पञ्चम सुमन · प्रकरण 47

घण्टानाद तथा शंखध्वनि - विज्ञान

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423गांववालोंको टाइमका भी पता लग जाता है 1 । बौद्ध, जैन, ईसाइयों- के मन्दिरोंमें भी इसका प्रयोग होता है । वर्मा, चीन, जापान, मिश्र, यूनान, रोम, फ्रान्स, रूस, इंगलैण्ड आदिमें भी घण्टेका व्यवहार प्राचीनकाल से है । घंटेकी ध्वनिसे कई रोग भी दूर होते हैं । इसका विशेष - लाभ ' देवमन्दिरगमन - विज्ञान ' में बताया जावेगा ।

( ३७ ख ) शंख - ध्वनिविज्ञान ।

सन्ध्या कर चुकनेपर तथा हिन्दुओंके धर्ममन्दिरोंमें, धर्म- कथाओंमें शंखका नाद किया जाता है, यह भी रहस्य - पूर्ण है । वैज्ञानिक - प्रोफेसर जगदीशचन्द्रवसु - महोदयने अपने प्रयोगों से सिद्ध किया है कि - जहां तक शंखकी ध्वनि जाती है; वहां तक संक्रामक रोगोंके अनेक विषाक्त परमाणु स्वयं ही दूर हो जाते हैं, वहांका वायुमण्डल विशुद्ध हो जाता है ।

जो लोग हमपर यह आक्षेप करते हैं कि- यह लोग मुंहसे हड्डी छूते हैं, इस पर उन्हें जानना चाहिए कि - जैसे चमड़ा अशुद्ध होने पर भी प्रतिपक्षी भी मृगचर्मादिरूपमें उसका उपयोग लेते हैं, और उसे शुद्ध मानते हैं । जैसे देवमन्दिरमें चमड़ेके बने होनेसे जूता लेजानेका निषेध होने पर भी चमड़ेका मृदंग वा ढोल वहां ले जाया जाता है 1

। जैसे बाल अशुद्ध होने पर भी प्रतिपक्षी- लोगों से शिखा ( चोटी ) रूपमें प्रयुक्त किये जाते हैं, चमरीकी पूछ- चमर मन्दिरोंमें, गुरुद्वारों वा राजभवनों में झुलते हैं; और उन्हें शुद्ध माना जाता है; जैसे पुरीष अशुद्ध होने पर भी प्रतिपक्षी भी गोपुरीष ( गोबर ) रूपमें उसका उपयोग करते हैं, और उसे शुद्ध 424मानते हैं; मल अशुद्ध होनेपर भी भस्मरूपसे प्रयुक्त की जाती है, क्योंकि — भस्म अग्निकी मल होती है; जैसे कि कृष्णयजुर्वेद में कहा है – ' अग्नेर्भस्मासि, अग्नेः पुरीषमसि ' ( तै ० सं ० १/२/१२ ( ३ ) जैसे दांत अशुद्ध होने पर भी, अस्थिमय होनेपर भी, गजदन्तरूपमें प्रतिपक्षियोंसे भी उपयुक्त किये जाते हैं, वल्कि अपने मुखमें भी लगाये जाते हैं; अपनी स्त्रियों के हाथ में चूड़ीरूप में पहिनाये जाते हैं 1 । जैसे मूत्र अशुद्ध होने पर भी प्रतिपक्षी भी गोमूत्रादिरूपमें उसका प्रयोग करते हैं, और उसे शुद्ध मानते हैं । जैसे कि - कृमि - विशेषके मुखकी लारसे उत्पन्न भी रेशमको पवित्र माना जाता है । जैसे वमन ( उल्टी ) अशुद्ध होती हुई भी मधु - रूप में प्रतिपक्षियोंसे प्रयुक्त की जाती है, और यज्ञमें भी उसका प्रयोग किया जाता है; जैसे हड्डीरूप कौडियाँ भी सभीसे प्रयुक्त की जाती है; इसी तरह अस्थि अशुद्ध होती हुई भी शङ्ख आदि रूपमें उसका प्रयोग होता है, और शङ्खको शुद्ध माना जाता है । यह सब सामान्य - शास्त्रके अपवाद हैं ।

यदि कहा जावे कि — ' यह तो आपकी इच्छा हुई, जिसे चाहे शुद्ध वना दें, जिसे अशुद्ध ' । इसपर यह जानना चाहिए कि— सामान्य - शास्त्रके अपवाद् सर्वत्र हुआ करते हैं, और वे स्वाभाविक होते हैं; उन्हें वैसा ही मानना पड़ता है । आक्षेप्ता लोग जिन्हें हड्डी एवं अस्पृश्य कहते हैं; उनके मुखमें भी क्या हड्डी जुड़ी हुई नहीं, जिन्हें दाँत कहते हैं? क्या आप उन्हें निकलवा डालते हैं? आपके शरीर में रक्त भी है, हड़ियाँ भी हैं; उन्हें भी अस्पृश्य 425होनेसे निकलवा डालेंगे? शुक्र अस्पृश्य है; उससे बने हुए पुत्रको भी गिरा देंगे क्या?. यदि नहीं; तो स्पष्ट हो जाता है कि- जिसके बिना निर्वाह न हो; वा जिसमें कई गुणविशेष अनुभूत हों, उसकी अस्पृश्यता बाधित हो जाती है, और उसे अपवादस्थल माना जाता है । जब अनिर्वार्ह्यस्थल में भी अस्पृश्यता नहीं मानी जाती; तब जहां हमारे विज्ञानज्ञाता प्राचीन ऋषि - मुनियोंने विशिष्ट वस्तुओंमें वैज्ञानिक - दृष्टिसे शुद्धता देखी; वहाँ भला अस्पृश्यता, वा अशुद्धता वा त्याज्यता कैसे हो सकती है? इस प्रकार सभी सामान्य - शास्त्रके अपवादों में जानना चाहिये ।

इसके अतिरिक्त प्राकृतिक नियमोंसे भी यही प्रतीत होता है कि — अस्पृश्यता बलावलपर निर्भर है । जिस वस्तुमें वैज्ञानिक गुणोंका बल अधिक होता है, वहाँ अस्पृश्यता प्रवृत्त नहीं होती । जैसे सायङ्कालीन वायु अस्पृश्य होती है; वह सम्पूर्ण वृक्षोंको दूषित कर देती है, परन्तु अधिक बल रखनेवाले पीपल और वड़ आदि वृक्ष, तुलसी आदि पौधे उस वायुसे दूषित नहीं किये जा सकते । पूर्ववत् वे शुद्ध ही रहते हैं । अवश्य इनमें विशिष्ट शक्ति

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हुआ करती है; जो अशुद्ध वायुको बलवान् नहीं होने देती । तभी हमारे शास्त्रों में तुलसी, पीपल आदि वृक्षोंको उत्तम वृक्ष माना गया है, सायं वा रात में भी इनके पास रहने से हमारी कोई हानि नहीं होती ।

इस प्रकार ऋषि - मुनियों ने मृगचर्म आदि तथा उनके वस्त्र, रेशमी कपड़ा आदि और गजदन्त एवं शङ्ख आदिको भी पवित्र 426कहा है । इस प्रकारकी विशिष्ट शक्तिको हमारे वैज्ञानिकमूर्धन्य पूर्वज जानते थे; तभी उन्होंने एतदादिकी व्यवहार्यता बताई है ।

शङ्खके वैज्ञानिक गुणोंपर विचार करना चाहिए । पहले हम वैज्ञानिक श्रीजगदीशचन्द्रबोसका इस विषय में अभिमत बता चुके हैं । धार्मिक लोगों में प्रसिद्ध है कि - प्रातः सायं शङ्ख बजाने से भूत हट जाते हैं - ' शङ्ख बाजे, भूत भागे ' । उनमें कीटाणु भी सूक्ष्म - भूतों में माने जाते हैं । दोनों सन्ध्याओं में तम और प्रकाशके मिश्रणसे रोगके कीटाणु पैदा होते हैं; और इधर - उधर फैल जाते हैं; और वे वायुमण्डलको अशुद्ध कर दिया करते हैं । तब शंखनाद कीटाणुओंका दूर करनेवाला होनेसे स्वयं ही आरोग्यकारक सिद्ध हुआ क्योंकि कीटाणु आरोग्यके विघातक हुआ करते हैं । संक्रामक रोगों में शङ्ख विशेष उपयोगी होता है ।

आजकलके वैज्ञानिक जिस नवीनताकी गवेषरणा करते हैं, आजके भारतीय उसमें बहुत हैरान हो जाते हैं । स्वयं कुछ भी नहीं करते, और न प्राचीन मुनियोंके वचनोंपर विश्वास वा श्रद्धा करते हैं । यह शंख मूकों ( गू गों ) को भी भाषणशक्ति देता है । यदि गूंगे प्रतिदिन तीन - चार बार शंख बजावें; और उन्हें बोलनेका अभ्यास कराया जाय, शंखमें डाला हुआ जल उन्हें पिलाया जाया करे, शंखभस्म उन्हें खिलाई जाए; और छोटे - शंखोंकी माला उन्हें पहराई जावे; तो वे मूक भी बोलने में कुछ सहायता प्राप्त कर लेते हैं । गण्डमाला - रोगमें शंख घिसकर लगानेसे लाभ होता है । क्षय, कृशता, विष तथा नेत्र रोगोंपर शंखको लाभदायी कहा गया है । 427शंख शूल, गुल्म, संग्रहणी, दन्तरोग, आँखका फूला और फोड़ोंका नाश करता है ।

इसी कारण प्राचीन समय में बच्चोंकी ग्रीवामें छोटे - छोटे शंखोंको धागे में पिरोकर पहिनाते थे । इससे बच्चे शीघ्र बोल सकते थे, दृष्टिदोष भी उन्हें नहीं होता था । महाराष्ट्रमें शंखका जल बच्चोंको पिलाते हैं, इससे कई उनके रोग दूर हो जाते हैं । प्राचीन शास्त्रों में शंखको इसीलिए रत्न कहा जाता है । समुद्रसे जब चौदह रत्न निकले थे; उनमें शंख भी था ।

सब आगमोंके मूल वेदमें भी शंखका लाभ आया है । जैसे कि — ‘ शंखेन हत्वा रक्षांसि ' ( अथर्वसं ० ४।१०।२ ) यहाँ शंखसे सूक्ष्म राक्षसोंका नाश कहा है । सन्ध्याके बाद जो कि शंख बजाया जाता है, इससे भूत - प्रेत - राक्षसादिका नाश होता है— इस सनातन- धर्मियोंकी प्रसिद्धिको यहाँ वेदका समर्थन प्राप्त है । प्रातः शुद्ध- वायुमें शंख बजाने से श्वासोंकी शुद्धता, और छातीकी विशालता, और फेफड़ोंकी शुद्धि होती है, जिससे भीतर निरन्तर श्वासोंकी शुद्धि होने से राजयक्ष्मा आदि रोग नहीं होते; ऐसा वैज्ञानिकोंका कथन है । आर्यसमाजके प्रवर्तक स्वा ० दयानन्दजीने अपने यजुर्वेद- भाष्यमें ' अवरस्पराय शङ्खध्मम् ' ( ३०।१६ ) ' नीचे के शत्रुओंके अर्थ शंख बजानेवालेको उत्पन्न वा प्रकट कीजिये ' यह लिखकर शंख बजानेकी वैदिकता सिद्ध की है । उनके अनुयायी इधर दृष्टि डालें- यहाँ शत्रु रोगकीटाणु भी विवक्षित हो सकते हैं ।

‘ समुद्राद् अधिजज्ञिषे ' ( अथर्व ० ४।१०।२ ) यहाँ शंखकी समुद्रसे 428उत्पत्ति बतलाई है । ' शङ्खो नो विश्वभेषजः कृशनः पातु अंहसः ' ( अथर्व ० ४।१०१३ ) यहाँ शंखको सब रोगोंका औषध स्वरूप, और पाप वा दुःखको दूर करनेवाला कहा है । ' दिवि जातः समुद्रजः सिन्धुतस्पर्याभृतः । स नो हिरण्यजः शङ्ख आयुष्प्रतरणो मणिः ' ( ०४ । १० । ४ ) यहां शंखको आयु देने वाला भी माना गया है । ' तत् ते बध्नामि आयुषे वर्चसे बलाय दीर्घायुत्वाय शतशारदाय ' ( अ ० ४ | १० | ७ ) यहां शंखको दीर्घ आयु, बल एवं तेज देनेवाला बताया है । जब वेद शंखकी इस प्रकारकी महिमा बताता है; तब वैदिकम्मन्य इसपर आक्षेप कैसे कर सकते हैं? बृहदारण्यक उपनिषद् में तथा अन्य श्रौतग्रन्थों में भी शंखके पर्याप्त प्रसङ्ग हैं । शंख बजानेके साथ ' कौशिकसूत्र ' में आयुवृद्धिकेलिए बालकके शरीरपर अभिमन्त्रित शंख बांधनेका भी विधान है । नक्षत्रकल्प ( १०/२ ) में शंखको पापहारी रक्षोघ्न, महौषध तथा दीर्घायुः प्रद बताया गया है । उसकी महत्ता इसीसे सूचित होती है कि- भगवान् विष्णु उसे नित्य धारण करते हैं ।

सनातनधर्मके देवमन्दिरोंमें, मठोंमें, संस्थाओंमें, भजन- मण्डलियों में, साधुओं की कुटियों में, कथाओं में, पूजा में, जप - पाठों में माङ्गलिक - उत्सवों में, शंखका पवित्र नाद भारत के घर - घर में होता है, और होता था । कुरुक्षेत्र - युद्ध में भगवान् श्रीकृष्णने पाञ्चजन्य नामक शंख बजाया था, युधिष्ठिरने अनन्तविजय, भीमसेनने पौण्ड्र, अर्जुनने देवदत्त, नकुलने सुघोष, सहदेवने मणिपुष्पक शंख बजाया । ( गीता १।१५-१६ ) । उससे शत्रुओं के हृदय फट गये । 429इस प्रकार इसके बजाने में प्राचीनता भी सिद्ध हुई । इसकी श्रेष्ठता होनेसे ही भगवान की आरती के समय शंखका जल भक्तोंपर डाला जाता है । यूरोपीय विज्ञानवेत्ताओंने भी शंखमें मनुष्य- हितकारिणी विद्युत् मानी है ।

आयुर्वेद में भी शंखकी अपूर्व शक्तिका वर्णन है । शंखद्रवके सेवन करने से गुल्म, ताप, तिल्ली, मूत्रकृच्छ आदि रोग दूर हो जाते हैं । शंखभस्मसे पत्थरी, पीलियायन आदि रोग हट जाते हैं । इसीके योगसे वैद्य लोग बहुतसी दिव्य औषधियां तैयार करते हैं, लाभ प्राप्त करते तथा कराते हैं । यदि शंखमें जल वा गंगाजल सिद्ध करके पिलाया जाया करे; तो कीटाणुजनित सभी रोग दूर हो जाते हैं । इसमें विशेष खर्च भी नहीं पड़ता । इसमें विविध लाभोंको देखकर प्राचीनकालमें कुमारियां भी अपने बाहुमें शंखकी चूड़ियां पहिरती थीं; ' सांख्यदर्शन ' में इसका संकेत आया है — ' बहुभिर्योगे विरोधो रागादिभिः कुमारीशं - खवत् ' ( ४।६ ) इसका भाष्य यह है - ' यथा कुमारी हस्तशंखानामन्योन्य- सङ्ग ेन झणत्कारो भवतीत्यर्थः । यदि हड्डीकी भांति शंखकी अपवित्रता होती; तो प्राचीनकालमें इसका उपयोग कैसे होता? गीता और सांख्यदर्शनादिने उसका संकेत कैसे किया? तब ' शंख यह हड्डीमात्र है, उसे सनातनधर्मी मुखसे क्यों लगाते हैं? उसका बजाना पोपलीलामात्र है, यह कहते हुए आक्षेप्ता वैदिक - ज्ञान- शून्य तथा विज्ञानके ककहरेको भी न जाननेवाले सिद्ध हुए । यह ' आलोक ' पाठकोंने अनुभूत किया होगा ।

430यज्ञका वैज्ञानिक महत्व

सन्ध्या करके फिर हवनादिरूप में देवयज्ञ भी किया जाता है । पारलौकिक लाभ तो इसका है ही; ऐहिक लाभ भी हैं । सनातन- हिन्दुधर्ममें यज्ञोंका बड़ा महत्त्व माना जाता है । इस धर्म में वेदोंका जो महत्त्व है; वही महत्त्व यज्ञोंको भी प्राप्त है; क्योंकि वेदोंका प्रधान विषय ही यज्ञ है; जैसे कि हम ' ब्राह्मणभाग भी वेद हैं ' इस निबन्ध में अग्रिम पुष्पमें बताएँगे ।

यह याद रखने की बात है कि अग्नि मानव समाजकी एक विशेष विभूति है । प्राणियों में मनुष्य ही केवल अग्नि - द्वारा काम लेते हैं; शेष तो अग्निसे दूर रहते हैं । वनमें हिंस्र जन्तुओं से . अपनी रक्षाका उपाय भी यही है कि - अपने चारों ओर अग्नि जलाकर रखी जाय । मनुष्य ही अग्नि द्वारा विविध कृत्योंको पूर्ण करता है । अग्नि द्वारा वह शक्ति उत्पन्न होती है, जिससे, मोटरें एवं रेलगाड़ियां चलती हैं, तार जाते हैं, विमान उड़ते हैं । अग्नि- द्वारा ही बाहरी तथा भीतरी भोजनकी पाकक्रिया सम्पन्न होती है, जिससे मनुष्य जीवन - धारण करता है । बहुत कहने से क्या, गर्भाशयी अग्निद्वारा ही मनुष्य आदिका शरीर पैदा होता है; और पुष्ट होता है । सुवर्ण आदि धातुओं की उत्पत्तिमें — जिनसे संसारका व्यवहार चलता है - कारण भी खानकी अग्नि ही है । जैसे कि ऋ ० सं ० में कहा है- ' रत्नधातमम् ' ( १ | १1१ )

महायुद्धों में जो महान् जनसंहार होता है, वह भी अग्निके ही बलसे । उसीके आश्रयसे बन्दूक चलती है, तोप चलाई जाती

431यज्ञका वैज्ञानिक - महत्व ४३.१ है, सर्वसंहारक अस्त्र चलते हैं, गैसें चलती हैं, वम डाले जाते हैं । जिस राष्ट्रके पास तेल, कोयला आदि अग्निका भोजन नहीं होता; वही अन्तमें हारता है । इसी कारण आक्रमणकर्ता राजा दूसरे राष्ट्रके पैट्रोल, तथा कोयलोंकी खानें नष्ट करनेकी चेष्टा करते हैं; जिससे दूसरोंकी पराजय और अपनी विजय हो!

अग्नि के उत्पादन और उससे होनेवाले जनसंहारके नवीन ` प्रकारोंका उद्भावन आज के भौतिक विज्ञानने किया है; उसकी चकाचौंध में पड़कर आजका युवक समाज अपनी प्राचीन संस्कृति एवं ज्ञान- गौरवको भूल गया है; पर हमारे पूर्वज विज्ञानकी चरम - सीमा तक पहुँच गये थे । अग्निकी उपासना इस बातका प्रत्यक्ष प्रमाण है । प्राचीन युगमें अग्नि - द्वारा दिव्य - शक्तिके उत्पादनका अन्य ही प्रकार था । जैसे आजकल विधान - विशेषसे अग्निमें पेट्रोल और कोयलेकी आहुति देकर भौतिक - शक्ति पैदा की जाती है; वैसे ही पुराकालमें प्राचीन मुनि विधानविशेष एवं मन्त्रविशेषसे द्रव्य- विशेषकी आहुति देकर दिव्य शक्तिको उत्पन्न करके अपने तथा दूसरोंके मनोरथोंकी वर्षा करा देते थे ।

आजका वैज्ञानिक जगत् अभी तक भौतिक तत्त्वोंके सम्बन्धमें सन्दिग्ध ही है, परन्तु हमारे पूर्वज पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाशको पृथक् - पृथक् और सामुदायिक तत्त्व मानते थे । वे हमारे पूर्वज इन पदार्थोंका गुण - धर्म भली - भांति जान चुके थे । उनका कहना था कि स्थूलसे सूक्ष्म, तथा व्यक्तसे अव्यक्तमें उत्तरोत्तर शतगुणा और सहस्रगुणा अधिक शक्ति हुआ करती 432है । इसी आधार पर उन्होंने तत्त्वोंकी उपादेयता स्वीकृत की थी ।

उन्होंने जाना था कि पृथिवी ग्राहकता - शक्ति रखनेपर भी स्थूल होनेके कारण एक बीजको एक बारसें केवल बीस गुना अधिक बढ़ा पाती हैं । जल पृथिवीकी अपेक्षा सौ गुना सूक्ष्म होनेके कारण एक बीजको एक बारमें हज़ार - गुना अधिक बढ़ा सकता है । किन्तु ये दोनों पदार्थ परस्परकी अपेक्षा रखा करते हैं । पृथिवी जलके बिना और जल पृथिवीके बिना उत्पत्ति एवं विकास नहीं कर पाता । इसलिए जलको जीवन - तत्त्व मानकर भी ऋषियोंने इसकी उपासनापर वहुत अधिक बल नहीं दिया ।

इसके पश्चात् अग्निका स्थान आता है । आजका वैज्ञानिक- जगत् अग्निको विभाजक द्रव्य मानता है । उसका कहना है कि अग्निमें पड़कर कोई भी द्रव्य नष्ट नहीं होता, अपितु कई भागों में विभक्त होकर, स्थूलसे सूक्ष्म होकर और भी अधिक शक्तिशाली बनकर इधर - उधर फैल जाता है । हमारे तत्त्व - द्रष्टा ऋषियोंने भी यही माना था । बल्कि इससे भी सूक्ष्म विश्लेषण किया था कि अग्निमें पड़कर कौन पदार्थ किन - किन रूपोंमें विभक्त होकर, कहां तक जाकर किस रूप में प्राप्त होता है । इसी ज्ञानने विकसित होकर यज्ञ - यागादिको जन्म दिया था । और इसमें ऋषि - मुनियोंने बहुत बड़ी उन्नति कर डाली थी ।

प्राचीनकाल में हवनीय सम्पूर्ण पदार्थोंका संस्कार करके उनमें वह सूक्ष्म - शक्तियाँ पैदा की जाती थी; जो अभीष्ट उद्देश्यके लिए आवश्यक होती थीं । यज्ञमें काम आनेवाली ओषधियां अमुक

In English

The Science of the Conch Shell

This chapter explains the scientific and spiritual benefits of using bells and conch shells in daily rituals. It argues that the sound of a conch purifies the atmosphere by destroying infectious germs and provides various health benefits for speech, lungs, and eyes.

This chapter answers

  • Scientific benefits of blowing a conch shell?
  • Why is the conch considered pure despite being bone?
  • How does conch sound affect germs and diseases?
  • Uses of conch for speech and eye health?
  • Meaning of shankha in vedic rituals?

Also written: Ghantanada, Tatha, Shankhadhvani, Vigyana, Ghantanada Tatha Shankhadhvani Vigyana, घण्टानाद तथा शंखध्वनि - विज्ञान

मूल ग्रन्थ

यह पाठ सनातन धर्मालोक ५के मुद्रित पृष्ठ 423–432 से ज्यों-का-त्यों लिया गया है — न कुछ जोड़ा गया है, न घटाया। स्कैन किया हुआ मूल पृष्ठ देखनेके लिये —

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