सनातन धर्मलोक ५ — पृष्ठ 451–460
सनातन धर्मलोक ५ · पृष्ठ 451–460
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शंख - ध्वनि - विज्ञान ४२३ गांववालोंको टाइमका भी पता लग जाता है 1 । बौद्ध, जैन, ईसाइयों-के मन्दिरोंमें भी इसका प्रयोग होता है । वर्मा, चीन, जापान, मिश्र, यूनान, रोम, फ्रान्स, रूस, इंगलैण्ड आदिमें भी घण्टेका व्यवहार प्राचीनकाल से है । घंटेकी ध्वनिसे कई रोग भी दूर होते हैं । इसका विशेष - लाभ ' देवमन्दिरगमन - विज्ञान ' में बताया जावेगा । ( ३७ ख ) शंख - ध्वनिविज्ञान । सन्ध्या कर चुकनेपर तथा हिन्दुओंके धर्ममन्दिरोंमें, धर्म-कथाओंमें शंखका नाद किया जाता है, यह भी रहस्य - पूर्ण है । वैज्ञानिक - प्रोफेसर जगदीशचन्द्रवसु - महोदयने अपने प्रयोगों से सिद्ध किया है कि - जहां तक शंखकी ध्वनि जाती है; वहां तक संक्रामक रोगोंके अनेक विषाक्त परमाणु स्वयं ही दूर हो जाते हैं, वहांका वायुमण्डल विशुद्ध हो जाता है । जो लोग हमपर यह आक्षेप करते हैं कि- यह लोग मुंहसे हड्डी छूते हैं, इस पर उन्हें जानना चाहिए कि - जैसे चमड़ा अशुद्ध होने पर भी प्रतिपक्षी भी मृगचर्मादिरूपमें उसका उपयोग लेते हैं, और उसे शुद्ध मानते हैं । जैसे देवमन्दिरमें चमड़ेके बने होनेसे जूता लेजानेका निषेध होने पर भी चमड़ेका मृदंग वा ढोल वहां ले जाया जाता है 1 । जैसे बाल अशुद्ध होने पर भी प्रतिपक्षी-लोगों से शिखा ( चोटी ) रूपमें प्रयुक्त किये जाते हैं, चमरीकी पूछ-चमर मन्दिरोंमें, गुरुद्वारों वा राजभवनों में झुलते हैं; और उन्हें शुद्ध माना जाता है; जैसे पुरीष अशुद्ध होने पर भी प्रतिपक्षी भी गोपुरीष ( गोबर ) रूपमें उसका उपयोग करते हैं, और उसे शुद्ध
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४२४ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) मानते हैं; मल अशुद्ध होनेपर भी भस्मरूपसे प्रयुक्त की जाती है, क्योंकि — भस्म अग्निकी मल होती है; जैसे कि कृष्णयजुर्वेद में कहा है – ' अग्नेर्भस्मासि, अग्नेः पुरीषमसि ' ( तै ० सं ० १/२/१२ ( ३ ) जैसे दांत अशुद्ध होने पर भी, अस्थिमय होनेपर भी, गजदन्तरूपमें प्रतिपक्षियोंसे भी उपयुक्त किये जाते हैं, वल्कि अपने मुखमें भी लगाये जाते हैं; अपनी स्त्रियों के हाथ में चूड़ीरूप में पहिनाये जाते हैं 1 । जैसे मूत्र अशुद्ध होने पर भी प्रतिपक्षी भी गोमूत्रादिरूपमें उसका प्रयोग करते हैं, और उसे शुद्ध मानते हैं । जैसे कि - कृमि -विशेषके मुखकी लारसे उत्पन्न भी रेशमको पवित्र माना जाता है । जैसे वमन ( उल्टी ) अशुद्ध होती हुई भी मधु - रूप में प्रतिपक्षियोंसे प्रयुक्त की जाती है, और यज्ञमें भी उसका प्रयोग किया जाता है; जैसे हड्डीरूप कौडियाँ भी सभीसे प्रयुक्त की जाती है; इसी तरह अस्थि अशुद्ध होती हुई भी शङ्ख आदि रूपमें उसका प्रयोग होता है, और शङ्खको शुद्ध माना जाता है । यह सब सामान्य - शास्त्रके अपवाद हैं । यदि कहा जावे कि — ' यह तो आपकी इच्छा हुई, जिसे चाहे शुद्ध वना दें, जिसे अशुद्ध ' । इसपर यह जानना चाहिए कि— सामान्य - शास्त्रके अपवाद् सर्वत्र हुआ करते हैं, और वे स्वाभाविक होते हैं; उन्हें वैसा ही मानना पड़ता है । आक्षेप्ता लोग जिन्हें हड्डी एवं अस्पृश्य कहते हैं; उनके मुखमें भी क्या हड्डी जुड़ी हुई नहीं, जिन्हें दाँत कहते हैं? क्या आप उन्हें निकलवा डालते हैं? आपके शरीर में रक्त भी है, हड़ियाँ भी हैं; उन्हें भी अस्पृश्य
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शंख - ध्वनि - विज्ञान ४२५ होनेसे निकलवा डालेंगे? शुक्र अस्पृश्य है; उससे बने हुए पुत्रको भी गिरा देंगे क्या?. यदि नहीं; तो स्पष्ट हो जाता है कि-जिसके बिना निर्वाह न हो; वा जिसमें कई गुणविशेष अनुभूत हों, उसकी अस्पृश्यता बाधित हो जाती है, और उसे अपवादस्थल माना जाता है । जब अनिर्वार्ह्यस्थल में भी अस्पृश्यता नहीं मानी जाती; तब जहां हमारे विज्ञानज्ञाता प्राचीन ऋषि - मुनियोंने विशिष्ट वस्तुओंमें वैज्ञानिक - दृष्टिसे शुद्धता देखी; वहाँ भला अस्पृश्यता, वा अशुद्धता वा त्याज्यता कैसे हो सकती है? इस प्रकार सभी सामान्य - शास्त्रके अपवादों में जानना चाहिये । इसके अतिरिक्त प्राकृतिक नियमोंसे भी यही प्रतीत होता है कि — अस्पृश्यता बलावलपर निर्भर है । जिस वस्तुमें वैज्ञानिक गुणोंका बल अधिक होता है, वहाँ अस्पृश्यता प्रवृत्त नहीं होती । जैसे सायङ्कालीन वायु अस्पृश्य होती है; वह सम्पूर्ण वृक्षोंको दूषित कर देती है, परन्तु अधिक बल रखनेवाले पीपल और वड़ आदि वृक्ष, तुलसी आदि पौधे उस वायुसे दूषित नहीं किये जा सकते । पूर्ववत् वे शुद्ध ही रहते हैं । अवश्य इनमें विशिष्ट शक्ति -हुआ करती है; जो अशुद्ध वायुको बलवान् नहीं होने देती । तभी हमारे शास्त्रों में तुलसी, पीपल आदि वृक्षोंको उत्तम वृक्ष माना गया है, सायं वा रात में भी इनके पास रहने से हमारी कोई हानि नहीं होती । इस प्रकार ऋषि - मुनियों ने मृगचर्म आदि तथा उनके वस्त्र, रेशमी कपड़ा आदि और गजदन्त एवं शङ्ख आदिको भी पवित्र
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४२६ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) कहा है । इस प्रकारकी विशिष्ट शक्तिको हमारे वैज्ञानिकमूर्धन्य पूर्वज जानते थे; तभी उन्होंने एतदादिकी व्यवहार्यता बताई है । शङ्खके वैज्ञानिक गुणोंपर विचार करना चाहिए । पहले हम वैज्ञानिक श्रीजगदीशचन्द्रबोसका इस विषय में अभिमत बता चुके हैं । धार्मिक लोगों में प्रसिद्ध है कि - प्रातः सायं शङ्ख बजाने से भूत हट जाते हैं - ' शङ्ख बाजे, भूत भागे ' । उनमें कीटाणु भी सूक्ष्म - भूतों में माने जाते हैं । दोनों सन्ध्याओं में तम और प्रकाशके मिश्रणसे रोगके कीटाणु पैदा होते हैं; और इधर - उधर फैल जाते हैं; और वे वायुमण्डलको अशुद्ध कर दिया करते हैं । तब शंखनाद कीटाणुओंका दूर करनेवाला होनेसे स्वयं ही आरोग्यकारक सिद्ध हुआ क्योंकि कीटाणु आरोग्यके विघातक हुआ करते हैं । संक्रामक रोगों में शङ्ख विशेष उपयोगी होता है । आजकलके वैज्ञानिक जिस नवीनताकी गवेषरणा करते हैं, आजके भारतीय उसमें बहुत हैरान हो जाते हैं । स्वयं कुछ भी नहीं करते, और न प्राचीन मुनियोंके वचनोंपर विश्वास वा श्रद्धा करते हैं । यह शंख मूकों ( गू गों ) को भी भाषणशक्ति देता है । यदि गूंगे प्रतिदिन तीन - चार बार शंख बजावें; और उन्हें बोलनेका अभ्यास कराया जाय, शंखमें डाला हुआ जल उन्हें पिलाया जाया करे, शंखभस्म उन्हें खिलाई जाए; और छोटे - शंखोंकी माला उन्हें पहराई जावे; तो वे मूक भी बोलने में कुछ सहायता प्राप्त कर लेते हैं । गण्डमाला - रोगमें शंख घिसकर लगानेसे लाभ होता है । क्षय, कृशता, विष तथा नेत्र रोगोंपर शंखको लाभदायी कहा गया है ।
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शंख - ध्वनि - विज्ञान ४२७ शंख शूल, गुल्म, संग्रहणी, दन्तरोग, आँखका फूला और फोड़ोंका नाश करता है । इसी कारण प्राचीन समय में बच्चोंकी ग्रीवामें छोटे - छोटे शंखोंको धागे में पिरोकर पहिनाते थे । इससे बच्चे शीघ्र बोल सकते थे, दृष्टिदोष भी उन्हें नहीं होता था । महाराष्ट्रमें शंखका जल बच्चोंको पिलाते हैं, इससे कई उनके रोग दूर हो जाते हैं । प्राचीन शास्त्रों में शंखको इसीलिए रत्न कहा जाता है । समुद्रसे जब चौदह रत्न निकले थे; उनमें शंख भी था । सब आगमोंके मूल वेदमें भी शंखका लाभ आया है । जैसे कि — ‘ शंखेन हत्वा रक्षांसि ' ( अथर्वसं ० ४।१०।२ ) यहाँ शंखसे सूक्ष्म राक्षसोंका नाश कहा है । सन्ध्याके बाद जो कि शंख बजाया जाता है, इससे भूत - प्रेत - राक्षसादिका नाश होता है— इस सनातन-धर्मियोंकी प्रसिद्धिको यहाँ वेदका समर्थन प्राप्त है । प्रातः शुद्ध-वायुमें शंख बजाने से श्वासोंकी शुद्धता, और छातीकी विशालता, और फेफड़ोंकी शुद्धि होती है, जिससे भीतर निरन्तर श्वासोंकी शुद्धि होने से राजयक्ष्मा आदि रोग नहीं होते; ऐसा वैज्ञानिकोंका कथन है । आर्यसमाजके प्रवर्तक स्वा ० दयानन्दजीने अपने यजुर्वेद-भाष्यमें ' अवरस्पराय शङ्खध्मम् ' ( ३०।१६ ) ' नीचे के शत्रुओंके अर्थ शंख बजानेवालेको उत्पन्न वा प्रकट कीजिये ' यह लिखकर शंख बजानेकी वैदिकता सिद्ध की है । उनके अनुयायी इधर दृष्टि डालें-यहाँ शत्रु रोगकीटाणु भी विवक्षित हो सकते हैं । ‘ समुद्राद् अधिजज्ञिषे ' ( अथर्व ० ४।१०।२ ) यहाँ शंखकी समुद्रसे
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४२८ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) उत्पत्ति बतलाई है । ' शङ्खो नो विश्वभेषजः कृशनः पातु अंहसः ' ( अथर्व ० ४।१०१३ ) यहाँ शंखको सब रोगोंका औषध स्वरूप, और पाप वा दुःखको दूर करनेवाला कहा है । ' दिवि जातः समुद्रजः सिन्धुतस्पर्याभृतः । स नो हिरण्यजः शङ्ख आयुष्प्रतरणो मणिः ' ( ०४ । १० । ४ ) यहां शंखको आयु देने वाला भी माना गया है । ' तत् ते बध्नामि आयुषे वर्चसे बलाय दीर्घायुत्वाय शतशारदाय ' ( अ ० ४ | १० | ७ ) यहां शंखको दीर्घ आयु, बल एवं तेज देनेवाला बताया है । जब वेद शंखकी इस प्रकारकी महिमा बताता है; तब वैदिकम्मन्य इसपर आक्षेप कैसे कर सकते हैं? बृहदारण्यक उपनिषद् में तथा अन्य श्रौतग्रन्थों में भी शंखके पर्याप्त प्रसङ्ग हैं । शंख बजानेके साथ ' कौशिकसूत्र ' में आयुवृद्धिकेलिए बालकके शरीरपर अभिमन्त्रित शंख बांधनेका भी विधान है । नक्षत्रकल्प ( १०/२ ) में शंखको पापहारी रक्षोघ्न, महौषध तथा दीर्घायुः प्रद बताया गया है । उसकी महत्ता इसीसे सूचित होती है कि-भगवान् विष्णु उसे नित्य धारण करते हैं । सनातनधर्मके देवमन्दिरोंमें, मठोंमें, संस्थाओंमें, भजन-मण्डलियों में, साधुओं की कुटियों में, कथाओं में, पूजा में, जप - पाठों में माङ्गलिक - उत्सवों में, शंखका पवित्र नाद भारत के घर - घर में होता है, और होता था । कुरुक्षेत्र - युद्ध में भगवान् श्रीकृष्णने पाञ्चजन्य नामक शंख बजाया था, युधिष्ठिरने अनन्तविजय, भीमसेनने पौण्ड्र, अर्जुनने देवदत्त, नकुलने सुघोष, सहदेवने मणिपुष्पक शंख बजाया । ( गीता १।१५-१६ ) । उससे शत्रुओं के हृदय फट गये ।
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शंख - ध्वनि - विज्ञान ४२६ इस प्रकार इसके बजाने में प्राचीनता भी सिद्ध हुई । इसकी श्रेष्ठता होनेसे ही भगवान की आरती के समय शंखका जल भक्तोंपर डाला जाता है । यूरोपीय विज्ञानवेत्ताओंने भी शंखमें मनुष्य-हितकारिणी विद्युत् मानी है । आयुर्वेद में भी शंखकी अपूर्व शक्तिका वर्णन है । शंखद्रवके सेवन करने से गुल्म, ताप, तिल्ली, मूत्रकृच्छ आदि रोग दूर हो जाते हैं । शंखभस्मसे पत्थरी, पीलियायन आदि रोग हट जाते हैं । इसीके योगसे वैद्य लोग बहुतसी दिव्य औषधियां तैयार करते हैं, लाभ प्राप्त करते तथा कराते हैं । यदि शंखमें जल वा गंगाजल सिद्ध करके पिलाया जाया करे; तो कीटाणुजनित सभी रोग दूर हो जाते हैं । इसमें विशेष खर्च भी नहीं पड़ता । इसमें विविध लाभोंको देखकर प्राचीनकालमें कुमारियां भी अपने बाहुमें शंखकी चूड़ियां पहिरती थीं; ' सांख्यदर्शन ' में इसका संकेत आया है — ' बहुभिर्योगे विरोधो रागादिभिः कुमारीशं - खवत् ' ( ४।६ ) इसका भाष्य यह है - ' यथा कुमारी हस्तशंखानामन्योन्य-सङ्ग ेन झणत्कारो भवतीत्यर्थः । यदि हड्डीकी भांति शंखकी अपवित्रता होती; तो प्राचीनकालमें इसका उपयोग कैसे होता? गीता और सांख्यदर्शनादिने उसका संकेत कैसे किया? तब ' शंख यह हड्डीमात्र है, उसे सनातनधर्मी मुखसे क्यों लगाते हैं? उसका बजाना पोपलीलामात्र है, यह कहते हुए आक्षेप्ता वैदिक - ज्ञान-शून्य तथा विज्ञानके ककहरेको भी न जाननेवाले सिद्ध हुए । यह ' आलोक ' पाठकोंने अनुभूत किया होगा ।
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४३० श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) यज्ञका वैज्ञानिक महत्व सन्ध्या करके फिर हवनादिरूप में देवयज्ञ भी किया जाता है । पारलौकिक लाभ तो इसका है ही; ऐहिक लाभ भी हैं । सनातन-हिन्दुधर्ममें यज्ञोंका बड़ा महत्त्व माना जाता है । इस धर्म में वेदोंका जो महत्त्व है; वही महत्त्व यज्ञोंको भी प्राप्त है; क्योंकि वेदोंका प्रधान विषय ही यज्ञ है; जैसे कि हम ' ब्राह्मणभाग भी वेद हैं ' इस निबन्ध में अग्रिम पुष्पमें बताएँगे । यह याद रखने की बात है कि अग्नि मानव समाजकी एक विशेष विभूति है । प्राणियों में मनुष्य ही केवल अग्नि - द्वारा काम लेते हैं; शेष तो अग्निसे दूर रहते हैं । वनमें हिंस्र जन्तुओं से . अपनी रक्षाका उपाय भी यही है कि - अपने चारों ओर अग्नि जलाकर रखी जाय । मनुष्य ही अग्नि द्वारा विविध कृत्योंको पूर्ण करता है । अग्नि द्वारा वह शक्ति उत्पन्न होती है, जिससे, मोटरें एवं रेलगाड़ियां चलती हैं, तार जाते हैं, विमान उड़ते हैं । अग्नि-द्वारा ही बाहरी तथा भीतरी भोजनकी पाकक्रिया सम्पन्न होती है, जिससे मनुष्य जीवन - धारण करता है । बहुत कहने से क्या, गर्भाशयी अग्निद्वारा ही मनुष्य आदिका शरीर पैदा होता है; और पुष्ट होता है । सुवर्ण आदि धातुओं की उत्पत्तिमें — जिनसे संसारका व्यवहार चलता है - कारण भी खानकी अग्नि ही है । जैसे कि ऋ ० सं ० में कहा है- ' रत्नधातमम् ' ( १ | १1१ ) महायुद्धों में जो महान् जनसंहार होता है, वह भी अग्निके ही बलसे । उसीके आश्रयसे बन्दूक चलती है, तोप चलाई जाती
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यज्ञका वैज्ञानिक - महत्व ४३.१ है, सर्वसंहारक अस्त्र चलते हैं, गैसें चलती हैं, वम डाले जाते हैं । जिस राष्ट्रके पास तेल, कोयला आदि अग्निका भोजन नहीं होता; वही अन्तमें हारता है । इसी कारण आक्रमणकर्ता राजा दूसरे राष्ट्रके पैट्रोल, तथा कोयलोंकी खानें नष्ट करनेकी चेष्टा करते हैं; जिससे दूसरोंकी पराजय और अपनी विजय हो! अग्नि के उत्पादन और उससे होनेवाले जनसंहारके नवीन ` प्रकारोंका उद्भावन आज के भौतिक विज्ञानने किया है; उसकी चकाचौंध में पड़कर आजका युवक समाज अपनी प्राचीन संस्कृति एवं ज्ञान-गौरवको भूल गया है; पर हमारे पूर्वज विज्ञानकी चरम - सीमा तक पहुँच गये थे । अग्निकी उपासना इस बातका प्रत्यक्ष प्रमाण है । प्राचीन युगमें अग्नि - द्वारा दिव्य - शक्तिके उत्पादनका अन्य ही प्रकार था । जैसे आजकल विधान - विशेषसे अग्निमें पेट्रोल और कोयलेकी आहुति देकर भौतिक - शक्ति पैदा की जाती है; वैसे ही पुराकालमें प्राचीन मुनि विधानविशेष एवं मन्त्रविशेषसे द्रव्य-विशेषकी आहुति देकर दिव्य शक्तिको उत्पन्न करके अपने तथा दूसरोंके मनोरथोंकी वर्षा करा देते थे । आजका वैज्ञानिक जगत् अभी तक भौतिक तत्त्वोंके सम्बन्धमें सन्दिग्ध ही है, परन्तु हमारे पूर्वज पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाशको पृथक् - पृथक् और सामुदायिक तत्त्व मानते थे । वे हमारे पूर्वज इन पदार्थोंका गुण - धर्म भली - भांति जान चुके थे । उनका कहना था कि स्थूलसे सूक्ष्म, तथा व्यक्तसे अव्यक्तमें उत्तरोत्तर शतगुणा और सहस्रगुणा अधिक शक्ति हुआ करती
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४३ ९ श्रीसनातनधर्मालोक ( ५ ) है । इसी आधार पर उन्होंने तत्त्वोंकी उपादेयता स्वीकृत की थी । उन्होंने जाना था कि पृथिवी ग्राहकता - शक्ति रखनेपर भी स्थूल होनेके कारण एक बीजको एक बारसें केवल बीस गुना अधिक बढ़ा पाती हैं । जल पृथिवीकी अपेक्षा सौ गुना सूक्ष्म होनेके कारण एक बीजको एक बारमें हज़ार - गुना अधिक बढ़ा सकता है । किन्तु ये दोनों पदार्थ परस्परकी अपेक्षा रखा करते हैं । पृथिवी जलके बिना और जल पृथिवीके बिना उत्पत्ति एवं विकास नहीं कर पाता । इसलिए जलको जीवन - तत्त्व मानकर भी ऋषियोंने इसकी उपासनापर वहुत अधिक बल नहीं दिया । इसके पश्चात् अग्निका स्थान आता है । आजका वैज्ञानिक-जगत् अग्निको विभाजक द्रव्य मानता है । उसका कहना है कि अग्निमें पड़कर कोई भी द्रव्य नष्ट नहीं होता, अपितु कई भागों में विभक्त होकर, स्थूलसे सूक्ष्म होकर और भी अधिक शक्तिशाली बनकर इधर - उधर फैल जाता है । हमारे तत्त्व - द्रष्टा ऋषियोंने भी यही माना था । बल्कि इससे भी सूक्ष्म विश्लेषण किया था कि अग्निमें पड़कर कौन पदार्थ किन - किन रूपोंमें विभक्त होकर, कहां तक जाकर किस रूप में प्राप्त होता है । इसी ज्ञानने विकसित होकर यज्ञ - यागादिको जन्म दिया था । और इसमें ऋषि - मुनियोंने बहुत बड़ी उन्नति कर डाली थी । प्राचीनकाल में हवनीय सम्पूर्ण पदार्थोंका संस्कार करके उनमें वह सूक्ष्म - शक्तियाँ पैदा की जाती थी; जो अभीष्ट उद्देश्यके लिए आवश्यक होती थीं । यज्ञमें काम आनेवाली ओषधियां अमुक