पञ्चम सुमन · प्रकरण 91
गणेश एवं गणनायकके स्वरूपका परिचय
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813का प्रसङ्ग उपस्थित हो सकता है । इसके अतिरिक्त गणनायकको बड़े कान वाला भी होना चाहिये । उसमें गगकी बातोंकी सुनवाई भी हो, कुत्ते तककी भी सुने, इसलिए उसके कान बड़े हों, तंग नहीं ।
५. ' लम्वोदरः ' — गणनायकका पेट बड़ा होना चाहिये, जो बातें सुनता रहे, उन्हें पेटमें जमा करता जाय, हज़म करता जाए । इसके लिए उसका पेट बड़ा होना चाहिये, सब चीजें उसमें समा सकें ।
६. विकट - गणनायकको ' विकट ' भी बनना चाहिये । ' विकट ' न बनेगा तो उसे शत्रु शष्प - तुल्य समझकर उखाड़ फेंकेंगे । ' सीधी अंगुलिसे घी भी नहीं निकल सकता । '
७. विघ्ननाशः — गणनायकको विघ्नविनाशक भी बनना चाहिये । गणराज्यकी असफलता करनेवाले जो विघ्न आवें उन्हें पीस दे । तभी ' गण ' का उसपर विश्वास होगा ।
८. ' विनायकः ' - विघ्ननाशक होने से ही गणनायक विनायक– विशिष्ट नायक, विशिष्ट नेता, बन सकता है ।
ε. ' धूम्रकेतु ' – गणनायकको ' धूम्रकेतु ' भी बनना चाहिये । धूम्रकेतु अग्निको कहते हैं, अग्निमें पतंगे जल मरते हैं, सिंह आदि हिंस्र जन्तु इससे दूर रहते हैं, शरीरको काटनेवाले, खराब करनेवाले कीटाणु अग्निके प्रभावसे अलक्षित हो जाते. हैं । अग्निका केतु धूम्र होता है उस धुएँसे विदेशी शत्रुओंकी आंखोंसे श्रांसू निकलवाता रहे, उस धुएँको अपने में न रखकर दूर - देशोंमें 814भिन्न - देशोंमें, विदेशों में, शत्रु- देशों में फहराता रहे । जिससे वे डरकर दूर भागें कि — कहीं यह प्रज्वलित अग्नि हमें जलाती न जाये । धूम्रकेतु पूछल तारेको भी कहते हैं । ' धूम्रकेतुरहित जनस्य ' शत्रु - राजाओंकेलिए गणनायक पूछल तारा रहे । उनकेलिए अशुभोत्पादक रहे । ऐसा गणनायक शत्रु- देशोंकेलिए होना भी चाहिये, क्योंकि ' लातोंके भूत बातों से नहीं मानते ' ।
१०. ‘ गणाध्यक्षः ’ – गणनायकको ' गणाध्यक्ष ' अपने गणका वास्तविक अध्यक्ष होना चाहिये, उसकी सब तरहकी देख - रेख वाला, उसका स्वामी होना चाहिये । साधारण- स्वामी भी न हो, किन्तु विनायक, विशिष्ट नेतृत्व करनेवाला हो, उसका प्रताप ऐसा हो कि उसके समक्ष सबका सिर अवनत होना चाहिये । यही ' गणाध्यक्षता ' है ।
११. ' भालचन्द्रः– गणनायकको ' भालचन्द्र ' भी होना चाहिये, चन्द्र उसके भाल पर, माथे पर हो । ' चन्द्र ' से आह्लादकता विवक्षित है । उसके माथेका ऐसा प्रभाव हो कि गण उसे देखते ही आह्लादित हो उठे । चन्द्र भी मस्तकपर द्वितीयाका होता है, जिसे सब नमन करते हैं, उसके भालके आगे सब झुकें । चन्द्र कलाधर भी होता है । गणनायक सभी कलाओं को सिर माथे रखे, अर्थात् उनका ज्ञान रखे ।
चन्द्र, द्विजराज भी होता है । गणनायकको भी द्विजोंको राजित करना चाहिये । यदि वह अद्विजोंको राजित करेगा, तो वह ' भालचन्द्र ' न होगा । वह गणके विशिष्ट नेतृत्वको प्राप्त न कर 815सकेगा । फिर निम्न जातियां
- ही उसे अपना मतदान करेंगी, उच्च- जातियां नहीं | तब निम्नोंको प्रसन्न करनेकेलिए उसे निम्नोंके निम्न कार्यों में प्रोत्साहन देना पड़ेगा । यदि वह कभी निम्न- कार्यों में प्रतिबन्ध डालेगा, जैसे कि समयानुसार नियन्त्रण करना पड़ता है, तो वे निम्न ही फिर उसे पटक देंगे, उच्च तो पहलेसे ही उसके सहयोगी न होंगे । इसलिए कहते हैं कि ' छोटोंको मुँह लगाना अच्छा नहीं होता ', नहीं तो फिर वे अपनी छोटी- छोटी बातें भी मनवाते रहेंगे, न मानने पर वे बहुत तंग करते हैं । उससे गणनायकके विशिष्ट - नेतृत्व में विघ्न खड़े हो जाते हैं । उस समय वह ' विघ्नेश ' न रहकर विघ्ननेय, विघ्नवशी हो जाता है ।
चन्द्र, क्षपा ( रात्रि ) -कर भी होता है । गणनायकको शत्रु देशों की रात्रि करनेवाला होना चाहिये । शत्रुओंकी बातें मानता रहा, अपनी बातें उनसे न मनवा सका, तो वह कभी शत्रुओंके चक्र में फँसेगा । उसपर से गरणका विश्वास भी धीरे - धीरे उठ जायगा । उसकी विनायकता भी क्रम - क्रम से हट जायगी ।
१२. ' गजाननः ' - गणनायकका हाथीका सिर, हाथीका मुख, हाथीका नाक, हाथीवाला मद भी होना चाहिये । ' बड़ा सिर सर्दार का, बड़ा पांव गँवार का ' वह लोकोक्ति प्रसिद्ध है । नेपोलियन- बोनापार्टका सिर भी बड़ा सुना जाता है । दिमागदार, चिन्तन- शील सिर होना चाहिये । वह गज - शिरसे सूचित होता है । ज केवल भोला - भाला भी नहीं होता, कुव्यवहार करनेपर बदला भी 816लेता है । इसमें एक दर्जीकी कथा भी प्रसिद्ध है—
एक हाथी प्रतिदिन उसके घर में सूँड डाल दिया करता था । दर्जी भी कभी केला तथा कभी कोई अन्य खाद्य वस्तु दे दिया करता था । एक दिन दर्जी क्रोध में बैठा था । हाथीने यथापूर्व सूड डाली । दर्जीने उसे सुई चुभो दी । हाथीने सूँड खींच ली । फिर वह अपनी सूँडमें नालीका गढ़ला पानी भर लाया । वह पानी उसने दर्जीके सिये जा रहे नये कपड़ोंपर डालकर उन्हें खराब कर दिया ।
फलतः गजशिर, गणनायककी चिन्तनशीलता तथा गजका आनन, उसकी गम्भीरता बताता है । गम्भीर तथा मस्त रहना यह गजका स्वभाव है । तब गजाननका भी वही स्वभाव अनिवार्य है । गजानन गणनायक के लिए भी ऐसा ही अपेक्षित है । गजानन होनेसे ही ' शुण्डी ' शुण्डाधारी भी अवश्य होना पड़ता है । सूँडसे ही वह आगे आनेवाले - शत्रुओं को तितर - बितर कर देता है, बड़े सम्मर्द ( भीड़ - भड़क्का ) में अपनी पहुँच कर सकता है । गणनायकके शुण्डा - स्थानीय शस्त्रधारी राजपुरुष होते हैं, जो सदा उसके आगे रहते हैं ।
शुण्डासे गजकी नासिका भी इष्ट होती है, गणनायककी नासिका भी बड़ी होनी चाहिये । नासिका से यहां घ्राण - शक्ति विवक्षित है । गणनायक आदमीको भांप ले कि वह कैसा है? पुरुषके भावोंको शीघ्र सूँघ ले. भांप ले, उनके अन्तस्तल में घुस जाय । बस आदमीकी पूरी जांचवाला ही पूर्ण गणेश, गणनायक 817होता है । गजकर्णक — गणनायकके कान भी हाथीके होने चाहियें; इस पर पहले प्रकाश किया जा चुका है । हाथी पशु होता है, मानवका वाहन होता है, पर गणनायक केवल हाथी नहीं होना चाहिये । गजका तो उसका आनन ( मुख ) हो, शेष देवशरीर हो, दिव्य - गुणधारी शरीर वाला हो, तभी उसमें कहे गये तथा कहे जानेवाले नायकताके गुण होंगे, अन्यथा नहीं । गजवाला मद भी उसमें होना चाहिये । मदोत्कट गजके आगे कोई प्रतिद्वन्द्वी खड़ा नहीं हो पाता । ' गजानन ' में एक अन्य भी रहस्य है; वह यह कि गणनायकको चारों वेदोंका पारङ्गत होना चाहिये । ' गजानन ' का ' ग ' ' ऋगू ' से ' जा ' यजुः से, ' न ' ' सामनसे ' न ' अथर्वन्से लिया गया है । अतः गणनायकको भी चारों वेदोंको भुला नहीं देना चाहिये । यह रहस्य निकलता है ।
इन बारह नामोंको जो अपनेमें रखता है अर्थात् — इनकी जो पूर्ण व्याख्या रूप बनता है वही पूर्ण रूपसे गणेश होता है, गणनायक होता है, विघ्नेश होता है । गणनायकके इन नामोंको ' जो स्मरण रखता है, जो श्रवण करता है; उसको भी कोई विघ्न प्रतिहत नहीं कर सकता है । विवाह में भी, संग्राम में भी, विद्यारम्भ में भी, किसी भिन्न राज्य - प्रवेश में तथा किसी बन्धनसे निर्गमनके • अवसरपर भी जो इन्हीं व्याख्यात नामोंको याद कर लेगा, तदनुकूल उसमें व्याख्या कर लेगा, वह भी गणनायक बनकर विघ्न- रहित हो सकेगा । विवाह में वरको गणनायक बनना पड़ता है । संग्राम में तो गणनायक होता ही है, नहीं तो संग्राम में विघ्न 818कैसे दूर हों? संकट में भी तो परिवारके मुख्य को गणनायकत्व स्वीकृत करना पड़ता है; तभी तो अपने आश्रितों को उसपर विश्वास प्राप्त होता है, और उन्हें निर्भयता हो जाती हैं, वह भी उस समय ' सुमुख ' आदि बने । विद्यारम्भ में भी ' सुमुख ' ' गजकर्णक ' आदि बनने पर छात्रको गणनायकता प्राप्त हो जाती है । यह गणेशके - बारह नामोंका विवरण हो चुका । अब गणेशके पूर्व कहे अन्य बारह वक्रतुण्ड आदि नामों को भी देखना चाहिये कि — यह गणेशत्व - गणनायकत्व में कितनी सहायता पहुँचाते हैं ।
( १ ) वक्रतुण्डः - गणनायकको ' वक्रतुण्ड ' भी होना चाहिये, केवल सीधा मुख भी न रखे । ' सीधा मुह बिल्लियां चाटा करती हैं ' यह एक प्रसिद्ध लोकोक्ति है । यदि सर्वदा सीधे मुह रहेगा, तो ऐरा - गैरा आदि आकर उसे तंग किया करेंगे । फिर उसे शासनका अवसर ही न मिलेगा । वे तो उसे ' अलिफ लैला ' की कहानियोंमें ही उलझाये रखेंगे, तब वह ' विघ्नहर ' कैसे हो सकता है? ' गणनायक ' फिर कैसे बन सके? ' वक्रतुण्डता ' से सर्व- साधारण तथा दुर्जनगरण उसके पास आते हुए घबड़ाते हैं, इससे शासनमें सम्भावित विघ्न भी हट जाते हैं ।
( २ ) महाकायः — गणनायककेलिए ' महाकाय ' होना भी आवश्यक ही है, तभी तो ' वपुर्वचन - वस्त्राणि विद्या विभव एव च । वकारैः पंचभिर्युक्तो नरो नारायणो भवेत् ' इन पांच वकारों में ' वपु ' ( शरीर ) को प्रथम स्थान दिया गया है । विद्या- आदि पीछे के 819पदार्थ हैं; आदिमें चाहिये ' महाकाय'ता, क्यों बी ० ए ० पास कृशतनुको थानेदारी में नहीं लिया जाता, अनपढ़े, पर डीलडौल वालेको थानेदारी में क्यों शीघ्र स्वीकृत कर लिया जाता है, उसमें कारण है ' महाकाय'ता । पहला प्रभाव शरीरका ही पड़ता है । पहलेके सुने प्रसिद्ध - पुरुषको जब लोग देखने आते हैं, तो उसका पहले क्या देखते हैं? शरीर । सिरसे लेकर उसका पांव तक क्या देखते हैं? शरीर । पहले उसीका प्रभाव पड़ता है । महा- कायता ही उसकी गणनायकता स्वतः बता रही होती है । पूछने - कहने की आवश्यकता नहीं रह जाती ।
३. सूर्यकोटिसमप्रभः — सूर्यकोटि समप्रभता ' गणनायकका प्रभावशालित्व द्योतित करती है । प्रभावशाली ही तो गणनायक होता है । जो ' महाकाय ' नहीं, वह प्रभावशाली नहीं । उसकी पर्वाह नहीं की जाती । उससे कोई डरता नहीं । उसके प्रेमको भी कोई नहीं चाहता । ' अमर्षशून्येन जनस्य जन्तुना, न जातहार्देन न विद्विषादरः ' ( किरातार्जुनीय १।३३ ) प्रभावोत्पादक होता है अम- क्रोध । वही ' महाकायता ' होने पर ' सूर्यकोटिसमप्रभ ' करता है । उसके सामने कोई आंख उठा ही नहीं सकता ।
४. ' गणेश्वरः ' ५. ‘ विघ्नविनाशक: - यही प्रभाव ही ' गणेश्वर ' कर देता है । एक बार एक अंग्रेजने पंजाब - केशरी रणजीतसिंहके लिए उसके एक भृत्यसे पूछा, क्यों! तुम्हारे राजाकी दाहिनी आंख कानी है या बाई '? उसने उत्तर दिया साहब! सत्य बात यह है कि आज तक मैं अपनी आँख उठाकर अपने स्वामीके मुखकी ओर 820• ही नहीं देख सका कि उनकी कौनसी आंख कानी है? इसी प्रभाव से ‘ गणेश्वर ' ‘ विघ्नविनाशक ' हो जाता है । बिना युद्धके युद्धोंको समाप्त कर देता है, सब कार्योंके विघ्न दूर कर देता है ।
६. ‘ मोदकवल्लभः ’ – गणनायककी ' मोदकवल्लभ ' तो सूचित करती है कि वह मोदकोंको बहुत चाहता है । उसके गण ' मोदक ' हों, प्रजाको प्रसन्न रखते हों, प्रजाको सन्तुष्ट, प्रमुदित करने वाले ही उसे प्रिय लगते हैं ।
७. सुरासुरैर्वन्दितपूजितः ' – ऐसा ही प्रजाप्रसादक, साथ ही प्रभावशाली तथा समय - समय पर ' विकट ' तथा ' वक्रतुण्ड ' होने वाला ' महाकाय ' ' गजानन ' होनेसे ही गजकी तरह समय - समय पर बृंहित ( चिंधार ) करने वाला अपनी सूंड आगे करके घुमा कर जनसम्मर्दको डरा देने वाला, शेष दिव्य - शरीरधारी ही गणेश्वर ' सुरासुर - वन्दितपूजित ' होता है । देवता भी उसे नमस्कार कर हैं, दानव भी उसे पूजते हैं, मानवोंका तो भला क्या कहना? बल्कि पिता भी अपने विवाहादि शुभ कृत्यों में पहले उसी का सम्मान करता है ( देखिये ' रामचरितमानस ' में महादेवके विवाह में गणपति - पूजन ) । यदि देवता उसकी पूजा करते हैं, पर यदि दैत्य उसकी पूजा नहीं करते, तो वह एकदेशी ही रह जाता है, गणपति, सर्वपति नहीं बन सकता । इसी प्रकारका ' गणेश्वर ' ‘ शरणमहं प्रपद्ये ' शरण - प्रपत्तिके योग्य होता है । ऐसे गणनायक से देश तथा काल भी आश्रय - योग्य होता है । उससे हीन अथवा उसे न पूजने वाले देशकालमें रहने में भांति - भांतिको विघ्न - बाधाएं 821व उपस्थित होती हैं ।
८. ' भूतगणाधिसेवितम् ' - – ' भूतगणाधिसेवितत्व ' से यह सूचित त चाहियें । अन्यायियों के लिए, दुर्जनों के लिए, दीनोंको उत्पीड़ित होता है कि उसके गण भूतों- जैसे महाकाय - डरावने भी होने करने वालोंकेलिए, देश- शत्रुओं के लिए, देशके खण्डित करने वालोंके लिए भीषणाकृति भी होने चाहियें । उनका उन परिगणितों पर प्रभाव ( रोब ) पड़ेगा, तो गणनायकका भी स्वतः ही उन दुष्टों ही
र चाहिये । उसका भोजन मनोहर हो । ऐसा उसका भोजन न हो, पर प्रभाव पड़ेगा ।
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६. ‘ चारुभक्षणः ’ — गणनायकको ' चारुभक्षण ' भी होना AA जो अचारु हो । लोक - विद्विष्ट खाना उसे न खाना चाहिये । मांस, र A मद्य, अण्डे जो भी आता जाय, उसे न गटकता जाय । फलजनक ते उसका चारुभक्षण होना चाहिये ।
१ १०. ' उमासुतः ' - गणनायकको ' उमासुत ' भी होना चाहिये । में स्वरूपा पार्वतीका सुत हो, शिव - लक्ष्मी से पालित हो । कु
य पालित न हो । पार्वती ( पर्वतीयभूमि ) से वह रक्षित हो, पर्वतोंकी ' ओ: - शिवस्य मा - लक्ष्मीरूमा, तस्याः सुतः ' वह शिवकी लक्ष्मी- क ११. ' शोकविनाशकारकः ' - गणनायकको गणोंका शोक दूर सोना, चांदी, हीरा आदिकी खानों से परिपोषित हो, शिवापादक लक्ष्मीसे वह परिपुष्ट हो, वही ' गणेश ' बनता है ।
ना करने वाला होना चाहिये । ' येन येन वियुज्यन्ते प्रजाः स्निग्धेन एं बन्धुना । स स पापाद् ऋते तासां दुष्यन्त इति घुष्यताम् ( अभिज्ञान 822शाकुन्तल ६।२६ ) इस दुष्यन्त राजाकी नीतिको अपनाने वाला हो ।
१२. ‘ आत्तपङ्कजः ’ — गणनायकके हाथमें कमल हो, अर्थात् गणनायक पङ्कसे भी कमल निकाल कर, अमेध्यसे भी कांचन निकाल कर, पापसे भी पुण्य निकाल कर उसे अपने हाथमें रखे । कमलसे ही कमला ( लक्ष्मी ) प्रसन्न होती है । वह हाथमें होने से ही कमलासना कमला ( लक्ष्मी ) आएगी कि यह मुझे कमलका आसन देगा, कमलसे मेरी पूजा करेगा; तो मैं भी इसके पास स्थिर होऊं ।
इस प्रकार इन नामों और कामोंको रखने तथा करने वाला ही गणेश्वर - गणनायक होता है । सभी देशों में, सभी कालोंमें और सबसे पूर्व उसीका वन्दन - पूजन होता है । किसी भी नव्य - कार्यके उद्घाटन - कर्म में उसीको निमन्त्रित
किया जाता है । अब ' गणेश ' के अन्य बारह वैदिक नामों पर
भी विचार कर यह निबन्ध उपसंहृत किया जाता है ।
१. ' मूषक - वाहन ' – ' गणेश '
का वाहन मूषक है । इसे इस प्रकार समझना चाहिये ।
गणेश श्रद्धा - विश्वासरूप है । गोस्वामी तुलसीदासने ' मानस '
में कहा है- ' भवानीशंकरौ वन्दे श्रद्धा - विश्वासरूपिणौ ( ११२
) यहां भवानी - शंकरको श्रद्धा- विश्वासरूप माना है । तब भवानी शंकरका अंश गणपति भी श्रद्धा - विश्वासरूप होता है । ‘ आत्मा वै जायते पुत्रः ' । मूषक ( चूहे ) से ' तर्क ' का बोध होता है । ' तर्क ' वादोंको काटता है, चूहा भी पदार्थों- को काटता है । चूहे पर गणेशको अधिष्ठित करके बताया गया है किं - मूषकरूप - तर्कको यदि निरंकुश कर दोगे; उसे गणेशरूप 823विश्वास से आक्रान्त नहीं रखोगे; तो तुम्हारा व्यवहार नहीं चल सकता । विश्वासकी उपासना सव कार्योंकी आदिमें आवश्यक है ।
यदि विश्वास न किया जायगा, केवल तर्क ही रखा जायगा, तो तर्क यह कहेगा कि ' क ' की आकृति यह क्यों है? ऐसी आकृति ' ख ' की क्यों नहीं? इस तर्कका फल क्या होगा? यही कि अक्षर- ज्ञान ही न होगा । व्यापारीका यदि अन्य व्यापारीपर विश्वास न होगा; तो हुण्डी चलना ही असम्भव हो जायगा । अतः यहाँ यह सिद्ध हो रहा है कि ' तर्क ' भी विश्वासके अंकुशके बिना ' कुतर्क ' हो जाता है, और विश्वास भी ' तर्क ' के बिना ' अन्धविश्वास ' हो जाता है । अतः तर्कको श्रद्धा - विश्वाससे आक्रान्त करके रखने से तर्क हानिप्रद नहीं होता ।
चूहे में बल भी बहुत होता है । वही पुरुषोंसे सारा घर भी छुड़वा सकता है । दक्षिण दिशा से दो निरंकुश चूहे प्रकट हुए । एकने प्लेग शुरू कराई, दूसरेने एक सम्प्रदाय ( आर्यसमाज ) खड़ा कराया । वेदोंके परम्परागत अर्थ भी बदलवा दिये । तर्कवादका इस युग में प्राबल्य भी कर दिया । जनताके करोड़ों रुपये इधर- उधर करवा दिये । इसी चूहेने मुसलमान जातिमें ' ताजिये ' शुरू कराकर उनसे उनकी छातियाँ पिटवाई । ऐसे प्रबल - चूहेको गण- पतिने अपना वाहन बना लिया ।
गणनायकको भी स्वयं श्रद्धा - विश्वासरूप होकर, दूसरोंका श्रद्धास्पद तथा विश्वास - भाजन बनकर, तर्करूप- चूहेपर सवारी करनी पड़ती है, तर्कका सहारा लेना पड़ता है । तभी वह विघ्न- 824.६२४ श्री सनातनधर्म लोक ( ५ )
हरण बनता है । तभी उसे विजय प्राप्त होती है ।
२ ' ब्रह्मणस्पति ' – गणनायकको ' ब्रह्मणस्पति ' भी होना चाहिये । ब्रह्मधर्म, वेदधर्म, ब्राह्मरण - धर्मका पति - संरक्षक बनना पड़ता है । तभी वह गणोंका ' गणपति ' बनता है । ' गणपति ' ' गजानन ' भी वेद - संरक्षण से ही होता है । वेद चार होते हैं, ऋग्, यजुः, सामन्, अथर्वन् । इन्हीं चारोंका अन्तिम अक्षर लेकर ' गजानन ' नाम रखा जाता है ।
३ ' कवि ' – गणनायकको ' कवि ' - क्रान्तदर्शी भी होना चाहिये । कवियोंका कवि होनेपर ही महाभारत ( महा - भा ( शोभा ) रत ) ग्रन्थ - लेखक बनता है । क्रान्तदर्शी ही अपने पीछे जनताको कठ- पुतलीकी तरह चला सकता है । इसलिए इसे ऋ ० सं ० ( १०।११२।६ ) में ' विप्रतम ' ( मेधावी ) कहा गया है ।
४ ‘ ज्येष्ठराज ’ – गणनायकको ' ज्येष्ठराज ' भी बनना चाहिये, ज्येष्ठों - श्रेष्ठों में राजित- शोभित होनेवाला । यदि वह साधारण- पुरुषों में ही शोभित होनेवाला हो, तो उसका गणपतित्व भी कैसे हो सकता है?
५ ‘ बृहस्पति ’ —– गणनायकको ' बृहस्पति ' भी बनना आवश्यक है । ' बृहती ' वाक्को कहते हैं, वाणीका पति, गीर्पति अर्थात् व्याख्यान - वाचस्पति । यदि गणनायकका वाकूपर अधिकार नहीं, वक्तृत्व पर आधिपत्य नहीं, तब वह गणनायक कैसे बन सकता है? बृहस्पति — अर्थात् प्रभावशाली वक्तृतावाला ही गणनायक बन सकता है, वह जनताको अपनी ओर खींच सकता है ।
825गणेश एवं गणनायकके स्वरूपका परिचय २५:
६ ' तत्पुरुष ' – गणनायकको ' तत्पुरुष ' प्रसिद्ध - पुरुष होना चाहिये । यदि वह देश - विदेशमें प्रसिद्ध पुरुष नहीं, तो फिर गणनायक होनेके योग्य भी नहीं हो सकता ।
७ ‘ कराटः —— गणनायकको ' कराट ' भी बनना पड़ता है । ' करम् - शुण्डाम् आटयति - भ्रमयति इंति कराटः । अपनी सूँडको घुमानेवाला, आपत्ति - समय में शत्रु- सम्मर्द होनेपर कर — शुण्डा- दण्ड घुमानेपर शत्रुओंको शीघ्र तितर - बितर किया जा सकता है । अथवा ' कर ' ' टैक्सका नाम भी होता है; उसे अटन करानेवाला अर्थात् जनताके उपयोग में लगानेवाला । इससे वह भली - भांति गण - नेतृत्वके योग्य सिद्ध होता है ।
८ ' प्रियपति ' - गणनायकको प्रियों में ' प्रियपति ' बनना चाहिये । प्रिय - पति बनने पर वह गणका नायक, उस गणका विश्वस्त नहीं हो सकता ।
६ ' निधिपति ' – गणनायकको ' निधिपति ' बनना तो आवश्यक है । जो ' निधिपति ' नहीं, वह ' गणपति ' भी नहीं । वह गणनायक . कैसा? निधिके बिना भला उसका कार्य कैसे चल सकता है?. निधिके बिना उसका गण कैसे बन सकता है? इसलिए इसे ऋ ० सं ० ( १०।११२।९ ) में ' मघवा ' भी कहते हैं ।
१० ' वसु ' अथवा ' वरद ' - गणनायकको ' वसु ' सर्वनिवास भी होना चाहिये, गण उसके पास निवास कर सके; तभी वह नेता बन सकेगा । ‘ वरद ' वर देनेवाला भी होना चाहिये । गणको उत्साहित करने केलिए समय - समय पर वरदान दे, उपाधि - प्रदान— 826पदवी - प्रदान, मनोरथ - प्रदान करे । ऐसे नायकको गण लिपटे रहते हैं, उसकेलिए अपने देहको होम देते हैं ।
११ ' चतुर्भुज ' – गणनायकको ' चतुर्भुज ' होना चाहिये ।
भी गणनेत्री ' चतुर्भु'ज ' से उसका सपत्नीकत्व इष्ट है । उसकी पत्नी
एक मुजा में हो । अथवा उसके अपने चार हाथ होने चाहियें,
अंकुश ( नियन्त्रण- कन्ट्रोल ) होना चाहिए । दूसरे
हाथमें कमल
इस न्याय से रखे, कमलकी मनोहरता रखे । ' पद्मपत्रमिवाम्भसा '
रहे । तीसरी जलमें रहता हुआ भी उससे अछूता रहे, उससे ऊपर
। समय पर भुजामें रणभेरीके प्रतिनिधि स्वरूप शङ्ख धारण करे
व्यदारयत्'को उसे बजावे, जिसका घोष ' धार्तराष्ट्राणां हृदयानि
रहे । समय- चरितार्थ करनेवाला बने । चतुर्थ- हस्त में मोदकधारी
समय पर गणमें मधुर - प्रसाद बांटे, स्वयं भी खावे ।
१२ विघ्नेश्वर अथवा स्वस्तिक । गणनायक ' विघ्नेश्वर ' भी हो, विघ्नोंके अधीन होजानेवाला न हो, विघ्न उसके अधीन रहने वाले हों । जब वह चाहे विघ्नोंको भगा दे, जब चाहे - विघ्नोंको शत्रु - समाजमें भेज सके । ' परमाणु- चम ' का आविष्कारक उससे शत्रुनाश भी कर सकता है; उसे अच्छे कामों में भी प्रयुक्त कर सकता है । यही विघ्न लाभप्रद भी हो सकते हैं - यदि उनका प्रयोग अपने अधिकारियोंके कुकृत्योंमें किया जाय । कुकृत्यों में विघ्न उपस्थित कर देने से वे कुकृत्योंसे विरत हो जाते हैं । गण- नायकको ' स्वस्तिक ' स्वस्तिकारक भी होना चाहिये । यदि वह स्वस्तिक — चारों ओर स्वस्ति - कल्याण करनेवाला नहीं; तो वह
In English
The Qualities of a Leader
This text describes the specific attributes and symbolic names a leader must possess to rule effectively. It argues that a ruler must be able to listen, digest information, destroy obstacles, and maintain a powerful presence to command respect and deter enemies.
This chapter answers
- What are the qualities of a good leader in hinduism?
- Meaning of lambodara and gajanan in leadership?
- Why should a leader be like a moon or chandrabhanu?
- How to deal with enemies according to ganapati traits?
Also written: Ganesha, Evan, Gananayakake, Svarupaka, Parichaya, Ganesha Evan Gananayakake Svarupaka Parichaya, गणेश एवं गणनायकके स्वरूपका परिचय