पञ्चम सुमन · प्रकरण 56

गोबर में लक्ष्मीका निवास

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513लक्ष्मीने कहा था- - ' ' दिष्ट्या प्रसादो युष्माभिः कृतो मेऽनुग्रहात्मकः । गया है कि- कृपा करके लक्ष्मीको कहा था कि तुम हमारे एवं भवतु भद्रं वः पूजितास्मि सुखप्रदा ' ( ८२।२५ ) इसमें यह बताया मूत्र, और गोवरमें रहो; इससे तुम्हारी चञ्चलता दूर होगी । सनातनधर्मके आचार - विचारों में यह विशेषता है कि उनमें जहां दृष्टफलकता हुआ करती है; वहां दृष्टफलकता भी होती है । अदृष्टरूपसे उसमें लक्ष्मीकी अभिमानिनी देवता निवास किया करती है, और दृष्टरूपमें उसमें लक्ष्मी भी निवास करती है ।

इसमें तात्पर्य यह है कि — भूमिमें जब खेती होती रहती हो; उसमें भूमिकी उत्पादक शक्ति क्रमशः क्षीण होती हुई नष्ट हो जाती है । यह बात अमेरिकाके वैज्ञानिकोंने अनुभूत की । तब उन्होंने भूमिकी उत्पादनशक्ति बढ़ानेकेलिए उसमें गोमूत्र से सने हुए गोबर का खाद भूमिमें डाला । जब भूमिकी उत्पादनशक्ति बढ़ी; तो उसके कारण गेहूँ भी प्रचुरमात्रामें बढ़ी, इसलिए गेहूँको संस्कृत में ' गोधूम ' कहते हैं । इस प्रकार गोवरके ही खादसे रुईकी खेती बढ़ती है । गेहूँकी वृद्धिसे अन्नकी वृद्धि तथा रुईकी वृद्धिसे वस्त्रकी वृद्धि होने पर संसारकी अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति होजानेसे लक्ष्मीकी प्राप्ति प्रत्यक्ष है । वह लक्ष्मी हमारी सदा स्थिर रहेगी । इस प्रकार ' गोमये विद्यते लक्ष्मीः ' यह ठीक ही है ।

गोबरके उपलोंके होनेपर हमें ईन्धन लेनेकी आवश्यकता नहीं पड़ती, उसकी भस्मसे ही पात्रोंकी शुद्धि होजानेसे हमें पात्र- शोधक यन्त्रोंकी आवश्यकता नहीं रहती । इस प्रकार लक्ष्मीके 514हमारे पास ही रहनेसे ' गोबर में लक्ष्मीका निवास ' यह कथन यथार्थ ही सिद्ध हुआ । पर आजकल हम ऐसा नहीं करते; उसके फल- स्वरूप हमारी लक्ष्मो भी खिंची हुई विदेशों में चली जा रही है । बूढ़ी वा अपाङ्ग गौ यदि दूध नहीं देती; तो गङ्गाजलरूप में तथा ओषधिरूपमें हमें गोमूत्र तो देती है; इससे रोग दूर होजानेसे हमें विलायती - दवाइयां मंगाकर लक्ष्मीको विदेश में भेजनेकी आवश्यकता नहीं रह जाती । इस प्रकार वह लक्ष्मीरूप गोवरभी तो देती है । तब उस वृद्धाका पालना भी हमारे लिए भाररूप नहीं सिद्ध होता 1 । वैसी गौओंको कसाईखाने में भेजनेकी सम्मति देने वाले कृतघ्न लोग अंग्रेजोंके मानसिक दास होनेसे भारत से अपने धनको विलायत में भेजने के एजेण्ट बने हुए हैं - यह बात भारतीयों को कभी नहीं भूलनी चाहिए ।

( ४८ ) पूर्वदिशा की ओर भोजनका विज्ञान ।

हम यहां तक प्रातःकालके आचार प्रायः बता चुके । अब पाठक मध्याह्नमें भोजनकी तैयारी कर रहे हैं; अतः उस समय के आचार - विचारों पर भी गम्भीर दृष्टि डालें ।

पूर्वदिशासे प्राणशक्तिका अभ्युदय होता हैं । हमारा प्राणस्वरूप सूर्य पूर्वदिशा से ही उदित होता है । अतः उसकी दिशा की ओर भोजन करनेसे भी हमारी प्राणशक्ति बढ़ेगी, और उससे आयु बढ़ेगी — यह स्वाभाविक है । डा. जार्ज कहते हैं कि — उत्तराभिमुख भोजन करनेसे विद्युत्का प्रवाह धमनियों में अत्यन्त वेगसे चलता है; अतः उत्तराभिमुख भोजन उतनी आयु नहीं देता, जितना कि

In English

The Presence of Lakshmi in Cow Products and the Science of Eating

This text argues that keeping cows provides material wealth through manure used for agriculture and medicine. It suggests that using cow products reduces dependence on foreign goods, thereby keeping wealth within the country. The chapter also introduces the importance of eating while facing east to increase life force.

This chapter answers

  • Why is lakshmi associated with cow dung?
  • How does cow manure help agriculture and economy?
  • Benefits of using cow urine for medicine?
  • Why should one eat facing east?

Also written: Gobara, Men, Lakshmika, Nivasa, Gobara Men Lakshmika Nivasa, गोबर में लक्ष्मीका निवास

मूल ग्रन्थ

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