पञ्चम सुमन · प्रकरण 92

वसन्त पंचमी

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827गणनायकता में भी सफलता प्राप्त नहीं कर सकता । इन ऊपरके नामोंके होनेपर ही ऋद्धि और सिद्धि गणपति पर चँवर डुलाती हैं ।

यह गणपति – गणेश – गणनायकके वैदिक एवं पौराणिक और लौकिक - स्वरूपका राजनीतिक परिचय है । यह इसके तीन प्रकारके वारह नाम कहे हैं । इन्हींसे गणपतित्वकी पूर्णता होती है । इन सब बारह नामोंका फल इस प्रकार कहा है- ' द्वादशैतानि नामानि यः पठेत् शृणुयादपि । विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा । संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ' । इस प्रकार सभी व्यक्ति, सभी कार्योंकी आदिमें दिव्य गणपति तथा लौकिक गरण- नायकका आह्वान करते हैं, उसीकी सबसे पूर्व अर्चना - वन्दना करते हैं । ' गणनायकता ' के इच्छुक भक्तोंको इन तीन प्रकारके बारह नामोंकी सर्वदा ही उपासना करनी चाहिये । उसी गणेशजीकी यह ' गणेशचतुर्थी ' है ।

( २१ ) वसंत - पञ्चमी ।

' ऋतूनां कुसुमाकरः ' ( १०।३५ ) भगवद्गीताके इस पद्यमें भगवान्ने वसन्त ऋतुको अपनी विभूति कहा है । इसीसे वसन्त का महत्त्व सिद्ध होता है । इसमें शीतका वह भयानक आक्रमण, जिसमें हिमपात, तुषारपात दिसे पौधे म्लान हो जाते हैं, वृद्ध लोग कालके गाल में जा समाते हैं; समाप्त हो जाते हैं । खेत लह- लहा उठते हैं, सरसोंके फूलोंकी वह पीतच्छटा आंखोंका आसेचन कर रही होती है । इस ऋतुसे सभी प्रसन्न होते हैं । शीतकाल में कुहरे दिसे सूर्य नहीं दीख पाता था; रात्रिको चन्द्रमा भी मलिन 828सा दीखता था; यह सब अब ठीक हो जाता है । यह कामदेवकी ऋतु मानी जाती है ।

यद्यपि वसन्त ऋतु तो चैत्र वैशाखमें ही होती है; तो माघ- मासमें शुक्लपक्षको पञ्चमीमें वसन्त कैसे - यह प्रश्न उठता है । इसपर उत्तर यह है कि — जैसे किसी राजाके आगमनसे पूर्व ही प्रजाकी ओर से तत्सम्बन्धी तैयारियां होने लगती हैं, अथवा जैसे— ' पूर्वरङ्गः प्रसङ्गाय नाटकीयस्य वस्तुनः ' किसी नाटक होनेसे पूर्व उसकी रिहर्सल होने लगती है, वैसे ही ऋतुराज वसन्तके आनेकी सूचना भी प्रकृति इसी तिथि से ही विशेषरूपसे देने लगती है । इसकी प्रजा पवन, भ्रमर, कोकिलादि ४० दिन पहले ही सुसज्जित होने लगते हैं । पतझरके पीले पत्तोंको गिराकर नवीन हरे - भरे किसलयको धारण करती हुई, मनोमोहक आम्रमञ्जरीसे सुवासित, मन्द मलयानिलस्नात, मधुमाधवी - प्रकृतिका जो रमणीय दृश्य इस ऋतुमें देखनेको मिलता है, वैसा अन्य किसी ऋतुमें नहीं । कहीं सरस - सरसोंकी पीली - मञ्जरी दिखाई दे रही होती है; तो कहीं आम्रविटपपर बैठी कोलिल जीवन - सङ्गीत सुना रही होती है; और कहीं स्वच्छ - सरोवरोंमें सरोजोंपर गुजारते हुए भ्रमर नव - जीवन सन्देश सुना रहे होते हैं । कितना सुन्दर समय होता है यह?

इसमें वृक्ष पुष्पोंसे लदे होते हैं; अतः सुगन्धित - पवनका प्रवाह होता है । सर्वत्र नव - उल्लास एवं स्फूर्ति तथा कार्यका उत्साह होता है । शीत - भीति जो कार्य नहीं करने देती थी, इसमें वह आलस्य नहीं रहता । इसमें सर्वत्र सौन्दर्य ही सौन्दर्य दीखता है । 829अांखें बाग - बगीचोंके मनोरम दृश्यको देखना चाहती हैं; पांव विहारार्थ चलना चाहते हैं ।

उत्तरायणका समय पुण्यप्रद माना जाता है । उसमें भी मकर- संक्रमण अन्य भी विशिष्ट होता है । फिर माघमास भी पुण्यप्रद मास माना है; इसमें प्रातः स्नानका विशेष महत्त्व माना जाता है । उसमें भी शुक्लपक्ष शुभ माना गया है, उसमें भी पञ्चमी तिथि जिसे ज्योतिःशास्त्रमें ' पूर्णा ' तिथि कहा गया है । प्रत्येक शुभकार्य पूर्णा- तिथि में करने से विशिष्ट - फलदायक होते हैं । यह कामकी तिथि मानी गई है 1

। मनकी कामनायें इसमें पूर्ण होती हैं ।

इसे ' श्रीपञ्चमी ' भी कहते हैं, श्री, शोभा तथा लक्ष्मी दोनोंका नाम होता है । शोभा इसमें प्रत्यक्ष होती है, लक्ष्मीकी ऋतु तो यह होती है, शीतकाल में भयानक शीतसे व्यापारमें जो शिथिलता आ जाती थी, इस दिनसे नवीन स्फूर्तिका सवार होकर उसमें नया कार्य प्रारम्भ हो जाता है । ' व्यापारे वसति लक्ष्मीः ' यह प्रसिद्ध है ही । इस दिन सरस्वती - पूजन भी किया जाता है । जनता इस ऋतुका ही रूप सिरपर रखती है अर्थात वसन्ती रंगके साफे पहनती है । इसकी प्रसन्नता में कई खेल, कई उत्सव मनाये जाते हैं । इसी दिन वीर हकीकतरायने हिन्दुधर्मकी रक्षा के लिए आत्म- बलिदान दिया था ।

830( २२ ) शिवरात्रिकी शास्त्रीय महत्ता ।

फाल्गुन - कृष्ण चतुर्दशी ही शिवरात्रिका दिन माना जाता है । इसमें उन्होंने आसुरी शक्तियोंको नष्ट किया था । समस्त संसार सत्त्व, रज और तम इन तीन गुणोंमें विभक्त है । देवता लोग भी इससे नहीं छूट पाये । भगवद्गीता में भी कहा है- ' न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः । सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्त ' यदेभिः स्यात् त्रिभिर्गु णैः, ( १८।४० ) । उसमें ब्रह्मा रजोगुण, विष्णु सत्त्व- गुण और रुद्र तमोगुणका अवलम्बन करते हैं । चतुर्दशी - तिथिके स्वामी भी भगवान् शिव हैं । शिव ' तम ' तत्त्वके अधिनायक हैं । एवं ' तम ' रात्रि में होता है; अतः शिवरात्रिको भी सायंकाल - व्यापिनी माना जाता है । इसे कालरात्रि भी कहा जाता है ।

शिव वैदिक - देव हैं । शिव, विष्णु, गणेश, सूर्य और देवी . यह पांच - देवता उपासना में प्रसिद्ध हैं । इसमें शिवको महादेव कहा जाता है । यह आशुतोष कहे जाते हैं । आराधना से शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं । इन्होंने हालाहल - पान करके देवताओंको भी अभयदान दिया धा । यह इतने अहिंसक हैं कि सांप भी इनके भूषण बने हुए हैं । संहारके देवता यही हैं । इनकी मूर्त्ति शिव- लिङ्ग कही जाती है । ब्रह्माण्ड इनका लिङ्ग है - ज्ञापक है । " उसका ब्रह्मा तथा विष्णु भी पार नहीं पा सके । यही बात बतलाने के लिए शिवपुराण में शिवलिङ्गकी कथा लिखी है - जिसे न समझकर प्रतिपक्षी लोग उपहास करके अपना अज्ञान प्रकाशित करते हैं । सो शिवलिङ्ग शिवकी अण्डाकार मूर्ति होती है । ' भग ' 831प्रकृतिका नाम होता है । ठीक देखा जावे; तो यह ॐकारकी मूर्त्ति स्पष्ट दीख पड़ती है ।

प्रतिपक्षियोंके अनुसार शिवलिङ्गको शिवका लिङ्ग तथा जलहरीको पार्वतीका ‘ भग ' भी माना जावे; और उसे पूजनीय मानने में शङ्का की जावे; तो उसपर यह जानना चाहिये कि महादेव जगत् के जनक ( पिता ) माने जाते हैं; और पार्वती जननी ( माता ) । जननीका जननीत्व वस्तुतः किस अङ्गमें होता है? जनक ( पिता ) का जनकत्व किसमें है? वे दो यही अङ्ग हैं, पर अपवित्रता होने से लोकमें इन अङ्गोंकी पूजा अव्यवहार्य होती है; अतः नहीं की जाती; पर जगत्के जनक - जननी पार्वती - परमेश्वर पवित्र देवता होने से इनके यह दोनों अङ्ग भी पवित्र हैं; अतः उनकी पूजा में भी कोई न तो दोष है, न उपहसनीयता । यह लिङ्ग - योनि अङ्ग कहां नहीं हैं; सर्वत्र हैं । मनुष्यके इन अङ्गोंमें लज्जा मानी जाती है, अन्यत्र नहीं । इस प्रकार देवताओंके भी अङ्गों में कुछ उपहस- नीयता वा लज्जाकी बात नहीं, क्योंकि वह मनुष्य नहीं, इस विषय पर हमारा निबन्ध भिन्न- पुष्प में प्रकाशित होगा ।

शिवपुराण में विष्णुकी निन्दा, और विष्णुपुराण में यदि शिवकी निन्दा पाई जाती हैं, तो यह अपने - अपने देवताकी अनन्य- भक्त्यर्थ है । ' नहिं निन्दा निन्द्य निन्दितुं प्रवर्तते, किन्तु विधेयं स्तोतुम् ' | किसी वस्तुकी निन्दा उसके निन्दनार्थ नहीं होती; किन्तु अन्यके स्तुत्यर्थ होती है, ऐसा समझनेसे शास्त्रीय निन्दा - स्तुतिका तात्पर्य ज्ञात होता है, नहीं तो परस्पर विरोध ही विरोध दीखता है ।

832शिवपूजा बहुत प्राचीन ( वैदिक ) कालसे चली आ रही है । आये दिन भूगर्भकी खुदाइयां हुआ करती हैं । मुहंजोदड़ों तथा हडप्पा में जो खनन हुआ था; उसकी मिली वस्तुओं के लिए भी अनुसन्धाताओंका विश्वास था कि यह वस्तुएँ वैदिक सभ्यता से भी प्राचीन हैं । उस खननमें शिवलिङ्गको मूर्तियां प्रायः मिलीं थी । अतः शिव प्राचीन- देव हैं, वैदिक देव हैं, और आर्योंके देव हैं । उन्हीं शिवका इस दिन व्रत किया जाता है । रात्रिमें जागरण कर रुद्राष्टाध्यायीका पाठ किया जाता है ।

( २३ ) शिवरात्रिका मूषक एक सम्प्रदायका स्थापक ।

- शिवभक्त बालक दयाराम के सामने १८६४ वा ६५ संवत्की शिवरात्रिमें शिव - प्रतिमापर चढ़नेवाले एक चूहेने अपनी बल- बत्ताका खूब परिचय दिया । एक तो उसने धार्मिक - संसार में उथल- पुथल कर देनेवाला, वेदमन्त्रोंका अपनी इच्छानुसार अर्थ करने- वाला एक सम्प्रदाय खड़ा करा दिया; दूसरा उसने शिवरात्रि - पर्वको छामर करवा दिया । अब इस शिवरात्रिके अवकाश होते हैं । शिवका कीर्तन होता है -कहीं अनुयोगिविधया, तो कहीं प्रतियोगि- विधया । शिवलिङ्गकी पूजा अत्यन्त प्राचीनकाल से [ कई लोगों के अनुसार तो वैदिककाल से भी पहले वे लोग मुहखोदाड़ोकी खुदाई की वस्तुओंको तो वैदिककालसे भी प्राचीन मानते हैं ] चली आती थी; यह हडप्पा और मुहअदड़ेके खनन से सिद्ध हो चुका है । कदाचित्

श्रीदेवेन्द्रनाथ - मुखोपाध्यायने स्वा ० दयानन्दके बाल्यकालका नाम

In English

Ganapati, Vasant Panchami, and Shivaratri

This text explains the significance of twelve names of Ganesha for success and protection. It describes the seasonal importance of Vasant Panchami as a precursor to spring and discusses the spiritual meaning of Shivaratri and the Shiva Linga.

This chapter answers

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  • What is the significance of shiva linga?
  • Why is shivaratri associated with tamas guna?

Also written: Vasanta, Panchami, Vasanta Panchami, वसन्त पंचमी

मूल ग्रन्थ

यह पाठ सनातन धर्मालोक ५के मुद्रित पृष्ठ 827–832 से ज्यों-का-त्यों लिया गया है — न कुछ जोड़ा गया है, न घटाया। स्कैन किया हुआ मूल पृष्ठ देखनेके लिये —

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