सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 841–850

सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 841–850

पृष्ठ 841

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गणेश एवं गणनायकके स्वरूपका परिचय ८१३ का प्रसङ्ग उपस्थित हो सकता है । इसके अतिरिक्त गणनायकको बड़े कान वाला भी होना चाहिये । उसमें गगकी बातोंकी सुनवाई भी हो, कुत्ते तककी भी सुने, इसलिए उसके कान बड़े हों, तंग नहीं । ५. ' लम्वोदरः ' — गणनायकका पेट बड़ा होना चाहिये, जो बातें सुनता रहे, उन्हें पेटमें जमा करता जाय, हज़म करता जाए । इसके लिए उसका पेट बड़ा होना चाहिये, सब चीजें उसमें समा सकें । ६. विकट - गणनायकको ' विकट ' भी बनना चाहिये । ' विकट ' न बनेगा तो उसे शत्रु शष्प - तुल्य समझकर उखाड़ फेंकेंगे । ' सीधी अंगुलिसे घी भी नहीं निकल सकता । ' ७. विघ्ननाशः — गणनायकको विघ्नविनाशक भी बनना चाहिये । गणराज्यकी असफलता करनेवाले जो विघ्न आवें उन्हें पीस दे । तभी ' गण ' का उसपर विश्वास होगा । ८. ' विनायकः ' - विघ्ननाशक होने से ही गणनायक विनायक– विशिष्ट नायक, विशिष्ट नेता, बन सकता है । ε. ' धूम्रकेतु ' – गणनायकको ' धूम्रकेतु ' भी बनना चाहिये । धूम्रकेतु अग्निको कहते हैं, अग्निमें पतंगे जल मरते हैं, सिंह आदि हिंस्र जन्तु इससे दूर रहते हैं, शरीरको काटनेवाले, खराब करनेवाले कीटाणु अग्निके प्रभावसे अलक्षित हो जाते. हैं । अग्निका केतु धूम्र होता है उस धुएँसे विदेशी शत्रुओंकी आंखोंसे श्रांसू निकलवाता रहे, उस धुएँको अपने में न रखकर दूर - देशोंमें

पृष्ठ 842

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८१४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) भिन्न - देशोंमें, विदेशों में, शत्रु- देशों में फहराता रहे । जिससे वे डरकर दूर भागें कि — कहीं यह प्रज्वलित अग्नि हमें जलाती न जाये । धूम्रकेतु पूछल तारेको भी कहते हैं । ' धूम्रकेतुरहित जनस्य ' शत्रु - राजाओंकेलिए गणनायक पूछल तारा रहे । उनकेलिए अशुभोत्पादक रहे । ऐसा गणनायक शत्रु- देशोंकेलिए होना भी चाहिये, क्योंकि ' लातोंके भूत बातों से नहीं मानते ' । १०. ‘ गणाध्यक्षः ’ – गणनायकको ' गणाध्यक्ष ' अपने गणका वास्तविक अध्यक्ष होना चाहिये, उसकी सब तरहकी देख - रेख वाला, उसका स्वामी होना चाहिये । साधारण- स्वामी भी न हो, किन्तु विनायक, विशिष्ट नेतृत्व करनेवाला हो, उसका प्रताप ऐसा हो कि उसके समक्ष सबका सिर अवनत होना चाहिये । यही ' गणाध्यक्षता ' है । ११. ' भालचन्द्रः– गणनायकको ' भालचन्द्र ' भी होना चाहिये, चन्द्र उसके भाल पर, माथे पर हो । ' चन्द्र ' से आह्लादकता विवक्षित है । उसके माथेका ऐसा प्रभाव हो कि गण उसे देखते ही आह्लादित हो उठे । चन्द्र भी मस्तकपर द्वितीयाका होता है, जिसे सब नमन करते हैं, उसके भालके आगे सब झुकें । चन्द्र कलाधर भी होता है । गणनायक सभी कलाओं को सिर माथे रखे, अर्थात् उनका ज्ञान रखे । चन्द्र, द्विजराज भी होता है । गणनायकको भी द्विजोंको राजित करना चाहिये । यदि वह अद्विजोंको राजित करेगा, तो वह ' भालचन्द्र ' न होगा । वह गणके विशिष्ट नेतृत्वको प्राप्त न कर

पृष्ठ 843

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गणेश एवं गणनायकके स्वरूपका परिचय ८१२ सकेगा । फिर निम्न जातियां - ही उसे अपना मतदान करेंगी, उच्च-जातियां नहीं | तब निम्नोंको प्रसन्न करनेकेलिए उसे निम्नोंके निम्न कार्यों में प्रोत्साहन देना पड़ेगा । यदि वह कभी निम्न-कार्यों में प्रतिबन्ध डालेगा, जैसे कि समयानुसार नियन्त्रण करना पड़ता है, तो वे निम्न ही फिर उसे पटक देंगे, उच्च तो पहलेसे ही उसके सहयोगी न होंगे । इसलिए कहते हैं कि ' छोटोंको मुँह लगाना अच्छा नहीं होता ', नहीं तो फिर वे अपनी छोटी-छोटी बातें भी मनवाते रहेंगे, न मानने पर वे बहुत तंग करते हैं । उससे गणनायकके विशिष्ट - नेतृत्व में विघ्न खड़े हो जाते हैं । उस समय वह ' विघ्नेश ' न रहकर विघ्ननेय, विघ्नवशी हो जाता है । चन्द्र, क्षपा ( रात्रि ) -कर भी होता है । गणनायकको शत्रु देशों की रात्रि करनेवाला होना चाहिये । शत्रुओंकी बातें मानता रहा, अपनी बातें उनसे न मनवा सका, तो वह कभी शत्रुओंके चक्र में फँसेगा । उसपर से गरणका विश्वास भी धीरे - धीरे उठ जायगा । उसकी विनायकता भी क्रम - क्रम से हट जायगी । १२. ' गजाननः ' - गणनायकका हाथीका सिर, हाथीका मुख, हाथीका नाक, हाथीवाला मद भी होना चाहिये । ' बड़ा सिर सर्दार का, बड़ा पांव गँवार का ' वह लोकोक्ति प्रसिद्ध है । नेपोलियन-बोनापार्टका सिर भी बड़ा सुना जाता है । दिमागदार, चिन्तन-शील सिर होना चाहिये । वह गज - शिरसे सूचित होता है । ज केवल भोला - भाला भी नहीं होता, कुव्यवहार करनेपर बदला भी

पृष्ठ 844

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८१६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) लेता है । इसमें एक दर्जीकी कथा भी प्रसिद्ध है— एक हाथी प्रतिदिन उसके घर में सूँड डाल दिया करता था । दर्जी भी कभी केला तथा कभी कोई अन्य खाद्य वस्तु दे दिया करता था । एक दिन दर्जी क्रोध में बैठा था । हाथीने यथापूर्व सूड डाली । दर्जीने उसे सुई चुभो दी । हाथीने सूँड खींच ली । फिर वह अपनी सूँडमें नालीका गढ़ला पानी भर लाया । वह पानी उसने दर्जीके सिये जा रहे नये कपड़ोंपर डालकर उन्हें खराब कर दिया । फलतः गजशिर, गणनायककी चिन्तनशीलता तथा गजका आनन, उसकी गम्भीरता बताता है । गम्भीर तथा मस्त रहना यह गजका स्वभाव है । तब गजाननका भी वही स्वभाव अनिवार्य है । गजानन गणनायक के लिए भी ऐसा ही अपेक्षित है । गजानन होनेसे ही ' शुण्डी ' शुण्डाधारी भी अवश्य होना पड़ता है । सूँडसे ही वह आगे आनेवाले - शत्रुओं को तितर - बितर कर देता है, बड़े सम्मर्द ( भीड़ - भड़क्का ) में अपनी पहुँच कर सकता है । गणनायकके शुण्डा - स्थानीय शस्त्रधारी राजपुरुष होते हैं, जो सदा उसके आगे रहते हैं । शुण्डासे गजकी नासिका भी इष्ट होती है, गणनायककी नासिका भी बड़ी होनी चाहिये । नासिका से यहां घ्राण - शक्ति विवक्षित है । गणनायक आदमीको भांप ले कि वह कैसा है? पुरुषके भावोंको शीघ्र सूँघ ले. भांप ले, उनके अन्तस्तल में घुस जाय । बस आदमीकी पूरी जांचवाला ही पूर्ण गणेश, गणनायक

पृष्ठ 845

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गणेश एवं गणनायक स्वरूपका परिचय ८१७ होता है । गजकर्णक — गणनायकके कान भी हाथीके होने चाहियें; इस पर पहले प्रकाश किया जा चुका है । हाथी पशु होता है, मानवका वाहन होता है, पर गणनायक केवल हाथी नहीं होना चाहिये । गजका तो उसका आनन ( मुख ) हो, शेष देवशरीर हो, दिव्य - गुणधारी शरीर वाला हो, तभी उसमें कहे गये तथा कहे जानेवाले नायकताके गुण होंगे, अन्यथा नहीं । गजवाला मद भी उसमें होना चाहिये । मदोत्कट गजके आगे कोई प्रतिद्वन्द्वी खड़ा नहीं हो पाता । ' गजानन ' में एक अन्य भी रहस्य है; वह यह कि गणनायकको चारों वेदोंका पारङ्गत होना चाहिये । ' गजानन ' का ' ग ' ' ऋगू ' से ' जा ' यजुः से, ' न ' ' सामनसे ' न ' अथर्वन्से लिया गया है । अतः गणनायकको भी चारों वेदोंको भुला नहीं देना चाहिये । यह रहस्य निकलता है । इन बारह नामोंको जो अपनेमें रखता है अर्थात् — इनकी जो पूर्ण व्याख्या रूप बनता है वही पूर्ण रूपसे गणेश होता है, गणनायक होता है, विघ्नेश होता है । गणनायकके इन नामोंको ' जो स्मरण रखता है, जो श्रवण करता है; उसको भी कोई विघ्न प्रतिहत नहीं कर सकता है । विवाह में भी, संग्राम में भी, विद्यारम्भ में भी, किसी भिन्न राज्य - प्रवेश में तथा किसी बन्धनसे निर्गमनके • अवसरपर भी जो इन्हीं व्याख्यात नामोंको याद कर लेगा, तदनुकूल उसमें व्याख्या कर लेगा, वह भी गणनायक बनकर विघ्न- रहित हो सकेगा । विवाह में वरको गणनायक बनना पड़ता है । संग्राम में तो गणनायक होता ही है, नहीं तो संग्राम में विघ्न ५२ स ० ध ०

पृष्ठ 846

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८१८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) कैसे दूर हों? संकट में भी तो परिवारके मुख्य को गणनायकत्व स्वीकृत करना पड़ता है; तभी तो अपने आश्रितों को उसपर विश्वास प्राप्त होता है, और उन्हें निर्भयता हो जाती हैं, वह भी उस समय ' सुमुख ' आदि बने । विद्यारम्भ में भी ' सुमुख ' ' गजकर्णक ' आदि बनने पर छात्रको गणनायकता प्राप्त हो जाती है । यह गणेशके - बारह नामोंका विवरण हो चुका । अब गणेशके पूर्व कहे अन्य बारह वक्रतुण्ड आदि नामों को भी देखना चाहिये कि — यह गणेशत्व - गणनायकत्व में कितनी सहायता पहुँचाते हैं । ( १ ) वक्रतुण्डः - गणनायकको ' वक्रतुण्ड ' भी होना चाहिये, केवल सीधा मुख भी न रखे । ' सीधा मुह बिल्लियां चाटा करती हैं ' यह एक प्रसिद्ध लोकोक्ति है । यदि सर्वदा सीधे मुह रहेगा, तो ऐरा - गैरा आदि आकर उसे तंग किया करेंगे । फिर उसे शासनका अवसर ही न मिलेगा । वे तो उसे ' अलिफ लैला ' की कहानियोंमें ही उलझाये रखेंगे, तब वह ' विघ्नहर ' कैसे हो सकता है? ' गणनायक ' फिर कैसे बन सके? ' वक्रतुण्डता ' से सर्व-साधारण तथा दुर्जनगरण उसके पास आते हुए घबड़ाते हैं, इससे शासनमें सम्भावित विघ्न भी हट जाते हैं । ( २ ) महाकायः — गणनायककेलिए ' महाकाय ' होना भी आवश्यक ही है, तभी तो ' वपुर्वचन - वस्त्राणि विद्या विभव एव च । वकारैः पंचभिर्युक्तो नरो नारायणो भवेत् ' इन पांच वकारों में ' वपु ' ( शरीर ) को प्रथम स्थान दिया गया है । विद्या- आदि पीछे के

पृष्ठ 847

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= गणेश एवं गणनायकके स्वरूपका परिचय 514 पदार्थ हैं; आदिमें चाहिये ' महाकाय'ता, क्यों बी ० ए ० पास कृशतनुको थानेदारी में नहीं लिया जाता, अनपढ़े, पर डीलडौल वालेको थानेदारी में क्यों शीघ्र स्वीकृत कर लिया जाता है, उसमें कारण है ' महाकाय'ता । पहला प्रभाव शरीरका ही पड़ता है । पहलेके सुने प्रसिद्ध - पुरुषको जब लोग देखने आते हैं, तो उसका पहले क्या देखते हैं? शरीर । सिरसे लेकर उसका पांव तक क्या देखते हैं? शरीर । पहले उसीका प्रभाव पड़ता है । महा-कायता ही उसकी गणनायकता स्वतः बता रही होती है । पूछने - कहने की आवश्यकता नहीं रह जाती । ३. सूर्यकोटिसमप्रभः — सूर्यकोटि समप्रभता ' गणनायकका प्रभावशालित्व द्योतित करती है । प्रभावशाली ही तो गणनायक होता है । जो ' महाकाय ' नहीं, वह प्रभावशाली नहीं । उसकी पर्वाह नहीं की जाती । उससे कोई डरता नहीं । उसके प्रेमको भी कोई नहीं चाहता । ' अमर्षशून्येन जनस्य जन्तुना, न जातहार्देन न विद्विषादरः ' ( किरातार्जुनीय १।३३ ) प्रभावोत्पादक होता है अम-क्रोध | वही ' महाकायता ' होने पर ' सूर्यकोटिसमप्रभ ' करता है । उसके सामने कोई आंख उठा ही नहीं सकता । ४. ' गणेश्वरः ' ५. ‘ विघ्नविनाशक: - यही प्रभाव ही ' गणेश्वर ' कर देता है । एक बार एक अंग्रेजने पंजाब - केशरी रणजीतसिंहके लिए उसके एक भृत्यसे पूछा, क्यों! तुम्हारे राजाकी दाहिनी आंख कानी है या बाई '? उसने उत्तर दिया साहब! सत्य बात यह है कि आज तक मैं अपनी आँख उठाकर अपने स्वामीके मुखकी ओर

पृष्ठ 848

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८२० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) • ही नहीं देख सका कि उनकी कौनसी आंख कानी है? इसी प्रभाव से ‘ गणेश्वर ' ‘ विघ्नविनाशक ' हो जाता है । बिना युद्धके युद्धोंको समाप्त कर देता है, सब कार्योंके विघ्न दूर कर देता है । ६. ‘ मोदकवल्लभः ’ – गणनायककी ' मोदकवल्लभ ' तो सूचित करती है कि वह मोदकोंको बहुत चाहता है । उसके गण ' मोदक ' हों, प्रजाको प्रसन्न रखते हों, प्रजाको सन्तुष्ट, प्रमुदित करने वाले ही उसे प्रिय लगते हैं । ७. सुरासुरैर्वन्दितपूजितः ' – ऐसा ही प्रजाप्रसादक, साथ ही प्रभावशाली तथा समय - समय पर ' विकट ' तथा ' वक्रतुण्ड ' होने वाला ' महाकाय ' ' गजानन ' होनेसे ही गजकी तरह समय - समय पर बृंहित ( चिंधार ) करने वाला अपनी सूंड आगे करके घुमा कर जनसम्मर्दको डरा देने वाला, शेष दिव्य - शरीरधारी ही गणेश्वर ' सुरासुर - वन्दितपूजित ' होता है । देवता भी उसे नमस्कार कर हैं, दानव भी उसे पूजते हैं, मानवोंका तो भला क्या कहना? बल्कि पिता भी अपने विवाहादि शुभ कृत्यों में पहले उसी का सम्मान करता है ( देखिये ' रामचरितमानस ' में महादेवके विवाह में गणपति - पूजन ) । यदि देवता उसकी पूजा करते हैं, पर यदि दैत्य उसकी पूजा नहीं करते, तो वह एकदेशी ही रह जाता है, गणपति, सर्वपति नहीं बन सकता । इसी प्रकारका ' गणेश्वर ' ‘ शरणमहं प्रपद्ये ' शरण - प्रपत्तिके योग्य होता है । ऐसे गणनायक से देश तथा काल भी आश्रय - योग्य होता है । उससे हीन अथवा उसे न पूजने वाले देशकालमें रहने में भांति - भांतिको विघ्न - बाधाएं

पृष्ठ 849

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गणेश एवं गणनायकके स्वरूपका परिचय ८२ १ व उपस्थित होती हैं । ८. ' भूतगणाधिसेवितम् ' - – ' भूतगणाधिसेवितत्व ' से यह सूचित होता है कि उसके गण भूतों- जैसे महाकाय - डरावने भी होने त चाहियें । अन्यायियों के लिए, दुर्जनों के लिए, दीनोंको उत्पीड़ित करने वालोंकेलिए, देश- शत्रुओं के लिए, देशके खण्डित करने वालोंके लिए भीषणाकृति भी होने चाहियें । उनका उन परिगणितों पर प्रभाव ( रोब ) पड़ेगा, तो गणनायकका भी स्वतः ही उन दुष्टों ही पर प्रभाव पड़ेगा । ने ६. ‘ चारुभक्षणः ’ — गणनायकको ' चारुभक्षण ' भी होना र चाहिये । उसका भोजन मनोहर हो । ऐसा उसका भोजन न हो, AA जो अचारु हो । लोक - विद्विष्ट खाना उसे न खाना चाहिये । मांस, र A मद्य, अण्डे जो भी आता जाय, उसे न गटकता जाय । फलजनक ते उसका चारुभक्षण होना चाहिये । १ १०. ' उमासुतः ' - गणनायकको ' उमासुत ' भी होना चाहिये । ' ओ: - शिवस्य मा - लक्ष्मीरूमा, तस्याः सुतः ' वह शिवकी लक्ष्मी-में स्वरूपा पार्वतीका सुत हो, शिव - लक्ष्मी से पालित हो । कु य पालित न हो । पार्वती ( पर्वतीयभूमि ) से वह रक्षित हो, पर्वतोंकी सोना, चांदी, हीरा आदिकी खानों से परिपोषित हो, शिवापादक लक्ष्मीसे वह परिपुष्ट हो, वही ' गणेश ' बनता है । क ११. ' शोकविनाशकारकः ' - गणनायकको गणोंका शोक दूर ना करने वाला होना चाहिये । ' येन येन वियुज्यन्ते प्रजाः स्निग्धेन एं बन्धुना । स स पापाद् ऋते तासां दुष्यन्त इति घुष्यताम् ( अभिज्ञान

पृष्ठ 850

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८२२ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) शाकुन्तल ६।२६ ) इस दुष्यन्त राजाकी नीतिको अपनाने वाला हो । १२. ‘ आत्तपङ्कजः ’ — गणनायकके हाथमें कमल हो, अर्थात् गणनायक पङ्कसे भी कमल निकाल कर, अमेध्यसे भी कांचन निकाल कर, पापसे भी पुण्य निकाल कर उसे अपने हाथमें रखे । कमलसे ही कमला ( लक्ष्मी ) प्रसन्न होती है । वह हाथमें होने से ही कमलासना कमला ( लक्ष्मी ) आएगी कि यह मुझे कमलका आसन देगा, कमलसे मेरी पूजा करेगा; तो मैं भी इसके पास स्थिर होऊं । इस प्रकार इन नामों और कामोंको रखने तथा करने वाला ही गणेश्वर - गणनायक होता है । सभी देशों में, सभी कालोंमें और सबसे पूर्व उसीका वन्दन - पूजन होता है । किसी भी नव्य - कार्यके उद्घाटन - कर्म में उसीको निमन्त्रित के अन्य बारह वैदिक नामों पर उपसंहृत किया जाता है । १. ' मूषक - वाहन ' – ' गणेश ' इस प्रकार समझना चाहिये । गोस्वामी तुलसीदासने ' मानस ' वन्दे श्रद्धा - विश्वासरूपिणौ ( ११२ किया जाता है । अब ' गणेश ' भी विचार कर यह निबन्ध का वाहन मूषक है । इसे गणेश श्रद्धा - विश्वासरूप है । में कहा है- ' भवानीशंकरौ ) यहां भवानी - शंकरको श्रद्धा-विश्वासरूप माना है । तब भवानी शंकरका अंश गणपति भी श्रद्धा - विश्वासरूप होता है । ‘ आत्मा वै जायते पुत्रः ' । मूषक ( चूहे ) से ' तर्क ' का बोध होता है । ' तर्क ' वादोंको काटता है, चूहा भी पदार्थों-को काटता है । चूहे पर गणेशको अधिष्ठित करके बताया गया है किं - मूषकरूप - तर्कको यदि निरंकुश कर दोगे; उसे गणेशरूप