पञ्चम सुमन · प्रकरण 90

संकटनाशन - गणेशचतुर्थी

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807( १६ ) संकटनाशन - गणेशचतुर्थी ।

चार गणेश चतुर्थियों में हम पहले आदिमका वर्णन कर चुके हैं; यह अन्तिमका वर्णन है । इसे संकट नाशनी कहते हैं - यह माघकृष्ण चतुर्थी में आती है और बहुत प्रसिद्ध है ।

इसकी कथा इस रूपसे प्रसिद्ध है किं- पार्वतीने गणेशको अपने शरीर के मलसे बनाया था; उसमें जीव प्रतिष्ठित कर दिया था । स्वयं अन्दर स्नान करने बैठी; और उसे बाहर बैठा दिया; और उसे किसीको अन्दर न आने देनेकी आज्ञा दे दी । महादेव जब आये; और अन्दर जाने लगे; तो उसने रोका; पर मुखसे कुछ नहीं कहा । तो महादेवजीने उसे अजनवी तथा अपनेको रोकते देख उसका सिर त्रिशूल से उड़ा दिया और भीतर चले गये । पार्वतीने अपना कोप - प्रदर्शन किया । महादेवजीने सब वृत्त कह सुनाया । पार्वती बोली - वह तो मेरा लड़का था; उसका सिर उससे जोड़कर उसे जीवित कर दीजिये; नहीं तो मैं अन्न जल

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ग्रहण न करूंगी । महादेवजी ने सर्वत्र ढूढ डाला; पर उन्हें वह सिर न मिला । फिर एक दिव्य हाथी आ रहा था; उसका सिर काट कर उस कबन्धपर जोड़ दिया । पार्वतीने कहा कि यह आपने क्या किया? विचित्र आकृति बना दी । उन्होंने कहा कि - यह एकदन्त, गजबदन गणेशजी होंगे । सब कार्यों में पहले इन्हींकी पूजा होगी । हम दोनोंके विवाह में भी पहले इन्हीं की पूजा हुई थी; यह उनका दूसरा अवतार है, दूसरा संस्करण है । हमारे पूर्वके विवाह में इनकी पूजा नहीं हुई, तत्फल - स्वरूप वह विवाह असफल

808श्रीसनातनधर्मालोक ( 2 )

होगया, और तुम सतीरूपमें पिता द्वारा अपमानित होकर सती होगई ।

वह सिर जो गणेशजीका उड़ गया था- - कहते हैं, वह चतुर्थीके चन्द्रमाके पृष्ठभाग में पहुँच गया था; अतः न दीखा । इसलिए उस दिन चन्द्रमाका दर्शन करके उसे अर्घ्यजल देते हैं । फिर गणेश - चतुर्थीव्रतका उद्यापन करते हैं ।

इस कथा में कही हुई गणेशोत्पत्ति में कई लोग शंकाएं करते हैं; वह सब उनके अल्पश्रुतत्व के कारण है । संक्षेपमें उत्तर यह है कि –पञ्चभूतोंके मिश्रण - विशेष से उसमें जीव प्रतिष्ठित हो जाता है— इस विषय में बिच्छू -आदिकी उत्पत्ति देख लीजिये; और फिर देवताओं में योनिजता न होनेसे उनमें पृथिवी भूतकी अपेक्षा तेज आदि भूतोंकी प्रधानता होती है; अतः सिर कटने पर भी मृत्यु नहीं होती । जरासन्धके भी शरीरकी दो फांकोंको सर्जरी ( जरा - राक्षसी ) द्वारा जोड़नेपर उसमें रक्तप्रवाह जारी होकर जीवका प्राकट्य होगया था । उक्त कथामें शिरः सन्धानमें भी उक्त सर्जरी जानी जा सकती है । वर्तमान- विज्ञान अभी इधर अभ्यास तो कर रहा है; कदाचित् इधर सफल हो जाए । यहां दिव्यतावश ऐसी सब शंकाएं समाहित हो जाती हैं । सिर कटनेपर भी जन्मतः अमृत पिये होनेसे देवता मरते नहीं । इसमें राहु - केतु याद रख लेने चाहिएँ । दिव्यता - वश ही गजशिरः -सन्धान से कोई वेमेल नहीं हुआ । इनके वाहन मूषक केलिए इस ग्रन्थका ५२-५३ पृष्ठ देख लेना चाहिए । अब अग्रिम - निबन्ध में गणेशजीके १२ नामोंपर राजनीतिक दृष्टिकोण उपस्थित किया जायगा ।

809गणेश एवं गणनायकके स्वरूपका परिचय

( २० ) गणेश एवं गणनायकके स्वरूपका परिचय ।

‘ गणेश'का सब स्थानोंमें तथा सबसे पूर्व पूजन किया जाता है । वेदमें प्रार्थनापूर्वक उसे कहा जाता है - हे गणपति - गणनायक! तुम गणोंमें ठीक - ठीक प्रतिष्ठित होवो । तुम बहुत मेधावी हो । तुम्हारे बिना कोई भी कार्य नहीं किया जाता ' ( ऋ ० १०।११२।६ ) ऐसे गणपति गणेशका राजनीतिक - स्वरूपभी जानना आवश्यक है ।

वैसे तो ' गणेश पुराण ' में ' गणेश सहस्रनाम ' में गणेशके सहस्र नाम कहे गये हैं, और वे सब राजनीतिक- रहस्यपूर्ण हैं; गणनायकके स्वरूपको परिचायित करने में अद्भुत क्षमता रखते हैं; तथापि गणेशके तीन प्रकारके बारह नाम बहुत प्रसिद्ध हैं । नामों से ही उसके कार्योंका परिचय हो सकता है । पुराणोंके अनुसार पहले बारह नाम यह हैं— " सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः । लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः । धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः । द्वादशैतानि नामानि यः पठेत् शृणुयादपि । विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा 1

। संग्रामे सङ्कटे चैव विघ्न- स्तस्य न जायते " ।

यहां पर गणेशके सुमुख १, एकदन्त २, कपिल ३, गजकर्णक ४, लम्बोदर ५, विकट ६, विघ्ननाश ७, विनायक ८, धूम्रकेतु ६, गणाध्यक्ष १०, भालचन्द्र ११, गजानन १२ यह बारह नाम आये हैं । इन नामोंके अतिरिक्त भी गणेशके बारह नाम पुराणादिमें आते हैं । वे यह हैं - ' वक्रतुण्ड! महाकाय! सूर्यकोटिसमप्रभ! अविघ्नं कुरु मे देव! सर्वकार्येषु सर्वदा । ' ' गणेश्वरं विघ्नविनाशनं च, 810लम्बोदरं मोदक - वल्लभं च । सुरासुरैर्वन्दितपूजितं च, गणेश्वरं शरणमहं प्रपद्ये । ' ‘ गजाननं भूतगणाधिसेवितं, कपित्थजम्बूफल- चारुभक्षणम् । उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वर- मान्तपंकजम् ' ।

यहाँपर पूर्व - नामोंके अतिरिक्त गणेशके १ वक्रतुण्ड, २ महाकाय, ३ सूर्यकोटिसमप्रभ, ४ गणेश्वर, ५ विघ्नविनाशन, ६ मोदकवल्लभ, ७ सुरासुरवन्दित - पूजित, भूतगणाधिसेवित, ६ चारुभक्षण, १० उमासुत, ११ शोकविनाशकारक, १२ आत्त- पंकज - यह बारह नवीन नाम आये हैं । यह गणेशके नाम पुराणोंके आ चुके । अब वेदानुगृहीत ' गणेश पुराण ( उपासना खण्ड ) स्थित कई गणेशके नाम भी संगृहीत किये जाते हैं ।

' गणेश पुराण ' के उपासना - खण्ड में गणेशसहस्रनामों में गणेशके निम्न वैदिक - नाम आये हैं- ' कविं कवीनामृषभो ब्रह्म

ब्रह्मणस्पतिः । ज्येष्ठराजो निधिपतिर्निधिः प्रियपतिः प्रियः ॥ ( ४६।१४-१५ ) ब्रह्म ब्रह्मार्चितपदो ब्रह्मचारी बृहस्पतिः ' ( १०२ ) इसमें ' गणपति ' के १ कवि, २ ज्येष्ठराज, ३ ब्रह्मणस्पति, ४ बृहस्पति यह नाम आये हैं ।

कृष्णयजुर्वेदीय तैत्तिरीयारण्यक ( १०1१ ) में तथा ' मैत्रायणी- ' यजुर्वेदसंहिता ' ( २२६ | १ | ६ ) में गणेश के ८ तत्पुरुष, ६ वक्रतुण्ड, १० दन्ती, ११ कराट, १२ हस्तिमुख - यह नाम आये हैं ।

* यदि ' विघ्नेश्वरपादपङ्कजम् ' पाठ हो तो वह ' उमासुतं ' का विशेषण होगा; उसका अर्थ होगा - ' विघ्नेश्वरभूते पादपङ्कजे यस्य सः, तम् ।

811गणेश एवं गणनायकत्रे स्वरूपका परिचय

‘ गणेशाथर्वशीर्ष में ‘ एकदन्तं चतुर्हस्तं पाशमंकुशधारिणम् । अभयं वरदं हस्तैर्बिभ्राणं मूषकध्वजम् ' यह नाम आये हैं । ' बोधायनगृह्य- शेषसूत्र ' में— ' विघ्न! विघ्नेश्वरागच्छ विघ्नेत्येव नमस्कृत! ' अविघ्नाय भवान् सम्यक् सदास्माकं भव प्रभो! ' ( ३।१०।२ ) यहां गणेशके विघ्न तथा विघ्नेश्वर यह नाम आये हैं । इनमें कई पूर्व आ चुके हैं । इनमें हमने १ मूषकवाहन, २ ब्रह्मणस्पति, ३ कवि, ४ ज्येष्ठराज, ५ बृहस्पति, ६ तत्पुरुष, ७ कराट, प्रियपति, ६ निधिपति, १० वसु अथवा वरद, ११ चतुर्भुज, १२ विघ्नेश्वर अथवा स्वस्तिक यह वारह नाम चुन लिये हैं ।

इन नामोंसे पूर्ण ' गणेश ' बनता है । नामोंसे कार्योंका परिचय होता है - ' यथा नाम तथा गुणः ' । यह पूर्व कहा जा चुका है कि - इन नामोंके पठन, श्रवण वा अवधारण से सभी विघ्न दूर हो जाते हैं । गणेशका मुख्य - स्वरूप गजानन होना, एकदन्त तथा लम्बोदर होना है । चूहा इनका वाहन होता है ।

गणेश वा गणपति गणनायकको कहते हैं । गण संघको कहते हैं । संघका नायक कैसा होना चाहिये - गणपति गणेशके स्वरूप से तथा नामों से इसका परिचय प्राप्त हो जाता है । इनका राज- नीतिक स्वरूप इस प्रकार है-

१ सुमुखः -- गणनायकको सम्पत्ति तथा विपत्तिमें ' सुमुख ' रहना चाहिये, हर्ष- शोकमें एक रूप ' सुमुख ' रहे । मुखके द्वारा हर्ष - शोकको प्रकट न होने दे । इसीसे गणनायक शत्रुओंकेलिए ' विकट ' सिद्ध होता है, शत्रु उससे प्रभावित होते हैं, अपनी 812मे १२ श्रीसनातनधर्मालौक ( ५ )

कार्यवाहियोंको उसपर निष्फल होता हुआ देखकर भाग खड़े होते हैं । यदि शत्रुओंकी कार्यवाहियों से गणनायकके मुखपर जरा भी खिन्नता - विचलितता दिखाई पड़ती है; तो शत्रु अपनी कार्यवाहियों की सफलता समझ कर प्रवृद्धोत्साह हो जाते हैं । ऐसे गणनायक की पराजय आशंकित हो जाती है, पर अपने विनायकत्व - विशिष्ट नायकत्वको अक्षत रखनेकेलिए उसे सदा ' सुसुख ' ही रहना पड़ता है ।

२. ‘ एकदन्तः ’ – गणनायकको ' एकदन्त ' ( दन्ती ) भी होना चाहिये, एक ही शुभ्र दान्त बाहर रखना चाहिये । शेष नीतिरूप दान्तोंको अन्दर अर्थात् बाहरमें अप्रकट- गुप्त रखना चाहिये; प्रसिद्ध है - ' हाथी के दांत खानेके और दिखानेके और ' तभी विघ्न- रहित होगा, तभी उसकी विजय होगी ।

३. ' कपिल ' – ' कपिल ' से ' कपिल - रंग ' अभीष्ट है । जैसे कपिला गाय होती है, उसमें या तो शुभ्र रंग होता है, या लाल । काला रंग सर्वथा नहीं होता । इस प्रकार गणनायक भी यशः - शुभ्र हो, लोकानुराग - रूप रक्तवर्ण भी हो, पर उसमें कलङ्करूप- कालापन सर्वथा न हो । कलङ्ककी एक रेखा भी होने से वह ' कपिल ' न बन सकेगा । तब वह विनायक, विशिष्ट नायक भी न बन सकेगा ।

४. ‘ गजकर्णकः ' — गणनायकको कान गजका रखना पड़ता है । उसे प्रतिसमय हिलाना - डुलाना पड़ता है । गजका कान बहुत कोमल होता है, गणनायकका भी । दुर्जनरूपी च्यूँटी उसमें छिद्र करनेमें सफल हो जाय, तो तत्परिणाम स्वरूप गणनायकके आत्म - विनाश

In English

Sankatnashan - Ganesh Chaturthi

This chapter describes the final of the four Ganesh Chaturthis, occurring in the month of Magha. It recounts the story of how Parvati created Ganesha and how Shiva replaced his severed head with that of an elephant to bring him back to life. The text also explains why devotees offer water to the moon on this day and introduces the twelve names of Ganesha used for various life events.

This chapter answers

  • Why does ganesh have an elephant head?
  • Why do hindus offer water to the moon on ganesh chaturthi?
  • What are the twelve names of ganesha?
  • How was ganesha created by parvati?

Also written: Sankatanashana, Ganeshachaturthi, Sankatanashana Ganeshachaturthi, संकटनाशन - गणेशचतुर्थी

मूल ग्रन्थ

यह पाठ सनातन धर्मालोक ५के मुद्रित पृष्ठ 807–812 से ज्यों-का-त्यों लिया गया है — न कुछ जोड़ा गया है, न घटाया। स्कैन किया हुआ मूल पृष्ठ देखनेके लिये —

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