पञ्चम सुमन · प्रकरण 5
कच्छबन्ध - रहस्य
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193इसी प्रकार कानके वन्द करने में भी समझ लेना चाहिये । उस समय शिखाका खोले रखना भी ठीक नहीं । खोलकर फिर उसमें ग्रन्थि दे देनी चाहिये, इस विषय में शिखा - विज्ञानमें हम दिखला चुके हैं ।
पांओंकी शुद्धि आवश्यक है ही, क्योंकि जूते आदिका स्पर्श वा अशुद्ध स्थलका स्पर्श होने से शुद्ध कर्म में अशुद्धि न प्रवेश करे- • अतः पावोंकी जलसे शुद्धि आवश्यक ही है; अब शेष रह जाता है कच्छ बांधना | कच्छसे लांग ( धोतीके पीछेकी ग्रन्थि ) बांधना इष्ट है । जहां वह हमारे कर्मका अङ्ग है वहां लौकिक लाभ भी इसके स्पष्ट हैं । एक तो हिन्दु - मुसलमानका भेद स्पष्ट हो जाता है । उत्तर प्रदेशमें हिन्दुओंकी सङ्गतिसे मुसलमान भी लांग बांधते हैं; पर अन्यत्र पंजाबादिमें नहीं बांधते । पश्चिमी पंजाबके ग्रामके लोगोंने लांग खोले रखना यह वहांके मुसलमानोंके सम्पर्कसे सीखा है । वैदिककर्माधिक़ारी होनेसे द्विजोंका लांग बांधना आवश्यक है । स्त्रियों में भी कर्माधिकार न्यून होनेसे उनकी साड़ीकी लांग भी . खुली रहती है । पर बंगाल आदि दक्षिण देशों में स्त्रियों में भी लांग बांधनेका प्रचार है ।
अब लांगके लौकिक लाभों पर भी विचार कर लेना चाहिये । लांग न बांधने से चलनेके समय धोतीके अंशके द्वारा जांघोंके पास घर्षण होता रहता है; इससे वहांकी त्वचा तथा नसोंको हानि पहुँचती है । धोतीके आगे के भागके वस्त्रके पांवमें पहुँचने से गिरने की भी आशंका रहती है । उसके वेगसे मट्टीके उड़नेकी आशंका भी 194रहती है; और लघुशंका करनेके समय अपने आपको नीचे से नंगा करना पड़ता है । घोड़ेपर वा साइकलपर कूदकर चढ़नेसे नंगे होनेकी शंका रहती है । इसलिए स्त्रियोंकी साड़ी वा घाघरा आदिके लांग - हीन होनेसे साइकल पर कूदकर चलने के समय नंगेपनकी आशंका रहती है; उस आशंकाको दूर करने के लिए स्त्रियों केलिए विशेष प्रकारका साइकल बना होता है, जिसका डंडा ऊपर नहीं होता, किन्तु नीचेसे ही टेढा हुआ हुआ होता है; इससे उन्हें उस पर कूद कर चढ़नेकी आवश्यकता नहीं पड़ती । इससे उनकी नग्नताकी आशंका भी नहीं रहती । हिन्दु जातीयताका चिन्ह तो है ही । प्राचीन समयसे हिन्दुका ऐसा वेष चला आता है, जिससे पुरानी हिन्दु - जातिके दर्शन भी हो जाते हैं ।
पंजाब आदिमें मुसलमान इसे हिन्दुओं का चिह्न मानकर उनसे विरुद्ध व्यवहार वाले होनेसे लांग नहीं बांधते । लेकिन घोड़े वा साइकिल आदि पर कूदकर चढ़ने की आवश्यकता में उन्हें भी नग्नताका अनुभवहोता है । तब पीछेकी लांग बांधने में हिन्दुओंका चिह्न न हो जावे, इस कारण वे पीछेकी लांग न बांधकर आगेसे लांग बांध लेते हैं अर्थात पीछेके धोतीके हिस्सेको नीचेसे आगे ऊपर बस्ति- वाले स्थानके पाससे निकाल लेते हैं । यह भी एक लांग जैसी बन जाती है, इससे नग्नताकी आशंका नहीं रहती, पर द्रविडप्राणायाम के समान हो जानेसे इसमें असुविधा बहुत होती है । मशकोंके उठानेवाले मुसलमान भी ऐसी ही लांग बांधते हैं, जिससे धोतीका खुला हुआ भाग जांघसे घिसता हुआ तकलीफ न पहुँचावे । 195सन्ध्यादिके समय लांग न बांधी जाय तो नीचेसे नग्नता होनेसे देवताकी अवहेलना समझी जाती है; अतः उस समय लांगका बांधना आवश्यक है | धोती में पीछे की लांग होने से चलने, उठने, बैठने आदि में एक सुविधासी रहती है इसका अनुभव लांग बांधने- वाले ही जान सकते हैं ।
लांग खोले रहने में तब त्रयुक्तता नहीं मानी जाती; जब अन्दर से कौपीन ( लँगोटा ) हो । इसलिए जव ब्रह्मचारी वा संन्यासी विना लांगकी धोती बांधते हैं; तो वे अन्दर कौपीन पहर लेते हैं । स्त्रियां वैसा साड़ीका वेष सुन्दर लगनेसे अन्दरसे पेटीकोट पहर लेती हैं । पजामा, सलवार, पतलून आदि पहनना हिन्दु - वेष नहीं है । यह मुसलमानों वा अँग्रेजोंसे आया है । हमारे धार्मिक कार्योंमें इसका उपयोग नहीं किया जाता । उनके पहननेवाले उन्हें उतारनेके समय अन्य पजामे वा पतलून आदि नहीं पहर सकते; अतः उन्हें अन्य पजामा आदि बदलने और पहले पजामा आदिके उतारने में या तो नंगा होना पड़ता है या धोती पहननी पड़ती है । पजामे आदि में बन्धन होता है, नालेकी पराधीनता पड़ती है; कभी नाला ही नहीं खुलता, कभी टूट ही जाता है तो बड़ी असुविधा होती है । पेशाब आदिके समय पजामा खोलकर कुछ नग्न भी होना पड़ता है, पर धोती में स्वाधीनता है । आग लग जाए तो धोतीको जल्दीसे खोला जा सकता है; पर पजामे आदि खोलने में बहुत देर लग जाती है; उसके उतारनेमें भी समय लग जाता है । पैन्टवाला नीचे भूमि पर ठीक नहीं बैठ सकता; उसे टांगें फैलाकर असभ्यतासे बैठना पड़ता 196है । साथ ही उसने कन्धे तककी चमड़ेकी पेटी भी यदि लगा रखी हो, और कभी बूटके सबब से गिर जावे; तो फिर वह स्वयं उठ भी नहीं सकता, जब तक कि कोई दूसरा उठाकर खड़ा न करे । अतः धोतीका वेष जहां प्राचीन है, भारतीयता वा हिन्दु - संस्कृति वा सात्त्विकताका बोध करानेवाला है वहां बहुत लाभका भी देनेवाला है, और लांग होनेपर लघुशंका आदिके समय बिना धोती खोले भी मूत्रत्याग आदि कार्य में कोई रुकावट नहीं पड़ती, और किसी भी प्रकारकी नग्नताका अनुभव नहीं करना पड़ता । लगता भी यह वेष सुन्दर है । पर लार्ड मैकालेके मानस दास इस पर उपहास करते हैं । इसका भाव यह है कि उन्हें भारतीयता से घृणा तथा अँजियत से ' अनुराग है ।
सड़क आदिमें कीचड़ होनेपर धोतीको सिकोड़ा भी जा सकता है । यदि कभी बहुत आवश्यकता भी पड़े तो धोतीके अग्रभागके कपड़े में कोई वस्तु भी ली जा सकती है । जो नाक आदि साफ कर चुके हों तो उसके अग्रभागसे नाकको साफ भी किया जा सकता है । गीले हाथ भी सुखाये जा सकते हैं । आंख वा नाकमें खुजली होनेपर उसके अग्रभागसे ठीक किया जा सकता है ।
फलतः लांग - सिष्टम तथा धोतीवाला वेष जहां प्राचीनता एवं सात्त्विकता लिये हुए है वहां लाभप्रद भी बहुत है । हिन्दुजातिको इसका परित्याग नहीं करना चाहिये । इसे कमर पर लपेटकर बांधनेका अभ्यास करना चाहिये | अभ्यासी व्यक्ति जब इसे बांधता है; तो दूसरा व्यक्ति उस धोतीको खैंचकर भी खोलने में समर्थ नहीं हो सकता । अतः जो लोग खुल जानेके डरसे इसे नहीं पहनना चाहते वा इसके पहिननेमें असभ्यता समझते हैं उन्हें यह भ्रम दूर कर लेना चाहिये ।
197( ७ ) षोडश संस्कार और उनका रहस्य
' पुत्र ही पिता होता है, ' ' आजके बालक कलके भविष्यद् भारतवर्ष हैं ' ये उक्तियाँ जहाँ प्रसिद्ध हैं, वहाँ ठीक भी हैं । हम बालकोंमें जैसा संस्कार डालेंगे, हमारे आचार - विचारोंका जो प्रभाव उनपर पड़ेगा, वे वैसे ही बनेंगे; वही आगे भारतवर्षका स्वरूप बनेगा । अंग्रेजी राज्यके समय अंग्रेजियतका प्रभाव जनता पर अधिक पड़ा; उस जनताके वैसे ही आचार - विचार - विहार बने । उसका बालकों पर गम्भीर प्रभाव पड़ा । उस समय बालक आज युवा हैं । वे भी अप - टू - डेट अंग्रेज बने हैं । न केवल उनका वेषभूषादि बाह्य व्यापार ही, अपितु उनका मन एवं मस्तिष्क भी वैसा बना है । अंग्रेजों के चले जाने पर भी अंग्रेजियत नहीं गयी । लार्ड मैकालेने भारतीय बालकों पर अपनी शिक्षा - दीक्षाका संस्कार डालकर उनको इस प्रकार अपना मानसिक दास बना लिया है कि अब वे युवक प्राच्य - साहित्य से घृणा दिलानेवाले विषैले साहित्य की सृष्टिमें लगे हैं । उन पर प्राच्य आचार - विचारोंका तथा प्राच्य युक्तियोंका प्रभाव नहीं पड़ता । ' पूर्वको दिशा भारतका उदय है, पश्चिम अस्त है ' - यह वे जानते हुए भी नहीं जान पाते ।
अब आगे भारतीय बालकको नवीन वातावरणके चंगुल से बचाना चाहिये, उस पर पाश्चात्त्य संस्कारोंका असर न पड़ने देकर प्राच्य संस्कार डालने चाहियें - जिससे यहाँका बालक . भारतीय - धर्म एवं भारतीय - संस्कृतिका उपासक बने, उससे जातीयता 198की भावना तथा गौरव न छूटे; अतः बालक पर अपने संस्कार डालने चाहियें । यह उचित भी है; क्योंकि नीति - शास्त्रकी यह उक्ति परम प्रसिद्ध है कि- ' नवे हि भाजने लग्नः संस्कारो नान्यथा भवेत् ' नवीन पात्र में लगा हुआ संस्कार अन्यथा नहीं हुआ करता; उसमें स्थिर रहा करता है । वह नवीन पात्र बालक है । उस पर जो आचार - विचारका संस्कार पड़ेगा, वह परिवर्तित नहीं होगा । बालक पर ही देशका, जातिका, धर्मका तथा संस्कृतिका भविष्य निर्भर है । संस्कारोंसे ही बालक सद्गुणी, सद्विचारसम्पन्न, सदाचारी, सत्कर्म - परायण, आदर्शभूत, अनुशासनप्रिय, सेवा- परायण, साहसी एवं संयमी होगा । इसके ऐसा बनने से समाज तथा ' देश भी वैसा बनेगा । बालकके संस्कारहीन होने पर वह बिगड़ेगा; इससे देश एवं समाज भी बिगड़ेगा । इसी बिगड़नेके परिणाम कलह, युद्ध एवं महायुद्ध हैं ।
बालककी सीमा क्या है? शिशु, बाल, कुमार, पौगण्ड, किशोर – ये बालकके अवस्था - भेद हैं । बालक इन अवस्थाओं में सब सीखता है बालक अनुकरणप्रिय तो होता ही है; हम जो करेंगे, वह वही करेगा । इस कारण हमें उसके सामने आदर्श बनकर रहना पड़ेगा! ' यह अबोध शिशु है इस पर हमारे असंयम आदिका क्या प्रभाव पड़ेगा ' – यह सोचना सर्वथा अयुक्त है । · उसके मन - बुद्धिका विकास चाहे न हुआ हो, तथापि मन एवं बुद्धि की सत्ता तो उसमें भी होती है; अतः उस पर भी यथा तथा प्रभाव पड़ता ही है ।
In English
The Importance of the Lang and Traditional Dress
This text explains the practical and religious necessity of tying the lang (a knot behind a dhoti) during rituals. It argues that traditional Indian clothing provides more physical freedom and cultural identity than Western garments like trousers.
This chapter answers
- Why is it necessary to tie a lang in a dhoti?
- Benefits of wearing a dhoti over trousers?
- How to maintain purity during religious rites?
- Differences between hindu and muslim clothing styles?
Also written: Kachchhabandha, Rahasya, Kachchhabandha Rahasya, कच्छबन्ध - रहस्य