्वकम् ' ( २।१७३ ) यहांपर उपवीतीको ही वैध वेदाध्ययन का अधिकार कहा है |

८-११-१२ वर्ष ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यके उपनयनका मुख्य काल है । मनु ( २।३७ ) के अनुसार ५-६-८ वर्ष तीनोंका काम्यकाल है; क्योंकि उसमें ब्रह्मवर्चस, बल तथा धनकी कामना करनी पड़ती है | मनु ( २३८ ) के अनुसार १६-२२-२४ वर्ष तीनोंका गौणकाल है, अतः आपत्कालरूप है । इसीलिए ' बृहत्पराशरस्मृति ' में कहा है— ' अष्टकद्वादशाब्दानि सगर्भाणि द्विजन्मनाम् । मुख्यः कालो व्रतस्यैष, ह्यन्य उक्तो विपर्यये ' ( गौणत्वे ) ( ४ । १६२ ) । उसके बाद ' व्रात्यता ' तथा प्रायश्चित्तार्हता होती है ।

‘ कार्पासमुपवीतं स्याद् विप्रस्योर्ध्ववृतं त्रिवृत् । शरणसूत्रमयं राज्ञो वैश्यस्याविकसूत्रिकम् ' ( मनु ० २।४४ ) यह तीनों वर्णोंका रुई, सन और ऊनके सूत्रोंसे यज्ञोपवीतका भेद है; जिससे अनायास मालूम हो नाय कि — यह किस वर्ण का है; परन्तु आजकल जैसे तीन वर्णोंका छन्दभेद नहीं दिखाई पड़ताः वैसे यज्ञोपवीतभेद भी नहीं दिखलाई पड़ता; वह समयका स्वातन्त्र्य है । क्षत्रिय, वैश्यका सन तथा ऊनका यज्ञोपवीत उसकी दृढ़ताके लिए अनुमित होता है, युद्ध एवं व्यापारके काममें लगे क्षत्रिय - वैश्योंके लिए उपयुक्त भी यही प्रतीत होता है । यह बाह्य उद्देश्य हैं; श्रभ्यन्तरिक उद्देश्य अदृष्ट- मूलक हो सकता है ।

' एकैकमुपवीतं तु यतिनां ब्रह्मचारिणाम् । गृहिणां च वनस्था- नामुपवीतद्वयं स्मृतम् ' ( वृद्धहारीतस्मृति ८ ( ४४ ) ' गृहस्थाश्रमी यज्ञो- 136पवीते... धारयेत् ' ( वैखानसधर्मसूत्र ३ | १ | १ ) ' उपवीतं बटोरेक, द्वे तथा इतरयोः ( गृहस्थवानप्रस्थयोः ) स्मृते ' ( पारिजात में देवल वचन ) ' यज्ञोपवीते द्वे धार्ये श्रौते स्मार्ते च कर्मणि । तृतीयमुत्तरीयार्थे वस्त्राभावे तदिष्यते, ( हेमाद्रि ) इत्यादि वचनों से गृहस्थियों को श्रौत - स्मार्त कर्मके कारण दो यज्ञोपवीत पहनना कहा है । जो लोग दूसरा यज्ञोपवीत स्त्रीके प्रातिनिध्यसे पहनना कहते हैं कि - ' दूसरा यज्ञोपवीत स्त्रियोंका होता था; परन्तु स्वाथियोंने उनके गले से उतारकर स्वयं पहिन लिया, यही कारण है कि पुरुषके गलेमें दो यज्ञोपवीत होते हैं'- - उनका कथन उक्त प्रयोजनसे खण्डित हो गया । नहीं तो तीसरा यज्ञोपवीत उत्पन्न हुए बालकके प्रतिनिधित्व से हो जाय! परन्तु ऐसा नहीं । प्रयोजन वहांपर कहा ही जा चुका है । वस्तुतः स्त्रियोंको यज्ञोपवीतका अधिकार नहीं होता । विवाह ही उनका यज्ञोपवीत संस्कार है ।

श्रीमनुने कहा है- ' वैवाहिको विधिः स्त्रीणां संस्कारो वैदिकः स्मृतः । पतिसेवा गुरौ वासो गृहार्थोऽग्निपरिक्रिया ' ( २।६७ ) यहांपर स्त्रियोंके विवाहको ही उपनयनस्थानीय कहा है, पतिसेवा ही उनका गुरुकुलवास माना गया है । घरका काम आदि उनका यज्ञ कहा है । इसमें टीकाकारोंकी सम्मति भी मिलती है । हम उनकी उक्त

श्रीकुल्लूकभट्ट लिखते हैं- ' अनेन [ अमन्त्रिका

' ' इति पद्येन पद्यकी टीका उद्धृत करते हैं-

स्त्रीणाम् ] उपनयनेपि प्राप्ते विशेषमाह - विवाहविधिरेव स्त्रीणां वैदिकः संस्कार उपनयनाख्यो मन्वादिभिः स्मृतः । पतिसेवैव गुरुकुले 137वासो वेदाध्ययनरूपः । गृहकृत्यमेव सायं प्रातः समिद्धोमरूपोऽग्नि- परिचर्या । तस्माद् विवाहादेरुपनयन - स्थाने विधानाद् उपनयनादे- र्निवृत्तिरिति ' ।

श्रीमेधातिथिने भी लिखा है- ' पूर्ववचनेन [ स्त्रीणां ] जात- कर्मादिवद् उपनयनेपि मन्त्रके प्राप्ते तन्निवृत्त्यर्थमारभ्यते— वैवाहिको विधिरिति - — वेदग्रहणार्थो वैदिकः संस्कार उपनयनाख्यो यः स स्त्रीणां वैवाहिको विधिः । विवाहे भवो, विवाहविषयो, विवाह- साध्यः । अतो विवाहस्य उपनयनस्थाने विहितत्वात् तस्य निवृत्तिः । ( प्र. ) यदि विवाहस्तत्- ( उपनयन ) कार्यम्, हन्त! प्राप्तं वेदाध्ययनं, प्राप्ता च ब्रह्मचर्या, उपनयनं नाम मा भूदिति? ( उ. ) एतद् उभयमपि निवर्तयतिपतिसेवा गुरौ वासः, पतिं या सेवते, उपचरति, आराधयति, सा एव अस्याः ( स्त्रियाः ) गुरौ वसतिः ” ।

श्रीगोविन्दराजने लिखा है - ' एवमुपनयनेपि [ स्त्रीणाम् ] अमन्त्र- के प्राप्ते आह— वैवाहिक इति । यद् विवाहविधानम्, तदेव सां वैदिक संस्कारोपनयनस्थाने, पतिसेवा च गुरुशुश्रूषास्थाने, गृहकृत्य च अग्निपरिचरणस्थाने ' । श्रीनारायणने लिखा है- ' उपनयनं तु न कार्यं तासाम्, विवाहसंस्कारस्य तत्स्थानीयत्वादित्यर्थः । वैदिक वेदाधिगमार्थः उपनयनरूपः । धर्मातिदेशार्थं तदङ्गसम्पादनोक्ता पतिसेवेति । यथा गुरुशुश्रूषा व्रतिनः, तेनैव प्रकारेण स्त्रिया पतिः शुश्रूष्यः । यथा चाप्रमादेन अग्न्युपचरणं तत्र, तथा गृहार्थेषु गृह- प्रयोजनेषु पाकादिषु श्रप्रमत्तया भाव्यमित्यर्थः । परिक्रिया - परिचर्या । शूद्रस्य तु द्विज - सेवैव गुरौ वास इति प्राह्यम् ' ।

138यहां पर राघवानन्दने लिखा है- ' तेषु स्त्रीणां विशेषमाह— ' वैवाहिको वक्ष्यमाणविवाह सम्बन्धी संस्कारः उपनयनसंस्कार- स्थानीयः । तेन तन्निवृत्तिः । वैदिकः -- वेदमन्त्रकृतः — ' विवाहस्तु समन्त्रकः ' इत्युक्त ेः । तासां पतिसेवैव गुरुकुलवासतया विधीयते, अकरणे प्रत्यवायस्मरणात्, करणे च स्तुतिस्मरणात् । एवं गृहार्थो गृहकृत्यमेव सायं - प्रातः समिद्धोमरूपा अग्निपरिचर्या ' । यहीं श्री नन्दनने लिखा है — ' उपनयनं तासां समन्त्रकम्, तच्च विवाह एवेत्याह वैवाहिको विधिरिति । संस्कारः - उपनयनम् । वैदिकः समन्त्रकः । तत्र गुरुकुलवासोऽग्निकार्यं च उत्तरार्धे प्रोक्तम् । गृहार्थ: - गृहकार्यम् । अग्निपरिक्रिया - अग्निपरिचर्या । विवाहस्य उपनयन- प्रतिपादनं तत ऊर्ध्वं कामचारवादभक्षादि - वर्जनार्थम् ' । यहीं श्री रामचन्द्रने लिखा है — ' स्त्रीणां - कन्यानाम्, संस्कारः वैवाहिको विधिः, वैदिकः — वेदमन्त्रैः स्मृतः । स्त्रीधर्मानाह – - पति सेवा गुरौ वासः गुरोराचार्यस्य समीपे वासः । अग्नेः परिक्रिया - गृहार्थे पाकनिमित्तम् ' ।

इस प्रकार स्त्रियोंका उपनयन ही जब नहीं है; तब ' पुरुषका यज्ञोपवीत स्त्रीके प्रातिनिध्यसे है ' यह कइयोंका अनुमान ठीक न रहा । ' आह्निकसूत्रावली ' में कहा है - ब्रह्मचारिण एकं स्यात् स्नातस्य द्वे बहूनि वा ' । ब्रह्मचारियोंको केवल वैदिक कर्म करना पड़ता है, इसलिए उनका नाम ' ब्रह्मचारी ' हुआ करता है । ' ब्रह्म चरति ' यह उसकी व्युत्पत्ति होती है । इसलिए वे एक ही सूत्र धारण करते हैं । स्नातक हो जानेपर वैदिक एवं स्मार्त दोनों कार्य 139करने पड़ते हैं, इस कारण उन्हें दो सूत्र पहनने पड़ते हैं । स्मृतियाँ भी उतनी होती हैं; जितनी मंत्र - संहिता | वेदार्थस्मरणका नाम ' स्मृति ' हुआ करता है । तब स्मार्त - कर्म के लिए दूसरा सूत्र धारण करना पड़ता है, वादिप्रोक्त कारणसे नहीं । आजकल सुधारक लोग यज्ञोपवीत छोड़ रहे हैं; इसीलिए क्या अपनी स्त्रीको दो यज्ञोपवीत दे रहे हैं?

बिना यज्ञोपवीतके जबकि द्विजात्युत्पन्न भी वेदाध्ययनका अधिकारी नहीं रहता; तब यज्ञोपवीताधिकार से रहित तो भला वेदाध्ययनमें किस प्रकार अधिकृत हो सकता है?? इसके अतिरिक्त पत्नी विवाह हो जाने पर उस पदवीको अनायास प्राप्त कर लेती यह लोक प्रत्यक्ष है कि पण्डितकी स्त्री पण्डितानी, मास्टरको स्त्री जाती है । प्रत्युत स्त्रीका पितृगोत्र भी बदल जाया करता है, पतिका गोत्र हो जाता है । ' अनूढा न पृथक् कन्या पिण्डे गोत्रे च सूतके । पाणिग्रहरण - मन्त्राभ्यां स्वगोत्राद् भ्रश्यते ततः ' ( ८४ ) ' विवाहे चैव संवृत्ते चतुर्थेऽहनि रात्रिषु । एकत्वं सा त्रजेद् भर्तुः पिण्डे गोत्रे च सूतके ' ( ८६ ) यह इस ' यमस्मृति ' तथा ' लिखित स्मृति ' के वचनसे विवाहिता स्त्री पितृगोत्रसे हटकर पति गोत्रकी हो जाती है । उस स्त्रीका और्ध्वदेहिक भी पति - गोत्र से होता है । इस प्रकार पतिसे अभिन्न रूप उसके लिए उपनयन आदिकी पृथक् आवश्यकता भी 140नहीं रहती, पतिके यज्ञोपवीतसे वह यज्ञोपवीतके बिना भी यज्ञोपवीतिनी मानी जाती है । तभी उसका विवाह मन्त्र - सहित हुआ करता है, विशेष कई स्वाधिकृत मन्त्र भी वह वरके सहारे पढ़ सकती है ।

उसका पृथक् उपनयन तो लौकिक दृष्टिसे भी उचित नहीं. सिद्ध होता । उसका स्त्रीत्व प्रायः उसे अपवित्र दशामें रखनेको बाध्य करता है, जिसके सबब वह यज्ञोपवीत के नियम नहीं पाल सकती । प्रतिमास रजस्वला होने पर क्या वह यज्ञोपवीतको बार- बार बदलती रहेगी? प्रसवकालमें क्या वह चालीस दिन तकके लिए उपवीतको छोड़ देगी? इधर नवजात शिशुको अपने साथ सुलाने के सबब स्त्रीका समय प्रायः बच्चोंके मलमूत्र में ही जाता है । क्या वह ढाई वर्षके लिए फिर यज्ञोपवीतको सन्दूकमें बन्द कर रखेगी? फिर ' नित्ययज्ञोपवीतिता ' कैसे होगी? स्त्रीके जिस वक्षःस्थल पर सुधारक परम पवित्र उपवीत लटकाना चाहते हैं; वह तो धूलि - धूसरित, मलमूत्रव्याप्तसर्वाङ्ग नवजात शिशुका दिन- रात स्तनपानके समय उसका क्रीडास्थल बनेगा । वह उसे रस्सी मानकर खींचेगा, तोड़ेगा, उसके साथ खेलेगा और फिर वह सूत्र उसके तेल - उबटनसे सना रहेगा । इस प्रकार सोचने से उसका स्त्रीके कन्धेपर लटकाना लौकिक दृष्टिसे भी ठीक नहीं जँचता; शास्त्र - दृष्टिसे तो निषेध है ही । इस विषय में ' सिद्धान्त ' ( काशी ) पत्रके ७-८ वर्षमें हमारा शास्त्रार्थं छप चुका है । इस विषय में ' श्रीसनातनधर्मालोक ' के तृतीय पुष्पमें भी हम स्पष्टता कर चुके हैं । ( इस तृतीय पुष्पका

141शौचादिके समय यज्ञोपवीतका दाहिने कानपर रखना

शौच आदिके समय यज्ञोपवीतसूत्रको दक्षिण कर्णपर लपेटना कर्णे यज्ञोपवीतं कृत्वा मूत्रपुरीषे विसृजेत् '

। ( वैखानसधर्मप्रश्न २।६।१, वैखानसधर्मसूत्र २।६।२ ) । [ शौचविधौ

] ' यज्ञोपवीतं शिरसि दक्षिणे कर्णे वा कृत्वा ' ( बोधायनगृह्यशेषसूत्र

४।६।१ ) इसी प्रकार कात्यायन - परिशिष्टके शौचसूत्र में भी कहा है

। ' याज्ञवल्क्य - स्मृति ' में भी कहा है — ' कर्णस्थ ब्रह्मसूत्र उदङ्मुखः

। कुर्यान्मूत्रपुरीषे तु '

इसकी ' मिताक्षरा ' में ( आचाराध्याय, ब्रह्मचारिप्रकरण १६ पद्य ) ।

लिखा है — ' पवित्रं दक्षिणे कर्णे कृत्वा विण्मूत्रमुत्सृजेत् ' । ' आग्नि- वेश्यगृह्यसूत्र ' में कहा है- ' कर्णस्थ ब्रह्मसूत्र मूत्रपुरीषं विसृजति ' कानमें लपेटनेको समूल बता रहे हैं ।

अब इसमें धार्मिक दृष्टिकोणके अनुसार पाठकगण रहस्य देखेँ । ( १/६२ ) ( पुरुष नाभिसे ऊपर पवित्र है, नाभिके नीचे अपवित्र विशेषतः शौचादिके समय अपवित्र होता है; इस कारण उस 142समय पवित्र यज्ञोपवीतको वहां नहीं रखना पड़ता, किन्तु ' तस्मान्मेध्यतमं त्वस्य मुखमुक्त स्वयम्भुवा ' ( मनु ० १२६२ ) इस प्रमाणसे अत्यन्त पवित्र एवं ज्ञानका भण्डार होनेसे बौधायनके अनुसार सिर पर अथवा वोधायन, याज्ञवल्क्य आदिके अनुसार उसे दाहिने कान पर रखा जाता है ।

दाहिने कानकी पवित्रता उसमें दीक्षा के समय आचार्यों द्वारा · गुप्तमन्त्रोपदेश करने से तथा देवता निवासके कारण सूचित होती है । ' शाङ्खायन ' ने कहा है- ' आदित्या वसवो रुद्रा वायुरग्निश्च धर्मराट् । विप्रस्य दक्षिणे कर्णे नित्यं तिष्ठन्ति देवता: ' । ' आचार मयूख में भी कहा है- ' अग्निरापश्च वेदाश्च सोमसूर्यानिलास्तथा । कहा है – प्रभासादीनि

' तीर्थानि गङ्गाद्याः सरितस्तथा । विप्रस्य एते सर्वेपि विप्राणां श्रोत्रे तिष्ठन्ति दक्षिणे । ' ' पराशर स्मृति ' में भी दक्षिणे कर्णे वसन्ति मनुरब्रवीत् ' ( ७१३६ -४०, १२/२० ) ' गोभिल- ' गृह्यासंग्रहमें भी कहा है- ' मरुतः सोम इन्द्राग्नी मित्रावरुणौ तथैव च । एते सर्वे च विप्रस्य श्रोत्रे तिष्ठन्ति दक्षिणे ' ( २/१० ) इन पद्योंमें ' विप्र ' शब्द द्विजोंका उपलक्षक है । ' प्रधानेन हि व्यपदेशा भवन्ति ' यह न्याय हुआ करता है ।

दाहिने कान के पवित्र होने से ही ' क्षुते निष्ठीवने चैव दन्तोच्छिष्टे तथानृते । पतितानां च सम्भाषे दक्षिणं श्रवणं स्पृशेत् ' ( गृह्यासंग्रह २ । ८६, कार्तिकमाहात्म्य १।३५ ) असत्य आदिके अवसरपर दाहिने कानको छूना कहा गया है । इसलिए अपराधी लोग भी अपनी शुद्धिके लिए दाहिने कानको छूते वा पकड़ते हैं । स्पष्ट है कि- 143देवता निवास होने से उसमें पवित्रता मानी जाती है, इसलिए शौचादिके समय उपवीतकी शुद्धिकी अक्षुण्णतार्थ उसे दाहिने कान पर लपेटा जाता है । किन्होंके मतमें उस समय बाएँ कानपर भी यज्ञोपवीतका रखना कहा है । जैसा कि - ' मूत्रे तु दक्षिणे कर्णे पुरीषे वामकर्णके । उपवीतं सदा धार्यं मैथुने तूपवीतिवत् । कृत्वा यज्ञोपवीतं तु पृष्ठतः कण्ठलम्बितम् । विण्मूत्रे तु गृही कुर्याद् वाम- कर्णे समाहितः ' । यहांपर उपवीतको मूत्रविसर्जनके समय दाहिने कानपर, पुरीष - त्यागके समय बाएँ कानपर, मैथुनके समय कण्ठी करके पीठके पीछे करना कहा है । यदि तब कानपर यज्ञोपवीत रखने में पुरुष भूल जाय; तो उसकी अशुद्धिके कारण उसका त्याग कहा है । जैसा कि ' सायणीय ' में - ' मलमूत्रं त्यजेद् विप्रो विस्मृत्यै- वोपवीतधृक् । उपवीतं तदुत्सृज्य धार्यमन्यद् नवं तदा ' ।

अब इस विषय में वैज्ञानिक वा आयुर्वेदिक दृष्टिकोण उपस्थित किया जाता है । — कानोंकी नसका गुप्त इन्द्रिय और अण्डकोष साथ सम्बन्ध है । मूत्रोत्सर्ग आदिके समय सूक्ष्म वीर्यस्रावकी आशङ्का रहती है । वीर्यका मुख्य केन्द्र मस्तिष्क है । वैसे तो वीर्य सारे शरीरमें व्यापक होनेसे किसी भी छिद्रसे बह सकता है; पर उसका मुख्य द्वार मलमूत्र - द्वार ही है । मूत्रादिके समय वीर्य मस्तिष्कसे चलित होकर, दाहिने कानकी लोहिनिका नसके द्वारा आता हुआ मलमूत्रके साथ सूक्ष्म रूपसे गिरता है । इसी कारण वैद्य वा डाक्टर लोग भी मूत्रके द्वारा ही वीर्यस्रावकी परीक्षा करते हैं । इसी कारण दाहिने कानको यज्ञोपवीतसूत्रसे लपेटा जाता है, 144जिससे वीर्यस्रावसे रक्षा हो । इसीलिए ही मैथुनमें यज्ञोपवीतका कण्ठी करना कहा है; जिससे शुक्रका निरोध न हो । इसके अतिरिक्त जिसको स्वप्नदोष होता हो; वह यदि दोनों कानोंको उपवीतसूत्र से अच्छी तरह बांधकर सो जाए; तब स्वप्नदोष रुक जाता है; ऐसा वैद्य लोग कहते हैं ।

कानकी नसका शिश्नेन्द्रिय से संबन्ध है - इस विषयमें प्रत्यक्ष प्रमाण भी है । जब स्त्री - पुरुष, घोड़ा घोड़ी आदि नौकाके द्वारा नदी पार करते हैं; उस समय घोड़ीको देखकर घोड़ा कामातुर होकर जब शिश्नोत्थान कर लेता है; स्त्रियोंके भी बीच में होने से यह अच्छा न समझकर उस समय मलाह लोग घोड़ेका कान मसल देते हैं; उससे घोड़ेका शिश्नोत्थान हटकर शिश्नसंकोच हो जाया करता है ।

इस प्रकार उस समय सूक्ष्मतया अण्डवृद्धिकी भी आशङ्का रहती है । सात प्रकारकी अण्डवृद्धि में छठा भेद ' मूत्रज - अण्डवृद्धि ' हुआ करता है । तब उससे सम्बन्ध रखनेवाली कानकी नसके यज्ञोपवीतसूत्र द्वारा दब जाने से वह आशङ्का प्रायः नहीं रहती । जिस स्थानमें कानपर यज्ञोपवीत लपेटा जाता है; वहां पर एक पुरुषने छिद्र कराया हुआ था; हमने उससे इसका कारण पूछा । उसने उत्तर दिया कि — ऊँचे स्थानसे नीचे कूदनेके कारण मेरे अण्ड- कोषोंमें विषमता आगई थी । तब डाक्टरने कानके उक्त स्थलमें छिद्र करके उस नसको ठीक कर दिया । इसी कारण कई लोग उस भाग में सुवर्ण - कुण्डल धारण करते हैं, इससे इसमें प्रत्यक्ष 145प्रमारणका अनुग्रह भी होगया । ' प्रत्यक्षे किं प्रमाणान्तरेण ' ।

इसमें लौकिक दृष्टिकोण भी है । मलमूत्र आदिके अवसर पर कानमें यज्ञोपवीत होनेसे हाथ धोना तथा कुल्ला करना नहीं भूलता । उस समय जलकी असुविधा होनेसे पीछे जल मिलने पर कानपर यज्ञोपवीत न होनेसे हाथ धोना भूल जाता है । उस समय अन्य मित्रादि उसके कान पर यज्ञोपवीत देखकर उसको अशुद्ध मानकर उससे हाथ नहीं मिलाते; नहीं तो मित्रगण आते ही हाथ मिलाना प्रारम्भ कर देते हैं । उस समय कानपर यज्ञोपवीत होनेसे अपनी तथा अपने हाथकी शुद्धि तथा कुल्ला करनेसे तात्कालिक दूषित परमाणुओंका नाश होता है । तब हाथकी शुद्धिसे गुप्त - इन्द्रियकी अस्पृश्यता भी हमारे वा अन्यके दिमाग में बैठ जाती है । इससे पुरुष, अशुद्धिके डरसे गुप्त इन्द्रियका व्यर्थ स्पर्श भी नहीं करेगा; नहीं तो सर्वदा उसके स्पर्शसे कुविचारकी आशङ्का बनी रहती है । वृथा स्पर्श न करने से कुविचारोंसे रक्षा भी हो सकती है ।

अब इसमें लौकिक एवं शास्त्रीय दोनों दृष्टिसे शौचादिके समय कान पर यज्ञोपवीत रखनेकी विशिष्टविद्वत्सम्मत उपपत्ति दी जाती है । पाठकगण उसका भी मनन करें—

' यज्ञोपवीतं परमं पवित्रम् ' इस मन्त्रमें यज्ञोपवीतकी पवित्रता स्पष्ट है, परन्तु जैसे पवित्र अग्नि भी श्मशान आदि स्थानमें स्थित हुई व्यवहार्य नहीं होती; वैसे ही उपवीतसूत्र भी अपवित्र अवस्था में उसके सम्बन्धसे निकले विद्युत् प्रवाहसे अपवित्र हो सकता है । यज्ञोपवीत पवित्र अवस्था में तो ब्रह्मसूत्र है; पर अपवित्र 146अवस्थामें वह कपासका सूत्रमात्र ही होता है । मलमूत्रके उत्सर्गे- समय में शरीर की वैद्युतिक - शक्ति दूषित होजाती है । इस दशा में जैसे मदिराके पात्रमें रखे पवित्र भी गङ्गाजलकी तथा हींग आदिके संसर्गसे होमियोपैथिक दवाईकी और अस्पृश्यके संसर्गसे देव- प्रतिमाकी शक्ति दूषित होजाती है; वैसे ही अपावन दशामें पवित्र यज्ञोपवीतकी रक्षा न करने पर वह अव्यवहार्य होजाता है; क्योंकि वह उस समय ब्रह्मसूत्र नहीं रहता । इस कारण गायत्री मन्त्र से अभिमन्त्रित अन्य यज्ञोपवीतसूत्र जब तक धारण न किया जाय; तब तक ब्रह्म ( वैदिक ) कर्मका उस पहिले के अपवित्रीभूत यज्ञोपवीत से करनेका अधिकार नहीं रहता ।

परन्तु मलमूत्रके उत्सर्गके समय शारीरिक अशुद्ध विद्युत्से बचावकेलिए तथा यज्ञोपवीतकी दिव्यशक्तिकी रक्षाकेलिए क्या उपाय हो? इस विषय में ऋषि - मुनियोंने एक उपाय ढूँढ निकाला है । वह यह है कि उस समय यज्ञोपवीत - सूत्रका दाहिने कानसे सम्बन्ध कर देनेपर वह अपवित्र नहीं होता, क्योंकि — किसी ऐसे पवित्र तत्त्वके साथ जोड़ने से जिसकी विद्युत् कभी दूषित न होती हो, उससे सम्बद्ध वस्तुमें भी पवित्र विद्युद् - धारा के प्रवाहसे वह अपवित्र अवस्थामें भी पवित्र रह सकता है । इस प्रकारका कौन - सा तत्त्व है जो कभी भी अपवित्र न हो, जिसके साथ सम्बन्ध कर देनेसे अपवित्र अवस्था में भी यज्ञोपवीतकी पवित्रता त्रिकाल में पवित्र रहनेवाले तत्त्वके पवित्र विद्युत् प्रवाह के संसर्ग से दूषित हो?

147इस पर यह जानना चाहिये कि — प्रकृतिने अपनी सृष्टिका सौन्दर्य प्रधानता से पाँच तत्त्वोंसे अलंकृत किया है । वे आकाश, वायु. तेज, जल, पृथिवी नामक तत्त्व सम्पूर्ण मण्डलके सभी पदार्थों में त - प्रोत हैं । इनमें ऐसा कौन - सा तत्त्व है जो कदापि दूषित न हो? पृथिवी भी देशकालानुसार दूषित होजाती है; जैसे- श्मशानभूमि । जल भी स्थानभेद वा अवस्थाभेदसे दूषित हो जाता है । अन्य जलोंकी तो बात छोड़िये, पात्रस्थ पवित्र गङ्गाजल भी अन्त्यज - स्पर्शसे वा मद्यके पात्रमें रखने से दूषित होजाता है । तेज का भेद अग्नि भी अशुद्ध हो जाया करती है । चिताग्नि तथा मुखकी फू'कसे जलाई हुई अग्नि भी अपवित्र मानी जाती है । वायुभी पुरीषालय, वेश्यालय, मदिरालय आदियोंकी दूषित मानी जाती है । अतः उस दूषित वायुमण्डल में रहने से अनेक व्यक्ति रोग से आक्रान्त होजाते हैं ।

उक्त विवेचनासे सिद्ध हुआ कि - पृथिवी, जल, तेज, वायु ये चार तत्त्व सदा पवित्र नहीं रहते । अपवित्र देशकालमें इनकी पवित्रता नष्ट होजाती है । अवशिष्ट रहा आकाश - तत्त्व । यह अपवित्र से अपवित्र अवस्थामें रहकर भी दूषित नहीं रहता । उसकी विद्युदु - धारा दूषित कभी भी नहीं होती । किसी भी शास्त्रमें यह नहीं लिखा कि अमुक स्थानका आकाश भी दूषित होजाता है । वह जल, वृष्टि आदिसे गीला वा ठण्डा, तेज वा लूसे गर्म, मिट्टी वा धुएँसे मलिन, वायु वा तूफान से कम्पित नहीं होता | मलालय वा मद्यालयका भी आकाश दूषित नहीं होता । इस कारण पवित्र 148यज्ञोपवीतकी भी पवित्रता मलमूत्रोत्सर्गी अपवित्र अवस्था में भी दूषित न हो, एतदर्थ उसका सम्बन्ध सदा पवित्र आकाशके साथ कर देना चाहिये, जिससे आकाश तत्त्वमें सदा पवित्र ठहरा हुआ वैद्युतिक प्रवाह यज्ञोपवीत - सूत्र के सर्वांश में व्याप्त होजाय । जिस प्रकार विद्युद् - भवनके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे विद्युत्प्रवाह सर्वत्र दौड़ता है, वैसे ही आकाशके साथ जोड़े हुए यज्ञोपवीतकी भी पवित्रता नष्ट नहीं होती । वह तब ब्रह्मसूत्र ही रहता है ।

यज्ञोपवीतका बाह्याकाशमें लटकाना असम्भव है । इसके अतिरिक्त शरीरसे पृथक् करने पर भी यज्ञोपवीत अशुद्ध होजाता है । इस कारण शरीरमें आकाशतत्त्व से बना हुआ जो अङ्ग वा इन्द्रिय हो; मूत्र - पुरीषोत्सर्गके समय उसीके साथ यज्ञोपवीत - सूत्रका सम्बन्ध कर देना चाहिये । आकाश, वायु, तेज, जल, पृथिवी इन पाँच तत्त्वोंके गुण क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध हैं । इनको धारण करनेवाले उक्त तत्त्वोंसे उत्पन्न इन्द्रिय हमारे शरीर में क्रमशः कान, त्वचा, आँख, जिह्वा, नासिका हैं । इनमें आकाशतत्त्वसे उत्पन्न कर्णेन्द्रिय ही आकाशके गुण शब्दको ग्रहण करता है; अन्य इन्द्रिय नहीं । तब शब्दग्रहणके कारण कर्णेन्द्रिय ही आकाशसे उत्पन्न है और आकाशकी तरह सदैव पवित्र हैं । इस कारण शास्त्रों में दक्षिण कानकी पवित्रता प्रसिद्ध है । उसके साथ सम्बन्ध कर देनेसे यज्ञोपवीतसूत्र मलमूत्रोत्सर्गकी अवस्थामें भी पवित्र रहता है । दाहिने कानकी पवित्रता होनेसे ही आचार्यगण विशेष- मन्त्रको भी दक्षिण - कर्णमें ही सुनाते हैं । इस कारण अपान वायु 149हो जाने पर शरीरके प्रतिनिधिभूत हाथ से दाहिने कानको छूते हैं; जिससे शरीर शुद्ध हो जाय ।

' पराशरस्मृति ' में भी लिखा है- ' चुते निष्ठीवने चैव दन्तोच्छिष्टे तथानृते । पतितानां च सम्भाषे दक्षिणं श्रवणं स्पृशेत् ' ( ७ । ३८ ) । इस प्रकार अपराधी भी दाहिने कानको छूता है, जिससे उसकी शुद्धि होजाय । हमारी ओरकी स्त्रियाँ भी अन्त्यजादि - स्पर्श द्वारा अपने बालकके अशुद्ध होजाने पर स्नानकी असमर्थतामें अपने दाहिने कानके सुवर्णसे छुए हुए जलको उस पर डालती हैं, जिससे वह पवित्र हो जाय । उसमें कारण दाहिने कान तथा सोनेकी पवित्रताका है । इसी कारण द्विज लोग लघुशङ्का वा दीर्घशङ्काके अवसर पर कानपर यज्ञोपवीतको रखते हैं ।

अब एक ही प्रश्न अवशिष्ट है कि - यज्ञोपवीतसूत्रको दाहिनेही कान पर क्यों रखा जाता है, बाएँ पर क्यों नहीं? इसका उत्तर यह है कि - बाएँ अङ्गसे दाहिना अङ्ग सर्वथा पवित्र माना जाता है । दान दाहिने ही हाथ से दिया जाता है, लिखा भी दाहिने ही हाथ से जाता है । शरीर के वामाङ्गमें स्त्रीशक्ति तथा दक्षिणाङ्गमें पुरुषशक्ति मानी जाती है । जिस स्त्री- जातिको वेदाध्ययन एवं यज्ञोपवीतका अधिकार ही नहीं; तब स्त्री - शक्तिसे समाविष्ट वामाङ्गमें यज्ञोपवीतको रखने का अधिकार ही कैसे हो? जिस स्त्रीशक्तिमें अपवित्रताकी स्थिति स्वाभाविक है; उसके साथ संसर्ग में पवित्र वस्तुकी पवित्रता सुरक्षित क्योंकर हो सकती है? इसलिए ऋषि - मुनियोंने दक्षिण कर्ण पर ही यज्ञोपवीत रखकर मलमूत्रोत्सर्गकी आज्ञा दी है - यही 150यज्ञोपवीतका दाहिने कानपर रखनेका वैज्ञानिक रहस्य है । मलमूत्रोत्सर्गकी समाप्तिमें मार्जन आदि द्वारा तथा हस्तप्रक्षालनपूर्वक सम्यक् शरीरशुद्धि हो जाने पर तब यज्ञोपवीतका दाहिने कान से उतारना ठीक ही है ।

इसके अतिरिक्त शरीरके भीतरी भागसे पीठसे जाती हुई, कन्धेमें होकर छातीके मार्गसे, नाभिप्रदेश से लेकर कमर तक एक प्राकृतिक रेखा है, ऐसा सुना गया है । वह वह्निके वा विद्युतके समान है । वह इन्द्रियोंमें उष्णता उत्पन्न कर मनुष्यको काम - क्रोधादि- से आविष्ट करती है, उसकी धनुषकी आकृति है । उसका स्वभाव लाजवन्ती बूटी के समान होता है, जो स्पर्शमात्र से कुम्हला जाती है । यज्ञोपवीत उसी रेखा पर ठहरता है । इस कारण यज्ञोपवीती व्यक्ति अयज्ञोपवीतियों के समान कामी या क्रोधी या हिंसक नहीं हुआ करते । जो लोग यज्ञोपवीतको प्रतिदिन नहीं धोते, ( प्रतिदिन स्नान नहीं करते ); वे भी क्रोधी हो सकते हैं । मलत्यागके समय यज्ञोपवीत इसीलिए भी कानमें रखा जाता है जिससे जागरित हुई वह विद्युद् - रेखा मलाशय में उष्णता करके मलको विशुद्धतासे उतार दे । इस प्रकार वह रेखा यज्ञोपवीतके भारके सम्बन्धसे सदा हीन होने पर शरीर में उष्णता उत्पन्न कर उष्णतामूलक काम- क्रोधादियोंको उत्पन्न करती है ।

इस प्रकार उपनयन - संस्कारका महत्त्व सिद्ध हो गया । संस्कारसे जैसा चमत्कार होता है, वैसा जन्मसे नहीं । रेशम संस्कारसे ही पहिनने योग्य होता है और कोमल भी । खानसे निकला सोना 151संस्कारसे ही चमकता है । हीरेको यदि शान पर चढ़ाकर संस्कार से चमक न लाई जाय, तो उतना बहुमूल्य नहीं होता, जितना कि चमकदार होने पर | स्वच्छ मरिण भी शानके संस्कारकी अपेक्षा रखती ही है । लकड़ीकी बनी हुई वस्तु रंगरोगनके द्वारा संस्कृत की हुई अधिक शोभा भी पाती है, टिकाऊ भी बनती है । इस अर्थ में तो सभी संस्कार प्रयोजनीय हैं; पर उपनयन तो विशेष - संस्कार है । उसीसे ही उसके अधिकारियोंकी शुद्धि होती है ।

यज्ञोपवीतको देवकार्यमें बाएँ कन्धे पर रखा जाता है, मृतक- पितृकार्य में दाहिने कन्धे पर रखा जाता है । ऋषिकृत्य में निवीती- रूपमें ( कण्ठीकी भांति ) धारण किया जाता है । यह गृह्यसूत्र एवं स्मृतियों में स्पष्ट है । इनका लक्षरण तथा इनका सम्बन्ध भी प्रकरण- वश बताया जाता है - इनको सव्य अपसव्य भी कहा जाता है । ‘ वामं शरीरं सव्यं स्याद् ' ( अमर ० ३।१।८४ ) ' सव्यं वामे च ' ( अजय ) ' सव्यदक्षिणयोर्यत्र विशेषो नास्ति हस्तयो: ' ( पञ्चतन्त्र ) इत्यादि प्रमाणोंसे ' सव्य ' बाएँ - कन्धे पर यज्ञोपवीत रखनेका नाम है । इसी का पर्यायवाचक उपवीती, वा यज्ञोपवीती है — ' तस्माद् यज्ञोपवीती एव अधीयीत याजयेद् यजेत वा यज्ञस्य प्रसृत्यै ' ( तैत्तिरीयारण्यक २।१ ) । – ' अपसव्यं तु दक्षिणम् ' ( अमरकोष ३ । ११८४ ) दक्षिणका नाम अपसव्य है । तो यज्ञोपवीतको दाहिने कन्धे पर करना उसका ‘ अपसव्य - करण ' है । इसीका पर्यायवाचक ' प्राचीनावीती ' होता है । निवीतीका अर्थ है यज्ञोपवीतका कण्ठी करना ' निवीतं कण्ठ- लम्बितम् ' ( अमर ० २ | ७ | ५० ) ।

152श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ )

१३२

अब इनके लक्षण देखिये - ' उद्धृते दक्षिणे पाणौ उपवीती - त्युच्यते द्विजः । सव्ये प्राचीन श्रावीती निवीती कण्ठसज्जने ' ( मनु ० २२६३, अमरकोष २ । ७ । ४६ - ५० ) गलेमें पहने हुए यज्ञोपवीत - सूत्र में दाहिना हाथ घुसा दे । इस प्रकार वह बाएँ — कन्धेमें हो जाता है । यही ' यज्ञोपवीती ' है । जैसा कि ' गोभिलगृह्यसूत्र में कहा है- ' दक्षिणं वाहुमुद्धृत्य शिरोऽवधाय सव्येंसे प्रतिष्ठापयति दक्षिणकक्षमन्ववलम्बं भवति, एवं यज्ञोपवीती भवति ' ( १।२।२ ) । गले में पहरे हुए यज्ञोपवीत- सूत्रमें बाएं हाथको घुसेड़ दे; तो यज्ञोपवीत दाहिने कन्धे पर हो जाता है । इसीका नाम अपसव्यकरण वा प्राचीनावीती है । जैसे कि ' गोभिलगृह्य ' में कहा है- ' सव्यं बाहुमुद्धृत्य शिरोऽवधाय दक्षिणें से प्रतिष्ठापयति, सव्यं कक्षमन्ववलम्वं भवति, एवं प्राचीना- वीती भवति ' ( १।२।३ ) । गलेमें मालाकी तरह यज्ञोपवीतको पहने, बायां वा दाहिना हाथ उसमें न घुसेड़े; तो निवीती होता है । जैसे कि ‘ शिरोवधाय दक्षिणपाण्यादौ अनुद्धृते कण्ठादेव आसज्जने ऋजुप्रालम्बे यज्ञसूत्रे वस्त्रे च निवीती भवति ' ।

अब यह प्रश्न है कि — सव्य, अपसव्य, निवीतित्व किस - किस कर्ममें कर्तव्य है । इसमें जानना चाहिये कि देवकर्म में यज्ञोपवीती, पितृकर्म में प्राचीनावीती, और ऋषि कर्ममें निवीती होना चाहिये । ‘ प्राचीनावीतिना सम्यगपसव्यमतन्द्रिणा । पित्र्यमानिधनात् कार्यं विधिवद् दर्भपाणिना ' ( ३।२७६, गोभि ० ११२४ ) यहां पर पितृकर्म प्राचीनावीतित्व में कहा है- ' कृतोपवीती देवेभ्यो, निवीती च 153भवेत्ततः । मनुष्यांस्तर्पयेद् भक्त्या ऋषिपुत्रान् ऋषींस्तथा ' ( आह्निकतत्त्व ) ।

शेष प्रश्न यह है कि ये भेद क्यों? इसपर ' शतपथब्राह्मण'- का कथन यह है 1 । ' ततो देवा यज्ञोपवीतिनो भूत्वा दक्षिणं जानु आच्य उपासीदन् ' ( २।४।२।१ ) वहां पर देवताओंको यज्ञोपवीती - बाएँ कन्धेमें सूत्र किये कहा है । अतः हमें भी देवकार्यमें वैसा करना पड़ता है.। प्रायः हमें देवकार्य करना पड़ता है; अतः सामान्यतया उपवीत भी हमें बाएँ कन्धेपर ही रखना पड़ता है; इसमें एक और भी प्रयोजन सूचित होता है । वह यह कि शरीरका दाहिना भाग पुरुषका होता है और बायां स्त्रीका । पुरुष पुरुषरूप होता है, स्त्री प्रकृतिरूप । पुरुष स्वतन्त्र होता है, प्रकृति पुरुषके अधीन होती है । बाएं कन्धेपर सदा सूत्र रखनेसे, दाहिनेमें उसके सर्वदा न रखने से सूचित होता है कि स्त्री सदा परतन्त्र रहती है और पुरुष स्वतन्त्र । स्त्रीको पुरुषके अधीन होना चाहिये, पुरुषको प्रकृतिके अधीन नहीं होना चाहिये । ' शतपथ में पूर्व के आगे पितरोंके लिए कहा है- ' अथैनं पितरः प्राचीनावीतिनः सव्यं जानु आच्य उपासीदन; तानब्रवीद् मासि मासि वोऽशनम् ' ( २।४।२।२ ) यहांपर पितरोंको प्राचीनावीती कहा है; तो जो कि- प्रतिमास हम उन्हें भोजन सौंपते हैं, वहां हमें भी प्राचीनावीती होना पड़ता है । आगे — ' अथैनं मनुष्या ( ऋषयः ) प्रावृता उपस्थं कृत्वा उपासीदन् ' ( २ | ४ | २ | ३ ) यहाँ पर मनुष्य- विशेष ऋषियोंका प्रावृत - निवीती होना ( ' निवीतं प्रावृतं त्रिषु ' ( अमरकोष २।६।११३ ) 154दिखलाया है; तब ऋषिकर्म में भी निवीती होना पड़ता है । इस प्रकार तीन ऋणों के शोधनार्थ यज्ञोपवीतकी परम आवश्यकता होती है । अतः यज्ञोपवीतको शरीरसे कभी भी पृथक नहीं करना चाहिये । ' सदोपवीतिना भाव्यं सदा वद्धशिखेन च । विशिखो व्युपवीतश्च यत् करोति न तत् कृतम् ' ( कात्यायन- स्मृति १४ ) । ' बिना यज्ञोपवीतेन द्विजातिर्यद्युपस्पृशेत् । प्राजापत्यं प्रकुर्वीत निष्कृतिर्नान्यथा भवेत् ' ( लघुहारीत ० २१ ) ' विना यज्ञो पवीतेन भुङ्क्त

तु ब्राह्मणो यदि । स्नानं कृत्वा जपं कुर्वन् उपवासेन शुध्यति ( २३ ) । यह यज्ञोपवीत छोड़नेका प्रायश्चित्त कहा है ।

स्वामी दयानन्दजीने ' सत्यार्थप्रकाश ' ( ११ समु ० पृ ० २४४ ) में यज्ञोपवीतको ' विद्याका चिह्न ' माना है, यह बात ठीक नहीं । ऐसा मानने पर वे स्वयं अविद्वान सिद्ध हो जाएंगे; क्योंकि उनका यज्ञोपवीत नहीं था । ' न्यायदर्शन ' ( १।२।१३ ) में ' ब्रात्य ' ( उपनयनादि- रहित ) को भी ब्राह्मण माना गया है; अतः वह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्योंका द्विजत्वसम्पादक तो हो सकता है, विद्वत्ता - सम्पादक वा हिन्दुत्व - सम्पादक नहीं । जहां यज्ञोपवीत धारणका यह प्रयोजन है, वहांपर द्विजत्व - चिह्नका भी प्रयोजन है, सब चिह्नोंके रखनेसे बड़े - बड़े लाभ होते हैं । मुलतानमें एक दंगे में मुसलमानोंने एक ब्राह्मणको मार डाला । यह हिन्दु है या मुसलमान —यह पता न लग सके; इस कारण मुसलमानोंने उसके परिचय - चिह्न नष्ट कर डाले । उसकी चोटी काट ली, तिलक मिटा दिया, इन्द्रिय भी काट दी, धोती भी हटा दी, मुहकी खाल भी उतार ली कि पहिचाना न

155यज्ञोपवीत- रहस्य

जावे; पर शीघ्रता से कमीजमें छिपा हुआ यज्ञोपवीत तोड़ना वे भूल गये; उसके शवको उन्होंने कुऍमें फेंक दिया । सिपाहियों द्वारा लाश मिलने पर उसके यज्ञोपवीत - द्वारा उसकी पहिचान होगई, क्योंकि — उसकी खोज पहलेसे ही जारी थी । तब उसके हत्यारोंको फांसी मिली । कहनेका भाव यह है कि - सभी चिह्नोंके रखनेसे जब - तब लाभ हो ही जाया करता है ।

खेद है कि आजकल पुरुष समाज में यज्ञोपवीत पहिननेका विचार हटता जा रहा है । बड़े नेता कहे जानेवाले भी इसके पहननेसे पराङ्मुख हैं । अन्य बाबू लोग नैकटाई प्रेमसे लगाते हैं जो ईसाकी फाँसीका चिह्न है; हैटके चमड़ेको बड़े गौरवसे सिर पर धारण करते हैं, पतलून खैचनेवाले चमड़े के पट्टे को कन्धेपर बड़े गर्वसे पहनते हैं । रेलवेके टी ० टी ०, पुलिसके थानेदार आदि जनेऊकी तरह चमड़े के पट्टे को बड़ी प्रतिष्ठा समझकर पहनते हैं; पर वे यज्ञोपवीतका भार - सा समझते हैं जो कि नहीं पहरते-

-यह आश्चर्यका अवसर है! स्वा ० दयानन्दजीने भी ऐसे व्यक्तियोंको ठीक डांटा है कि – जब ' पतलून आदि वस्त्र पहनते हो; और तमगोंकी इच्छा करते हो; तो क्या यज्ञोपवीतादिका कुछ बड़ा भार होगया? ( सत्यार्थप्र ० ११ समु ० २४४ पृ ० ) ' यज्ञोपवीत और शिखा को छोड़ मुसलमान और ईसाइयोंके सदृश बन बैठना व्यर्थ है । ' ( स ० प्र ० पृ ० २४४ ) ।

ऐसे व्यक्तियों से यदि पूछा जाय कि आप कौन हैं? तो कहते हैं - हम हिन्दु हैं । परन्तु वेष उनका ईसाइयोंका होता है, 156भाषा भी उर्दू - अंग्रेजी होती है, सिर पर चोटी भी नहीं होती, माथे पर तिलक भी नहीं होता, ग्रीवामें यज्ञोपवीत भी नहीं होता । हिन्दुत्वका अन्य कोई चिह्न नहीं होता; वे अपने आपको हिन्दु कैसे सिद्ध कर सकते हैं? गोरे न होने से वे अंग्रेज भी नहीं । सुन्नत न होनेसे वे मुसलमान भी नहीं । केश, कड़ा आदि न होनेसे सिक्ख भी नहीं । क्या ' इतो भ्रष्टास्ततो नष्टाः ' ही का नाम हिन्दु है? क्या अपने कोई चिह्न भीतर - बाहर न रखनेवालेका ही नाम हिन्दु है? हाय खेद! ऐसोंको लज्जा क्यों नहीं आती? कुछ समय के बाद इन्हें ' हिन्दु ' नाम कहते हुए भी शर्म लगेगी ।

आजकल स्त्री, शूद्र, अन्त्यज भी यज्ञोपवीत पहननेमें उत्कण्ठित दिखाई देते हैं; पर शास्त्रानुसार उनका उसमें अधिकार नहीं; इस विषय पर ' श्रीसनातनधर्मालोक में ५०० पृष्ठ दिये गये हैं । कुछ अंश ‘ श्रीसनातनधर्मालोक के तृतीय पुष्पसें भी दिया है । पाठक उसे मँगाकर देख सकते हैं । इससे उनके एतद्विषयक सन्देह मिटेंगे । इस उपनयनका नाम ' यज्ञोपवीत ' प्रसिद्ध है । इसका अर्थ है- ‘ यज्ञका सूत्र ' । यज्ञमें द्विजका अधिकार होता है— ' अयं स होता यो द्विजन्मा ' ( ऋ ० १।१४६ ५ ) । तब द्विज पुरुषों से अतिरिक्त यज्ञ का व अन्य कौन ले सकता है । इस कारण स्त्री - शूद्रान्त्यजादि यज्ञ तथा यज्ञ - विषयवाले वेद में अनधिकृत हैं ।

जोकि स्वा ० दयानन्दजीने ' यज्ञे सौत्रामणीसुते ' ( यजुः १६।३१ ) इस पदसे यज्ञोपवीत धारण करना अर्थ किया है, वह ठीक नहीं । अपने वेदभाष्यमें स्वामीजीने इस प्रकार अर्थ किया है - ' यज्ञे 157( सौत्रामणी ) सूत्राणि - यज्ञोपवीतादीनि मणिना - प्रन्थिना युक्तानि क्रियन्ते यस्मिन्, तस्मिन् ( सुते ) सम्पादिते ' जिसमें यज्ञोपवीतादि ग्रन्थियुक्त सूत्र धारण किये जाते हैं, उस सिद्ध किये हुए यज्ञमें ' । स्वामीजीका यह अर्थ ' मीमांसादर्शन, शतपथ ब्राह्मण, कातीयश्रौत- सूत्र तथा कोश - व्याकरणादिसे विरुद्ध ही है । सौनामरिण एक यज्ञविशेष ही है; यह यज्ञोपवीतका नाम नहीं । शतपथ एवं मीमांसा- दर्शन में सौत्रामणी - यज्ञविशेषके देखने से स्पष्ट है कि यह यज्ञविशेष है, यज्ञोपवीत - संस्कार नहीं । ' शतपथ ब्राह्मण ' में लिखा है— ' सुरावान् वा एष बर्हिषद् यज्ञो यत् सौत्रामणी ' ( १२ / ८३१-२ ) इसी कारण यजुर्वेद में ' सुरावन्तं बर्हिषदं सुवीरं यज्ञ ' ( यजुः १६।३२ ) मैं यह कहा है ।

' सौत्र'का ' यज्ञोपवीतवत् ' ' मणि ' का ग्रन्थि ' सुते ' का ' सम्पादिते ' यह अर्थ भी निर्मूल होनेसे असङ्गत ही है । ' गौतमधर्मसूत्र ' में ४८ संस्कारोंमें यज्ञोपवीतसे ‘ सौत्रामणी ' को पृथक् रखा गया है । अस्तु-

जो लोग स्त्री - शूद्रादिको यह कहकर उत्तेजित करते हैं कि- सनातनधर्मियोंने तुम्हें उपवीतका अधिकार न देकर तुम्हारा अपमान किया है, उन्हें यह तो देखना चाहिये कि वही सनातनधर्म संन्यासियोंको यज्ञोपवीत नहीं देता, वा उन्हें नहीं पहनने देता; क्या इससे वह उनका अपमान करता है? नहीं - नहीं । बल्कि संन्यासी वा यती लोग तो सर्वनमस्करणीय माने गये हैं । अतः • वादियोंकी यह उत्तेजनात्मक नीति ठीक नहीं । यहाँ तो अधिकार- अनधिकार में शास्त्रकी ही मान्यता होती है । तीन आश्रम, तीन वर्णों 158के पुरुषों में ही उपवीतका अधिकार होता है; तभी यज्ञोपवीतकी तीन तन्तुएँ होती हैं । इस प्रकार ' उपनयन ' मुख्य संस्कार तथा रहस्यपूर्ण सिद्ध हुआ ।

उपनयन में मेखला

उपनयनमें मेखला हुआ करती है । मेखलाका माहात्म्य पारस्कर- गृह्यसूत्रके ' इयं दुरुक्कं परिबाधमाना वर्णं पवित्रं पुनती म आगात् । प्राणापानाभ्यां बलमादधाना स्वसा देवी सुभगा मेखलेयम् ' ( २ राश ८ ) इस मन्त्र में आया है । इससे स्पष्ट है कि - यह लाभदायक है । प्राण - अपानको बल देनेसे यह हार्निया रोगको नहीं होने देती । पाठकोंने देखा होगा कि कई वृद्ध पुरुष नल वढ़ आने से रबड़की एक साँपकी भांति नलके स्थान पर एक पेटी बांधते हैं; इससे वह स्थान दबा रहनेसे नल - वृद्धि नहीं हो पाती । ब्रह्मचर्यावस्थासे मेखला रखने पर पच्चीसवें वर्ष उतार देने पर फिर उस रोगकी सम्भावना नहीं रह पाती । कोई अन्त्ररोग नहीं हो पाता ।

इसी मेखलाबन्धनका ही दूसरा रूप पतलून पर पेटी बांधना, पजामे में नालेका बांधना, नेकर पहिनना, कमरबन्द बांधना, सिपाहियोंका पेटी बांधना आदि है । कटिके निचले स्थल पर मेखलाका दबाव पड़ने से प्रारण अपानकी गति ठीक रहती है । इसी से कमर कसने पर चुस्ती मालूम पड़ने लगती है । अतः अन्त्रवृद्धि की शङ्का नहीं हो पाती । यद्यपि धोती, साड़ी, लहंगा आदिके बन्धन भी इसीके रूपान्तर हैं; तथापि वैध - संस्कार वा अभिमन्त्रण द्वारा मेखलाबन्धन विशेष लाभदायक है जैसा कि मन्त्रमें कहा जा 159चुका है । वह वायुको शान्त करके कामचेष्टामें संयम लाती है, पुस्त्वको भी स्थिर रखती है ।

मेखला -भेद वर्ण - भेदको बताता है, जिस प्रकार पेटीका भेद पुलिस, मिलटरी आदिमें भेद बताता है । मेखला मूंजकी जो कही गई है; तो मुञ्जमें यह विशेष गुण है कि वह दाह, रक्त, मूत्राशय- सम्बन्धी रोगों तथा नेत्र रोगोंको दूर करता है । इस मौञ्जीको कमर में कसकर स्नान - ध्यान आदिसे तेज समस्त देह में भर जाता है । इससे ब्रह्मचारीका बल बढ़ जाता है, तथा प्रारण अपानकी शक्ति प्राप्त होती है । यह मेखला विद्युत् शक्तिको लौटाती है, और उसको स्थानान्तरित भी करती है । जैसे बैटरी में जोड़ी हुई गोलाकार तार विद्युत्को लौटाती है, और स्थानान्तरित करती है ।

मेखला बांधने से कमरकी शक्ति बढ़ती है । आजकल यौवनमें ही नवयुवकों की कमर जो कि झुक जाती है; वहाँ मेखलाका धारण न करना ही हेतुभूत है । अंग्रेजोंका ' वेल्ट ' बांधना मेखलाका ही अनुकरण है । पर मौञ्जीमें जो गुण है, वह कमरबन्दमें कहांसे हो सकता है । मौजी मेखलामें व्यय भी नहीं है, गुण बहुत से हैं । यह सर्वविदित है कि - संकट उपस्थित होने पर कार्यकर्ताको उत्साह देनेके लिए कहा जाता है कि- ' कमर कसकर तैयार हो जाओ ' । तब कमर कस लेने पर निर्बलका भी साहस बढ़ जाता है । तब वैध मेखला - धारणके लाभ कितने हो सकते हैं - यह स्वयं सोचा जा . सकता है | क्षत्रियके लिए धनुषकी डोरीके समान तनी हुई मूर्वा- तृणकी, और वैश्यके लिए सनकी मेखला कही गई है । क्षत्रिय 160और वैश्यको बल - व्यापारादिमें भविष्य में लगने से कमरकी दृढता बहुत अपेक्षित होती है; अतः उनके लिए भिन्न मेखलाका विधान है ।

उपनयनमें भिक्षा एवं गायत्री

उपनयनमें भिक्षा भी माँगी जाती है, उसका रहस्य यह है कि धनीका भी लड़का निर्धनके समान भिक्षा मांगे, जिससे भविष्य में उसे धनका गर्व न रहे और सभी अपने पर देशका ऋण समझें । भविष्यमें वे अपनेको देशका ऋणी समझकर देश- सेवा द्वारा उस ऋरणकी पूर्ति करें । अन्य इस विषय में ' षोडशसंस्कार- रहस्य ' में बताया जायगा ।

उपनयनसंस्कार में वेदके सारस्वरूप सावित्र - मन्त्रका उपदेश भी दिया जाता है, जिसे ' गायत्री मन्त्र ' कहा जाता है । उस गायत्री- मन्त्रका क्या महत्त्व तथा उस महत्त्वका क्या रहस्य है, यह अग्रिम निबन्धमें बताया जाता है, ' आलोक ' पाठक इसे भी सावधानता से देखें |

सूचना – यह पञ्चम पुष्प है; इससे पूर्वके चार पुष्पोंका मंगाना भी आवश्यक है ।

। जिनके पास न हों; वे उन्हें हमसे मंगा लें । मूल्य ७ । ) डाक - व्यय पृथक् ।

161( ५ ) गायत्री मन्त्रकी महत्ताका रहस्य ।

' गायत्री छन्दसामहम् ' ( भगवद्गीता १०।३५ )

' उपनयन - रहस्य ' हम बता चुके; उपनयनमें गायत्री मन्त्रका उपदेश किया जाता है । यह क्यों? इसका इतना महत्त्व क्यों? इसपर अब विचार किया जाता है ।

' ॐ भूर्भुवः स्वः, तत् सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् । ' यह मन्त्र धार्मिक जगत् में प्रसिद्ध है । यह ' अथर्ववेदसं ० ' से अतिरिक्त तीन वेदोंकी संहिताओं में मिलता है । ' अथर्ववेद ' की शौनकसंहितासे भिन्न किसी संहितामें उक्त मन्त्र कदाचित् मिल जाय; यह सम्भावना हो सकती है । तथापि अथर्ववेद - शौनकसंहिता ( १६।७१।१ ) में वेदमाता गायत्रीकी महिमा तो वर्णित है ही । ' ऋग्वेद ' की शाकलसंहिता में ( ३।६२।१० ) उक्त मन्त्र ं मिलता है, ' सामवेद ' की ' कौथुमसंहिता ' में भी उत्तरार्चिक ( १३।४।३।१ ) में मिलता है । शुक्ल यजुर्वेदकी वाजसनेय - संहिता ( ३।३५, १६।३, २२/६, ३०/२ ) में, तथा काण्वसंहिता ( ३।४३, २४ | १३, ३४ | २ ) एवं ' कृष्णयजुर्वेद ' की ' तैत्तिरीयसंहिता ' ( १२५२६३१२, १ | ५ | ८ | १०, ४ | १ | ११ | ७ ) में तथा कृष्णयजुर्वेदकी ' मैत्रायणी - संहिता ' ( ४ । १० । ७७ ) में भी मिलता है । इस प्रकार अन्य वेदसंहिताओंमें भी इसका मिलना सम्भव है ।

यह गायत्री मन्त्र, सावित्री, गुरुमन्त्र आदि नामोंसे प्रसिद्ध है । गायत्री छन्दवाला होनेसे यह ' गायत्री ' नामसे प्रसिद्ध है । यद्यपि 162गायत्री छन्दवाले मन्त्र अन्य भी बहुत से हैं; तथापि ' प्रधानेन हि व्यपदेशा भवन्ति ' इस न्यायसे प्रधान इसी मन्त्रका उक्त नाम प्रसिद्ध है । अथवा ' गायत्री गायतेः स्तुतिकर्मणः ' ( निरुक्त ७ | १२ | ६ ) ' गायतो [ ब्रह्मणो ] मुखादुदपतत् - इति ब्राह्मणम् ' ( नि ० ७११२।५ ), तथा ' गायन्तं त्रायते ' इत्यादि निर्वचन से योगिक रूप से भी उक्त नामसे प्रसिद्ध है । ' सा हैषा गयान् [ प्रारणान् ] तत्रे, तस्य प्राणान् त्रायते ' ( शत ० १४/८/१५/७ ) इस प्रकार गायत्री प्राण- रक्षणी विद्या भी है । ' सवितुरियम् ऋकू ' इस विग्रह से यह मन्त्र ‘ सावित्री ' नामसे भी प्रसिद्ध है । इसी कारण ही इसकी स्त्रीलिङ्गसे प्रसिद्धि है । अथवा गायत्री, त्रिष्टुप् जगती इन तीन छन्दोंके ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्योंके सावित्र मन्त्र हैं, तब इन छन्दोंके स्त्रीलिङ्गान्त होनेसे गायत्री - सावित्री, त्रिष्टुप् -सावित्री, जगती- सावित्री इस प्रकार भी ' सावित्री ' में स्त्रीत्व है । इस प्रकार ' वेदमाता ' ( अथर्व ० १६७१।१ ) इस नाम से प्रसिद्ध होने से भी इसमें स्त्रीलिङ्ग- रूपसे प्रसिद्धि है । इसके अतिरिक्त सविता वाले मन्त्र में सविता की शक्ति भी सन्निहित है, क्योंकि - शक्ति तथा शक्तिमान्‌का अभेद हुआ करता है; कभी उस शक्तिमान्को शक्तिरूपसे भी वर्णित किया जाता है । शक्ति स्त्रीलिङ्ग होनेसे उसे ' देवी ' रूप में वर्णित किया जाता है । सविता की शक्ति ही गायत्रीदेवीके नामसे विख्यात है । इसी कारण सनातनधर्मकी सन्ध्या में उक्त मन्त्रके विसर्जनके अवसर पर ' उत्तमे शिखरे देवि! ' ( तैत्तिरीयारण्यक १० ३० ) इस प्रकार स्त्रीत्वका प्रयोग है | सविताको शक्तिरूप होनेसे उसका ' श्वेतवर्णा

In English

The Sacred Thread and the Upanayana Rite

This text explains the ritual of Upanayana, which marks a person's second birth as a 'dvija' through the instruction of the Gayatri mantra. It details the significance of wearing the sacred thread (yagnopavit) and provides mathematical and symbolic reasons why the thread must be wrapped sixty-six times.

This chapter answers

  • What is the meaning of upanayana?
  • Why is a person called a dvija after upanayana?
  • Why is the sacred thread wrapped 66 times?
  • What is the connection between yagnopavit and the vedas?

Also written: Yagyopavita, Rahasya, Yagyopavita Rahasya, यज्ञोपवीत - रहस्य

मूल ग्रन्थ

यह पाठ सनातन धर्मालोक ५के मुद्रित पृष्ठ 119–162 से ज्यों-का-त्यों लिया गया है — न कुछ जोड़ा गया है, न घटाया। स्कैन किया हुआ मूल पृष्ठ देखनेके लिये —

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