पञ्चम सुमन · प्रकरण 46

वाणीका उपवास वा मानसिक - तप, मौन

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417और लाभ प्राप्त्यर्थं हमारी गोलाकार स्थिति स्वाभाविक हुआ करती है ।

परिक्रमा अपेक्षित लाभकी प्राप्ति एवं आत्मगत - तेजकी वृद्धि हुआ करती है । मूर्तिपूजा में परिक्रमा अपना विशेषस्थान रखती है । परिक्रमा के समय जिधर मुख करे; उसे उस देवको प्राप्त होनेकी आस्था रहती है; उस देवके गुणोंका चिन्तन भी होता रहता है । हमने भी जब पृथ्वीका अन्त पाना होता है; तब पृथ्वी - परिक्रमा करते हैं । फलतः परिक्रमा भी रहस्यपूर्ण - व्यवहार है । कोई उपहासकी बात नहीं ।

( ३६ ) वाणीका उपवास, वा मानसिक - तप, मौन ।

सन्ध्या आदिके समय अपेक्षित मन्त्रोच्चारणादिके बिना और किसीसे बातचीत न करना यह ' मौन ' कहाता है । इसमें भी कई रहस्य हैं । एक यह कि यज्ञ में अपभाषणका निषेध है । सन्ध्या वाजप आदि भी यज्ञरूप होते हैं; इनमें हम वातचीत करेंगे; तो हिन्दीमें करेंगे । हिन्दी अपभ्रष्ट भाषा है; उसका व्यवहार करने से दोष उपस्थित होता है । महाभाष्य में कहा है कि - असुरोंने विजयकेलिए किये जा रहे हुए यज्ञ में ' हेलयः - हेलयः ' कहते हुए- अपभाषण किया; और वे पराजित हो गये । इसलिए हमारे पूजा - सम्बन्धी कार्यों में भी संस्कृत शब्दोंका व्यवहार देखा गया है । यह नहीं कहते कि ' हम देवताके घर जाते हैं ', किन्तु कहते हैं- ' देवमन्दिरमें जाते हैं ' यह नहीं कहते कि — देवताको देखने जाते हैं; किन्तु कहते हैं कि- ' देवदर्शनार्थ जाते हैं ' इत्यादि । 418दूसरा सन्ध्या आदिमें. वेरोकटोक वात - चीत होनेसे हमारा ध्यान उसी ओर जावेगा । फिर हमारी उपासनाकी एकाग्रता नष्ट होगी ।

यह तो हुई पूजाकी बात; वैसे भी समय - समय पर मौन रहना यह मानसिक - तप है । प्रत्येक समय बोलनेवाले, अधिक बोलने- वाले जब बोलेंगे; उसमें जहां वाणीका खर्च होगा; वहां अपनी भीतरी - शक्तिका, भीतरी -विद्युत्का भी, अपने तेजका भी ह्रास होगा । प्रायः मौन अबलम्बन करनेवालेकी वह शक्ति सुरक्षित रहती है; इसलिए समयपर बोलनेवालेका प्रभाव भी दूसरेपर होता है । जिस इन्द्रियका जितना संयम होगा; उसकी शक्ति उतनी बढ़ेगी, भविष्य में भी वह अधिक कार्य देगी । फिर अधिक बोलनेसे उसमें असत्य - बहुलता भी रहेगी । असत्य बोलना भी ' हमारे तपको क्षीण करनेवाला होता है । अस्तु ।

' मौन ' का अर्थ है ' मुनेर्भावः ' । तो यह मौन मुनित्व है । मुनि इसी मौनका ही व्यवहार अधिकांशमें करते थे । जैसे कायिक उपवास एकादशी व्रत है— जिसका विवेचन हम आगे करेंगे, उससे शरीरकी शुद्धि होती है; वैसे ही वाणीका उपवास मौनव्रत है; इससे वाणीकी शुद्धि हो जाती है । मौन मानसिक - तप है । जैसे कि भगवान् ने कहा है- ' मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनम् आत्म- • विनिग्रहः । भावसंशुद्धिरित्येतत् तपो मानसमुच्यते ' ( गीता १७/१६ ) । मनकी प्रसन्नता रखनी ( कुढ़ते न रहना ), सौम्य रहना, मौन रहना, आत्म - संयम रखना, भावकी शुद्धि रखनी - यह मानस - तप कहा है ।

419जैसे सदा अन्न, कदन्न ( खराव अन्न ) आदि खानेसे शरीर में अशुद्धि व्याप्त हो जाने से शरीर रोगी हो जाता है, और शारीरिक उपवास करनेपर वह अशुद्धि दूर होकर शरीर की शुद्धि हो जाया करती है, और वह शरीर भी नीरोग हो जाया करता है, वैसे ही सतत - भाषणसे, सुभाषण और अपभाषणके मिश्रण हो जाने से वाणी भी अस्वस्थ हो जाती है, वह असत्य भी वोलने लग जाती है - यही उसकी अस्वस्थता - रुग्णता होती है । वही वाणी फिर निर्भर्त्सन, और गालिप्रदान आदिमें परिणत होकर क्रोधके प्राज्य - साम्राज्यको आविष्कृत करके ‘ वाक्पारुष्याद् नान्यदस्त्यप्रियत्वम् ' इस न्यायसे कलह, युद्ध एवं महायुद्धोंकी सृष्टि करनेवाली बन जाती है ।

वाणी जब तक हमारे अन्दर है, हमारी है । जब मुख बाहर हुई; तब वह दूसरेकी हो जाती है । उससे यदि दूसरा क्षत को प्राप्त करता है; तब वह उस वाक्के प्रयोक्ता पर प्रहार करता है; उसके मारनेका प्रयत्न करता है । परन्तु मौनव्रत वाणीके उस रोगको शान्त करनेवाला अमोघ औषध होता है । मौनव्रत से न केवल वाणीका बल, प्रत्युत मनोबल, बुद्धिबल, आत्मबल तथा शारीरिक बल भी प्राप्त होता है । अधिक भाषण शारीरिक- बलके साथ मनोबल एवं बुद्धिबलका भी ह्रास करता है; क्योंकि वाणीके विकासमें यह तरीका है कि उस समय हमारा आत्मा और बुद्धि हमारे शरीर में कौन्सिल करते हैं; कि अमुक अर्थको कहना है । वे मनको प्रेरित करते हैं । मन उस समय शारीरिक अग्निको पीटता है, वह अग्नि वायुको प्रेरित करती है । वह वायु नाभिप्रदेशसे 420ऊपर छाती आदिमें प्रवेश करती है, फिर ऊपर आती है और ' शब्द मुखसे उत्पन्न होता है । यही वाणी है । इसमें हमारे शरीरका मथन होता है । उसकी अग्नि हसित होती है । इसलिए लैकचरार और अध्यापक जिनको चिल्ला - चिल्लाकर बोलना पड़ता है, शीघ्र मरते हैं ।

हमारी भाषण - क्रियाको हमारा गला और फेफड़े विशेषरूपसे सम्पन्न करते हैं । फेफड़ोंमें वायुसंचार होनेपर ही वाणीकी प्रक्रिया संपन्न होती है, उसका प्रभाव हमारे मस्तिष्क एवं शरीरपर भी पड़ता है । मौनव्रत से फेफड़ोंकी सुरक्षा होती है; और वे रक्तशुद्धि के कार्य में निरन्तर लगे रहते हैं । इससे शारीरिक स्वास्थ्य उन्नत होता है, मन भी दृढ होता है । इसलिए शारीरिक या मानसिक विविध रोगियोंके लिए मौन बिना - मूल्य की दवाई है ।

मौनसे शारीरिक, मानसिक एवं वाचिक स्वास्थ्य प्रवृत्त रहता है । इस संसार में सारा व्यवहार शरीर, वाणी और मनपर निर्भर है " । इनकी विषमता होनेपर ही विविध कलहोंकी सृष्टि होती है । उनके साम्य वा स्वास्थ्य रहनेपर सांसारिक सब व्यवहारोंका सामञ्जस्य रहता है । इस कारण वाचंयमता - मौनव्रत एक आवश्यक व्यवहार है । इस प्रकार मौनसे जीवन सुखी हो जाता है । अप- भाषण - गाली - गलौज़की प्रवृत्ति घटती है । मित्र बढ़ते हैं । कुटुम्ब में ऐक्य रहता है; कुटुम्बके ऐक्य में समाज जीवन स्वस्थ रहता है । मौनकी समाप्तिमें भी वाणी- निग्रह आवश्यक है ।

मितभाषण मौनका प्रथम सोपान है । मितभाषी पुरुषके शब्द 421परिमित होते हैं; उनका दूसरेपर प्रभाव पड़ता है । जिस प्रकार सुनयना, चन्द्रवदना स्त्रीका मुख घूँघट में रहता हैं, तो उसे देखने की चाह बनी रहती है; जव मुख घूँघटसे बाहर आता है, तो सभीकी चित्तवृत्ति वलात् उधर खिंच जाती है, वह मनको हर लेती है; यही बात वाणीकेलिए भी है । मुखमें रहना वाणीका पर्दा है; मुखसे बाहर आना वाणीका पर्देसे वाहर आना है । वाक्- संयमीकी वाणीके प्रारम्भ होनेपर सभी उसके एक - एक शब्दको ध्यान से सुनते हैं । इसमें श्रीगान्धीजी निदर्शन थे । वह नियमित दिनमें मौन करके उसे समाप्त करके जब बोलना शुरू करते थे; तब जनराशि उनके वचनके सुननेके कुतूहलसे उनके पास इकट्ठी हो जाया करती थी, मौनके कारण भिन्नशब्दोंके प्रयोक्ता- उनके • जोरदार प्रभाव पड़ता था ।

है । साधक यदि मौनका अवलम्बन लेता है, तो दैवी - सम्पत्तिके आविर्भावक, उदात्त मानसिक - भावका उज्जृम्भण होता है । मौनसे. 422ही अनायास धर्म, अर्थ, कामकी प्राप्ति होती है, फिर मोक्ष की प्राप्ति भी सुलभ हो जाती है ।

' मुखादग्निरजायत ' ( यजु ० ३१११२ ) इस मन्त्रमें मुखसे अग्निको उत्पत्ति कहने से मुखसे उत्पन्न होती हुई वाणी भी अग्नि- स्वरूपा सिद्ध होती है । वही बढ़ी हुई वागग्नि उद्दीप्त होकर - शापरूप- को प्राप्त होकर दूसरोंके कुलोंको भी जला डालती है; इससे तदाश्रय- भूत रसना तथा अपने आत्माका भी अनिष्ट होता है । तब रसना- बल क्षीण हो जाता है । परन्तु वाक्संयममें तो पुरुषके पास स्वर्गीय - चातावरणका उदय होता है । मौन ही हमें आत्म - चिन्तन, मनन, ध्यान आदि में सुविधा देकर आत्माको विशुद्ध करके परमात्मासे मिलाने में सौकर्य कर दिया करता है, मनको दृढ बना दिया करता है, आरोग्यको प्राप्त कराता है । आत्मकल्याणेच्छु पुरुषोंको इस मौनका निश्छल अभ्यास करना चाहिये ।

( ३७ क ) घण्टानाद |

प्रातःकाल देवमन्दिरोंसे उठनेवाली दीर्घ प्ररणवनाद - सी सुमधुर घण्टा - ध्वनि भारतीय हिन्दुओं को अनादिकाल से परिचित एवं प्रिय है । देवपूजनमें घण्टा वा छोटी घंटीका नाद भी आवश्यक माना जाता है । जहां घंटी रहती है, वहां सर्प, अग्नि तथा बिजलीका भय नहीं होता । घंटे की ध्वनि देवताओंको प्रसन्न करनेवाली, असुर, राक्षस, भूत - प्रेतादिको भगा देने वाली, पापनिवर्तक, एवं अरिष्टनाशक बताई गई है । लौकिकरूपमें यह पता लग जाता है । कि — मन्दिरमें पूजा हो रही है; नियत समय पर होनेसे शहर वा

In English

Circumambulation and the Practice of Silence

This text explains the spiritual purpose of circumambulation (parikrama) around a deity to increase inner radiance. It also details the benefits of silence (mauna) as a form of mental austerity to preserve speech, physical health, and mental focus.

This chapter answers

  • Why do hindus perform parikrama?
  • Benefits of mauna or silence?
  • How does silence affect physical health?
  • Spiritual meaning of speech control?

Also written: Vanika, Upavasa, Va, Manasika, Tapa, Mauna, Vanika Upavasa Va Manasika Tapa Mauna, वाणीका उपवास वा मानसिक - तप, मौन

मूल ग्रन्थ

यह पाठ सनातन धर्मालोक ५के मुद्रित पृष्ठ 417–422 से ज्यों-का-त्यों लिया गया है — न कुछ जोड़ा गया है, न घटाया। स्कैन किया हुआ मूल पृष्ठ देखनेके लिये —

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